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स्वयंसेवी संस्था की प्रबंधन-व्यवस्था

स्वयंसेवी संस्था की प्रबंधन-व्यवस्था

परिचय

इस झारखण्ड में हम विशेषता: एक स्वयंसेवी संस्था के सम्बन्ध में विचार-विमर्श करेंगे, न की सामान्यतः प्रबंधन के सम्बन्ध में।एक स्वंयसेवी संस्था को संचालित करने के इस पहलु को समझने के लिए यह समझना उपयोगी हो सकता है कि संस्था क्या है? कैसे कार्य कार्य करते हुए यह एक ढांचे को तैयार करती है? इन ढांचों को स्वयंसेवी संस्थाओं के स्वरुप तथा लक्षणों की अपूर्व वर्णन करनी चाहिए और अनिवार्य रूप से वाणिज्यिक, औद्योगिक या सरकारी संस्थाओं से उन्हें नहीं लिया जाना चाहिए।निम्नलिखित अनुभाग में सामान्यतः एक संस्था को समझने के लिए ढांचे तथा विशेषता: एक स्वयंसेवी संस्था का विवेचन किया गया है:

संस्था क्या है?

संस्थापक सदस्य अपने अनुभव, सैद्धांतिक पृष्टभूमि तथा प्रयोजनों से संस्था के आधारभूत ढांचे का निर्माण करते हैं और प्रारंभिक “संसाधन प्रबंधकों” की सहायता से इसका प्रारभ करते हैं।ये संसाधन प्रबंधक वे स्थानीय लोग हो सकते हैं, जो संस्था के भवन के लिए स्थान उपलब्ध करा सकते हैं, संस्था के उद्देश्यों को मदद तथा बल देने वाली अन्य समरूपी संस्थाएं, कार्य प्रारभ करने के लिए थोडा-सा अनुदान देने वाली कुछेक दाता संस्थाएं आदि हो सकती हैं।ये सभी लोग संस्था को सहयोग करने में “स्टेक होल्डर” होते हैं|

मुख्यतः संस्थापक सदस्य तथा गौण रूप से संसाधन प्रबंधक संस्था के मिशन प्रमुख मूल्य तथा दृष्टिकोण (विजन) को पारिभाषित करने में मदद कते हैं।स्वयंसेवी संस्थाओं का मिशन विभिन्न तरीकों से बताया जा सकता है: जैसे- “पददलित तथा गरीब लोगों की उन्नति के लिए काम करना” “गरीबों की सामाजिक, आर्थिक उन्नति के द्वारा सामाजिक परिवर्तन लाना” या “गरीबों को संगठित करना” आदि|

परन्तु इन मिशनों को सम्पादित करने लिए विभिन्न प्रकार की रणनीतियों का चयन किया जाता है।कुछ लोग गरीबों के लिए आय-उपार्जन की गतिविधियाँ शुरू करते हैं और इसी क्रम में उन्हें सही रूप से संगठित करते हैं।कुछ लोग सर्वप्रथम स्थानीय लोगों को संगठित करने के पश्चात् अगले कदम के बारे में निर्णय लेते हैं।इन रणनीतियों में भी वे सामाजिक वानिकी, कृषि विज्ञान, प्रौढ़ शिक्षा, आय बढ़ाने वाले कार्यक्रम आदि का चयन करते हैं। प्राथमिकता तौर पर इसका चयन क्षेत्र एवं लोगों की विभिन्न आवश्कताओं तथा संस्थापक सदस्यों (और कभी-कभी अन्य स्टेक होल्डरों) द्वारा स्थिति की पूर्ण रूप से समझ विकसित करने के पश्चात् किया जाता है|

एक बार गतिविधियों का चयन हो जाने के पश्चात वे विभिन्न कार्य तथा उत्तरदायित्वों में विभाजित हो जाती है।उदहारणार्थ, एक सामाजिक वानिकी कार्यक्रम संचालित करने के लिए सम्भावित दाता (प्रायः सरकार) के मार्गदर्शी सिद्धांतों के अनुसार एक परियोजना का प्रस्ताव तैयार करना होगा।सरकारी अधिकारियों के साथ सम्पर्क स्थापित करना होगा, कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिए योजना बनानी होगी, नर्सरी बनाना, गतों का खनन, वृक्षारोपण, सिचाई, छंटाई, सुरक्षा आदि सभी कार्य करने होंगे, लेखा-जोखा रखना होगा, धनराशि का वितरण करना होगा और आवधिक रिपोर्ट (दाता की आवश्यकताओं के अनुसार) बनानी तथा भेजनी होगी।ये सभी कार्य स्वयंसेवी संस्था तथा स्थानीय समुदाय के सदस्यों द्वारा विभिन्न संयोजनों में उनकी क्षमताओं, अनुभव, पहल के अनुसार सम्पादित किये जाने होंगे।इस प्रकार निश्चित समयावधि में कार्य तथा क्रियाकलाप परिभाषित होते हैं|

पहले बहुत से कार्य अनौपचारिक मानकों तथा आमने-सामने की पारस्परिक क्रिया-प्रतिक्रियाओं की सहयता से समन्वित किये जाते हैं।कुछ औपचारिक नियम तथा विनियम क़ानूनी आवश्यकताओं के ऊपर निर्भर करते हुए संस्था के क्रियाकलापों तथा कार्यकर्ताओं में बढ़ोतरी होती है, कुछ अधिक मात्रा में औपचारिकता का होना आवश्यक हो जाता है।नये अंतवैयक्तिक सम्बन्ध विकसित होते हैं।नये “सम्मिलन” (कोअलिशन) तथा उप-समूह बनते हैं और धीरे-धीरे जवाबदारियों के बंटवारे के साथ कार्य भी विभाजित होने लगते हैं|

सभी संस्थाएं एक प्रदत्त पर्यावरण में विद्यमान रहती है।यह पर्यावरण अथवा परिवेश संस्था की सीमा के बाहर होते हुए भी संस्था को प्रभावित करता है।यह पर्यावरण एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक. सांस्कृतिक तथा राजनीतिक पर्यावरण हैं जो एक प्रदत स्वयंसेवी संस्था के लिए विशिष्ट होता है।उधाहरणार्थ संसाधन, कोष एवं लोगों जैसे अवयवों को जुटाने के लिए स्वयंसेवी संस्था को देश के प्रदत पर्यावरण से सबंध रखना पड़ता है।यह पर्यावरण है सरकारी संस्थाएं तथा अन्य राष्ट्रीय एंव अन्तर्राष्ट्रीय दाताओं का, जो स्वयंसेवी संस्थाओं को अनुदान देते हैं।पर्यावरण में नियामक पहलू  भी शामिल है।देश में विधि, विनियम, नियम तथा प्रक्रियाएं हैं जो संस्था पर असर डालती है और कामकाज के लिए ढांचा प्रदान करती है।जिन लोगों के लिए संस्था होती है, जिनके साथ यह काम करती है, जिन्हें यह सेवा मुहैया करती है, स्थानीय समुदाय भी इस पर्यावरण के महत्वपूर्ण पहलू  हैं|

यह समझना भी बहुत आवश्यक है कि एक संस्था कहीं अलग होकर हवा में कार्य नहीं कर सकती है और पर्यावरण तथा उसके विभिन्न पहलू संस्था पर प्रभाव डालते हैं।कभी-कभी संस्था के पर्यावरण में स्वतंत्र रूप से बदलाव आते हैं और ये बदलाव विशेषतया स्वयंसेवी संस्था के स्वरुप तथा कार्य को भी प्रभावित करते हैं।एक स्वयंसेवी संस्था कैसे काम करती है, इसे सम्पूर्ण रूप से समझने के लिए पर्यावरण या बाहरी परिवेश को समझना बहुत लाभकारी सिद्ध होता है|

संस्था के कार्य तथा क्रियाकलाप

वे लोग जो उन्हें सम्पादित करते हैं ऐसी अनौपचारिक व्यवस्थाएं जो अंतवैयक्तिक सम्बन्धों को मजबूत करते हुए कार्य सम्पादन में मदद करती हैं, श्रम विभाजन, नियम तथा विनियम और पुरस्कार पद्धति, सभी मिलकर संगठनिक संस्कृति का निर्माण करती हैं।संचार व्यवस्था, सूचना प्रवाह, निर्णय की प्रक्रिया, मतभेद निपटाने की प्रक्रिया आदि प्राथमिकता रूप से उपरोक्त पहलुओं तथा कार्य, मानव संसाधन अनौपचारिक एवं अनौपचारिक व्यवस्थाओं पर निर्भर करती है।यह प्रक्रियाएँ कार्य संस्कृति तथा संगठनिक गतिशीलता की प्रतिबिम्ब होती है|

अतः अपने पारिभाषित ‘विजन” एंव दृष्टिकोण तथा प्रयोजनों के अनुरूप प्रत्येक स्वयंसेवी संस्था एक विशेष प्रचलन रणनीति प्रस्तुत करती है।इस “प्रचलन रणनीति “ से संस्था के प्राथमिकता कार्य स्पष्ट रुप से परिभाषित होते हैं।ये कार्य संगठन निर्माण, महिला मंडल” या युवा मंडलियों के आयोजन करना हो सकता है।वे जल, भूमि, तथा वन संरक्षण कार्यक्रमों को कार्यान्वित करना हो सकता है, या वे अनौपचारिक, औपचारिक तथा प्रौढ़ शिक्षा केद्रों का आयोजन करना हो सकते हैं।रणनीति के आधार पर ऐसे विभिन्न प्रकार के कार्य हो सकते हैं।ये संस्था के प्राथमिक कार्य हैं जो यह निर्धारित करते हैं कि किस प्रकार अधिकाधिक वित्तीय संसाधनों तथा लोगों को काम में लाया जायेगा|

इन प्राथमिक कार्यों को सम्पन्न करने के लिए कोई भी संस्था निर्धारित गौण तथा सहायक कार्यों को पूरा करने हेतु बाध्य होती है।उदाहरणार्थ संगठन निर्माण कार्यक्रम को कार्यान्वित करने हेतु किसी संस्था को लेखा-जोखा रखना होगा, एक प्रौढ़ शिक्षा केंद्र चलने के लिए संस्था को प्रशिक्षकों तथा पर्यवेक्षकों को पहचानना, भर्ती करना, प्रशिक्षित करना होगा और उनके छुट्टी रिकोर्डों, भुगतान सूचियों तथा वाहन भक्तों का ब्यौरा रखना होगा|

संक्षेप में कहा जाए कि एक प्रकार से प्रशासनिक कार्य सम्पादित करने होंगे।इन गौण (सेकेडरी) कार्यों का सम्पन्न होना प्रमुख एवं आवश्यक है ताकि संस्था के प्राथमिक कार्य प्रभावी ढंग से सम्पन्न किये जा सकें।अतः गौण कार्यों का अपने आप में कोई खास मूल्य नहीं हैं।लेकिन ये प्राथमिक कार्यों के निष्पादन को काफी सरल बनाते हैं।अतः अपने उद्देश्यों एंव अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कोई संस्था प्रभावी रूप से अपने प्राथमिक कार्य सम्पन्न करना चाहती है, तो उसके लिए यह भी आवश्यक हो जाता है कि वह अपने गौण कार्यों को सुचारू रूप से सम्पन्न करने के लिए आवश्यक उपाय भी ढूंढ निकाले|

किसी स्वयंसेवी संस्था को स्थापित करने की प्रक्रिया में व्यापक मिशन तथा दृष्टिकोण, बाद में निश्चित उद्देश्यों में परिवर्तित होते हैं।इनमें से कुछ उद्देश्यों को संस्था के औपचारिक दस्तावेजों, जैसे स्मृतिपत्र आदि में लिखित रूप में दर्शाया जाता है।कुछ उद्देश्य कार्य के दौरान उभर आते हैं तथा कुछ निश्चित समयावधि में परिवर्तित भी होते हैं।इसलिए कुछ वर्षों बाद संस्था पुराने उद्देश्यों पर कार्य करने के अलावा कुछ नये उद्देश्यों पर भी कार्य कर सकती है।बहरलाल, जिन संसाधनों के लिए उद्देश्य प्रतिबद्ध है, दर्शाए गए उद्देश्यों से अलग हो सकते हैं।उसी प्रकार ऐसा भी हो सकता है कि संस्था से बाद में जुड़ने वाले साथियों का उद्देश्यों के प्रति नजरिया, संस्था के मूल संस्थापक सदस्यों के नजरिये से बिल्कुल समान न हो।अतः संस्था में कार्यरत विभिन्न कार्यकर्त्ता भी संस्था के मूल संस्थापक सदस्यों के विभिन्न नजरिये से देखते, समझते होंगे।वास्तव में बाहरी व्यक्ति भी संस्थापक सदस्यों के उद्देश्यों के प्रति नजरिये से अलग तरीके का नजरिया रखते हैं।अतः इस बाते को जानना महत्वपूर्ण है कि किसी संस्था के दर्शाये गए “वास्तविक” तथा अनुभव किये गए उद्देश्य आवश्यकता के तौर पर एक जैसे नहीं हो सकते हैं|

स्रोत:- हलचल, जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची|



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