অসমীয়া   বাংলা   बोड़ो   डोगरी   ગુજરાતી   ಕನ್ನಡ   كأشُر   कोंकणी   संथाली   মনিপুরি   नेपाली   ଓରିୟା   ਪੰਜਾਬੀ   संस्कृत   தமிழ்  తెలుగు   ردو

गैर-सरकारी संगठनों का संचालन तथा प्रबंधन

परिचय

इस अध्याय में बताया गया है की गैर-सरकारी संगठनों को किस प्रकार संचालित तथा प्रबधित किया जाता है। इससे सम्बन्धित अनेक मसलों पर इस अध्याय में चर्चा की गई है जिनमें जबाबदेही, प्रबंधन, मानव संसाधन विकास/ प्रशिक्षण, मूल्यांकन और मॉनिटरिंग, सूचना, नेट्वर्किंग तथा सहमेल-निर्माण शामिल हैं।

गैर-सरकारी संगठनों की जबावदेही

उत्तर और दक्षिण दोनों गैर-सरकारी संगठनों के सामने अपनी जबाबदेही तथा प्रतिनिधिकता के सवालों को हल करने को चुनौती है। इस सम्बन्ध में दो प्रमुख सवाल पूछे जा रहे हैं:

  • गैर-सरकारी संगठन किसके प्रति जबावदेही है?
  • वे किनका या +किसका प्रतिनिधित्व करते हैं?

इन सवालों को लेकर चली बहस इधर इसलिए भी तेज हुई है क्योंकि उनके कार्य-क्षेत्र का विस्तार हुआ है तथा उनकी संरचनाओं में नियंत्रण की निजी व सहभागी दोनों रूप, यानी निगमित और अनिगमित इकाइयों के विविध रूप शामिल हो गए हैं।

शुरू में तो ऐसा लगता है जैसे इन सवालों के जवाब बहुत सरल हैं। एक निगमित गैर-सरकारी संगठन पर बोर्ड ऑफ़ मैनेजमेंट या न्यासियों का नियंत्रण होता है और इस तरह वह उन्हीं के प्रति जबाबदेह होता है। इन लोगों को संगठन से कोई वित्तीय लाभ प्राप्त नहीं होते और वे एस अर्थ में स्वतंत्र होते हैं कि उनका उस तरह का भी कोई निहित स्वार्थ या हित नहीं होता जो संगठन के कमर्चारियों या लाभार्थियों को हो सकता है। सहभागी गैर-सरकारी संगठन मो बोर्ड का चुनाव सदस्यों द्वारा किया जाता है। इस प्रकार संगठन सचमुच जनतान्त्रिक तथा अपने सदस्यों के प्रति जबाबदेही होता है।

आम तौर पर गैर-सरकारी संगठन पंजीकरण, नियमन आदि की प्रक्रियाओं के माध्यम से व्यापक जनगण के प्रति जबाबदेही होते हैं। कोषदाताओं के प्रति भी रिपोर्टिंग के माध्यम से उत्तरदायी होते हैं।

सीमांत तथा अधिकारहीन लोगों की बीच काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन अपने को इन लोगों के हितों के प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं। जो गैर-सरकारी संगठन साधनहीन के किसी खास पक्ष पर काम करते हैं यह समूचे समाज को प्रभावित करने वाले मसले पर काम करते हैं, वे किसी विशिष्ट जन-समूह के प्रतिनधि की बजाए एक तरह के ध्येय के प्रतिनिधि के रूप में अपने को देखते हैं। दोनों ही मामलों में प्रतिनिधित्व वहीँ मजबूत होगा जहाँ गैर-सरकारी संगठन का ढांचा निजी होने की बजाए सहभागी होगा। पर गैर-सरकारी संगठनों की जवाबदेही और प्रतिनिधिकता के सवाल इससे कहीं अधिक जटिल है।

यह इतना सरल नहीं है, यह बात उक्त परिचर्चा के विशिष्ट पहलुओं में निहित है। ऐसा भी हो सकता है की निजी गैर-सरकारी संगठन जिस बोर्ड द्वारा नियत्रित किये जाते हों वह मात्र रबड़ की मोहर हो तथा वास्तव में कमचारी संगठन को नियंत्रित करते हों। इस तरह निजी संगठन, जिनमें सहभागी संगठनों जैसी जनतांत्रिक जवाबदेही  नहीं होती, वास्तव मी किसी के प्रति नहीं, पर अपने प्रति जवाबदेही हो सकते हैं। निजी गैर-सरकारी संगठनों को कुछ लोगों द्वारा जनता या ध्येय का प्रतिनिधित्व करने की आड़ में अपने व्यक्तिगत व राजनितिक आकांक्षाओं के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। कई ऐसे संगठन जो सहभागी संगठन होने का दावा करते है, गहरी छानबीन के बाद “सांकेतिक” सदस्यता वाले संगठन पाए गए और इस तरह वास्विकता में उनपर निजी नियंत्रण पाया गया तथा उनका धोखेबाज उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया गया था।

जिस तरह मुट्ठीभर धोखेबाज गैर-सरकारी संगठन बहुसंख्यक गैर-सरकारी संगठनों की निष्ठा व ईमानदारी पर बिना बात का संदेह पैदा कर सकते हैं ठीक उसी तरह थोड़े से ऐसे संगठन भी बहुसंख्यक संगठनों पर ऐसे लोगों का नियंत्रण होता है जो सच्ची व्यक्तिगत प्रतिबद्धता और सरोकार से उत्प्रेरित होते हैं और ईमानदारी व निष्ठा के उच्च मानदंड स्थापित करते हुए काम करते हैं।

गैर-सरकारी संगठन अनेक तरीकों से अपने अभिशासन तथा संचालन की गुणवत्ता में सुधार ला सकते हैं। बहुत-से गैर-सरकारी संगठन पहले ही इस तरह के सुधारों की जरुरत महसूस कर चुके हैं। इस तरह के अनेक संकेत मिले हैं इस तरह के सुधार किये जा रहे हैं, इन परिवर्तनों से उठे मसलों और बहसें चल रही हैं। पर जिस वातावरण में गैर-सरकारी संगठन काम करते हैं, उसमें परिवर्तन करने से इन लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता मिलेगी।

गैर-सरकारी संगठनों के अभिशासन तथा संचालन में सुधार

गैर-सरकारी संगठन अपने अभिशासन और संचालन निम्नलिखित तरीकों से सुधार ला रहे हैं:

 

  • अपने मिशन, मूल्यों तथा लक्ष्यों को साफ-साफ बताना और यह सुनिश्चित करना कि उनकी रणनीतियाँ आर कार्यचालन हर समय इन्हीं के अतर्गत हों,
  • बेहतर प्रबंधकीय प्रक्रियाएं, साथ ही वित्तीय प्रबंध, लेखा और बजटिंग प्रणालियाँ
  • बेहतर मानव संसाधन विकास और संगठन के भीतर प्रबंधकों, प्रशासकों, परियोजना कर्मियों, बोर्ड सदस्यों, लाभार्थियों, सदस्यों व स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण
  • यह सुनिश्चित करने की बेहतर क्रिया-विधियाँ कि महिलाओं और पुरुषों को सदस्यों से लेकर नेताओं तक संगठन के सभी स्तरों पर प्रभावशाली रूप में भाग लेने का अवसर मिले
  • संगठन अरु उसकी परियोजनाओं, सेवाओं और क्रियाकलापों की मॉनिटरिंग, मूल्यांकन तथा समीक्षा के लिए बेहतर साधन
  • गैर-सरकारी संगठनों द्वारा गैर-सरकारी संगठनों के लिए बेहतर सूचना सम्बन्धी व्यवस्था
  • गैर-सरकारी संगठनों के लिए बेहतर नेटवर्किंग और सहमेल-निर्माण

 

प्रबंधन

गैर-सरकारी संगठनों में काम काफी प्रयास की अपेक्षा रखता है। परम्परागत रूप से इनकी ओर वे लोग खींचते हैं जिनके उच्च आदर्श होते हैं जिनमें असीम उर्जा, रचनात्मकता, प्रतिबद्धता और लचकीलापन होता है। इस क्षेत्र में कार्यकर्त्ता तथा नेतृत्व के स्तर पर महिलाओं की सहभागिता का स्तर काफी उच्च है। बेशक, जमाईका जैसे कुछ देशों में गैर-सरकारी संगठनों के नेतृत्व में महिलाओं का प्रतिनिधित्व है। हाल में गैर-सरकारी संगठनों की गतिविधियों में जो उभार देखने में आया है वह परिणामत्मक ही नहीं, गुणात्मक भी है। जैसा कि हम कह आये हैं, अब गैर-सरकारी संगठन काफी बड़ी और जटिल इकाईयां हैं जो अपने कार्यक्रम खुद चलाती हैं तथा साथ ही सरकारें व  अन्य संगठन उन्हें सार्वजानिक सेवाएं प्रदान करने का काम सौंपते हैं। वे साथ-साथ अनेक गतिविधियाँ चला सकते हैं- सेवा प्रदान करने से लेकर एडवोकेसी संसाधनों से अपने काम के लिए कोष प्राप्त करने का प्रयास भी करते हैं तथा इन कोषों का अत्यंत प्रभावकारी और दक्षतापूर्ण ढंग से उपयोग करते हैं। वे अपने कार्य की लगातार समीक्षा, मॉनिटरिंग और नियोजन करते रहते हैं। उन्हें वेतनभोगी कर्मचारियों, बोर्ड सदस्यों, कार्यकर्ताओं, सदस्यों और लाभार्थियों के दल की रचनात्मक उर्जाओं को जुटाने के योग्य होना होता है। यह आवश्यक है कि एक ओर वे उत्प्रेरित भी करें और दूसरी ओर प्रबंधन कार्य भी करें। सहभागी गैर-सरकारी संगठनों में तो प्रबंधकों के लिए भी यह जानना जरुरी है कि लोगों के साथ किस प्रकार कार्य करना है। बहुत से गैर-सरकारी संगठन बाहरी स्रोतों के कोषों पर निर्भर होने के कारण असुरक्षित स्थितियों में कार्य करते हैं।

इस सबका अर्थ यह है कि गैर-सरकारी संगठनों के प्रबंधकों को एक बेमिसाल किस्म के पुरुष और महिलाएँ होना पड़ता है। इस बात को स्वीकार किया जाता है  कि:

इन बेमिसाल किस्म के लोगों के निजी गुणों के साथ-साथ ऐसा ज्ञान व दक्षताएं आवश्यक है जो गैर-सरकारी संगठनों के कार्यों, प्रावधानों, लक्ष्यों समूहों आदि के लिए तथा समूचे संगठन के प्रबंधन के कार्यों के लिए प्रासंगिक हों। गैर-सरकारी संगठनों के प्रबंधकों के निजी गुण ही संगठन के कार्य और विकास के लिए प्रर्याप्त नहीं होते। दूसरे शब्दों में:

गैर-सरकारी संगठनों में दक्षतापूर्ण और प्रभावशाली प्रबंध-अकरी और वित्तीय प्रणालियों आवश्यक हैं।

मानव संसाधन विकास और प्रशिक्षण

गैर-सरकारी संगठनों का कार्य उससे खिन अधिक कठिन और दुष्कर हैं जितना आम तौर पर माना जाता है। निजी और सार्वजनिक क्षेत्र से इन संगठनों में आने वाले प्रबंधकों और कर्मचारियों का भी यही कहना है। गैर-सरकारी संगठन अक्सर ऐसी परियोजनाएं हाथ में लेती हैं जो सिमित संसाधनों वाली, पर व्यापक और जटिल होती हैं। फिर भी गैर-सरकारी संगठनों के बारे में यह मिथ्या धारण फैली है कि गैर-सरकारी संगठनों का कार्य विशेष कठिन नहीं है।

अब गैर-सरकारी संगठनों के प्रबंधकों के प्रशिक्षण को अधिकाधिक रूप से  विशिष्ट कार्य माना जा रहा है। कुछ देशों में तो इस कार्य के लिए एजेंसियों खुल गई हैं। अक्सर ये एजेंसियाँ भी गैर-सरकारी संगठन ही होती है। अब अधिकाधिक रूप से बोर्डों, सदस्यों, कार्यकर्ताओं और लाभार्थियों के विशिष्ट मानव संसाधन विकास और प्रशिक्षण की जरुरत महसूस की जा रही है और इस दिशा में कार्य किया जा रहा है। यह इस मान्यता पर आधारित है कि एक प्रशिक्षित और प्रभावशाली बोर्ड का होना उतना ही आवश्यक है जितना योग्य व सक्षम लाभार्थियों का होना। भलीभांति प्रशिक्षित और जानकारी रखने वाले बोर्ड अपने कर्मचारियों पर अपेक्षाकृत कम निर्भर होते हों और वे कर्मचारियों को समुचित रूप से जवाबदेही बना सकते हैं।

गैर-सरकारी संगठनों द्वारा की गई इस मानव संसाधन विकास/प्रशिक्षण सम्बन्धी पहलकदमियों में से कुछ अन्तर्राष्ट्रीय रुझान वाली पहलकदमियां हैं। कुछ अन्य संगठन गैर-सरकारी संगठनों को शोध व परामर्श सेवाएं प्रदान करते हैं और साथ ही उनके लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाते हैं। इसके आलावा, अब अधिकाधिक गैर-सरकारी संगठन प्रशिक्षण पर समय और संसाधन खर्च कर रहे हैं। कोषदाता संगठन भी यह कार्य कर रहे हैं। उनकी पहल और सहायता व भागीदारी से अनेक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाएं जा रहे हैं। पर इस सबके बाबजूद अक्सर ही यह विचार व्यक्त किया जाता है कि अभी भी गैर-सरकारी संगठन और उनके कोषदाता इस कार्य पर बहुत कम निवेश कर रहे हैं।

अन्य क्षेत्रों की तरह गैर-सरकारी संगठनों में भी मानव संसाधन विकास की शुरुआत सही योग्यता और प्रतिभा वाले कर्मचारियों को ओनी ओर आकर्षित करने से होती है। इसका अर्थ यह भी है कि वे उचित वेतन और सेवा-स्थितियां प्रदान कर पाने में सक्षम हैं। गैर-सरकारी संगठनों में कार्यरत बहुत-से लोगों का मानना है कि उनमें कार्य या नौकरी की असुरक्षा एक प्रमुख समस्या है। गैर-सरकारी क्षेत्र नौकरी की असुरक्षा महिलाओं और पुरुषों को सदैव एक ही तरीके से प्रभावित नहीं करती। बहुत-से देशों में श्रम शक्ति अध्ययन बताते हैं कि कम वेतन वाले सेवा क्षेत्र में महिलाओं की संख्या अधिक है और इसके अतर्गत बहुत-से गैर-सरकारी संगठनों में भी आते हैं। यह एक ऐसा कारक हो सकता है जो गैर-सरकारी क्षेत्र से उन महिलाओं की अधिक संख्या को स्पष्ट करता है जो आम तौर पर कल्याण के के क्षेत्र में आती है।

जहाँ गैर-सरकारी संगठनों का सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करने काम दिया गया है वहाँ भी नौकरी की असुरक्षा की स्थिति बनी हुई है। ऐसा इस कारण है कि ऐसी सेवाएं प्रदान करने के रुझान के साथ-साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में बाजार अर्थतंत्र को लागू करने का रुझान भी अक्सर दिखाई देता है। इसका अर्थ यह है कि अनुबंध प्राप्त करने के लिए गैर-सरकारी संगठन एक-दूसरे से और यहाँ तक कि निजी संगठनों से प्रतिद्वंदिता करते हैं। अनेक देशों में ऐसे रुझान काफी आगे तक बढ़ चुके हैं। इसके चलते इस मुद्दे तक ही सिमित नहीं है। बहुत-से  गैर-सरकारी संगठन अब यह सवाल उठाने लगे हैं कि क्या मानवीय जरूरतों, मसलों और समस्याओं को ऐसे “बाजार” के रूप में देखा जाना चाहिए जिसके भीतर प्रतिद्वंदिता होती है। गैर-सरकारी संगठनों में मानव संसाधन विकास के इस पहलू में कोषदाता और सेवाएँ प्रदान करने वाली संस्थाएं प्रमुख भूमिकाएं अदा करती हैं।

गैर-सरकारी संगठनों के कर्मचारियों को उचित वेतन के सवाल पर एक अन्य बहस भी चली है जो गैर-सरकारी संगठनों और उनके कर्मचारियों के आम्र तौर पर “पेशेवर” होने के संबध में है। एक विचार यह है कि उन संगठनों के कर्मचारियों को अन्य क्षेत्रों के कर्मचारियों जितना ही वेतन मिलना चाहिए। दूसरे विचार के अनुसार गैर-सरकारी संगठनों के कर्मचारी निःस्वार्थ कम वेतन वाले समर्पित शौकिया कार्यकर्ता होते हैं, न कि निपुण पेशेवर लोग। निःसंदेह ऐसे गैर-सरकारी संगठन भी हैं जो अतिवादी नजरिया अपनाते हैं:

“(गैर-सरकारी संगठन) अब एक ऐसा उद्योग है जिसमें काफी पैसा बनाया जा सकता है। (राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन ‘अ’)  का निदेशक (प्रति वर्ष) 75,000 अमरीकी डालर का वेतन पाटा है। (राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन ‘ब”) का वेतन उच्च सरकारी अधिकारियों के बराबर है। (वह) कल्याण क्षेत्र में अभिजन है जबकि (ऐसे) नेता सार्वजनिक तौर पर निर्धारित की भर्त्सना करते हैं—“

यह एक बड़ी पेचिदा बहस है। इसमें नियंत्रण, जवाबदेही और प्रतिनिधित्व के सवाल भी शामिल हैं जिन पर हमने ऊपर विचार किया है:

“कई स्वैछिक संगठन सामान्यतः केन्द्रीय सत्ता वाले हो गए हैं। उनके निदेशक निरंकुश बन गए हैं और वे जनतान्त्रिक प्रक्रिया के अनुसार नहीं चलते जिन लोगों के साथ काम करते हैं उनके साथ उनकी पहचान न के बराबर है—यह सच्चे जन संगठनों में जो होता है, उसका ठीक उल्टा है—लोगों के लिए गैर-सरकारी संगठन—दलाल—बन गये हैं, वे नये ठेकेदार हैं जिन्होंने उन भूस्वामियों और सूदखोरों की जगह ले ली है—जिन्हें लोग अक्सर शोषक तथा लुटेरे मानते हैं।

इसलिए गैर-सरकारी संगठन एक ओर तो व्यावसायिक होने और समुचित वेतन देकर तथा कर्मचारियों विकास में निवेश करके  व्यावसायिकता का यह स्तर हासिल करने का प्रयास करते हैं और दूसरी ओर प्रभावशाली व सक्षम होने के लिए अपने परम्परागत मूल्यों व क्षमता को बनाये रखते हैं और इन दोनों स्थितियों के बीच अंतर करना कठिन है। यह रास्ता कोई सरल रास्ता नहीं है गैर-सरकारी संगठनों क क्षेत्र समाज में अन्य क्षेत्रों के रुझानों, श्रम बाजार की ताकतों तथा व्यक्तिवाद की ओर ले जाने वाले सामाजिक रुझानों से अपरिहार्य रूप से प्रभावित होता है। कुछ हद तक गैर-सरकारी संगठनों को इन रुझानों के बीच काम करना होता है और इनसे उनका प्रभावित होना अपरिहार्य है। किन्तु गैर-सरकारी संगठनों उन मूल्यों और निःस्वार्थ लक्ष्यों को ध्यान में रखना होगा जो उनकी प्रेरक शक्ति है और कार्य के सभी पहलुओं में उन्हें अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। ये मूल्य उन समाजों में आवश्यक प्रति-बल है जहाँ स्वार्थपूर्ण व्यक्तिवाद पराकाष्ठा पर पहुँच चूका है। गैर-सरकारी संगठन इस तथ्य को समझ रहे हैं।

समीक्षा, मॉनिटरिंग तथा मूल्यांकन

गैर-सरकारी संगठनों की परिभाषा के अनुसार वे ऐसे संगठन हैं जो लगातार बदलते और विकसित होते रहते हैं। इस प्रकार मॉनिटरिंग और मूल्यांकन सम्बन्धी कार्य उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्हीं के जरिये परिवर्तन और विकास को निर्देशित किया जा सकता है। मॉनिटरिंग और मूल्यांकन संचित अनुभव और विशेषज्ञता को आत्मसात करने के बहुमूल्य तरीके हैं। जब संगठन के भीतर या बाहर तीव्र परिवर्तन होंते हैं तो अनुभव और विशेषज्ञता आराम से लुप्त हो जाती हैं।

इसके अतिरिक्त, बहुत से गैर-सरकारी संगठन इस बात को समझ चुके हैं कि समय-समय पर अपना स्वयं का मूल्यांकन से कहीं बेहतर है। इस प्रकार गैर-सरकारी संगठन अब लगातार मॉनिटरिंग और नियमित मूल्यांकन के लिए स्वयं अपनी क्रियाविधियों द्वारा अपने कार्य को बढ़ाने की जरुरत को समझ रहे हैं। अधिकाधिक गैर-सरकारी संगठन विशेष परियोजनाओं और कार्यक्रमों के संदर्भ में ऐसा कर रहे हैं। अब सम्पूर्ण संगठन की बड़ी-बड़ी समीक्षाएं और मूल्यांकन कम होते जा रहे हैं, पर ऐसा अक्सर होता है। । मॉनिटरिंग और मूल्यांकन से सम्बन्धी साहित्य bdthabdthbdtbdbबढ़ता जा रहा है। कुछ संगठन ऐसे बनाये गए हैं जो गैर-सरकारी संगठनों को मूल्यांकन तथा समीक्षा में मदद करते हैं। इनमें से कुछ राष्ट्रीय हैं और कुछ अन्तर्राष्ट्रीय। इनमें ब्रिटेन की चेरेटी एवेल्युएशन सर्विस, भारत की दि सोसाइटी फॉर पार्टीसिपेटरी रिसर्च एन एशिया (प्रिय) और जिम्बाब्वे की एमडबल्यूईएनजीओ हैं।

सूचना

विभिन्न देशों में गैर-सरकारी संगठनों द्वारा या उनके बारे में उपलब्ध सुचना की गुणवत्ता और विस्तार अलग-अलग है। जिनका सामान्य अर्थ यह है कि गैर-सरकारी संगठनों को अपने कार्य के बारे में सूचना उपलब्ध करानी चाहिए। कभी-कभी गैर-सरकारी संगठनों से कानून के तहत वित्तीय सूचना मांगी जाती है। सूचना के प्रावधानों के लिए कई बार ऐसे संसाधन जरुरी होते हैं जिन तक बहुत से गैर-सरकारी संगठनों की पहुँच नहीं होती इसलिए गैर-सरकारी संगठनों और उनके कार्य के बारे में सूचना का आभाव रहा है। इसके फलस्वरूप:

  • गैर-सरकारी संगठनों को जानबूझकर अपने कार्य को गोपनीय रखने के आरोप का सामना करना पड़ सकता है
  • अचेतन रूप से गैर-सरकारी संगठन सूचना नहीं देते और प्रकाशित करने के महत्व को नहीं समझते

यह कोई स्वस्थ प्रवृति नहीं है और बहुत से संगठन अब इस बात को समझ रहे हैं। किन्तु इस क्षेत्र मने गैर-सरकारी संगठनों को दूसरे के समर्थन व सहायता तथा समझदारी की जरूरत होती है। जैसे कि कहा जा चूका है सुचना के लिए संसाधन आवश्यक है। अतः कोषदाता को भी यह बात समझनी चाहिए। प्रशिक्षण, मॉनिटरिंग, मूल्यांकन आदि जैसी सुचना आवश्यक है। गैर-सरकारी संगठनों के कार्य में सुधार के अन्य पहलुओं की तरह अतिरिक्त संसाधन प्राप्त होने से दीर्घावधि में लागत-प्रभावकारिता बढ़ेगी। इस तरह के खर्चे को अनावश्यक खर्चा मानना गलती होती होगी। गैर-सरकारी संगठनों की डायरेक्टरियाँ प्रकाशित करना जनता तक सूचनाएँ पहुँचाने के एक व्यावहारिक तरीका हो सकता है। इस तरह के प्रकाशनों में गैर-सरकारी संगठनों, सरकारी मंत्रालयों, एजेंसियों, कोषदाताओं, आदि के बारे में जानकारी दी जा सकती है। देश के आकार तथा गैर-सरकारी संगठनों के विस्तार को देखते हुए इस तरह की डायरेक्टरियाँ, राष्ट्रीय, स्थानीय या क्षेत्रीय आधार पर प्रकाशित की जा सकती है। सोलोमन आइलैंड्स में एक नेटवर्क गैर-सरकारी संगठन द्वार प्रकाशित अच्छी डायरेक्टरी उपलब्ध है। इसमें संगठनों आदि के नाम, पते आदि के अलावा अन्य जानकारी भी दी गई हैं। इनमें प्रत्येक गैर-सरकारी संगठन के लक्ष्यों और कार्य का सारांश दिया गया है और समय-समय पर ताजा सूचनाएँ इसमें जोड़ी जाती है।

जैसी कि कहा जा चूका है संसाधनों की कभी एक ऐसा मुख्य कारण है जिसके चलते गैर-सरकारी संगठनों के बारे में सूचनाएँ कम उपलब्ध हो पाती हैं। और इसके अलावा एक  अन्य बाधा भी है:

कोई ऐसा सर्वमान्य आधार नहीं हैं जिसके अनुसार वर्तमान सुचना के साथ ही क़ानूनी उद्देश्यों के लिए आवश्यक सुचना को प्रस्तुत किया जा सके। यह आशा की जाती है कि इस रिपोर्ट में प्रस्तुतु परिभाषा और वर्गीकरण ऐसा आधार बनाने में मददगार होंगे।

नेटवर्किंग और सहमेल-निर्माण

नेटवर्किंग और सहमेल-निर्माण के जरिये गैर-सरकारी संगठन अपने समान हितों और सरोकारों की पहचान कर सकते हैं, सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं, एक दूसरे को समर्थन व सहायता दे सकते हैं और अपने साझे लक्ष्यों को हासिल करने के लये उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उयोग कर सकते हैं। असल में नेटवर्किंग और सहमेल गैर-सरकारी संगठनों के कार्यों के प्रभाव को सुधारने की सहकारी-सहयोगी रणनीतियों की अभिव्यक्तियाँ होते हैं। अब राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्थानीय, क्षेत्रीय स्तरों पर बहुत से नेटवर्क अस्तित्व में हैं। अन्तराष्ट्रीय नेटवर्किंग के कुछ उदाहरण है” दि वर्ल्ड इंफोर्मेशन नेटवर्क (टिवन), दि थर्ड वर्ल्ड फेमिनिस्ट नेटवर्क, डिवेलपिंग आल्टरनेटिव फार वीमन ए न्यू इरा (डान), डीसेब्ल्ड पीपुल्स इंटरनेशनल (डीपीआई), दि इंटरनेशनल डेट नेटवर्क और दि कॉमनवेल्थ एसोसिएशन फॉर लोकल एक्शन एंड इकोनॉमिक डिवेलपमेंट (कमैक्ट) राष्ट्र संघ के पर्यावरण, जनसंख्या, सामाजिक विकास और महिला शिखर सम्मेलनों से सम्बंधित अन्तर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों को समान मसलों पर अधिकाधिक रूप से एक-दूसरे से जोड़ रही है। कुछ ऐसे नेटवर्क भी हैं जो अन्तराष्ट्रीय क्षेत्रों में विभिन समूहों को एक-दूसरे से जोड़ते है, जैसे केरिबियन क्षेत्र में दि कैरिबियन पीपुल्स डिवेलपमेंट एंजेसी (कारिपेडा) और कैरिबियन नेटवर्क फॉर इंटीग्रेटीड रूरल डेवेलपमेंट, अफ्रीका में दि अफ्रीकन एनजीओज सेल्फ रिलायंस एंड डेवेलपमेंट एडवोकेसी ग्रुप और प्रशांत क्षेत्र में दि पेसिफिक आइस्लैंड्स एसोसिएशन ऑफ़ एनजीओज।

राष्ट्रीय स्तर पर नेटवर्किंग के बहुत से उदाहरण हैं : ब्रिटेन में कम्युनिटी बिजनेस मूवमेंट, भारत में दि एसोसिएशन ऑफ़ वालंटरी एजेंसीज फॉर रूरल डिवेलपमेंट (अवार्ड) सोलोमन आइलैंडस में डिवेलपमेंट सर्विस एक्सचेंज, न्यूजीलैंड में एसोसिएशन ऑफ़ एनजीओज आओतेआरोआ (अंगोआ), युगांडा में दि डेवेलपमेंट नेटवर्क ऑफ़ इंडीजिनस वालंटरी एसोसिएशन (डेनिबा), और कनाडा में दि केनाडीयन एनवायरमेंटल नेटवर्क।  इसके अलावा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा और विकलांगता जैसे क्षेत्रों में भी कई  नेटवर्क काम कर रहे हैं। इंटरनेट तथा इंफारमेशन सुपर हाईवे के जरिये अन्तर्राष्ट्रीय दूर संचार के क्षेत्र में जो क्रांति हुई है वह सभी स्तरों पर  तथा गैर-सरकारी संगठनों के कार्य के दायरे को तथा गैर-सरकारी संगठनों के नेटवर्कों के प्रभाव को अत्यधिक बढ़ा रही है।

कोषदाता संगठन अब इन नेटवर्कों के महत्व को समझने लगे हैं, ठीक उसी तरह अन्तर्राष्ट्रीय एंजेसियाँ उन्हें अपने अन्तर्राष्ट्रीय मंचों में स्थान देकर उनके अस्तित्व को महत्व दे रही हैं। वे केवल उन गैर-सरकारी संगठनों तक ही सिमित नहीं हो जो परिवर्तन के लिए एडवोकेसी करते हैं, इसलिए सहमेल-निर्माण तथा नेटवर्क ऐसे उद्देश्यों के लिए प्रभावकारी सिद्ध हो रहे हैं, खास कर तब जब नेटवर्क उन्हें गैर-सरकारी संगठनों के अलावा अन्य संगठनों से भी जोड़ते हैं। कई देशों में गैर-सरकारी संगठनों में निजी क्षेत्र के बीच नेटवर्किंग तथा सहयोगपूर्ण सम्बन्धों में वृद्धि हो रही है। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के मसले पर जो उपलब्धि हासिल की गई उसमें गैर-सरकारी संगठनों और अन्य संगठनों और अन्य संगठनों के बीच नेटवर्किंग द्वारा सम्पर्क का हाल का उदाहरण सर्वोत्तम उदाहरण है।

 

स्रोत:- हलचल, जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची।



© 2006–2019 C–DAC.All content appearing on the vikaspedia portal is through collaborative effort of vikaspedia and its partners.We encourage you to use and share the content in a respectful and fair manner. Please leave all source links intact and adhere to applicable copyright and intellectual property guidelines and laws.
English to Hindi Transliterate