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नेटवर्क प्रणाली

नेटवर्क को मजबूत बनाने की जरुरत

नेटवर्क प्रणाली ने पिछले दशक में महत्व धारण किया है। इसका कारण यह है कि विकास कार्यों में संलग्न कार्यकर्त्ता अधिकाधिक यह महसूस करने लगे थे कि समाज के विकास सम्बन्धी जटिल प्रश्नों को मात्र संस्थागत प्रयासों द्वारा हल नहीं किया जा सकता।

यूँ तो संघीय संगठनों (एसोसिएशनों) के कुछ रूप कुछ अर्सें से अस्तित्व में रहे हैं, पर वे व्यक्ति को दूसरे संगठनों के साथ, स्वत्रंतापूर्वक पारस्परिक क्रिया-प्रतिक्रिया का अवसर प्रदान नहीं करते, ही वे विचारों के स्वतंत्र प्रवाह की अनुमति देते हैं ।लेकिन नेटवर्क विभिन्न प्रकार के संगठनों-गैर-सरकारी संगठनों, सरकारी अभिकरणों, अकादमिक संस्थानों, ट्रेड यूनियनों, राजनीतक दलों,  महिला संगठनों, आदि- से जुड़े लोगों के बीच परस्पर-क्रिया, वैचारिक आदान-प्रदान, संवाद, और संयुक्त कार्यवाई का अवसर प्रदान करता है। इसके साथ ही यह कुछ भिन्न परिप्रेक्ष्यों वाले पर एक ही मसले पर कार्म करने वाले व्यक्तियों और संगठनों के  लिए मंच पर आने, सूचनाओं का आदान-प्रदान करने, अपने ज्ञान-आधार, विशेषज्ञता, संसाधनों और क्षमताओं को मिल बाँटकर प्रयुक्त करने की सम्भावनाएं भी पैदा करता है ताकि वे कुछ खास मसलों पर एक साथ मिलकर काम कर सकें।

आज के संदर्भ में नेटवर्कों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वृहत-स्तर पर स्थिति में तेजी से बदलाव आ रहा है और स्वयंसेवी संगठनों से की जाने वाली अपेक्षाएँ भी बदल रही हैं इन संगठनों से की जाने वाली अपेक्षाएँ भी बदल रही हैं। इन संगठनों को समर्थन प्रदान करने, उनके कार्य के लिए अनुकूल वातावरण निर्मित करने, और जन-समुदाय की सहभागिता सुनिश्चित करने, वृहत-स्तरीय नीतियों को प्रभावित करने तथा स्वयसेवी कार्य की संभावना व  अवसर तैयार करने के घोषित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए नेटवर्क आवश्यक ही नहीं, बल्कि यह स्वयंसेवी कार्य को प्रोन्नत करने की समग्र रणनीति का मूलभूत अंग भी है।

नेटवर्क विभिन्न उद्देश्यों

नेटवर्क विभिन्न उद्देश्यों को ध्यान में रख कर निर्मित किया जा सकता है। ये निम्न अल्पकालिक या दीर्घकालिक लक्ष्य इस प्रकार हो सकते हैं:

  • प्रमुख सरोकार वाले ऐसे मसलों की, जिनसे निबटना वर्तमान संस्थागत ढांचे के तहत कठिन हो, पहचान करना, उन्हें प्रतिपादित करना और उन पर विचार-विमर्श करना।
  • नये-नये विचारों, दृष्टिकोणों और परिप्रेक्ष्यों का मिलजुल कर निरूपण करना और उन्हें प्रखर बनाना। ऐसा मुख्यतः इसलिए क्योंकि नए विचार स्थापित पद्धतियों की समालोचना और उनसे अलग नई दिशा मने उन्मुख होते है। वर्तमान संस्थागत ढांचे ऐसी संभावनाओं पर अंकुश लगाते हैं।
  • कठिनाइयों के समय और निहित स्वार्थो के हमलों का प्रतिकार करने के लिए निचले स्तर के संगठनों की समर्थन प्रदान करना। एक सामाजिक-राजनीतक रणनीति के रूप में ऐसे हमलों से निबटने के लिए नेटवर्क आवश्यक होता है।
  • निदृष्ट स्थानीय, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति में विभिन्न स्तरों पर लोकतान्त्रिक अवसरों और लोकतान्त्रिक कार्यचालन में कमी आने का प्रतिरोध करने के लिए।
  • सामाजिक रूपांतरण के ध्येय के समर्थन में व्यक्तियों और छोटे-छोटे ग्रुपों की पहचान करने, उन्हें, प्रोत्साहित और उत्प्रेरित करने के लिए।
  • संस्कृतियों, प्रणालियों, देशों और महाद्वीपों  के आर-पार सूचना, अनुभव और दृष्टिकोण के आदान-प्रदान के लिए

इसके अलावा, विभिन्न विचारधाराओं वाले और विभिन्न संगठनों में विभिन्न मसलों पर कार्यरत लोगों के बीच सूचनाओं, अनुभवों और विचारों के आदान-प्रदान के लिए नेटवर्क सर्वाधिक सक्षम और लचकीली क्रियाविधि का काम कर सकता है। स्वयंसेवी संगठनों का नेटवर्क, सूचनाओं के प्रसार, जनमत निर्मित करने हेतु जनसमुदाय के विश्लेषण और नजरियों को उभारने, नीति-निर्माताओं और चुने हुए जन-प्रतिनिधियों को प्रभावित करने/सामाजिक पैरवी करने, स्वयंसेवी संगठनों और समाज के अन्य तबकों के बीच एकजुटता निर्मित करने और सरकार पर दबाव डालने में प्रमुख भूमिका निभा सकता है। नेटवर्क की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के विकास प्रतिरूपों/दिशाओं के निर्णय में अक्सर बाहरी कारक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने का प्रयास करते हैं और विकाशील देशों के सन्दर्भ में यह बात विशेष रूप से सही है।

वाणी की हाल में आयोजित आम सभा में इस विषय पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया और यह निश्चित किया गया कि देश में स्वयंसेवी कार्य को उन्नत करने के लिय स्थानीय, राज्यीय, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय नेटवर्कों को सुदृढ़ बनाया जाएगा।

 

स्रोत:- हलचल, जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची।



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