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राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण नीति (2001)

राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण नीति (2001)

  1. परिचय
  2. लक्ष्य तथा उद्देश्य
  3. नीति निर्देश
    1. न्यायिक कानूनी प्रणाली
    2. निर्णय क्षमता
    3. विकास प्रक्रिया में एक लैंगिक दृष्टिकोण लागू करना
  4. महिलाओं का आर्थिक सशक्तीकरण
    1. गरीबी उन्मूलन
    2. लघु ऋण
    3. महिला तथा अर्थव्यवस्था
    4. वैश्विकरण
    5. महिला तथा कृषि
    6. महिला तथा उद्योग
    7. सहायक सेवाएं
  5. महिलाओं का सामाजिक सशक्तिकरण
    1. शिक्षा
    2. स्वास्थ्य
    3. पोषण
    4. पेय जल तथा स्वच्छता
    5. घर तथा आश्रय
    6. पर्यावरण
    7. विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी
    8. कठिन परिस्थितियों में महिलाएं
  6. महिलाओं के खिलाफ हिंसा
  7. बालिका के अधिकार
  8. जन संचार
  9. कार्यात्मक रणनीतियां
    1. कार्य योजनाएं
  10. सांस्थानिक प्रणालियां
  11. संसाधन प्रबंधन
  12. विधान
  13. लैगिंक सुग्राहिता
  14. पंचायती राज संस्थान
  15. स्वैच्छिक क्षेत्र संगठनों के साथ भागीदारी
  16. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग

परिचय

1.2 भारतीय संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकार, मौलिक कर्तव्य तथा दिशा-निर्देशक सिद्धांतों में लैंगिक समानता के सिद्धांत का उल्लेख किया गया है। संविधान न केवल महिलाओं की समानता को सुनिश्चित करता है, बल्कि राज्यों को महिलाओं के पक्ष में सकारात्मक भेदभाव का निर्देश देता है।

लोकतांत्रित राजनीति के ढांचे में हमारे कानून, विकास नीतियां, योजनाएं तथा कार्यक्रम को विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के उत्थान की ओर उन्मुख रखा गया है। पांचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-78) से महिला कल्याण से लेकर विकास तक के मुद्दे को उठाया जा रहा है। हाल के वर्षों में महिला सशक्तीकरण को महिला की दशा का एक केंद्रीय मुद्दा माना गया है। राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना वर्ष 1990 में संसद के एक अधिनियम द्वारा की गई है, जिसके तहत महिला के अधिकारों तथा कानूनी अशिकारों को सुरक्षा प्रदान की जाती है। संविधान का 73वां तथा 74वां संशोधन (1993) में पंचायत तथा नगर निकाय के चुनावों में महिला को आरक्षण प्रदान करने का प्रावधान किया गया है, जिससे स्थानीय स्तरों पर उनकी भागीदारी का मार्ग प्रशस्त होता है।

1.3 भारत ने विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय घोषणाओं तथा मानवाधिकार दस्तावेजों को अपना समर्थन दिया है, जो महिला के समान अधिकार की बात उठाते हैं। उनमें से प्रमुख है वर्ष 1993 में लाई गई महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन की घोषणा (CEDAW)।

1.4 द मेक्सिको प्लान ऑफ ऐक्शन (1975), नैरोबी फॉरवर्ड लुकिंग स्ट्रेटेजी (1985), द बीजिंग डिक्लेरेशन तथा प्लैटफॉर्म फॉर ऐक्शन (1995) व 21वीं शताब्दी में लैंगिक समानता तथा विकास व शांति पर आयोजित UNGA सत्र द्वारा ग्रहण किया गया आउटकम डॉक्युमेंट को भी भारत को पर्याप्त समर्थन मिला है।

1.5 यह नीति नौंवीं पंच वर्षीय योजना तथा महिला सशक्तीकरण से जुड़े अन्य क्षेत्र के लिए भी प्रतिबद्ध है।

1.6 महिलाओं का आंदोलन तथा गैर-सरकारी संगठनों का एक विशाल नेटवर्कों ने, जिनकी भूमि स्तर की उपस्थिति है और महिलाओं की समस्याओं की गहरी समझ है, महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए प्रेरक प्रयास किया है।

1.7 हालांकि संविधान, विधायिका, नीतियां, योजनाएं, कार्यक्रम और संबद्ध प्रणालियों व देश में महिलाओं की वास्तविक दशा के बीच एक चौड़ी खाई मौजूद है। भारत में महिलाओं की दशा पर गठित समिति की रिपोर्ट ‘समानता की ओर’,1974 में इसका गहन विश्लेषण किया गया है और 1988-2000 में महिलाओं के लिए राष्ट्रीय योजना, श्रमशक्ति रिपोर्ट, 1988 व ‘कार्य मंच पांच वर्ष बाद- एक मूल्यांकन’ को रेखांकित किया गया।

1.8 लैंगिक असमानता कई रूपों में दिखाई पड़ती है, जिसका सबसे सामान्य रूप है जनसंख्या में स्त्रियों के अनुपात का लगातार नीचे गिरना। सामाजिक ढर्रा तथा घरेलू और सामाजिक स्तर की हिंसा इसके अन्य रूप हैं। बालिकाओं, किशोरियों तथा महिलाओं के खिलाफ भेदभाग देश के कई हिस्सों में पाए जाते हैं।

1.9 लैंगिक असमानता के छुपे कारणों का संबंध सामाजिक तथा आर्थिक रचना से है, जो औपचारिक तथा अनौपचारिक रीतियों औत व्यवहारों पर आधारित है ।

1.10 परिणामस्वरूप विशेषकर अनुसूचित जाति/जनजातियां/ अन्य पिछड़ी जातियां तथा अल्पसंख्यक समुदाय समेत समाज के कमजोर वर्गों की महिलाओं तक शिक्षा, स्वास्थ्य तथा उत्पादक संसाधनों की पहुंच अपर्याप्त है। अतः वे प्रायः हाशिए पर रह कर गरीबी और सामाजिक रूप से बहिष्कृत जीवन जीने के लिए मजबूर रहती हैं।

लक्ष्य तथा उद्देश्य

1.11 इस नीति का लक्ष्य महिलाओं की उन्नति, विकास तथा सशक्तीकरण को मूर्त रूप देना है। इस नीति का व्यापक प्रसार किया जाएगा ताकि इसके लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सभी साझेदारों को सक्रिय भागीदारी करने के लिए प्ररित किया जा सके। इस नीति के उद्देश्यों में विशेषकर निम्नांकित शामिल हैं:

(i)       महिलाओं के पूर्ण विकास हेतु सकारात्मक आर्थिक तथा सामाजिक नातियों के जरिए एक माहौल का निर्माण करना, ताकि वे अपनी क्षमताओं को क्षमझ सकें।

(ii)      राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा नागरिक क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा सभी मानवाधिकारों तथा मौलिक आजादियों का पुरुषों के समान कानूनी तथा व्यावहारिक उपयोग करना।

(iii)     सामाजिक, राजनैतिक तथा आर्थिक जीवन में महिलाओं द्वारा भागीदारी और निर्णय क्षमता का समान अवसर।

(iv)     स्वास्थ्य देखभाल, सभी स्तर की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, करियर तथा व्यावसायिक मार्गदर्शन, रोजगार, समान वेतन, पेशेवर स्वास्थ्य तथा सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा तथा सरकारी ऑफिस इत्यादि में समान अवसर की उपलब्धता।

(v)      कानूनी सिस्टम को सुदृढ़ करना, जिसका उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ होने वाले सभी प्रकार के भेदभाव का उन्मूलन।

(vi)     पुरुष तथा महिला दोनों के सक्रिय भागीदारी और साझीदारी द्वारा सामाजिक धारणाओं और सामुदायिक व्यवहारों में परिवर्तन लाना।

(vii)    विकास प्रक्रिया में एक लैंगिक दृष्टिकोण को लागू करना।

(viii)    महिलाओं तथा बालिकाओं के खिलाफ होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव का उन्मूलन; तथा

(ix)     सिविल सोसाइटी के साथ खास कर महिला संगठनों के साथ साझेदारी का निर्माण तथा उसका सशक्तीकरण।

नीति निर्देश

न्यायिक कानूनी प्रणाली

कानूनी-न्यायिक प्रणाली को अधिक जिम्मेदार तथा महिलाओं की आवश्यकता के प्रति संवेदनशील बनाया जाएगा, खासकर घरेलू हिंसा तथा निजी उत्पीड़न के मामलों में। नए कानून को लागू किया जाएगा और मोजूदा कानून की समीक्षा की जाएगी ताकि त्वरित न्याय प्रदान किया जा सके और दोषी को कड़ी से कड़ी सजा दी जा सके।

2.2 सामुदायिक तथा धार्मिक नेताओं समेत सभी भागीदारों की पूर्ण भागीदारी के साथ इस नीति का उद्देश्य है पर्सनल लॉ जैसे शादी, तलाक, गुजारा भत्ता तथा अभिभाकत्व आदि में सुधान लाना, ताकि महिलाओं के खिलाफ भेदभाव को खत्म किया जा सके।

2.3 पुरुष प्रधान समाज में संपत्ति के अधिकार ने महिला को दोयम दर्जा पर रहने के लिए मजबूर किया है। इस नीति का उद्देश्य है संपत्ति और विरासत के मालिकाना हक से जुड़े कानूनों में सुधार लाना है, ताकि महिलाओं को लैंगिक न्याय मिल सके।

निर्णय क्षमता

3.1 शक्ति की साझेदारी में महिलाओं की समानता तथा निर्णय क्षमता में उनकी सक्रीय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी, ताकि सशक्तीकरण के लक्ष्य की पूर्ति की जा सके। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, कॉरपोरेट, सांवैधानिक निकायों तथा सलाहकार आयोग, समितियों, बोर्ड, ट्रस्ट इत्यादि में सभी स्तरों की निर्णय क्षमता में महिलाओं की समान पहुंच बनाने के लिए सभी उपाय किए जाएंगे। उच्च विधायिका समेत सभी क्षेत्रों में आरक्षण/कोटा पर विचार किया जाएगा। महिला हितैषी कर्मचारी नीतियों का भी निर्माण किया जाएगा, ताकि महिलाओं को विकास प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी निभाने का मौका मिल सके।

विकास प्रक्रिया में एक लैंगिक दृष्टिकोण लागू करना

4.1 सभी विकास प्रक्रियाओं में उत्प्रेरक, भागीदार तथा प्राप्तकर्ता के रूप में महिलाओं के दृष्टिकोण को लागू करने के लिए नीतियों, कार्यक्रमों एवं प्रणालियों की स्थापना की जाएगी। जहां कहीं भी नीतियों तथा कार्यक्रमों में अंतर दिखाई पड़ेगा, उन्हें पाटने के लिए महिला के लिए तैयार विशिष्ट हस्तक्षेपों को लागू किया जाएगा। ऐसे मुख्य धारा प्रणालियों की प्रगति की समीक्षा के लिए समय-समय पर समंवयन तथा निगरानी प्रणाली तैयार की जाएगी। परिणामस्वरूप महिला के मामले तथा चिंताओं को सभी संबंध कानूनों, क्षेत्रगत नीतियों, योजनाओं तथा कार्यक्रमों में उठाया और प्रतिबिंबित किया जाएगा।

महिलाओं का आर्थिक सशक्तीकरण

गरीबी उन्मूलन

5.1 चूंकि महिलाएं गरीबी रेखा के नीचे बसर करने वाली विशाल जनसंख्या निर्मित करती हैं और प्रायः अत्यधिक गरीबी में जीवन व्यतीत करती हैं, ऐसे में घर से बाहर की कड़वी सच्चाइयों तथा सामाजिक भेदभाव, वृहत अर्थव्यवस्था नीतियों तथा गरीबा उन्मूलन कार्यक्रमों के जरिए ऐसी महिलाओं की जरूरतों तथा समस्याओं से निपटा जा सकत है। उन कार्यक्रमों का उन्नत क्रियांवयन किया जाएगा जो पहले से ही महिला केंद्रित हैं। गरीब महिलाओं को संगठित करने और सेवाओं के एकत्रीकरण के लिए आवश्यक उपाय किए जाएंगे, जिसके तहत उन्हें कई प्रकार के आर्थिक तथा सामाजिक विकल्प प्रदान किए जाएंगे और साथ ही उनकी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए आवश्यक सहायक उपाय भी किए जाएंगे।

लघु ऋण

5.2 उपभोग तथा उत्पादन के लिए महिलाओं को ऋण की प्राप्ति के अवसरों को बढ़ावा देने के लिए नई तथा मौजूदा लघु-ऋण प्रणालियों व लघु-वित्त स्थितियों को सुदृढ़ किया जाएगा। विस्तृत वित्तीय स्थितियों तथा बैंकों के जरिए पर्याप्त ऋण प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए अन्य सहायक उपाय भी अपनाए जाएंगे ताकि गरीबी रेखा से नीच बसर करने वाले सभी महिलाओं को ऋण की सरल उपलब्ध सुनिश्चित हो सके।  

महिला तथा अर्थव्यवस्था

5.3 बृहत आर्थिक तथा सामाजिक नीतियों को तैयार करने तथा उनके क्रियांवयन में महिलाओं को शामिल कर उनके दृष्टिकोण को स्थान दिया जाएगा। उत्पादकर्ता तथा मजदूर के रूप में सामाजिक-आर्थिक विकास में उनकी भूमिका की औपचारिक व अनौपचारिक क्षेत्रों में (घरेलू काम करने वाली महिलाएं भी शामिल हैं) पहचान की जाएगी और रोजगार तथा उनकी कार्यदशाओं की रूपरेखा तैयार की जाएगी। ऐसे उपायों में शामिल होंगे:

जहां कहीं भी आवश्यक हो काम की पारंपरिक अवधारणा की पुनरव्याख्या और पुनर्परिभाषा, जैसे जनगणना रिकॉर्ड में महिलाओं के योगदान को उत्पादक तथा मजदूर के रूप में दिखाया जाना।

सैटेलाइट तथा राष्ट्रीय खातों का निर्माण। उपरोक्त (i) तथा (ii) को लागू करने के लिए सही क्रिया विधियों का विकास।

वैश्विकरण

वैश्विकरण ने महिलाओं की समानता के लक्ष्य की पूर्ति के लिए नई चुनौतियां खड़ी की हैं जिसके लैंगिक प्रभाव को योजनाबद्ध तरीके से मूल्यांकित नहीं किया जा सका है। हालांकि वृहत स्तर के अध्ययनों से जिन्हें महिला तथा बाल विकास विभाग द्वारा संचालित किया गया, यह पता चलता है कि रोजगार की पहुंच बनाने तथा गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजित करने के लिए नीतियों में फेर-बदल करने की जरूरत है। वृद्धिरत वैश्विक अर्थव्यवस्था के लाभों का असमान वितरण हुआ है, जिससे व्यापक आर्थिक विषमता पैदा हुई है, गरीबी का स्त्रीकरण, खासकर अनौपचारिक अर्थव्यवस्था तथा ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यदशा में गिरावट होने और असुरक्षित कार्य वातावरण को बढ़ावा मिलने से लैंगिक असमानता में वृद्धि हुई। महिलाओं की क्षमता बढ़ाने तथा नकारात्म सामाजिक तथा आर्थिक प्रभाव से निपटने के लिए उनके सशक्तीकरण के लिए रणनीतियां तय की जाएंगी।

महिला तथा कृषि

5.5 कृषि तथा सहायक क्षेत्रों में उत्पादक के रूप में महिलाओं के अहम योगदानों को देखते हुए संकेंद्रित प्रयास किया जाएगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ट्रेनिंग, विस्तार तथा विभिन्न कार्यक्रमों के लाभ उनकी संख्या के अनुपात में ही उन तक पहुंच सके। मृदा संरक्षण, सामाजिक वानिकी, डेरी विकास तथा अन्य व्यावसायिक सहायक कृषि क्षेत्रों जैसे उद्यान विज्ञान, मवेशी पालन, पॉल्ट्री, मछली पालन इत्यादि में महिलाओं के प्रशिक्षण की व्यवस्था को कृषि क्षेत्र के श्रमिक महिलाओं तक भी विस्तार किया जाएगा।

महिला तथा उद्योग

5.6 इलेक्ट्रॉनिक्स, सूचना प्रौद्योगिकी तथा खाद्य प्रसंस्करण और कृषि उद्योग व टेक्स्टाइल उद्योग में महिलाओं द्वारा निभाई अहम भूमिका इन क्षेत्रों के विकास में काफी महत्वपूर्ण रही है। उन्हें श्रम कानून, सामाजिक सुरक्षा तथा अन्य सहायक सेवाओं में व्यापक मदद की जाएगी, ताकि वे विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में भागीदारी निभा सके।

5.7 वर्तमान में महिलाएं कारखानों में रात की पाली में काम नहीं कर सकतीं, भले ही वे ऐसा चाहती हों। कारखानों में रात की शिफ्ट में महिलाएं काम कर सकें इसके लिए उचित उपाय अपनाने होंगे। इसके लिए सुरक्षा, परिवहन इत्यादि के लिए सहायक सेवाएं बहाल करनी होगी।

सहायक सेवाएं

5.8 महिलाओं के लिए सहायक सेवाएं, जैसे बच्चों की देखभाल की सुविधाएं, कार्यस्थल तथा शिक्षण संस्थाओं में पालनाघर, वृद्धाओं और विकलांग महिलाओं के लिए घर जैसी सुविधाओं का विस्तार और उन्नत किया जाएगा ताकि सामाजिक, राजनैतिक तथा आर्थिक जीवन में उनके पूर्ण सहयोग को सुनिश्चित किया जा सके और एक अनुकूल वातावरण का निर्माण किया जा सके। महिलाओं के विकास प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए महिला हितैषी कर्मचारी नीतियों का भी निर्माण किया जाएगा।

महिलाओं का सामाजिक सशक्तिकरण

शिक्षा

6.1 महिलाओं तथा लड़्कियों के लिए शिक्षा का समान अवसर मुहैय्या कराया जाएगा। भेदभाव को समाप्त करने, शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए, निरक्षरता को खत्म करने, एक लैंगिक संवेदनशील शिक्षा प्रणाली बनाने के लिए, नामांकन में इजाफा करने, तथा कक्षा में लड़कियों की उपस्थिति दर में विस्तार करने तथा जीवन भर के प्रशिक्षण के लिए  शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए, साथ ही महिलाओं की व्यावसायिक/तकनीकी क्षमताओं में सुधार के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा में लैंगिक अंतर को कम करना एक मुख्य लक्ष्य होगा। मौजूदा नीतियों में क्षेत्रवार समय सीमा की पूर्ति का ध्यान रखा जाएगा, जिसमें खासकर अनुसूचित जाति/ जनजातियों/ अन्य पिछड़ी जातियों, अल्पसंख्यक समुदाय की  लड़कियों तथा महिलाओं पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। शिक्षा प्रणाली के सभी स्तरों पर लैंगिक संवेदनशील पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाएगा, जिससे लैंगिक भेदभाव के एक कारण के रूप में लैंगिक रूढ़िवादिता से निपटा जा सके।

स्वास्थ्य

6.2महिलाओं के स्वास्थ्य की एक समग्र नीति जिसमें पोषण तथा स्वास्थ्य सेवाएं दोनों शामिल हैं, अपनाई जाएगी तथा जीवन के हर चरण में महिलाओं तथा लड़कियों की आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। शिशु मृत्यु तथा मातृ मृत्यु दर में कमी एक प्राथमिक चिंता है, जो मानव विकास का एक संवेदनशील संकेतक है। यह नीति राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 में उल्लेख की गई शिशु मृत्यु दर (आइएमआर), मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) के लिए राष्ट्रीय जनांकीय लक्ष्यों पर जोर डालती है। महिलाओं के लिए व्यापक, सस्ता तथा गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुरक्षा उपलब्ध किया जाना चाहिए। ऐसे उपाय अपनाए जा रहे हैं, जो महिलाओं की प्रजनात्मक अधिकारों को सुनिश्चित करते हैं, ताकि वे सूचित विकल्पों को अपना सकें, यौन तथा स्वास्थ्य समस्याओं जैसे संक्रमणों तथा फैलने वाले रोगों जैसे मलेरिया, टीबी तथा जल जनित रोगों और हाइपर टेंशन तथा कार्डियो-पल्मोनरी रोगों के प्रति अपनी संवेदनशीलता पर विचार कर सकें। एचआइवी/एड्स तथा अन्य यौन संक्रमण रोगों का सामाजिक, विकासात्मक तथा स्वास्थ्य परिणामों से लैंगिक दृष्टिकोण से निपटा जाएगा।

6.3 शिशु तथा मातृ मृत्यु तथा और कम उम्र में शादी की समस्या से प्रभावी रूप से निपटने के लिए मृत्यु, जन्म तथा शादी के सूक्ष्म स्तर के बेहतर और सटीक आंकड़े की जरूरत होगी। मृत्यु तथा जन्म के सख्त पंजीकरण लागू किया जाएगा तथा शादी के पंजीकरण को अनिवार्य किया जाएगा।

6.4 राष्ट्रीय जनसंख्या नीति (2000) की जनसंख्या स्थिरिकरण के प्रति प्रतिबद्धता के अनुरूप यह नीति परिवर नियोजन हेतु पुरुष तथा महिलाओं के अपने पसंद की सुरक्षित प्रभावी तथा सस्ती विधि तथा समय से पहले विवाह तथा संतानों के बीच सही अंतर रखने की समस्या पर जोर डालती है। शिक्षा के प्रसार, शादी का अनिवार्य पंजीकरण तथा BSY जैसे विशेष कार्यक्रम से शादी की उम्र में विलम्ब की जानी चाहिए ताकि 2010 तक बाल विवाह समाप्त हो जाए।

6.5 स्वास्थ्य सुरक्षा तथा पोषण के बारे में महिलाओं का पारंपरिक ज्ञान को उचित प्रलेखन के जरिए पहचान दिलाई जाएगी तथा ऐसे ज्ञान के उपयोग का प्रोत्साहन दिया जाएगा। भारतीय तथा वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति का विस्तार महिलाओं के लिए उपलब्ध समग्र स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर में किया जाएगा।

पोषण

6.6 महिलाओं में शैशव, बचपन तथा किशोर उम्र व प्रजनन अवस्था में कुपोषण तथा रोगों के उच्च खतरे को देखते हुए हर जीवन अवस्था में उनकी पोषण आवश्कताओं पर व्यापक ध्यान दिया जाएगा। किशोरी, गर्भवती महिला तथा स्तनपान कराने वाली महिला के स्वास्थ्य के साथ उनके शिशु तथा छोटे बच्चों के स्वास्थ्य के साथ संबंध को देखते हुए भी यह काफी महत्वपूर्ण है। वृहत तथा सूक्ष्म तत्त्वों की कमी की समस्या से निपटने के लिए, खासकर गर्भवती तथा स्तनपान कराने वाली महिलाओं में, क्यों कि इससे कई प्रकार के रोग तथा विकलांगता के खतरे रहते हैं।

6.7 घर के अंदर महिलाओं तथा लड़कियों के पोषण भेदभाव को सही रणनीति के जरिए समाप्त करना होगा। घर के भीतर पोषण असंतुलन तथा गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिला की विशेष पोषण समस्या से निपटने के लिए व्यापक पोषण शिक्षा शुरु करनी होगी। इस प्रणाली की योजना, निगरानी तथा आपूर्ति में महिलाओं की भागीदारी भी सुनिश्चित करनी होगी।

पेय जल तथा स्वच्छता

6.8विशेषकर ग्रामीण तथा शहरी झोपड़ पट्टियों में महिलाओं के लिए घर के पास सुरक्षित पेय जल, सीवेज के निस्तारण, शौचालय की सुविधा तथा स्वच्छता की आवश्यकता पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। ऐसी सेवाओं की योजना, निगरानी तथा रखरखाव में महिलाओं की भागीदारी भी सुनिश्चित करनी होगी।

घर तथा आश्रय

6.9. हाउसिंग नीति, हाउसिंग कॉलोनी की योजना तथा ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में आश्रय के प्रावधान में महिलाओं के दृष्टिकोण को भी शामिल किया जाएगा।  अविवाहित महिलाओं, घर की प्रमुख महिलाओं, नौकरी करने वाली महिलाओं, छात्राओं, प्रशिक्षु तथा ट्रेनी महिलाओं के लिए पर्याप्त तथा सुरक्षित हाउसिंग व्यवस्था के लिए विशेष ध्यान दिया जाएगा।

पर्यावरण

6.10 पर्यावरण, संरक्षण तथा पुनःस्थापन की नीतियों तथा कार्यक्रमों में महिलाओं को भागीदार बनाया जाएगा तथा उनके विचार भी लिए जाएंगे। उनकी जीविका पर पर्यावरण कारकों के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, पर्यावरण संरक्षण तथा पर्यावरण विनाश पर नियंत्रण के कार्यों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। ग्रामीण महिलाओं की एक बड़ी आबादी ऊर्जा के प्राकृतिक स्रोतों जैसे उपलों, अनाज के भूसियों, पुआलों पर निर्भर रहती हैं। पर्यावरण हितैषी रूप में इन संसाधनों के दक्ष इस्तेमाल को सुनिश्चित करने के लिए इस नीति का उद्देश्य होगा गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों का प्रसार करना। सौर ऊर्जा, बायोगैस, धुम्रहीन चुल्हा और अन्य ग्रामीण अनुप्रयोगों के प्रसार में महिलाओं को शामिल किया जाएगा, ताकि पारितंत्र पर व ग्रामीण महिलाओं के जीवन परिवर्तन में इन उपायों के स्पष्ट प्रभावों को देखा जा सके।

विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी

6.11 विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में महिलाओं की गहन भागीदारी के लिए कार्यक्रम चलाए जाएंगे। इनमें शामिल होंगे छात्रों को उच्च शिक्षा में विज्ञान विषयों का चयन करने के लिए प्रेरित करना, तथा विज्ञान तथा तकनीकी इनपुट वाले विकास प्रॉजेक्ट में महिलाओं की पूर्ण भागीदारी का प्रयास करना। वैज्ञानिक रुझान तथा जागरुगता के विकास के लिए भी कदम उठाए जाएंगे। उनकी विशेष योग्यता वाले क्षेत्रों जैसे बातचीत तथा सूचना तकनीकी के लिए प्रशिक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। महिलाओं की आवश्यकता के अनुरूप तथा उनके द्वारा किए जाने वाले नीरस कार्यों को कम करने के लिए उचित तकनीकी विकास किया जाएगा।

कठिन परिस्थितियों में महिलाएं

6.12 महिलाओं की स्थितियों की विविधता की पहचान करने और विशेषकर वंचित समूहों की आवश्यकता को समझने के लिए आवश्यक उपाय तथा कार्यक्रम चलाए जाएंगे। इन समूहों में शामिल हैं वे महिलाएं जो अत्यधिक गरीब हैं, दरिद्र महिलाएं, संघर्ष की परिस्थितियों में फंसी महिलाएं, प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित महिलाएं, अत्यल्प विकसित क्षेत्रों की महिलाएं, विकलांक विधवाएं, बुजुर्ग महिलाएं, कठिन परिस्थितियों में जीने वाली अविवाहित महिलाएं, घर की मुखिया महिलाएं, रोजगार से हटाई गई महिलाएं, प्रवासी महिलाएं या वे जो विवाह हिंसा की शिकार होती है, बांझ महिलाएं और वैश्याएं इत्यादि।

महिलाओं के खिलाफ हिंसा

 

7.1 महिलाओं के खिलाफ होने वाली शारीरिक तथा मानसिक, चाहे यह घरेलू या सामाजिक  हो, भले ही वे परंपरा से जन्मे हों, पर सभी प्रकार की हिंसाओं से प्रभावी रूप से निपटा जाएगा। सहायता हेतु संस्थान तथा प्रणाली/योजनाओं का निर्माण किया जाएगा और ऐसी हिंसाओ को रोका जाएगा, जिनमें कार्य स्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न, दहेज प्रथा जैसी घटनाएं भी शामिल होंगी। इसके तहत हिंसा की शिकार महिलाओं का पुनर्वास भी किया जाएगा और दोषी पर प्रभावी कार्रवाई की जाएगी। महिलाओं तथा लड़कियों के व्यापार से निपटने वाले कार्यक्रमों तथा उपायों पर विशेष बल डाल जाएगा।

बालिका के अधिकार

 

8.1 बालिका के खिलाफ किसी भी प्रकार के भेदभाव तथा उनके अधिकारों के उल्लंघन को समाप्त किया जाएगा। इसके लिए घर तथा घर-परिवार के बाहर बचावकारी तथा दंडात्मक दोनों प्रकार के उपाय किए जाएंगे। इसके लिए जन्म पूर्व लिंग निर्धारण तथा स्त्री भ्रूण हत्या की प्रथा, स्त्री शिशु हत्या, बाल विवाह, बालिका के साथ दुर्व्यवहार  तथा बालिका दहेज इत्यादि के कड़े नियम लागू किए जाएंगे। परिवार के अंदर तथा इसके बाहर बालिका के साथ व्यवहार में भेदभाव हटाने तथा बालिका होने की सकारात्मक छवि बनाने पर जोर दिया जाएगा। बालिकाओं की आवश्यकताओं पर विशेष जोर डाला जाएगा तथा उनके पोषण, स्वास्थ्य तथा शिक्षा व व्यावसायिक शिक्षा से जुड़े क्षेत्रों में पर्याप्त निवेश किया जाएगा। बाल श्रम को समाप्त करने हेतु क्रियांवयन कार्यक्रमों में बालिकाओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

जन संचार

9.1 महिलाओं तथा लड़कियों की गरिमामय छवि के प्रसार के लिए माडिया का इस्तेमाल किया जाएगा। यह नीति महिलाओं की गलत, अपमानित तथा पारंपरिक नकारात्मक व उनके खिलाव हिंसा की  छवि पेश करने से रोकेगी। निजी क्षेत्र के सहभागी तथा मीडिया नेटवर्कों को हर स्तर पर शामिल किया जाएगा, ताकि विशेषकर सूचना तथा संचार तकनीकियों में महिलाओं को समान भागीदारी प्रदान की जा सके। मीडिया को आचार संहिता, व्यावसायिक दिशा-निर्देश तथा अन्य आत्म नियंत्रण वाली प्रणालियों के विकास के लिए बढ़ावा दिया जाएगा, ताकि लैंगिक रूढ़िवादिता को हटाकर महिलाओं तथा लड़कियों की संतुलित छवि को प्रतिबिंबित किया जा सके।

कार्यात्मक रणनीतियां

 

कार्य योजनाएं

10.1 इस नीति को व्यवहार में उतारने के लिए सभी केंद्रीय तथा राज्य मंत्रालय समय सीमा युक्त कार्य योजना तैयार करेंगे, जिसमें केंद्र/राज्य महिला अत्था बाल विकास विभाग तथा राष्ट्रीय/राज्य महिला आयोग के साथ परामर्श किया जाएगा। इस योजना में मुख्यतः निम्न शामिल हैं:-

i)        वर्ष 2010 तक प्राप्त किए जाए योग्य लक्ष्य।

ii)       संसाधनों की पहचान तथा प्रतिबद्धता।

iii)      कार्य बिंदुओं के क्रियांवयन की जिम्मेदारी।

iv)    कार्य बिंदुओं तथा नीतियों की दक्ष निगरानी, समीक्षा तथा लैंगिक प्रभाव वाले मूल्यांकन सुनिश्चित करने काली संरचना तथा प्रणालियां।

v)       बजट निर्माण प्रक्रिया में लैगिंग दृष्टिकोण को शामिल करना।

10.2 बेहतर योजना तथा कार्यक्रम संचालन व संसाधनों के पर्याप्त आबंटन को बढ़ावा देने के लिए विशेष एजेंसियों के साथ मिलकर जेंडर डेवलपमेंट इंडिसेस (जीडीआई) का विकास किया जाएगा। इसका विश्लेषण तथा अध्ययन गहराई से किया जाएगा। लैंगिक आंकड़ा परीक्षण तथा मूल्यांकन प्रणालियों के विकास पर भी ध्यान दिया जाएगा।

10.3 केंद्र तथा राज्य सरकार की सभी प्राथमिक डेटा संग्रह एजेंसियों तथा निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों के अनुसंधान व अकादमिक संस्थानों द्वारा उपलब्ध लैंगिक डेटा का संग्रह संपन्न किया जाएगा। महिलाओं की दशा को दर्शाने वाले अहम क्षेत्रों में डेटा तथा सूचनाओं के खालीपन को इनके द्वारा तुरंत भरा जाएगा। सभी मंत्रालय/कॉरपोरेशन/बैंक और वित्तीय संस्थानों इत्यादि को कार्यक्रमों से संबंधित डेटा के सग्रह, क्रमवार समूहन, प्रसार और रखरखाव/प्रकाशन की सलाह दी जाएगी। इससे नीतियों का सार्थक योजना निर्माण तथा मूल्यांकन में मदद मिलेगी।

सांस्थानिक प्रणालियां

11.1 महिलाओं की उन्नति को बढ़ावा देने वाली सांस्थानिक प्रणालियां, जो केंद्र तथा राज्य स्तरों पर विद्यमान हैं, को मजबूत बनाया जाएगा। ऐसा आवश्यक हस्तक्षेपों के जरिए किया जाएगा तथा इसमें पर्याप्त संसाधनों का प्रावधान, प्रशिक्षण  तथा वृहत-नीतियों को प्रभावित करने वाला वकालत क्षमता, विधायिका, कार्यक्रम इत्यादि पर विचार किया जाएगा।

11.2 समय-समय पर नीति की कार्यात्मकता की निगरानी के लिए राष्ट्रीय तथा राज्य परिषद बनाए जाएंगे। राष्ट्रीय परिषद के प्रमुख प्रधान मंत्री होंगे तथा राज्य परिषद के मुख्य मंत्री होंगे और सदस्य के रूप में इसमें संबंधित विभाग/मंत्रालय/राष्ट्रीय तथा राज्य महिला आयोग, सामाजिक कल्याण बोर्ड, एनजीओ के प्रतिनिधि, महिला संगठन, कॉरपोरेट सेक्टर, ट्रेड यूनियन, वित्तीय संस्थान, अकादमिक व्यक्ति, विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता इत्यादि शामिल होंगे। ये निकाय इस नीति के क्रियांवयन में हुई प्रगति का वर्ष में दो बार समीक्षा करेंगे। राष्ट्रीय विकास परिषद को भी समय-समय पर कार्यक्रम की प्रगति के बारे में सूचित किया जाएगा ताकि उससे सही सलाह और टिप्पणियां प्राप्त की जा सके।

11.3 महिलाओं के लिए राष्ट्रीय तथा राज्य संसाधन केंद्र की स्थापना की जाएगी, जिसके जरिए सूचनाओं का संग्रह, प्रसार, चालू अनुसंधान कार्य, सर्वेक्षण का संचालन, प्रशिक्षण का क्रियानवयन तथा जागरुकता निर्माण कार्यक्रम चालू किया जाएगा। ये केंद्र महिला अध्यययन केंद्रों तथा अन्य अनुसंधान व अकादमिक संस्थानों से उपयुक्त सूचना नेटवर्किंग प्रणालियों के जरिए जुड़े रहेंगे।

11.4 जहां जिला स्तर के संस्थान को मजबूती प्रदान की जाएगी वहीं मूल स्तर पर आंगनवाड़ी/गांव/शहर स्तर पर स्वयं-सहायता समूह (SHGs) जैसे कार्यक्रमों द्वारा महिलाओं को मदद दी जाएगी। महिलाओं के समूहों को उनके अपने पंजीकृत सोसाइटी में संस्थानीकरण व पंचायत/नगरपालिका स्तर पर संघबद्ध होने हेतु मदद की जाएगी। ये सोसाइटी सरकार तथा गैर-सरकारी माध्यमों, जैसे- बैंक तथा वित्तीय संस्थानों द्वारा उपलब्ध कराए संसाधनों वपंचायतों/नगर निकायों के साथ नजदीकी संबंध स्थापित कर का उपयोग कर सभी सामाजिक तथा आर्थिक विकास कार्यक्रमों के क्रियान्यवन के बीच तालमेल स्थापित करेंगे।

संसाधन प्रबंधन

 

12.1 नीति के क्रियांवयन हेतु पर्याप्त वित्तीय, मानव तथा मार्केट संसाधनों की उपल्ब्धता को संबंधित विभागों, वित्तीय ऋण संस्थानों तथा बैंकों, निजी क्षेत्र, सिविल सोसाइटी तथा अन्य संबद्ध संस्थानों द्वारा प्रबंधित किया जाएगा। इस प्रक्रिया में निम्न शामिल होगा:

(a) महिलाओं को दिए जाने वाले लाभ प्रभाव तथा लैंगिक बजट निर्माण के जरिए उनसे जुड़े कार्यक्रमों के लिए संसाधनों का आबंटन का मूल्यांकन। इन योजनाओं के तहत महिलाओं को अधिकतम लाभ दिलाने के लिए नीतियों में उचित परिवर्तन;

(b) पूर्व में रेखांकित नीति को प्रोमोट करने और विकास करने के लिए संबंधित विभागों द्वारा पर्याप्त संसाधन आबंटन।

(c) क्षेत्र स्तर तथा अन्य ग्रामीण स्तर के कार्यों में स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, शिक्षा तथा महिला व बाल विकास विभाग के बीच तालमेल बनाना।

(d) उपयुक्त नीति पहल के जरिए बैंकों तथा वित्तीय ऋण संस्थानों द्वारा ऋण आवश्यकताओं की पूर्ति करना तथा महिला तथा बाल विकास विभाग के साथ समन्वयन के साथ नए संस्थानों का विकास करना।

12.2 नौंवीं योजना में अपनाई गई महिलाओं की घटक योजना, जो यह सुनिश्चित करती है कि सभी मंत्रालयों तथा विभागों से महिलाओं के लिए 30% से कम लाभ/फंड आबंटित न किए जाएं, को प्रभावी रूप से क्रियांवित किया जाएगा ताकि महिलाओं तथा लड़कियों की हर स्तर पर आवश्यकताओं व हितों पर ध्यान दिया जा सके। नोडल मंत्रालय के रूप में महिला तथा वाल विकास विभाग घटक योजना के क्रियांवयन का समय-समय पर निगरानी व समीक्षा करेगा, जो योजना आयोग के साथ गुणवत्ता तथा परिमाण दोनों के संदर्भ में होगा।

12.3 महिलाओं के उत्थान हेतु सहायक कार्यक्रमों और परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए निजी क्षेत्र के निवेशों को भी संकेंद्रित करने के प्रयास किए जाएंगे।

विधान

 

13.1 मौजूदा विधान संरचना की समीक्षा की जाएगी और नीति के क्रियांवयन के लिए अतिरिक्त विधायिका उपायों को चिह्नित विभागों द्वारा अपनाया जाएगा। इसमें सभी प्रकार के लैंगिक भेदभाव को दूर करने के मौजूदा कानून, जिसमें पर्सनल, पारंपरिक तथा जनजाति नियम, उप-विधान, संबंधित नियम और कार्यपालिका व प्रशास्नात्मक नियम की समीक्षा भी शामिल हैं। इस प्रक्रिया की योजना 2000-2003 की अवधि के बीच बनाई जाएगी। विशेष आवश्यक उपायों के लिए परामर्श प्रक्रिया लागू की जाएगी, जिसमें शामिल होंगे- सिविल सोसाइटी, राष्ट्रीय महिला आयोग तथा महिला तथा बाल विकास विभाग। उचित मामलों में अन्य प्रतिभागियों को भी शामिल करने के लिए परामर्श प्रक्रिया को विस्तृत किया जाएगा।

13.2 विधियों के प्रभावी क्रियांवयन को सिविल सोसाइटी व समुदायों की भागीदारी द्वारा बढ़ावा दिया जाएगा। यदि आवश्यक हुआ तो विधान प्रक्रिया में उचित परिवर्तन किया जाएगा।

13.3 इसके अलावा विधान के प्रभावी क्रियांवयन के लिए निम्नांकित अन्य उपाय भी किए जाएंगे।

(a) सभी आवश्यक कानूनी प्रावधानों का कड़ा अनुपालन तथा शिकायतों की त्वरित कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी, जिसमें हिंसा तथा लैंगिक उत्पीड़न पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

(b) कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने और दंड देने के कदम, संगठित/असंगठित क्षेत्र में महिला श्रमिकों के लिए सुरक्षा व प्रासंगिक कानूनों जैसे समान वेतन अधिनियम तथा न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का कड़ाई से पालन किया जाएगा।

(c) महिलाओं के खिलाफ अपराध, उनकी घटनाएं, बचाव, जांच, पड़ताल तथा सजा देने की प्रक्रिया की क्राइम रिव्यू मंच तथा केंद्र, राज्य और जिला स्तरीय सम्मेलनों में नियमित रूप से समीक्षा की जाएगी। मान्यताप्राप्त स्थानीय, स्वैच्छिक संगठनों को महिलाओं तथा लड़कियों के खिलाफ हिंसा व उत्पीड़ की शिकायत दर्ज करने तथा पंजियन संपन्न करने, अनुसंधान व कानूनी कार्रवाई करने के लिए अधीकृति किया जाएगा।

(d) पुलिस थाने में महिला सेल, एन्करेज वुमन पुलिस स्टेशन फैमिली कोर्ट, महिला कोर्ट, परामर्श केंद्र, कानूनी सहायता केंद्र व न्याय पंचायत को सुदृढ़ किया जाएगा और महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा तथा उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए विस्तार किया जाएगा।

(e) विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया कानूनी साक्षरता कार्यक्रम तथा अधिकार सूचना कार्यक्रमों के जरिए कानूनी अधिकारों, मानवाधिकारों तथा अन्य महिला अधिकारों के सभी आयामों की जानकारियों का प्रसार किया जाएगा।

लैगिंक सुग्राहिता

14.1 राज्य के कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका विभागों के कर्मचारियों का प्रशिक्षण, जिसमें नीति तथा कार्यक्रम निर्माता, क्रियांवयन तथा विकास एजेंसियों, कानून अनुपालन प्रणाली व न्यायपालिका और साथ ही गैर-सरकारी संगठनों पर ध्यान दिया जाएगा। अन्य उपायों में शामिल हैं:

(a) लैंगिक मुद्दे की सामाजिक जागरुकता और महिला अधिकारों को प्रोमोट करना।

(b) लैंगिक शिक्षा व मानवाधिकार मामलों को शामिल करने हेतु पाठ्यक्रम तथा शैक्षिक सामग्रियों की समीक्षा।

(c) सभी सार्वजनिक व कानूनी दस्तावेजों से महिलाओं की गरिमा के अनादरपूर्ण संदर्भों को हटाना।

(d) महिला की समानता व सशक्तीकरण से जुड़े सामाजिक संदेशों के प्रसार के लिए जन संचार के विभिन्न रूपों का इस्तेमाल करना।

पंचायती राज संस्थान

15.1 संविधान का 73वां तथा 74वां सशोधन (1993) में महिला के लिए राजनैतिक शक्ति संरचना में बढ़ी हुई भागीदारी व समान उपलब्ध का प्रावधान किया है। सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने की प्तक्रिया में PRI में अहम भूमिका निभाएगा। PRIs तथा स्थानीय स्वशासन मूल स्तर पर महिलाओं के लिए राष्ट्रीय नीति के क्रियांवयन तथा संचालन में सक्रिय रूप से शामिल होगा।

स्वैच्छिक क्षेत्र संगठनों के साथ भागीदारी

16.1 महिलाओं को प्रभावित करने वाली सभी नीतियों व कार्यक्रमों के सूत्रीकरण, क्रियांवयन, निगरानी व समीक्षा में स्वयं सेवी संगठनों, एसोसिएशन, संघ, ट्रेड यूनियन, गैर-सरकारी संगठनों, महिला संगठनों, साथ ही शिक्षा, ट्रेनिंग व अनुसंधान से जुड़े संस्थान को शामिल किया जाएगा। इस दिशा में संसाधनों व क्षमता निर्माण से जुड़े उचित सहायता प्रदान की जाएगी और महिला सशक्तीकरण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा दिया जाएगा।

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग

17.1 इस नीति का उद्देश्य है महिला सशक्तीकरण पर अंतर्राष्ट्रीय बाध्यताओं/प्रतिबद्धताओं का क्रियांवयन करना, जैसे कंवेशन ऑन आल फॉर्म ओफ डिस्क्रिमिनेशन अगैंस्ट वुमन (CEDAW), कंवेन्शन ऑन द राइट्स ऑफ थे चाइल्ड  (CRC), इंटरनेशनल कंफरेंस ऑन पॉपुलेशन एंड डेवलपमेंट (ICPD+5) तथा अन्य दस्तावेज। महिला सशक्तीकरण की दिशा में अनुभवों को साझा कर, विचारों तथा तकनीकियों के आदान-प्रदान द्वारा, संस्थानों व संगठनों के साथ नेटवर्किंग व द्वि-स्तरीय और बहु-स्तरीय भागीदारियों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय, क्षेत्रीय व उप-क्षेत्रीय सहयोग।

 

स्त्रोत: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार



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