অসমীয়া   বাংলা   बोड़ो   डोगरी   ગુજરાતી   ಕನ್ನಡ   كأشُر   कोंकणी   संथाली   মনিপুরি   नेपाली   ଓରିୟା   ਪੰਜਾਬੀ   संस्कृत   தமிழ்  తెలుగు   ردو

बिहार/झारखंड स्वावलम्बी सहकारी समिति अधिनियम, १९९६(अधिनियम संख्या-२, १९९७)

बिहार/झारखंड स्वावलम्बी सहकारी समिति अधिनियम, १९९६(अधिनियम संख्या-२, १९९७)

परिचय

१७ जनवरी, १९९७

स्वावलम्बन, पारस्परिक सहयोग एवं मितव्ययता पर आधारित और अपनी आर्थिक एवं सामाजिक बेहतरी के लिए सदस्यों द्वारा स्व-प्रबन्धित तथा नियंत्रित, प्रतियोगी, आत्मनिर्भर व्यावसायिक उद्यमों के रूप में सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन और उनके आनुषंगिक विषयों का उपबन्ध करने के लिए अधिनियम।

भारत गणराज्य के सैंतालीसवें वर्ष में बिहार-राज्य विधान-मंडल द्वारा निम्नलिखित रूप में यह हो :-

खण्ड-१  प्रस्तावना

१. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(१) यह अधीनियम झारखंड/बिहार स्वावलम्बी सहकारी समिति अधिनियम, १९९६ कहलाएगा।

२. इसका विस्तार सम्पूर्ण झारखंड/बिहार राज्य में होगा।

३. यह तुरंत प्रवृत्त होगा।

२.परिभाषाएँ -  इस अधिनियम में जबतक कि संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो –

(क) “ राज्य” से अभिप्रेत है झारखंड/बिहार राज्य;

(ख) “बोर्ड”से अभिप्रेत है किसी सहकारी समिति का निदेशक बोर्ड;

(ग़) “उप-विधियाँ” से अभिप्रेत है निबंधित सहकारी समिति की उप-विधियाँ।

(घ) “मुख्य कार्यपालक” से अभिप्रेत है वह व्यक्ति जिसे बोर्ड से अधीक्षण, नियंत्रण और निदेशन के अध्यधीन सहकारी समिति के कार्यकलाप को प्रबंध सौंपा गया हो;

(ड.) “सहकारी समिति”से अभिप्रेत है इस अधिनियम के अधीन निबंधित या निबंधित समझा जानेवाला कोई संगठन;

(च) “सहकारी आधार” से अभिप्रेत है इस अधिनियम की धारा ३ में उल्लिखित सहकारिता के सिद्धांत;

(छ) “प्राथमिक सहकारी समिति” के अभिप्रेत है वह समिति जिसका कोई सदस्य निबंधित सहकारी समिति न हों;

(ज) “केन्द्रीय सहकारी समिति” से अभिप्रेत है परिसंघ और संघ से भिन्न वह समिति जिसका कोई अन्य सहकारी समिति तथा उप-विधियाँ में उपलब्ध हो तो कोई व्यक्ति सदस्य हो;

(झ) “परिसंघ” से अभिप्रेत है इस अधिनियम की धारा १४ की उप-धारा (२) के अधीन गठित परिसंघ;

(ण) “संघ” से अभिप्रेत है इस अधिनियम की धारा १४ की उप-धारा (१) के अधीन गठित संघ;

(ट) “सामान्य निकाय” से अभिप्रेत है

  1. I. प्राथमिक सहकारी समिति के संबंध में उस सरकारी समिति के सभी सदस्य।
  2. II. केन्द्रीय सरकारी समिति के संबंध में सभी सदस्य सहकारी समितियाँ के प्रतिनिधि और यदि उप-विधियाँ में उपबंध हो तो सभी सदस्य व्यक्ति।
  3. III. परिसंघ के संबंध में सभी सदस्य सहकारी समितियाँ के प्रतिनिधि।
  4. IV. संघ के संबंध में सब सहकारी परिसंघों एवं सहकारी समितियों के प्रतिनिधि।

(ठ) “आम-सभा” से अभिप्रेत है इस अधिनियम के अधीन निबंधित किसी सहकारी समिति के सामान्य निकाय की सभा।

(ड) “पदधारी” से अभिप्रेत है किसी सहकारी समिति द्वारा ऐसी सहकारी समिति के किसी पद निर्वाचित या नियुक्त किया गया कोई ब्यक्ति।

(ढ) “निबंधक” से अभिप्रेत है इस अधिनियम की धारा ८ के अधीन नियुक्त स्वावलम्बी सहकारी समितियों का निबंधक और इसमें ऐसा कोई अन्य व्यक्ति भी शामिल है जिसे इस अधिनियम के अधीन निबंधक की सभी या कोई शक्ति प्रदान की गई हो।

(ण) “परिवार” से अभिप्रेत है पति, पत्नी, और उनकी अविवाहित पुत्रियाँ एवं अवयस्क पुत्र।

(त) “सहकारिता अधिकरण” से अभिप्रेत है इस अधिनियम की धारा ३९ के अधीन गठित अधिकरण।

खण्ड – २ सहकारिता के सिद्धांत

३ सहकारिता के सिद्धांत -  इस अधिनियम के अधीन सहकारी समिति का गठन करने को इच्छुक व्यक्ति या सहकारी समितियाँ निम्नांकित सहकारिता सिद्धांतों के अनुरूप उप-विधियाँ बनायेंगे, यथा :-

(क) किसी सहकारी समिति की सदस्यता स्वैच्छिक होगी और वैसे सभी व्यक्तियों को विना किसी सामाजिक, राजनीतिक, जाति या धार्मिक भेद-भाव के उपलब्ध होगी, जो इसकी सेवा का उपयोग कर सकते हों और सदस्यता की जिम्मेदारी स्वीकार करने के इच्छुक हों।

(ख) सहकारी समितियाँ लोकतांत्रिक संगठन है; उनके कार्यकलाप का प्रबंधन उनके सदस्यों द्वारा तय की गई रीति से निर्वाचित या नियुक्त एवं उनके प्रति उत्तरदायी व्यक्तियों द्वारा किया जायगा।  सहकारी समितियों के सदस्य समान मताधिकार (एक सदस्य एक मत) कर उपयोग करेंगे और सहकारी समितियों, जिनके वे सदस्य हैं, पर प्रभाव डालने वाले निर्णयों में उनकी समान भागीदारी होगी।

(ग)  किसी सहकारी समिति के संचालन से प्राप्त आर्थिक लाभ उस सहकारी समिति के सदस्यों का होगा और उसका वितरण ऐसी रीति से, जिससे कि दूसरे सदस्यों कि कीमत पर किसी एक सदस्य द्वारा लाभ उठाना परिवर्जित हो सके, किया जाएगा, जिसे –

  1. I. सहकारी समिति के कारबार के विकास करने का उपबन्ध करके।
  2. II. सामूहिक सेवाओं का उपबन्ध करके।
  3. III. अंशधारियों को लाभांश वितरण के अतिरिक्त, सदस्यों के बीच सहकारी समिति के साथ उनके संव्यवहारों के अनुपात में वितरण करके प्राप्त किया जाएगा।

(घ)  सभी सहकारी समितियाँ सहकारिता के आर्थिक एवं लोकतांत्रिक सिद्धान्तों एवं तकनीकों में अपने सदस्यों, पदधारियो और कर्मचारियों तथा जन-सामान्य को शिक्षित करने का उपलब्ध करेंगी।

(ङ)    सभी सहकारी समितियाँ अपने सदस्यों एवं अपने समुदायों के हितों कि सर्वोत्तम सेवा करने के लिए स्थानीय, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अन्य सहकारिताओं के साथ हरेक व्यावहारिक रीति के सक्रिय रूप से सहयोग करेंगी।  जिससे कि विश्व भर में सहकारियों द्वारा कार्य कि एकता संबंधी उनके लक्ष्य कि उपलब्धि हो सके।

(च)  स्वयत्तता एवं स्वतंत्रता : सहकारी समितियाँ स्वायत्त एवं स्वयं सहायता संस्थाएँ हैं जिनका नियंत्रण सदस्यों द्वारा किया जाएगा।

(छ) समुदाय के लिए चिंतन : सहकारी सदस्यों के स्वीकृति के द्वारा स्थायीत्व विकास के लिए सहकारिता काम करेगी।

४. संगठन,  जिन्हें निबंधित किया जा सकेगा – इस अधिनियम के अधीन केवल वैसे संगठन जो स्वावलम्बन और पारस्परिक सहायता के द्वारा अपने सदस्यों कि सामाजिक और आर्थिक बेहतरी के लिए अपनी उप-विधियाँ में सहकारिता सिद्धांतों के अनुसार उपबन्ध करें, को सहकारी समिति के रूप में निबंधित किया जा सकेगा।

परन्तु ऐसी सहकारी समिति जो विशेष समूहों तक सीमित रहने वाली अपनी सदस्यता के कारण सरकारी नीति और कार्यक्रमों के अधीन विशेषाधिकार का उपभोग करती है, कि सदस्यता ऐसे विशेष समूहों के सदस्यों तक ही निबंधित की जाएगी।

१ निबंधन हेतु आवेदन –

(१)

  1. I. जहाँ दस अन्यून व्यक्ति, जिनमें से प्रत्येक विभिन्न परिवारों के सदस्य हों, किसी सहकारी समिति का गठन करने हेतु इच्छुक हो, तो इस उद्देश्य से धारा ३ के आधार पर एवं धारा ९ के अनुसार उप-विधियाँ विरचित कर इस अधिनियम के अधीन निबंधन हेतु आवेदन कर सकेंगी।
  2. II. जहाँ इस अधिनियम के अधीन निबन्धित दो या अधिक सरकारी समितियाँ किसी केन्द्रीय सहकारी समिति का गठन करने हेतु इच्छुक हो तो वे इस उद्धेश्य से धारा ३ के आधार पर एवं धारा ९ के अनुसार उप-विधियाँ विचरित कर इस अधिनियम के अधीन निबंधन हेतु आवेदन कर सकेंगी।
  3. III. जहाँ इस अधिनियम के अधीन निबंधित दो या अधिक सरकारी समितियाँ किसी सहकारी परिसंघ का गठन करने हेतु इच्छुक हों तो वे इस उद्देश्य से धारा ३ के आधार पर एवं धारा ९ के अनुसार उप-विधियाँ विरचित कर इस अधिनियम के अधीन निबंधन हेतु आवेदन कर सकेंगी।
  4. IV. जहाँ इस अधिनियम के अधीन निबंधित दो या अधिक सहकारी परिसंघ  और सहकारी समितियाँ जो किसी सहकारी परिसंघ का सदस्य नहीं, सरकारी संघ का गठन करने हेतु इच्छुक हों तो वे इस उद्देश्य से धारा ३ के आधार पर एवं धारा ९ के अनुसार उप-विधियाँ विरचित कर इस अधिनियम के अधीन निबंधन हेतु आवेदन कर सकेंगी।
  5. V. जहाँ बिहार सहकारी सोसाइटी अधिनियम, १९३५ की धारा ११ के अधीन निबंधित कोई सहकारी समिति अपने को इस अधिनियम के अधीन सहकारी समिति के रूप में सपरिवर्तित करने हेतु इच्छुक हों तो वह इस उद्देश्य से धारा ३ के आधार पर एवं धारा ९ के अनुसार उप-विधियाँ विरचित कर इस अधिनियम के अधीन निबंधन हेतु आवेदन कर सकेंगी।

(२)निबंधन के लिए आवेदन निबंधक को प्रस्तुत किया जाएगा।

(३) प्रत्येक ऐसे आवेदन के साथ निम्नांकित संलग्न किये जायंगे –

(क)    प्रवर्तक सदस्यों द्वारा यथा अंगीकृत सहकारी समिति की प्रस्तावित उप-विधियों की दो प्रदियाँ,

(ख)    सदस्यों के नाम, पता, उप जीविका और हिस्सा भागीदारी के उल्लेख के साथ सूचि,

(ग)     प्रवर्तक सदस्यों द्वारा निर्वाचित प्रथम बोर्ड सदस्यों की सूचि,

(घ)     अध्यक्ष द्वारा सम्यक रूप से हस्ताक्षरित उस बैठक, जिसमें उप-विधियाँ अंगीकृत की गयीं, की कार्यवाही की सच्ची प्रति।

(ङ)      बिहार सहकारी सोसाईटी अधिनियम १९३५ की धारा ११ के अधीन निबंधित किसी समिति, जो इस अधिनियम के अधीन सहकारी समिति के रूप में अपने को संपरिवर्तित  करना चाहती हो, की स्थिति में, यह साक्ष्य कि समिति के कब्जे में कोई सरकारी हिस्सा पूँजी नहीं है और यह भी साक्ष्य कि इस अधिनियम के अधीन सहकारी समिति के रूप में निबंधन के लिए आवेदन करते समय तक उसने कोई ऋण या गारंटी प्राप्त नहीं की है  अथवा उसने ऐसे किसी वकाया कर्ज की गारंटी के लिए सरकार के साथ सहमति के ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया है, और

(च)     निबंधन शुल्क, कुल प्राधिकृत हिस्सा पूँजी, चाहे उसका जो भी नाम कहा जाय, का एक प्रतिशत, जो न्यूनतम एक सौ रुपये और अधिकतम दस हजार रुपये होगा ।

(४)निबंधक, यदि उसका यह समाधान हो जाय, कि

(क) आवेदन इस अधिनियम कि अपेक्षाओं के अनुरूप है, और

(ख) प्रस्तावित उप-विधियाँ इस अधिनियम के उपबन्धो के प्रतिकूल  नहीं है सहकारी  समिति तथा उसकी उप-विधियों को निबंधित करेगा और आवेदन में उल्लिखित मुख्य प्रवर्तक को आवेदन-प्राप्ती की तारीख से नब्बे दिनों के भीतर निबंधन का प्रमाण-पत्र और स्वयं द्वारा हस्ताक्षरित और मुहर सहित निबंधित उप-विधियों की मूल प्रति भेजेगा।

(५)यदि उप-धारा (४) अधिकाधिक शर्तों को पूरा नहीं किया गया है, तो आवेदन-प्राप्ति की तारीख से नब्बे दिनों के भीतर निबंधक कारणों के साथ अस्वीकृत का आदेश मुख्य प्रवर्तक को संसूचित करेगा।  उक्त अवधि के भीतर अस्वीकृत संसूचित नहीं किये जाने की स्थिति में सहकारी समिति निबंधित समझी जाएगी और वैसी स्थिति में निबंधक एक माह के अन्दर निबंधित समझे जाने का प्रमाण-पत्र और स्वयं द्वारा हस्ताक्षरित एवं मुहर सहित निबंधित समझी गयी उप-विधियाँ की मूल प्रति भेजेगा।

(६) जहाँ धारा (५) के अधीन अस्वीकृत का आदेश आवेदकों को प्राप्त है अथवा विहित अवधि के अन्दर समझे गये निबंधन का प्रमाण-पत्र आवेदकों को प्राप्त नहीं होता है तो वे इस आदेश के विरुद्ध ऐसे आदेश के संसूचन के ६० दिनों के अन्दर अथवा समझे गये निबंधन प्रमाण-पत्र के संसूचन हेतु विहित की गई अवधि ६० दिनों के अन्दर सहकारी अधिकरण में अपील कर सकेंगे।  इस संबंध में अधिकरण का निर्णय अंतिम होगा।

(७) जहाँ कोई सहकारी समिति निबंधित हो जाए वहाँ निबंधक द्वारा हस्ताक्षरित और मुहर सहित निबंधन का प्रमाण-पत्र इसका निश्चायक साक्ष्य होगा।  परन्तु यह कि जहाँ बिहार सहकारी सोसाईटी अधिनियम, १९३५ के अधीन कोई सहकारी समिति पूर्व में निबंधित थी, उसका ऐसा निबंधन इस धारा के अधीन निबंधन का प्रमाण-पत्र जारी होते ही रद्द समझा जायगा।

६ सहकारी समिति का निगमित निकाय होना –

(१) सहकारी समिति जिस नाम से निबंधित होती है उसी नाम से निगमित निकाय होगी जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और एक सामान्य मुहर होगी।  सहकारी समिति अपनी ओर से सम्पत्ति अर्जित करने, धारण करने और निपटाये वादों को दायर करने तथा अन्य विधिक कार्यवाहियों को प्रारम्भ करने तथा अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अन्य सभी आवश्यक कार्य करने हक़दार होगी।

(२) सहकारी समिति के निबंधन के पूर्व सहकारी समिति के प्रयोजनों को अग्रसर करने में सदभावनापूर्वक किये गये सभी सव्यवाहर निबंधन के पश्चात   भी समिति के संव्यवहार समझे जायेंगे।

(३) कोई सहकारी समिति सीमित दायित्वों के साथ निबंधित हो सकेगी तथा इसके नाम के पश्चात “सीमित” शब्द का प्रयोग किया जायेगा।

७ नाम का प्रदर्शन – (१) प्रत्येक सहकारी समिति निबंधित कार्यालय का पता तथा झारखंड स्वावलम्बी सहकारी समिति अधिनियम, १९९६ के अधीन निबंधित शब्दों को –

(क)    प्रत्येक कार्यालय या स्थान पर जहाँ इसका कारबार होता हो,

(ख)    सभी नोटिसों और अन्य कार्यालय – प्रकाशनों पर,

(ग)     अपनी सभी संविदाओं, कारबारी पत्रों माल के लिये-दिये गये आदेशों, बीजकों, लेखा विवरणी रसीदों एवं खास-पत्रों पर, और

(घ)     सभी विनिमय बिलो, वचन-पत्रों, पृष्ठाकोनों, चेकों, मुद्रा-आदेशों पर, जिन पर इसका हस्ताक्षर हो या जो इसकी ओर से हस्ताक्षरित हो, प्रदर्शित करेगी।

(२)प्रत्येक सहकारी समिति के नाम में ‘सहकारी’ और ‘समिति’ शब्द अन्तविष्ट होंगे।

८ निबंधक कि नियुक्ति –

(१)   राज्य सरकार, राज्य या उसके अंश के लिए, अधिसूचना द्वारा स्वावलम्बी सहकारी समितियों के निबंधक और उसके सहायतार्थ अन्य पदाधिकारियों को, इस अधिनियम के अधीन निबंधक कि सभी या कोई शक्ति प्रदत्त कर सकेगी।

(२)    सामान्यत: निबंधक कि पदावधि तीन वर्षों कि होगी।

खण्ड- ३ उप – विधियाँ-१

९ उप-विधियाँ- (१) अधिनियम में उपबंधित विशिष्ट विषयों को छोड़कर, सहकारी समिति का कार्यकलाप इस अधिनियम के प्रावधानों के अध्यधीन इसकी उपविधियाँ द्वारा विनियमित किया जायगा।

(२)सहकारी समिति कि उपविधियाँ में निम्नलिखित के संबंध में उपबन्ध किये जा सकेंगे :-

(क) सहकारी समिति का नाम, पता एवं कार्यक्षेत्र।

(ख) सदस्यों के सामान्य केन्द्रीभूत आवश्यकताओं को स्पष्टता: उल्लिखित करते हुए सहकारी समिति के उद्देश्य।

(ग)  धारा ३ में यथावार्नित सहकारिता के सिद्धान्त।

(घ)  अपने सदस्यों को प्रदान कि जाने वाली सेवाएँ।

(ङ)   सदस्यता प्राप्त करने कि पात्रता।

(च)  सदस्यता प्राप्त करने कि प्रक्रिया।

(छ) सदस्य के रूप में बने रहने की शर्तें।

(ज) सहकारी समिति की सेवाओं का उपयोग करते रहने के लिए वह समय-सीमा जिसके पूर्व कोई सम्भावित सदस्य निश्चित रूप से सदस्यता हेतु आवेदन कर दे और सदस्यता प्राप्त कर लें।

(झ) सदस्यता वापसी अंतरण की प्रक्रिया।

(ञ)  सदस्यता के पयावसित और अस्तित्वहीन होने की प्रक्रिया।

(ट)  सदस्यों की अधिकार।

(ठ)  सेवाओं के उपयोग, वित्तीय प्रतिबद्दता तथा बैठकों में भागीदारी के आलोक में मताधिकार सहित सदस्यता के अधिकारों का प्रयोग करने हेतु हरेक सदस्य के लिए अपेक्षित न्यूनतम वार्षिक कार्य का निर्धारण।

(ड)   किसी सदस्य के जिम्मे बकाया राशि के भुगतान में व्यक्तिक्रम के परिणाम।

(ढ)    सहकारी समिति की पूँजी, यदि कोई हो, की प्रकृति और रकम।

(ण) किसी एक सदस्य द्वारा अभिदाय की जा सकने वाली अधिकतम पूँजी।

(त)  सहकारी समिति द्वारा संविदित ऋणों के संबंध में सदस्यों के दायित्व की प्रकृति और मात्रा।

(थ)  सहकारी समिति द्वारा जुटाई जानेवाली निधियों के श्रोत एवं प्रकार।

(द)   किन-किन प्रयोजनों से निधियों का प्रयोग किया जा सकेगा।

(ध)  किस सीमा तक और किन शर्तों के अधीन जमा राशियाँ, ऋण, डिबेन्चर तथा अन्य निधियों की उगाही की जा सकेगी।

(न)  किन शर्तों पर और किन प्रयोजनों के लिए राजकीय सहायता तथा अन्य वित्तीय संस्थाओं से सहायता माँगी और प्राप्त की जा सकेगी।

(प) अधिशेष के निपटाने की रीति।

(फ) विभिन्न निधियों, आरक्षित निधियों का गठन और उनके प्रयोजन।

(ब) आम सभा और अन्य विशेष सभा बुलाने की रीति और उनकी गणपूर्ति।

(भ) आम सीमाओं की आवृति।

(म) सामान्य निकाय की भूमिका और सामान्य निकाय के समक्ष विचार हेतु रखे जाने वाले विषय।

(य) उपविधियाँ संशोधित करने की रीति।

(र) निर्वाचन की प्रक्रिया ।

(ल) निर्वाचन कराने में सहकारी समिति के असफल रहने की दशा में निर्वाचन की प्रक्रिया।

(व्) बोर्ड का आकार की पात्रता।

(कक ) निदेशक बनने की पात्रता।

(खख) निदेशक पद को प्रतिधारित करने की शर्तें।

(ग़ग़) निदेशक, अध्यक्ष और अन्य पदधारित करने की कार्यविधि।

(घघ) निदेशक को हटाने तथा रिक्त को भरने की प्रक्रिया।

(डड) बोर्ड की बैठक बुलाने की रीति और गणपूर्ति।

(चच)बोर्ड की बैठकों की आवृति।

(छछ) बोर्ड की शक्तियाँ और कृत्य।

(जज) अध्यक्ष सहित पदधरियों की शक्तियाँ और कृत्य।

(झझ) मुख्य कार्यपालक की शक्तियाँ और कृत्या।

(णण) सदस्यों के हितों के विरुद्ध कार्य करने तथा सदस्यों, निदेशकों और कर्तव्यों को पूरा करने के लिए समितियाँ।

(टट) जहाँ सहकारी समिति आवश्यक व्यवस्था करने में असफल रहे वहाँ लेखा-परीक्षकों कि नियुक्ति और उनकी भूमिका तथा लेखा  परीक्षा संचालित करने कि प्रक्रिया और लेखा परीक्षा अनुपालन कि समय-सीमा।

(ठठ) सहकारी समिति कि ओर से दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने तथा वादों और अन्य विधिक कार्यवाहियों के दायर करने एवं प्रतिरक्षा करने के लिए पदधारी या पदधारियों को प्राधिकृत करना।

(डड) वैसे निर्वान्धनों, जिनपर सहकारी समिति गैर-सदस्यों के साथ व्यवहार कर सकेगी।

(ढढ) वैसे निर्वान्धनों, जिनपर सहकारी समिति सहकारी समितियों के साथ सहयुक्त कर सकेगी।

(णण) वैसे निर्वान्धनों जिनपर सहकारी समिति सहकारी समितियों से भिन्न संस्थाओं से व्यवहार कर सकेगी।

(तत) वैसे अधिकार, यदि कोई हो, जिन्हें सहकारी समिति किसी सहकारी समिति या अन्य परिसंघो को प्रदान कर सकेगी तथा वैसी परिस्थितियाँ जिनमें इस अधिकारों का प्रयोग परिसंघ द्वारा किया जा सकेगा।

(थथ) यदि सहकारी समिति परिसमापन के अधीन न हो तो निधियों के निपटाने कि रीति।

(दद) सहकारी समिति का लेखा वर्ष।

(धध) किसी सदस्य कि मृत्यु हो जाने कि दशा में नाम निर्देशिती के नाम शेयरों एवं हितों का अन्तरण।

(नन) सहकारी समिति का लेखा वर्ष।

(पप) गैर-सदस्यों कि सेवा पर निबंधन, यदि कोई हो।

(फफ) अपने क्षेत्र में रहने वाले लोगों के स्वावलम्बी समूहों को संगठित करना तथा शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करना।

(बब) बोर्ड में प्रतिनिधित्व का उपबन्ध सहित महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन-जातियों तथा अन्य कमजोर वर्गों के लिए विशेष उपाय।

१० उपविधियों का संशोधन :- (१) सहकारी समिति, अपने सामान्य निकाय अथवा प्रतिनिधि सामान्य निकाय, जहाँ यह अस्तित्व में हो द्वारा, मताधिकार प्राप्त उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित संकल्प में अपनी उपविधियाँ के किसी उपबन्ध को संशोधित कर सकेगी।

परन्तु यह कि ऐसा कोई संकल्प तब तक पारित नहीं किया जायेगा, जब तक कि प्रस्तावित संशोधन कि प्रति के साथ, यथास्थिति, सामान्य निकाय या प्रतिनिधि सामान्य निकाय के प्रत्येक सदस्य को बैठक के पूरे बीस दिन पूर्व लिखित नोटिस ने दे दी गई हो, तथा ऐसी नोटिस और प्रस्तावित संशोधन कि बैठक कि तारीख से ठीक पहले बीस दिनों कि कालावधि तक सहकारी समिति के नोटिस बोर्ड पर भी प्रदर्शित न किया गया हो।

परन्तु यह और कि प्रतिनिधि सामान्य निकाय उपविधियाँ में अपने गठन एवं शक्तियों से संबंधित किसी उपबन्ध को परिवर्तित नहीं करेगी।

(२)संशोधन के निबंधन के लिए आवेदन संकल्प पारित होने की तारीख से तीस दिनों की अवधि के भीतर निबंधक को प्रस्तुत किया जायेगा।

(३) निबंधक को प्रस्तुत हरेक आवेदन-पत्र पर अध्यक्ष तथा बोर्ड के सदस्यों का हस्ताक्षर होगा और उसके साथ निम्नलिखित विशिष्टयां संलग्न की जायेंगीं-

(क) संशोधन को अंगीकार करने वाले संकल्प की प्रति।

(ख) जिस आम सभा में संशोधन अनुमोदित किया गया हो उसकी तारीख।

(ग़) आम सभा के लिए जरी की गयी नोटिस की तारीख।

(घ)ऐसी आम सभा की तारीख की सहकारी समिति की नामावली में दर्ज सदस्यों की कुल संख्या जिन्हें मताधिकार प्राप्त हो।

(ड.) ऐसी आम सभा में उपस्थित मताधिकार प्राप्त सदस्यों की संख्या, और

(च) संकल्प के पक्ष में मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या।

(४) निबंधक, आवेदन-प्राप्ति की तारीख से नब्बे दिनों की अवधि के भीतर संशोधन को, यदि प्रस्तावित संशोधन अधिनियम के उपबन्धों के अनुरूप हो, निबन्धित कर लेगा।

(५) निबंधक निबंधित संशोधन की एक प्रति अपने हस्ताक्षर एवं मुहर सहित एक प्रमाण-पत्र के साथ सहकारी समिति को, निबंधन के बाद पन्द्रह दिनों की अवधि के भीतर अग्रसारित कर देगा, तथा ऐसा प्रमाण-पत्र इस बात का निश्चायक सबूत होगा कि संशोधन सम्यक रूप से निबंधित कर दिया गया है।

(६) यदि प्रस्तावित संशोधन अधिनियम के उपबन्धों के अनुरूप न हो तो आवेदन प्राप्ति की तारीख से नब्बे दिनों की अवधि के भीतर इनकार का आदेश, इसके कारणों सहित, सहकारी सिमिति को संसूचित कर देगा।

परन्तु यह कि संशोधन को निबन्धित करने से इनकार करने का कोई आदेश सहकारी समिति को अपना पक्ष करने का अवसर दिये विना पारित नहीं किया जायेगा।

(७) उपधारा (६) के अधीन इनकार का आदेश, उस उपधारा में विनिद्रिष्ट अवधि के भीतर संसूचित नहीं किये जाने की स्थिति में संशोधन निबंधित समझा जायेगा और वैसी स्थिति में निबंधक एक माह के अन्दर ऐसे संशोधन को निबंधित समझे जाने का प्रमाण-पत्र और स्वयं द्वारा हस्ताक्षरित मुहर सहित निबंधित समझे गए संशोधन की मूल प्रति भेजेगा।

११ दायित्वा का परिवर्तन, सम्पत्तियों और दायित्वों का अन्तरण, विभाजन तथा आमेलन :

(१)   कोई सहकारी स्मित अपने सामान्य निकाय के संकल्प द्वारा अपने सीमित दायित्वा के विस्तार में परिवर्तन कर सकेगी।

(२)    कोई सहकारी समिति अपने सामान्य निकाय के संकल्प द्वार अपनी सम्पतियों और दायित्वों का, पूर्णत: या अंशत: किसी अन्य सहकारी समिति, जो अपने सामान्य निकाय के संकल्प द्वारा ऐसे अन्तरण के लिए सहमत हो, को अन्तरण कर सकेगी।

(३)   कोई सहकारी समिति अपने सामान्य निकाय के संकल्प द्वारा दो या अधिक सहकारी समितियों में अपना विभाजन कर सकेगी।

(४)कोई दो या अधिक सहकारी समितियाँ, अपने-अपने सामान्य निकायों के संकल्प द्वारा अपना आमेलन कर सकेंगी और एक नई सहकारी समिति बना सकेंगी।

(५) इस धारा के अधीन सहकारी समिति का प्रत्येक संकल्प उसकी आम सभा में मताधिकार प्राप्त कुल सदस्यों के बहुमत से पारित किया जायेगा तथा ऐसे संकल्प में यथास्थिति, दायित्वा, अंतरण, विभाजन, आमेलन की सभी विशिष्टियाँ अन्त्रदिर्ष्ट होंगी।

(६) जहाँ इस धारा के अधीन कोई संकल्प पारित किया जाता है वहाँ सहकारी समिति अपने सभी सदस्यों, परिसंघ जिससे वह संबंध है और लेनदारों को, संकल्प की प्रति के साथ इसकी नोटिस देगी जो अपनी सहमति दे सकेंगे।  किसी उपविधि या संविदा के प्रतिकूल होते हुए भी, किसी सदस्य, परिसंघ या लेनदार को, नोटिस तामिल की जाने की तारीख से एक माह की अवधि के भीतर, यथास्थिति, शेयर, जमा राशि, ऋण या सेवा प्रत्याह्रित कर लेने का विकल्प होगा।

(७) कोई सदस्य, परिसंघ या लेनदार, जो विनिद्रिष्ट अवधि के भीतर उपधारा (६) के अधीन अधिकार का प्रयोग न करे तो संकल्प में उसकी अनुमति प्राप्त समझी जायेगी।

(८) इस धारा के अधीन किसी सहकारी समिति द्वारा पारित संकल्प तब तक प्रभावी नहीं होगा, जब तक कि –

(क)(१) सभी सदस्य, परिसंघ और उपधारा (६) के अधीन संकल्प पर अपनी अनुमति न दे दें अथवा उपधारा (७) के अधीन अनुमति दी गई न समझी जाय, अथवा

(२) उपधारा (६) के अधीन, उनमें विनिद्रिष्ट, अवधि के भीतर, निर्दिष्ट विकल्प देने वाले सदस्यों, परिसंघ और लेनदारों के सभी दावों कि पूर्ति या अन्यथा समाधान न कर किया जाय, और

(ख) (१) दायित्वा के परिवर्तन कि दिशा में, संबंधित सहकारी समिति कि उपविधियाँ में संशोधन को निबन्धित न कर लिया गया हो अथवा निबन्धित किया गया न समझा गया हो, अथवा

(२) विभाजन या आमेलन कि दशा में, यथास्थिति, सहकारी समिति या सहकारी समितियों के निबंधन का प्रमाण-पत्र जारी न कर दिया गया हो अथवा जारी किया गया न समझा गया हो।

(९) जब उपधारा (२) के अधीन किसी सहकारी समिति द्वारा पारित संकल्प प्रभावी हो जाय, जो संकल्प सम्पत्तियों और दायित्वों को अंतरिती में निहित करने के लिए बिना और आश्वासन के यथेष्ट हस्तान्तरण-पत्र होगा।

(१०) किसी सहकारी समिति का निबंधन स्वत: तब रद्द हो जायेगा और सहकारी समिति विघटित समझी जायेगी, तथा एक निगमित निकाय के रूप में  अस्तित्वहीन हो जायेगी :-

(क) जब ऐसी सहकारी समिति कि सम्पूर्ण सम्पत्तियां और दायित्वा किसी दूसरी सहकारी समिति को अन्तरित कर दी जाय, या

(ख) जब ऐसी सहकारी समिति दो या अधिक समितियों में विभाजित हो जाय।

(११) जहाँ दो या अधिक सहकारी समितियों का आमेलन तक नई सहकारी समिति के रूप में हो जाय, वहाँ इस प्रकार आमेलित सहकारी समितियों का निबंधन स्वत: रद्द हो जायेगा और उन्हें विघटित समझा जायेगा तथा वे निगमित निकायों के रूप में अस्तित्वहीन हो जायेंगे।

१२ समनुशंगी संगठन का प्रवर्त्तन :- (१) कोई सहकारी समिति अपने वर्णित उद्देश्यों को अग्रसर करने के लिए आम सभा में मताधिकार प्राप्त उपस्थित सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा, एक या अधिक समनुशंगी संगठनों को प्रवर्तित कर सकेगी और ऐसे संगठन को, सामान्य निकाय द्वारा सहमत, तत्समय प्रवृत किसी विधि के अधीन निबंधित किया जा सकेगा।

(२)ऐसे किसी समनुशंगी संगठन की वार्षिक रिपोर्ट और लेखा प्रति वर्ष प्रवर्तक सहकारी समिति की आम सभा में प्रस्तुत किया जायेगा।

(३) उपधारा (१) के अधीन सृजित कोई समनुशंगी संगठन तब तक ही अस्तित्व में रहेगा जब तक कि सहकारी समिति का सामान्य निकाय उसके अस्तित्व को आवश्यक समझे।

१३ अन्य के साथ नये संगठन का सृजन :-  जहाँ किसी सहकारी समिति और अन्य संगठन या संगठनों के बीच सहयोग के लिए किसी नये संगठन का सृजन करना अपेक्षित हो, वहाँ नया संगठन कम्पनी या लोक समिति के रूप में, जो इस उद्देश्य कि पूर्ति के लिए समुचित हो जिसके लिए इसका सृजन किया गया हो, निबंधित किया जा सकेगा।

खण्ड – ४ संघ और परिसंग

१४ सहकारी संघ-परिसंग : (१) इस अधिनियम के अधीन राज्य में एक सहकारी संघ का निबंधन होगा और वह झारखंड राज्य सहकारी संघ कहलायेगा।  सहकारी संघ का गठन सहकारी परिसंघों तथा ऐसी सहकारी समितियों से होगा, जो किसी परिसंघ के सदस्य नहीं है।

(२)समान कार्य-प्रकृति कि प्राथमिक एवं केन्द्रीय सहकारी समितियों के वर्ग के सहकारी परिसंघ स्थापित किये जा सकेंगे तथा इस अधिनियम के अधीन निबंधन के पात्र होंगे।

परन्तु यह कि एक कार्य-प्रकृति कि प्राथमिक एवं केन्द्रीय समितियों के वर्ग का राज्य में एक ही सहकारी परिसंघ हो सकेगा।

(३)अपने संगठकों कि सेवा करने के लिए तथा अपनी उप-विधियों के अनुसार संघ/परिसंघ निम्नलिखित कृत्यों का पालन कर सकेंगे :-

(क) सहकारिता-सिद्धान्तों के अनुपालन कि सुरक्षा।

(ख) सहकारी समितियों का प्रवर्त्तन एवं संगठन करना और इस प्रयोजनार्थ आदर्श उप-विधियाँ विचरित करना तथा सहकारी समितियों द्वारा विभिन्न विनिमयों एवं नीतियों कि विरचना हेतु विचारार्थ मार्ग-दर्शक सिद्धरनत बनाना।

(ग)  सहकारिता प्रशिक्षण, शिक्षा एवं सूचना देना तथा सिद्धान्तों का प्रचार कर सकना।

(घ)  शोध एवं मूल्याकंन का जिम्मा लेना तथा परिप्रेक्ष्य विकास योजना को तैयार करने में सदस्य सहकारी समितियों की सहायता करना।

(ङ)    सदस्य सहकारी समितियों के बीच सामंजस्यपूर्ण संवर्धन करना।

(च)  सदस्य सहकारी समितियों के आपसी विवाद तथा किसी सहकारी समिति और उसके सदस्यों के बीच हुए विवाद का निपटारा करने में सहकारी समिति एवं उनके सदस्यों की सहायता करना।

(छ) सदस्य सहकारी समितियों के हितों का प्रतिनिधित्व करना तथा सहकारी समितियों के अनुकूल नीतियों एवं विधानों के लिए लांबी करना।

(ज) अपने सदस्यों की ओर से कारबार, सेवा का जिम्मा लेना।

(झ) जहाँ आमंत्रित किया जाय वहाँ बोर्ड के बैठकों में भाग लेने सहित, सदस्य सहकारी समितियों को सहकारिता एवं प्रबंधन विकास सेवाएँ उपलब्ध कराना

(ञ)  लेखा-परीक्षकों की एक नामावली तैयार करना तथा सदस्य सहकारी समितियों में समय पर वार्षिक लेखा-परीक्षा का संचालन सुनिश्चित कराना।

(ट)   सदस्य सहकारी समितियों में समय पर निर्वाचन का संचालन सुनिश्चित करना।

(ठ)  आम सभाओं के नियमित संचालन में सदस्य सहकारी समितियों की सहायता करना।

(ड)    सदस्य सहकारी समितियों के अनुपालनार्थ आचार संहिता तैयार करना।

(ढ)    सदस्य सहकारी समितियों के लिए अस्तित्वाक्षम्य होने का प्रतिमान तैयार करना।

(ण) विधिक सयायता एवं परामर्श देना।

(त)  सदस्य सहकारी समितियों के क्षेत्र में रहनेवाले लोगों के स्वावलम्बी समूहों को संगठित करने में सहायता करना।

(थ)  सदस्य सहकारी समितियों के कहने पर कोई अन्य सेवाएँ उपलब्ध करना।

(४)   (क) कोई परिसंघ किसी सदस्य सहकारी समिति के बोर्ड से अपने सदस्यों के सामान्य निकाय की सभा बुलाने का अनुरोध कर सकेगा तथा बोर्ड से ऐसा करने का अनुरोध तब क्रेग जब सदस्य सहकारी समिति के कम-से-कम दस प्रतिशत सदस्यों ने परिसंघ से ऐसा करने का अनुरोध किया हो।

(ख) अध्यपेशा में कार्यक्रम में सम्मिलित की जाने वाली मदें अन्तविष्ट होंगी और इन पर सामान्य निकाय की बैठक में विचार किया जायेगा।

(ग़) सदस्य सहकारी समिति का बोर्ड अध्येक्षा प्राप्त होने की तीस दिनों के भीतर ऐसी सभा बुलायेगा।

(ङ)      यदि परिसंघ द्वारा ऐसा करने हेतु की गयी अध्यपेक्षा की प्राप्ति के तीस दिनों के भीतर कोई सदस्य सहकारी समिति आमसभा बुलाने में विफल रहे तो परिसंघ का बोर्ड स्वंय ऐसी सभा, ऐसी मदों, जैसा कि अध्यपेक्षा में सम्मिलित कि गई हो, पर विचार करने के लिए बुला सकेगा।

(५)   (क) किसी परिसंघ का सामान्य निकाय सदस्य सहकारी समितियों के प्रतिनिधियों से गठित होगा।

(ख) सामान्यत: किसी सहकारी समिति का अध्यक्ष सहकारी समिति के अगले सोपान के लिए प्रतिनिधि होगा।  परन्तु यह कि यदि अस्वस्थता या अन्य किसी अपरिहार्य कारणों से अध्यक्ष प्रतिनिधि करने में असमर्थ हो तो वह मुख्य कार्यपालक या बोर्ड के किसी अन्य सदस्य को प्रतिनिधि होने के लिए नाम-निर्देशित कर सकेगा।

(ग़) प्रतिनिधि अपनी समिति का प्रतिनिधित्वा अगले सोपान कि सहकारी समिति/परिसंघ/संघ में तब तक करता रहेगा, जब तक कि वह सदस्य सहकारी समिति में पद पर बना रहेगा।

(६)   सहकारी संघ :

  1. I.  सहकारिता शिक्षा निधि का सृजन और संशोधन कर सकेगा।
  2. II.  जिला एवं राज्य स्तरीय सभी प्रकार की सहकारी समितियों के हित और कल्याण का प्रतिनिधित्व कर सकेगा।
  3. III. सहकारी उद्धमों के नये स्वरूपों का प्रवर्तन कर सकेगा।
  4. IV. सहकारिता-सिद्धान्तों के अनुपयोग की दिशा में प्रायोगिक परियोजनाएँ प्रारम्भ कर सकेगा।
  5. V. सहकारी समितियों की ओर से और उनके बीच सम्पर्क स्थापित कर सकेगा, और
  6. VI. सहकारिता के संबंध में आंकड़ा बैंक के रूप में कार्य कर सकेगा
  7. खण्ड – ५ निधियों का प्रबंधन

१. निधियों का संग्रहण :

कोई सहकारी समिति अपने सदस्यों से अंश पूँजी, जमा राशियों, डिबेन्चर, ऋण तथा अन्य अभिदाय का संग्रहण उस सीमा तक और ऐसी शर्त के अधीन कर सकेगी जैसी कि सहकारी समिति कि उपविधियों में विनिद्रिस्ट कि जायें।

परन्तु यह कि किसी सहकारी समिति के विघटन के समय अन्य को देय राशियों का निपटारा करने के बाद ही सदस्यों को देय राशियों का निपटारा किया जायेगा।

१ उधार पर निर्बन्धन :

(१)   कोई सहकारी समिति बाह्य स्रोतों से डिबेंचरो जमा राशि के संग्रहण अनुदानों प्राप्ति तथा उधार लेना उस सीमा तक तथा ऐसी शर्तों के अधीन कर सकेगी जैसी कि उपविधियों में विनिद्रिस्ट की जाएं।  बाह्य स्रोतों से जुटाई गई जमा राशि एवं उधार, तथापि, कभी भी सदस्य निधि और संगठनात्मक आरक्षित  राशि घटाव संचित कमी, यदि कोई हो, के दस गुणा से अधिक नहीं होगा।

(२)   कोई सहकारी समिति अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सरकार अथवा अन्य वित्तये संस्थाओं से ऐसे निर्बन्धन एवं शर्तों पर निधियाँ, गारंटी को स्वीकार कर सकेगी जैसा कि आपस में करार पाया जाय तथा ऐसी शर्तों में सरकार अथवा अन्य वित्तपोषकों को बोर्ड में एक विशेषग्य नाम-निर्दिष्ट करने का अधिकार दिया जाना सम्मिलित हो सकेगा।

१ हिस्सा धारण करने पर निर्बन्धन :

(१)   किसी प्राथमिक सहकारी समिति का कोई सदस्य, कभी समादत्त साधारण पूँजी के दसवें भाग से अधिक धारण नहीं करेगा।

(२)    कोई सहकारी समिति हिस्सा के रूप में सरकार से निधि स्वीकार नहीं करेगी।

१ अधिशेष का निपटना :-

(१)   कोई सहकारी समिति वर्ष में, सदस्यों के साथ संव्यवहार से प्रोदभुत होने वाले अधिशेष से उस वर्ष में अपने सदस्यों को प्रश्रय रिबेट के रूप में पच्चीस प्रतिशत से अधिक रकम का आस्थगित भुगतान तथा अपने सदस्यों को उनके शेयर के अनुसार हिस्सा पूँजी पर पन्द्रह प्रतिशत से अधिक लाभांश का भुगतान नहीं करेगी।

(२)   सदस्यों से प्रोदभुत शेष तथ अन्य के साथ संव्यवहार से प्रोदभुत अधिशेष का उपयोग निम्नलिखित रूप में किया जायेगा :-

(क) पच्चीस प्रतिशत से अन्यून सांविधिक आरक्षित निधि में अन्तरित किया जायगा।

(ख) बीस प्रतिशत से अन्यून अनवेक्षित हानि पूरा करने के लिए आरक्षित में अन्तरित किया जायेग।

(ग)  जहाँ सहकारी समिति सहकारी संघ का सदस्य हो, वहाँ सहकारी संध के सहकारिता शिक्षा निधि में तीन प्रतिशत तक अन्तरित किया जा सकेगा।

(घ)  सामान्य निकाय के निर्णयानुसार कर्मचारियों को बोनस भुगतान किया जायेगा।

(ङ)    सामान्य हित निधि में पांच प्रतिशत से अन्यून अन्तरित किया जा सकेगा, जिसका प्रयोजन सामान्य निकाय द्वारा अनुमोदित हो।

(च)  सहकारिता आन्दोलन के विकास से सम्बन्ध किसी प्रयोजन हेतु अभिदाय के रूप में पांच प्रतिशत से अन्यून का भुगतान किया जा सकेगा।

कमी पूर्ति के लिए प्रबंध :

(१)   जहाँ कोई सहकारी समिति किसी उल्लिखित वर्ष में घाटे में हो वहाँ बोर्ड प्रथम आगामी वार्षिक आम सभा में सामान्य निकाय से समक्ष घाटे की पूर्ति करने की रीति के संबंध में प्रस्ताव की एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।

(२)    सहकारी समिति का सामान्य निकाय कमी समावेशन निधि में उपलब्ध राशि के विरुद्घ मुजरा कर और अथवा वर्ष के दौरान समिति की सेवा से सदस्यों ने जिस अनुपात में लाभ उठाया हो या उनके लाभ उठाने की आशा हो उस अनुपात में सदस्यों के लेखा में घाटा विकलित कर इसका समावेशन करवाने का निर्णय लेगा।

आरक्षित एवं अन्य निधियाँ :-

(१)   सहकारी समिति के उद्देश्यों का प्रवर्त्तन करने के लिए सहकारी समिति सांविधिक एवं असांविधिक आरक्षित तथा निधियों का सृजन कर सकेगी।

(२)    आरक्षित एवं अन्य निधियों का उपयोग आवश्यक होने पर, उन प्रयोजन के लिए किया जायेगा, जिसके लिए उनका सृजन किया गया हो, किन्तु सहकारी समिति के कारबार में भी इसका अन्यथा उपयोग किया जा सकेगा।

कारबार से बाहर निधि निवेश :- ऐसी निधियाँ जिनके उपयोग की आवश्यकता सहकारी समिति को न हो, का निवेश या निक्षेप इसके कारबार से बाहर :-

(क) संघ/किसी परिसंघ में, जिसका वह सदस्य हो,

(ख) किसी स्थानीय सहकारी बैंक में,

(ग)  अन्य किसी सहकारी समिति के हिस्सा में,

(घ)  भारतीय न्याय अधिनियम १८८२ की धारा २० में विनिद्रिष्ट किसी प्रतिभूति में,

(ङ)    स्थानीय डाकघर बचत बैंक में, और

(च)  उपविधियों में यथा उपबंधित किसी गैर-सट्टेबाजी रीति से किया जा सकेगा।

अभिदाय पर निर्बन्धन:- कोई सहकारी समिति, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से धन या वस्तु के रूप में, किसी संगठन, जिसका उद्धेश्य किसी राजनीतिक दल या किसी धार्मिक विश्वास के हितों को बढ़ाना हो, को अभिदाय नहीं करेगी।

खण्ड – ६ प्रबंधन

सदस्यता :-

कोई व्यक्ति जिसे सहकारी समिति की सेवा की आवश्यकता हो, सदस्यता की जिम्मेदारी को स्वीकार करता हो और ऐसी अन्य शर्तों, जो सहकारी समिति की उप-विधियाँ में विनिर्दिष्ट की हुई हों, को पूरा करता हो, सदस्य बनाया जा सकेगा।  परन्तु यह कि सहकारी समिति आवेदक को अपनी सेवाएँ प्रदान करने कि स्थिति में हो तथा आवेदक इस अधिनियम या बिहार सहकारी सोसाइटी अधिनियम १९३५ के अधीन निबंधित वैसी ही या समान सेवा प्रदान करनेवाली किसी अन्य सहकारी समिति का पहले से सदस्य नहीं हो।

सदस्यता लिंग के आधार पर कोई विभेद किये बिना उपलब्ध कराई जायेगी।

सदस्य बनाया जाना और सदस्यता से हटाया जाना निर्वाचित बोर्ड द्वारा ही, उप-विधियाँ में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया के अनुसार किया जायेगा।

कोई सहकारी समिति, बिना पर्याप्त कारण के, ऐसे किसी व्यक्ति को उप-विधियों के अधीन सदस्यता के लिए सम्यक रूप से अहक हो, को प्रवेश देने से इनकार नहीं करेगी।  जहाँ इस तरह प्रवेश देना इनकार किया जाय, वहाँ तत्संबंधी कारणों सहित इस आशय के विनिश्चय कि संसूचना ऐसे आवेदक को निर्णय कि तारीख से पन्द्रह दिनों के भीतर अथवा सदस्यता के आवेदन की तारीख से तीस दिनों के भीतर, जो भी पहले हो, दी जायेगी।

परन्तु यह कि यदि सदस्यता के लिए आवेदन करने की तारीख से तीस दिनों के भीतर ऐसा विनिश्चय संसूचित नहीं किया जाता है, तो वह व्यक्ति एकतिस्वें दिन सहकारी समिति के एक सदस्य के रूप में सम्मिलित किया गया समझा जाएगा।

जहाँ किसी व्यक्ति को सदस्यता देने से बोर्ड द्वारा इनकार कर दिया गया हो, वहाँ बोर्ड के विनिश्चय के विरुद्ध बोर्ड के विनिश्चय के संसूचन के तीस दिनों के अन्दर सामान्य निकाय में अपील की जा सकेगी।

सामान्य निकाय के विनिश्चय से व्यक्ति कोई आवेदक सामान्य निकाय के विनिश्चय के संसूचन के साठ दिनों के अन्दर सरकारी अधिकरण के समक्ष पुनविर्लोक्न आवेदन दाखिल कर सकेगा।  सदस्य के रूप में सम्मिलित किया गया कोई भी व्यक्ति सदस्यता के अधिकारों, जिसमें मताधिकार भी शामिल है, का प्रयोग उपविधियों में समय-समय पर यथा अधिकथित शर्तों को पूरा करने पर ही कर सकेगा।  परन्तु यह कि कोई व्यक्ति कम-से-कम एक वर्ष तक सदस्य बने रहने के बाद ही मताधिकार का प्रयोग करने का पात्र होगा।  परन्तु यह और कि उपयुक्त परन्तु किसी सहकारी समिति के निबंधन के प्रथम वर्ष में प्रवर्तक सदस्य पर लागू नहीं होगा।

गैर-सदस्यों को सेवाएँ उपलब्ध करने पर निर्बन्धन :- किसी सहकारी समिति कि सेवाएँ सामान्यता: केवल सदस्यों को ही उपलब्ध होंगी जबतक कि उप-विधियों में अन्यथा उपबंधित न हो।

सामान्य निकाय :-

अध्यादेश तथा उप-विधियाँ के उपबन्धों के अध्यधीन किसी सहकारी समिति का अंतिम प्राधिकार इसके निकाय में निहित होगा।

जहाँ कोई सहकारी समिति इस प्रकार इच्छा करे, वहाँ इसके सदस्यों में से एक प्रतिनिधि सामान्य निकाय का उपबंध इसकी उप-विधियाँ में किया जा सकेगा, जिसका गठन ऐसी रीति से और ऐसे कृत्यों के साथ होगा जैसे उप-विधियाँ में विनिर्दिष्ट किये जाये।

परन्तु यह कि प्रतिनिधि सामान्य निकाय को सहकारी समिति कि उप-विधियों में संशोधन करने का अधिकार नहीं होगा, सिवाय उनके, जिनके संबंध में उप-विधियाँ ने प्रतिनिधि सामान्य निकाय को संशोधन करने कि उक्ति प्रत्यायोजित कर दी हो।  इस अध्यादेश तथा उप-विधियों के अध्यधीन,सामान्य निकाय द्वारा निम्नलिखित मामलों का निपटारा किया जायेगा।

(क) बोर्ड के निदेशकों का निर्वाचन।

(ख) बोर्ड के निदेशकों को हटाना और रिक्तियों को भरना।

(ग)  निबंधक के पास दाखिल करने के लिए बोर्ड द्वारा प्रस्तुत वार्षिक रिपोर्ट पर विचार।

(घ)  सांविधिक लेखा-परीक्षकों एवं आन्तरिक लेखा-परीक्षकों कि नियुक्ति एवं हटाया जाना।

(ङ)    लेखा-परीक्षा की रिपोर्ट और निबंधक के यहाँ दाखिल किए जाने के लिए लेखा-परीक्षित विवरण पर विचार।

(च)  लेखा-परीक्षा/विशेष अनुपालन रिपोर्ट पर विचार।

(छ) धारा ३६ के अधीन जाँच रिपोर्ट पर की गयी करवाई संबंधी रिपोर्ट यदि कोई हो।

(ज) शुद्ध अधिशेष का निपटान।

(झ) संचालन घाटा, यदि कोई हो, का पुनविर्लोकन।

(ञ)  दीर्घकालीन महत्वा की योजना और वार्षिक परिचालन योजना का अनुमोदन।

(ट)   वार्षिक बजट का अनुमोदन।

(ठ)  विनिर्दिष्ट आरक्षिति एवं अन्य निधियों का सृजन।

(ड)   आरक्षित एवं अन्य निधियों की वास्तविक उपयोगिता का पुनविर्लोकन।

(ढ)    अन्य सहकारी समितियों में सहकारी समिति की सदस्यता के संबंध में रिपोर्ट।

(ण) किसी समनुशंगी संगठन की वार्षिक रिपोर्ट एवं लेखा का पुनविर्लोकन।

(त)  सदस्यता के लिए जिस व्यक्ति का आवेदन अस्वीकृत कर दिया गया हो अथवा जिसकी सदस्यता बोर्ड द्वारा समाप्त कर दी गयी हो, उसकी अपील।

(थ)  प्रतिनिधि सामान्य निकाय की नियुक्ति, पुनर्गठन एवं भंग करना।

(द)    किसी निदेशक या आन्तरिक लेखा-परीक्षक को उस हैसियत से अपने कर्तव्य के लिए अथवा संबंधित बैठकों में उसकी उपस्थिति के लिए देय पारिश्रमिक।

(ध)  संघ परिसंघ में सहकारी समिति की सदस्यता।

(न)  अन्य संगठनों के साथ सहयोग।

(ऩ)  उप-विधियों का संशोधन।

(प)   निदेशकों एवं पदधारियों के लिए आचार-संहिता बनाना।

(फ) सदस्यों को सम्मिलित किये जाने एवं सदस्यता समाप्त किये जाने संबंधी टिप्पणी समाप्त।

(ब)   सहकारी समिति का विघटन।

(भ) ऐसे अन्य कृत्य, जो विधियाँ में विनिर्दिष्ट हों।

बोर्ड :

किसी सहकारी समिति का सामान्य निकाय उप-विधियों के अनुसार एक बोर्ड का गठन करेगा।  बोर्ड का आकार उप-विधियों के अनुसार होगा।  मुख्य कार्यपालक बोर्ड का पदेन सदस्य होगा।  उप-विधियों में यथाविनिर्दिष्ट किसी मानदण्ड के अतिरिक्त कोई निदेशक के रूप में चुने जाने पर अपात्र होगा, यदि –

(क) उप-विधियों में यथावीनिर्दिष्ट सदस्य के रूप में, वह किसी समय मताधिकार खो दिया हो।

(ख) वह उप-विधियों में यथाविनिर्दिष्ट सदस्य के रूप में बने रहने का अधिकार खो देता हो, या

(ग) वह उप-विधियों में यथाविनिर्दिष्ट किसी अन्य निरहारता से ग्रस्त हो जाता हो।

उप-विधियों में यथाविनिर्दिष्ट मानदण्ड के अतिरिक्त, कोई व्यक्ति निदेशक नहीं रह जाएगा, यदि वह उप-धारा (३) में यथाविनिर्दिष्ट किसी निर्हर्ता से ग्रस्त हो जाता हो,या

(क) वह बोर्ड की लगातार तीन बैठकों में, अनुपस्थिति की इजाजत लिए बिना, अनुपस्थित रहता हो, या

(ख) वह सामान्य निकाय के लगातार किसी तीन सभाओं में अनुपस्थिति की इजाजत लिए बिना अनुपस्थित रहता हो, या

(ग) इस अधिनियम के अधीन दंडित किया गया हो।

उप-विधियों में यथाविनिद्रिष्ट ऐसे मानदण्ड के अतिरिक्त, बोर्ड के सभी निदेशक  तीन वर्षों की कालावधि के लिए निदेशक चुने जाने के लिए निर्हताग्रस्त हो जायेंगे और किसी सहकारी समिति के निदेशक के रूप में बने रहने के अपात्र हो जायेंगे, यदि किसी सहकारी समिति के निदेशक के रूप में अपनी अवधि के दौरान –

(क) वे उप-विधियाँ में यथाविनिद्रिष्ट समय के भीतर अपनी पदावधि की समाप्ति से पहले निर्वाचन नहीं कराएं।

(ख) वे सरकारी समिति के लेखा-वर्ष की समाप्ति के चार माह के भीतर सामान्य निकाय की वार्षिक आम सभा अथवा सामान्य निकाय की कोई अधियाचित आम सभा नहीं कराएँ। या

(ग) वे सामान्य निकाय की वार्षिक आम सभा के समक्ष लेखा- परीक्षकों की रिपोर्ट के साथ विगत वित्तीय वर्ष की संपरीक्षित लेखा नहीं रखें।

किसी सहकारी समिति, जो दो वर्षों से अधिक की अवधि से अस्तित्व में है, के बोर्ड के निदेशक के रूप में चुने जाने का पात्र होने के लिए किसी सदस्य के लिए यह आवश्यक होगा कि वह –

(क) निर्वाचन वर्ष के ठीक पूर्ववर्त्ती कम-से-कम दी वर्षों तक मतदाता सदस्य बना रहा हो।

(ख) सहकारी समिति के सामान्य निकाय कि, निर्वाचन के ठीक पूर्ववर्त्ती दो सभाओं में भाग लिया हो, और

(ग) लगातार दो कार्यविधि तक सहकारी समिति का निदेशक या पदधारी नहीं रहा हो।

किसी सहकारी समिति का प्रत्येक निदेशक एवं कर्मचारी अपनी शक्तियों का प्रयोग एवं अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय –

(क) ईमानदारी एवं सदभावपूर्वक और सहकारी समिति के सर्वाधिक हित में कार्य करेगा, और

(ख) ऐसी सम्यक सावधानी, परिचय और कुशलता के साथ कार्य करेगा जैसा कि वैसी ही परिस्थितीयों में कोई मर्यदापूर्ण प्रज्ञावान व्यक्ति करता है।

कोई निदेशक या कर्मचारी जो दुर्विर्नियोग, न्यास-भंग अथवा किसी अन्य लोप या कार्य, जिसके चलते सहकारी समिति को हानि हुई है, का दोषी है तो ऐसी अपराधिक कार्यवाही, जिसका वह विधि के अधीन जिम्मेवार है, पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना उस हानि कि पूर्ति करने के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेवार होगा।

बोर्ड कि शक्तियाँ और कृत्य :-

उप-विधियाँ के अनुसार बोर्ड को –

(क)    सदस्य बनाने या सदस्यता समाप्त करने।

(ख)    अध्यक्ष एवं अन्य पदधारियों को निर्वाचित करने।

(ग)     अध्यक्ष एवं अन्य पदधारियों को पद से हटाने।

(घ)     मुख्य कार्यपालक को नियुक्त करने एवं हटाने।

(ङ)      कर्मचारीवृन्द कि संख्या निर्धारित करने।

(च)     निम्नलिखित के संबंध में नीतियाँ निर्धारित करने – सदस्यों को दी जानेवाली सेवा का संगठन एवं प्रबंध।

अहर्ता, भर्ती, सेवा शर्तें एवं कर्मचारियों से संबंधित अन्य मामले।

निधियों कि अभिरक्षा एवं निदेश का ढंग।

लेखा संघारण कि रीति।

विभिन् निधियों का संग्रहण, उपयोग एवं निवेश।

सूचना पद्धति के अनुश्रवण (मोनेटरिंग)एवं प्रबंध तथा दाखिल कि जाने वाली सांविधिक विवरणी।

समिति के प्रभावी कार्य सम्पादन के लिए आवश्यक अन्य विषय और मामले।

(छ)    सामान्य निकाय के अनुमोदन के लिए वार्षिक रिपोर्ट, वार्षिक वित्तीय विवरण, वार्षिक योजना और बजट को प्रस्तुत करने।

(ज)    लेखा-परीक्षा एवं अनुपालन रिपोर्टों पर विचार करने और उन्हें सामान्य निकाय के समक्ष प्रस्तुत करने।

(झ)    अन्य सहकारी समितियों कि सदस्यता का पुर्नविलोकन करने।

(ञ)     सामान्य निकाय द्वारा प्रत्यायोजित अन्य कृत्यों का जिम्मा लेने का प्राधिकार होगा।

निर्वाचित सदस्यों में से बोर्ड द्वारा अध्यक्ष का चुनाव किया जाएगा और वह, उप-विधियाँ के अनुसार –

(क)    बोर्ड कि बैठकों एवं सामान्य निकाय कि सभाओं कि अध्यक्षता करेगा।

(ख)    चुनाव के मामलों को छोड़कर बोर्ड के द्वारा निर्णय किए जाने वाले किसी अन्य मामले में बराबर-बराबर मत प्राप्त होने की दशा में अपना निर्णायक मत देना।

(ग)     बोर्ड द्वारा निर्धारित नीतियों में या अंगीकृत संकल्पों में विनिद्रिष्ट, बोर्ड द्वारा प्रत्यायोजित अन्य शक्तियों का प्रयोग करना।

पदावधि :- बोर्ड के निदेशक की पदावधि, अथवा जहाँ उप-विधियाँ में चक्रानुक्रम से निदेशक की सेवा-निवृत्ति के लिए उपलब्ध हो वहाँ निदेशक की पदावधि, उतनी ही अवधि के लिए होगी, जितनी की उप-विधियाँ में विनिर्दिष्ट है, किन्तु वह पद-धारण करने की तारीख से तीन वर्षों से अधिक नहीं होगी।  परन्तु यह कि इस पदावधि को सामान्य निकाय द्वारा अपनी बैठक में मताधिकार-प्राप्त सदस्यों के बहुमत से समाप्त किया जा सकेगा।

परन्तु यह भी कि प्रथम बोर्ड कि कार्यवधि सहकारी समिति के निबंधन कि तारीख से लेकर बारह माय से अधिक की नहीं होगी।

निर्वाचन :

सहकारी समिति के बोर्ड के निर्वाचन के संचालन की जिम्मेदारी पदधारी बोर्ड की होगी।

निर्वाचन पदावरोही निदेशक की पदावधि समाप्त होने से पूर्व उपविधियाँ में विनिर्दिष्ट रीति से संचालित किया जायेगा। निदेशकों का निर्वाचन सामान्य निकाय की सभा में होगा।

निदेशक उप-विधियाँ में विनिर्दिष्ट अवधि एवं जिसके लिए वे निर्वाचित किये गये, उस अवधि तक के लिए धारण करेंगे तथा नव-निर्वाचित निदेशक, यथास्थिति बहिग्रामी निदेशकों की कार्यवधि के पूरा होने अथवा कार्यवधि के नहीं रह जाने पर पदधारण करेंगे।

निदेशक, यदि उप-विधियाँ ऐसी अनुज्ञा दे तो पुननिर्वाचन का पात्र हो सकेगा: परन्तु यह कि वह लगातार दो कार्यविधियों तक सहकारी समिति को निदेश या पदधारी नहीं रहा हो।

जहाँ उम्मीदवारों कि संख्या निर्वाचित होनेवाले निदेशकों कि संख्या से अधिक हो जाए वहाँ निदेशकों का निर्वाचन गुप्त मतपत्र द्वारा होगा।

जहाँ, कोई बोर्ड निदेशक कि कार्यवधि कि समाप्ति के पूर्व, निर्वाचन संचालित करने हेतु आवश्यक कदम नहीं उठाता हो,अथवा, जहाँ, बोर्ड पर निदेशक बाकी नहीं बच गए हों, वहाँ सहकारी समिति के कुल सदस्यों के न्यूनतम पांच प्रतिशत सदस्य निर्वाचन संचालन के विनिर्दिष्ट प्रायोजन के लिए एक तदर्थ बोर्ड को नियुक्त करने के लिए, संयुक्त रूप से सदस्यों कि एक आमसभा का आयोजन कर सकेंगे।

इस प्रकार नियुक्त तदर्थ बोर्ड की अवधि तीन माह से अधिक कि नहीं होगी। यदि उप-धारा (७) के अनुसार तदर्थ बोर्ड का गठन नहीं होता है तो परिसंघ का यह कर्तव्य होगा कि वह निबंधक को सूचित करें।

उप-धारा (९) के अधीन परिसंघ द्वारा सूचित किये जाने पर निबंधक, स्वप्रेरणा से, निर्वाचन के संचालनार्थ विनिर्दिष्ट प्रायोजन के लिए एक दूसरे तदर्थ बोर्ड की नियुक्ति हेतु एक आमसभा बुला सकेगा।

उप-धारा (१०) के अधीन नियुक्त तदर्थ बोर्ड की कार्यवधि एक माह से अधिक की नहीं होगी तथा उप-विधियों के अनुसार नियमित बोर्ड के निर्वाचित होते ही यह तदर्थ बोर्ड नहीं रह जायेगा। निर्वाचन संचालन का व्यय सहकारी समिति द्वारा वहन किया जायेगा।

जहाँ बोर्ड में रिक्ति हो और जहाँ ऐसी रिक्ति के कारण निदेशकों की गणपूर्ति नहीं हो, वहाँ शेष निदेशक बची हुई अवधि के लिए किसी भी रिक्ति की पूर्ति हेतु सदस्यों के निर्वाचन के प्रयोजनार्थ आमसभा बुलायेंगे, यदि बची हुई अवधि छ: माह से अधिक हो।

बैठक :

किसी सहकारी समिति का उप-विधियाँ में हालाँकि वह विनिर्दिष्ट रहेगा कि बोर्ड कि बैठक तीन माह में कम-से-कम एक बार एवं सामान्य निकाय कि सभा एक वर्ष  में कम-से-कम एक बार अवश्य होगी।

सहकारी समिति के सदस्यों के कम-से-कम दसवें भाग द्वारा हस्ताक्षरित अध्यपेक्षा अध्यपेक्षा कि प्राप्ति के तीस दिनों के भीतर बोर्ड किसी आमसभा का भी आयोजन करेगा तथा ऐसी किसी अध्यपेक्षा में प्रस्तावित कार्यसूची और किन कारणों से सभा आवश्यक समझी गई, अंतवृस्ति होंगे।

जहाँ बोर्ड समुचित समय के भीतर वार्षिक या अध्यपेक्षित करने में असफल हो वहाँ निबंधक यथास्थि अध्यपेक्षित या वार्षिक आमसभा बुलाने हेतु सक्ष्म होगा।

प्रत्येक सहकारी समिति प्रत्येक आम सभा एवं प्रत्येक बोर्ड बैठक की कार्यवाही, कार्यवाही-पुस्तिका में अभिलिखित करेगी।  ऐसी कार्यवाही बैठक/सभा के लिए आमंत्रित सभी व्यक्तियों को बैठक, सभा की समाप्ति के तीस दिनों के अन्दर भेजी जायेगी। ऐसी अभिलिखित कार्यवाही बैठक/सभा की अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित की जायेगी।

कर्मचारीवृन्द:

सभी स्टाफ सहकारी समिति के कर्मचारी होंगे और सहकारी समिति के प्रति पूर्ण जिम्मेवार होंगे तथा ऐसी कार्मिक नीतियों एवं सेवा-शर्तों के अनुसार नियुक्त होंगे, हटाये जायेंगे एवं कार्य करेंगे जो बोर्ड द्वारा विरचित किये जाएँ।

परन्तु यह कि कोई सहकारी समिति प्रतिनियुक्ति पर अन्य अभिकरणों से ऐसे निर्बन्धन के आधार पर कार्मिक ले सकेगी जैसा दोनों में परस्पर करार हुआ हो ।  सरकार का कोई पदाधिकारी या तो अपनी सरकारी सेवा के दौरान या उसके बाद तीन वर्षों कि अवधि तक, किसी सहकारी समिति में, किसी भी हैसियत से सेवा नहीं करेगा।

खण्ड-७ सूचना

लेखाओं तथा अभिलेखों का संघारण

प्रत्येक सहकारी समिति अपने निबंधित कार्यालय में निम्नलिखित लेखाओं और अभिलेखों को रखेगी :-

(क)     समय-समय पर किए गए संशोधन सहित इस अध्यादेश कि एक प्रति।

(ख)    कार्यवृत्त पुस्तक।

(ग)     निबंधन प्रमाण-पत्र तथा निबंधित उप-विधियाँ कि एक प्रति और संशोधन की तारीख सहित समय-समय पर निबंधित संशोधन की एक-एक प्रति।

(घ)     ऐसे संघ/परिसंघ जिसका यह सदस्य हो कि तथा अपने सदस्य सहकारी समिति कि अधिप्रमाणित उप-विधियाँ कि एक-एक प्रति।

(ङ)      सहकारी समिति द्वारा प्राप्त तथा खर्च की गई सभी धनराशि, उनके प्रयोजनों सहित का लेखा।

(च)     सहकारी समिति के सम्पत्ति द्वारा सामानों की सभी खरीद-बिक्री का लेखा।

(छ)    सहकारी समिति के सम्पत्तियों तथा दायित्वों का लेखा।

(ज)    कुछ सदस्यता तथा विभिन्न सेवाओं का सद्स्यावर उपयोग प्रदर्शित करनेवाली पूँजी।

(झ)    वित्तीय वर्ष की समाप्ति के तीस दिनों के भीतर अद्धतन की गई चालू वर्ष के लिए मताधिकार प्राप्त सदस्यों की सूचि।

(ञ)     बोर्ड नीतियों की प्रतियाँ।

(ट)      वार्षिक रिपोर्ट, लेखा-परीक्षा रिपोर्ट, जाँच रिपोर्ट और उनका अनुपालन।

(ठ)      अन्य विधियों तथा विनियमों की प्रतियाँ, जिनके अध्यधीन सहकारी समिति हो।

(ड)      ऐसे अन्य दस्तावेज, जो सहकारी समिति के कृत्यों से सुसंगत हो परन्तु यह कि जहाँ सहकारी समिति के शाखा-कार्यालय हैं वहाँ शाखा-कार्यालयों संबंधी लेखा एवं अभिलेख, वित्तीय वर्ष कि समाप्ति के पचीस दिनों के अन्दर किसी अवधि के लिए निबंधित कार्यालय में उपलब्ध रहेगा।

लेखा- परीक्षा

सहकारी समिति अपने लेखाओं कि लेखा-परीक्षा परिसंघ द्वारा तैयार कि गई नामावली से चयनित लेखा-परीक्षक द्वारा कराएगी।  ऐसा लेखा-परीक्षक चार्टर्ड एकाउंटेंट अधिनियम, १९४९ के यथान्तगर्त या तो चार्टर्ड अकाउनटेंट होगा या निबंधक के कार्यालय का होगा।  नामावली निबंधक कार्यालय द्वारा भी रखी जायेगी।  जहाँ ऐसा संघ/परिसंघ नहो, वहाँ ऐसे लेखा – परीक्षक का चयन निबंधक द्वारा रखी गई नामावली से किया जायेगा।

लेखा-परीक्षक कि रिपोर्ट में सहकारी समिति कि रिपोर्ट के अतिरिक्त बैठकों में निदेशकों कि उपस्थिति, निदेशकों द्वारा सहकारी समिति को मंजूर किए गए ऋण एवं अग्रिम या सहकारी समिति के साथ किए गए कारबार, बोर्ड कि बैठकों पर हुए व्यय, निदेशकों को भुगतान किए गए पारिश्रमिक, निदेशकों को प्रतिपूर्ति, किए गए व्यय, सदस्यों, स्टाफ, निदेशकों तथा अन्य कि शिक्षा और पारिश्रमिक पर हुए व्यय से संबद्ध रिपोर्ट भी अन्तविर्ष्ट अन्तविर्ष्ट होगी।

यह सुनिश्चित करना बोर्ड का कर्तव्य होगा कि वित्तीय वर्ष कि समाप्ति के पैंतालीस दिनों के भीतर वार्षिक वित्तीय विवरणों को तैयार करके लेखा-परीक्षक हेतु प्रस्तुत कर दिया जाय।

लेखा-परीक्षक के पारिश्रमिक का निर्धारण बोर्ड द्वारा कुय जायगा तथा सामान्य निकाय को अगली सभा में इसे सूचनार्थ रखा जा सकेगा।

सामान्य निकाय विशेष आम सभा में उपस्थित सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प के द्वारा किशी लेखा-परीक्षक को अपने पद से हटा सकेगा।

लेखा-परीक्षक को प्रत्येक आम सभा कि नोटिस दी जायेगी तथा वह सभा में भाग लेने का हकदार होगा।

किशी सहकारी समिति के लेखा-परीक्षक कि मांग पर, सहकारी समिति कि वर्तमान या पूर्व पदधारी, बोर्ड के सदस्य, सदस्य या कर्मचारी –

(क)    ऐसी सूचना और ऐसा स्पष्टीकरण स्पष्टीकरण देंगें, जैसा कि आवश्यक समझा जाय, तथा

(ख)     सहकारी समिति के प्रत्येक ऐसे अभिलेखों, दस्तावेजों, बहियों, लेखाओं और भौउचरों को देखने देंगे, जो लेखा-परीक्षा कि राय में जाँच करने और रिपोर्ट तैयार करने में उसे समर्थ होने के लिए आवश्यक हो।

जहाँ कोई सहकारी समिति समय पर अपने वाषिक लेखाओं कि लेखा-परीक्षा कराने में में असफल हो, वहाँ लेखा-परीक्षा के लिए नियत तारीख से नब्बे दिनों के भीतर सहकारी समिति के लेखाओं कि लेखा-परीक्षा कराना सहकारी संघ/परिसंघ के उत्तरदायित्व होगा।

ऐसी लेखा-परीक्षा कराने का खर्च सहकारी समिति कि लेखा-परीक्षा करा पाने में असमर्थ हो, तो निबंधक सहकारी समिति के लेखाओं कि लेखा-परीक्षा  कराएगा।

विशेष लेखा-परीक्षा:-

सहकारी या अन्य बाह्य व्यक्ति या संस्थाओं से निधियों का संव्यवहार करने वाली किसी सहकारी समिति कि विशेष लेखा-परीक्षा ऐसे लेनदार के अनुरोध पर निबंधक द्वारा, ऐसा विनिदिष्ट निदेश निर्बन्ध जैसा कि निबंधक द्वारा करार पाया गया हो, के अध्यधीन शुरू की जा सकेगी।

उप-धारा (१) के अधीन विशेष लेखा-परीक्षा का खर्च लेनदार द्वारा वहन किया जाएगा:- परन्तु यह कि जहाँ विशेष लेखा-परीक्षा से सहकारी समिति में गम्भीर कुप्रबंध का पता चले, वहाँ ऐसा खर्च सहकारी समिति से या कुप्रबंध के लिए उत्तरदायी व्यक्तियों से वसूल किया जा सकेगा।

प्रत्येक विशेष लेखा-परीक्षा आरम्भ होने कि तारीख से एक सौ बीस दिनों के भीतर पूरी करके रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी जाएगी।

विशेष लेखा-परीक्षा रिपोर्ट में :-

(क)    प्रत्येक भुगतान का विवरण जो लेखा-परीक्षक को विधि के प्रतिकूल प्रतीत हो।

(ख)    रकम कि कमी, बर्बादी व् हानि का विवरण, जो किसी व्यक्ति द्वारा अपने कर्तव्यों के अनुपालन में बरती गई घोर उपेक्षा या किए गये कदाचार के कारण हुई प्रतीत हो।

(ग)     प्राप्त किसी धन राशि का विवरण, जिसका लेखा-जोखा दिया जाना चाहिए था, किन्तु किसी व्यक्ति द्वारा ऐसा नहीं किया गया हो, तथा

(घ)     कोई तात्विक अनौचित्य या अनियमितता, जिसका उसे देय धन के व्यय या वसूली में पता चले अन्तविर्ष्ट रहेगा।  विशेष लेखा-परीक्षा रिपोर्ट की प्राप्ति की तारीख से तीस दिनों के भीतर निबंधक इसकी प्रतियाँ :-

(क)    आवेदक लेनदार,

(ख)    संबंधित सहकारी समिति, और

(ग)     जहाँ आवश्यक हो, वहाँ सहकारी अधिकरण को संप्रेषित करेगा।

विवरणियां दाखिल करना :-

वर्ष की समाप्ति के पांच माह के भीतर, प्रत्येक सहकारी समिति निबंधक के समक्ष निम्नलिखित सूचना दाखिल करेगी:-

(क)    कार्यकलाप की वार्षिक रिपोर्ट,

(ख)    लेखाओं का लेखा-परीक्षित विवरण,

(ग)     सामान्य निकाय द्वारा यथानुमोदित अधिशेष निपटारा हेतु योजना,

(घ)     निदेशक के नामों की सूचि तथा उनकी कार्यविधि,

(ङ)      सहकारी समिति की उपविधियाँ में किए गए संशोधन की सूचि,

(च)     सामान्य निकाय की सभा के आयोजन की तारीख तथा जहाँ निर्वाचन होना बाकी है, वहाँ उसके संचालन से संबंध घोषणा,

(छ)    लेखा-परीक्षा/विशेष लेखा-जाँच से संबंध अनुपालन रिपोर्ट।

जाँच:-

प्रत्येक सहकारी समिति निबंधक द्वारा अपेक्षा की जाने पर उसे कोई सुसंगत सूचना देगी, जिससे वह अपना यह समाधान कर सके कि सहकारी समिति ने कार्यकलाप का संचालन सहकारिता-सिद्धान्त तथा इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार किया है।

निबंधक स्वप्रेरणा से तथा संघ/परिशंघ के जिससे सहकारी समिति सम्बद्ध हो, या लेनदार सहकारी समिति ऋणी हो, या कम-से-कम एक तिहाई निदेशकों, या कम-से-कम दस प्रतिशत सदस्यों  के आवेदन पद सहकारी समिति द्वारा इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी उपबंध के घोर उल्लंघन से सम्बन्ध विनिर्दिष्ट मामले कि जाँच कर सकेगा या करवा सकेगा।

निबंधक आवेदक या आवेदकों से ऐसी फ़ीस कि प्राप्ति के पश्चात ही जाँच का आदेश देगा, जो की जानेवाली जाँच का खर्च पूरा करने के लिए प्रयाप्त समझी जाए।

जाँच-आदेश की तारीख से चार माह के भीतर जाँच पूरी कर ली जायेगी।

जाँच पूरी होने की तारीख से एल ,औ ले भीतर, निबंधक, जाँच रिपोर्ट निम्नंकित को सम्प्रेषित करेगा:-

(क)    संबंधित सहकारी समिति को,

(ख)    आवेदकों तथा ऐसी रिपोर्ट प्राप्त करने के लिए आवेदकों द्वारा अभिहित व्यक्ति को,

(ग)     निब्संधन द्वारा विनिर्दिष्ट फ़ीस अदा करने पर सहकारी समिति के किसी सदस्य को, ऐसे किसी परिसंघ को जिसका सहकारी समिति सदस्य हो, किसी लेनदार को, और

(घ)     सहकारी अधिकरण को।

सम्मान करने तथा व्यक्तियों और दस्तावेजों की जाँच करने की शक्ति :-

धारा ३४ के अधीन विशेष लेखा-परीक्षा या धारा ३६ के अधीन जाँच करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति संबंधित सहकारी समिति को विशेष लेखा-परीक्षा या जाँच आरम्भ करने की अपनी प्रस्तावित तारीख से कम-से-कम पन्द्रह दिनों की लिखित नोटिस देगा: परन्तु यह कि लिखित रूप से अभिलिखित किये जानेवाले विशेष कारणों से वह पन्द्रह दिनों से कम कि नोटिस के बिना विशेष लेक-परीक्षा शुरू कर सकेगा।

इस अधिनियम के अधीन किसी विशेष लेखा-परीक्षा या जाँच के प्रयोजनार्थ ऐसी लेखा-परीक्षा या जाँच करनेवाला व्यक्ति:-

(क)    अध्यक्ष या अन्य संबंध प्राधिकारी से सहकारी समिति के प्रधान कार्यालय में ऐसी रसीदें, वाउचर, विवरण, विवरणी, पत्र, नोटिस या किन्हीं अन्य दस्तावेजों को प्रस्तुत करनी कि लिखित मांग कर सकेगा जिन्हें वह विशेष लेखा-परीक्षा या जाँच के लिये आवश्यक समझे।

(ख)    लिखित रूप में :-

ऐसी रसीदें, वाउचर, विवरण, विवरणी, पत्र या अन्य दस्तावेज के लिए जवाबदेह या उन्हें अभिरक्षा में रखनेवाले या उन पर नियंत्रण रखनेवाले सहकारी समिति के किसी कर्मचारी या अन्य प्राधिकारी के स्वयं उपस्थित होने के लिए अपेक्षा कर सकेगा,या

सहकारी समिति के साथ किसी संविदा में प्रत्यक्ष रूप में कोई शेयर या हित रखनेवाले किसी व्यक्ति से उसे स्वयं या प्राधिकृत अभिकर्ता के माध्यम से सहकारी समिति के प्रधान कार्यलय में उसके समक्ष उपस्थित होकर किसी प्रश्न का उत्तर देने या उससे संबंधित घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर करने कि अपेक्षा कर सकेगा।

(ग)      अध्यक्ष या किसी अन्य संबंधित प्राधिकारी से स्पष्टीकरण कि अपेक्षा कि जाने कि दशा में, लिखित रूप में उन बिन्दुओं का विनिदेशन करते हुए जिन पर उसका स्पष्टीकरण अपेक्षित है, उसे सहकारी समिति के प्रधान कार्यलय में उससे मिलने के लिए बुला सकेगा।

(घ)     ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा, जो इस धारा के प्रयोजनार्थ युक्तियुक्त रूप अवधि नियक कर सकेगा और ऐसा अनुपालन उप-धता (२) के अधीन सूचना देने के लिए अपेक्षित व्यक्ति पर आज्ञापक होगा।

विशेष लेखा-परीक्षा या जाँच रिपोर्ट पर करवाई:-

धारा ३४ के अधीन विशेष लेख-परीक्षा रिपोर्ट या धारा ३६ के अधीन जाँच रिपोर्ट संबंधित व्यक्तियों को संसूचित करने के बाद निबंधक, जहाँ विशेष लेखा-परीक्षा या जाँच रिपोर्ट से किसी या सभी पदधारी या निदेशक द्वारा किये गये कुप्रबन्ध का पता चले, किसी सिविल या अपराधिक कार्यवाही, जिसके वे भागी हो, पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना :-

(क)    बोर्ड को सामान्य निकाय की सभा ऐसा युक्तियुक्त समय के भीतर जो वह विनिर्दिष्ट करे, आयोजित करने का निदेश दे सकेगा ताकि वह आवश्यक कार्यवाही के लिए विशेष लेखा-परीक्षा या जाँच रिपोर्ट के निष्कर्ष को या तो प्रत्यक्षत: या अपने नाम-निर्देशिती के माध्यम से सामान्य निकाय के ध्यान में ला सके, या

(ख)    आवश्यक कार्यवाही के लिए सहकारी अधिकरण से प्रार्थना कर सकेगा।

खण्ड -८ विवादों से निपटारा

सहकारी अधिकरणों का गठन :- विहित नियमों के अध्यधीन,राज्य सरकार, राजकीय गजट में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा, अधिसूचना में विनिर्दिष्ट क्षेत्र या क्षेत्रों के लिए एक या अधिक सदस्यों के साथ, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त अथवा ऐसे अधिकरणों पर तत्समय लागू किसी अन्य विधि के अधीन प्रदत्त सभी शक्तियों का प्रयोग तथा सभी कार्यों को करने के लिए, उतने सहकारी अधिकरणों का गठन कर सकेगी, जितने आवश्यक हों।

विवादों का निपटारा:- किसी सहकारी समिति के गठन, प्रबंध या कारबार और उससे संबंधित या उसके अनुषंगिक मामलों के संबंध में, यदि कोई विवाद –

(क)    सदस्यों, पूर्व सदस्यों और मृत सदस्यों के जरिए दावा करने वाले व्यक्तियों के बीच, अथवा

(ख)    किसी सदस्य, पूर्व सदस्य या मृत सदस्य के जरिए दवा करने वाले किसी व्यक्ति तथा सहकारी समिति, इसके वर्तमान या पूर्व बोर्ड, निदेशक, पदधारी या परिसमापक के बीच, अथवा

(ग)     सहकारी समिति या इसके बोर्ड और किसी पूर्व बोर्ड, निदेशक, पदधारी या सहकारी समिति के किसी मृत निदेशक, मृत पदधारी के नाम-निर्देशिती, वारिस या विधिक प्रतिनिधि के बीच, अथवा

(घ)     सहकारी समिति और किसी अन्य सहकारी के बीच, अथवा

(ङ)      किसी सहकारी समिति के प्रवर्त्तकों और निबंधक या किसी सहकारी समिति और निवंध्क के बीच, अथवा

(च)     किसी सहकारी समिति और सहकारी समिति के परिसमापक के बीच या दो या अधिक सहकारी समितियों के परिसमाकों के बीच उत्पन्न हो तो ऐसे विवादों को वेनिश्चयार्थ सहकारी अधिकरण के पास भेजा जा सकेगा: परन्तु यह कि जबतक विवाद के पक्षधर विवादों के निपटारा हेतु उप-विधियों में उपलब्ध सभी उपचारों को नि:शेष नहीं कर लें, तबतक इस धारा के अधीन कोई विवाद सहकारी अधिकरण को प्रस्तुत नहीं किया जायेगा। किसी सहकारी समिति में हुए निर्वाचनों से संबंधित कोई विवाद विनिश्चय हेतु सहकारी अधिकरण को भेजा जा सकेगा।

अधिकरण के किसी विनिश्चय के विरुद्ध विरुद्ध कोई अपील आदेश कि तारीख से साठ दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में कि जायेगी।

अधिकरण कि, वसूली आदेश देने कि, शक्ति :-

सहकारी समिति का कोई सदस्य, निदेशक या अध्यक्ष तथा निबंधक जिस व्यक्ति के आचरण के कारण सरकारी समिति को हानि हुए हैं उसके विरुद्ध आवश्यक कार्यवाही करने के लिए एक आवेदन, लेखा-परीक्षक और विशेष लेखा-परीक्षक या जाँच पदाधिकारी को रिपोर्ट की एक प्रति के साथ, अधिकरण को प्रस्तुत कर सकेगा।  अधिकरण ऐसी रिपोर्ट के आधार पर विधि-विरुद्ध उपगत व्यय की प्रत्येक मद को नामंजूर कर सकेगा और जिसकी उपेक्षा या अवचार के चलते कोई कमी, हानि या अलाभप्रद परिव्यय हुआ हो उसके लिए रिपोर्ट में जिम्मेदार ठहराए गए व्यक्ति से उसे वसूल करने के आदेश दे सकेगा अथवा ऐसी कोई रकम जिसका लेखा-जोखा रखा जाना चाहिए था किन्तु उस व्यक्ति द्वारा ऐसा लेखा नहीं रखा गया हो, तो ऐसे प्रत्येक मामले में, सहकारी समिति को ऐसे व्यक्ति द्वारा अदा की जाने वाली दाई रकम का विनिर्देश कर सकेगा।

स्पष्टीकरण – ऐसा कोई व्यक्ति, जिसकी उपेक्षा या अवचार के चलते या योगदायी उपेक्षा से कोई ऐसी कमी या हानि हुई होती यदि कुछ अन्य व्यक्तियों द्वारा अपेक्षा या अवचार नहीं होता।

अधिकरण प्रत्येक नामंजूरी, अधिभार के संबंध में अपने विनिश्चय को सकारणलिखित रूप में उल्लेख क्रेग, ऐसे विनिश्चय की एक प्रात्ति उस व्यक्ति को जिसके विरुद्ध यह किया गया है, सिविल प्रक्रिया संहिता,१९०८ में सम्मान तामील करने की विहित रीति से तामील कराई जाएगी।

परन्तु यह कि अधिकरण इस धारा के अधीन वसूली का कोई आदेश तबतक नहीं देगा जबतक कि उस व्यक्ति को, जिसके विरुद्ध ऐसा कोई आदेश देय गया हो, स्वयं या वकील द्वारा अभ्यावेदन करने का अवसर ने दिया गया हो।

इस आदेश के अधीन पारित किसी आदेश से व्यथित, कोई व्यक्ति, अधिकरण द्वारा उस पर आदेश तामील करने कि तारिक के पश्चात साठ दिनों के भीतर, उच्च न्यायालय में ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील दायर कर सकेगा।

अधिकरण अथवा उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश का निष्पादन उसी रीति से किया जाएगा जैसा किसी सिविल प्रक्रिया संहिता, १९०८ के अधीन किसी सिविल यायालय कि किसी डिग्री का किया जाता है।

खण्ड – ९ अपराध और शास्ति

अपराध और शास्ति :-

इस अधिनियिम के अधीन यह अपराध होगा, यदि कोई सहकारी समिति –

(क)    कोई नोटिस देने, कोई विवरणी या दस्तावेज भेजने में असफल हो अथवा कोई कार्य करने या करने देने में असफल हो जो इस अधिनियम द्वारा या उसकी उपविधियाँ के अधीन किसी सहकारी समिति को देना, भेजना, करना या करने देना अपेक्षित हो।

(ख)    इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ अपेक्षित किसी कार्य को करने में अथवा सूचने देने में नाज-बूझकर उपेक्षा करें या वैसा करने से इनकार करें अथवा अधिनियम या उसकी उपविधियाँ द्वारा निषिद्ध कोई कार्य करें।

(ग)     किसी दृष्टि से जन-बूझकर मिथ्या या अपर्याप्त विवरणी बनाता हो या सूचना देता हो।

(घ)     सहकारी समिति के गठन, प्रबन्ध और कारबार के संबंध के कपटपूर्ण कार्यकलाप में लिप्त हो।

(ङ)      सहकारी समिति के गठन, प्रबन्ध और संबंध में कपटपूर्ण कार्यकलाप में लिप्त हो।

(च)     प्रबंध समिति का निर्वाचन कराने में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, १९५१ कि धारा १२३ के अधीन यथापरिभाषित “भ्रष्ट आचरणों” में लिप्त हो।

इस अधिनियम के अधीन यह एक अपराध होगा, यदि कोई व्यक्ति या सहकारी समिति इस अधिनियम अथवा सहकारी समिति कि उपविधियाँ के उपबंधों का उल्लंघन करें।

किसी सहकारी समिति द्वारा किया गया अपराध सहकारी समिति के प्रत्येक पदधारी, जो उसकी उपविधियाँ, जिसका उल्लंघन अपराध है, के अधीन कर्तव्यों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है, द्वारा भी किया गया अपराध समझा जाएगा, अथवा यदि ऐसा कोई पदधारी न हो तो प्रत्येक निदेशक द्वारा भी किया गया अपराध समझा जाएगा, जब तक कि यथास्थिति पदधारी या निदेशक यह सिद्ध नहीं कर दे कि उसने अपराध किए जाने को रोकने का प्रयत्न किया है।

इस धारा के अधीन किया गया कोई अपराध एक वर्ष तक कि अवधि के कारावास से या २,०००/- रु. (दो हजार रुपये) तक के जुर्मे से, या दोनों से दण्डनीय होगा।

परन्तु यह कि जहाँ कोई व्यक्ति दुर्विनियोग, कपट, न्यास-भंग, छल या ऐसे अन्य किसी कार्य जिसमे नैतिक अक्षमता अन्तग्रस्त हो, का दोषी हो, जिसके परिणामस्वरूप सहकारी समितिको हानि हुई हो, तो वी भारतीय दण्ड संहिता, १८६० के सुसंगत उपबंधों के अधीन भी दण्डनीय होगा।

खण्ड – १० विघटन

सदस्यों द्वारा विघटन:-

कोई सहकारी समिति, एक वैशिष संकल्प द्वारा अपने विघटन को, अधिकृत कर सकेगी:

परन्तु यह कि आम सभा के लिए ऐसी कोई नोटिस, सभा में भाग लेने के आमंत्रण के साथ, निबंधक को, आवेदन कर सकेगा, यदि उसे यह विश्वास करने का युक्तियुक्त कारण हो कि सहकारी समिति को सहकारी समिति के रूप में मान्यता प्राप्त होने या बने रहने का अधिकार नहीं है, क्योंकि वह –

(क)    अपना निबंधन छल या गलती से कराया है।

(ख)    गलत उद्धेश्यों से सेवारत है।

(ग)     निबंधक को नोटिस के बाद, इस अधिनियम या अपनी उपविधियाँ के उपबन्धों का जन-बूझकर अतिक्रमण किया है।

(घ)     सहकारिता-सिद्धान्तों तथा इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार अब संचालित नहीं हो रही है।

(ङ)      निबंधन कि तारीख के दो वर्षों के भीतर प्रारंभ नहीं किया हा; या

(च)     लगातार दो वर्षों से कारबार नहीं किया है।

जहाँ इस धारा के अनुसरण में अधिकरण में अधिकरण को कोई आवेदन प्राप्त होता है, वहाँ सहकारी समिति को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का एक युक्तियुक्त अवसर देने के बाद, सहकारी समिति को विघटित करने या निबंधक के पर्यवेक्षण में परिसमापित एवं विघटित करने का आदेश दे सकेगा।

जहाँ निबंधक उप-धारा (३) के अनुसरण में आदेश प्रपद करता है, तो वह:-

(क)    जहाँ आदेश सहकारी समिति को विघटित करने का है वहाँ विघटन प्रमाण-पत्र निर्गत करने, अथवा

(ख)    जहाँ आदेश सहकारी समिति को निबंधक के प्रयवेक्षण में परिसमापित तथा विघटित करने का है वहाँ एक नोटिस किसी समाचार पत्र, जो उस जिला में प्रकाशित या वितरित होता हो जिसमें सहकारी समिति का निबंधित कार्यालय अवस्थित है, में प्रकाशित करेगा।

परिसमापक कि नियुक्ति : जहाँ सहकारी समिति को परिसमापित और विघटित करना हो और सामान्य निकाय या अधिकरण द्वार कोई परिसमापक नियुक्त नहीं किया गया हो तो निबंधक :-

(क) सहकारी समिति के कार्यकलापों के परिसमापन के लिए किसी व्यक्ति को परिसमापक के रूप में नियुक्त कर सकेगा; अथवा

(ख) जहाँ उसका समाधान हो जाए कि सहकारी समिति को सम्पत्तियां या दायित्व नहीं है वहाँ एक विघटन प्रमाण-पत्र निर्गत कर सकेगा।

परिसमापक के कर्तव्य :- नियुक्त किए जाने पर परिसमापक :

(क)    अपनी नियुक्ति कि सूचना निम्नलिखित को तुरंत देगा:- यदि परिसमापक कि नियुक्ति निबंधक द्वारा नहीं कि गई हो तो निबंधक को, और ऐसे हरेक दावेदार और लेनदार को जिसकी जानकारी परिसमापक को हो;

(ख)    अपनी नियुक्ति कि नोटिस लगातार दो सप्ताहों तक हरेक सप्ताह में एकबार वैसे किसी समाचार पत्र में तुरन्त प्रकाशित करवाएगा जो उस स्थान में प्रकाशित या वितरित होता हो जहाँ सहकारी समिति का निवंधित कार्यालय हो और वैसी प्रत्येक अधिकारिता में जहाँ सहकारी समिति अपना कारबार करती हो, परिसमापन कि नोटिस देने के लिए युक्तियुक्त कदम उठाएगा;

(ग)     खण्ड (क), (ख) में उल्लिखित नोटिस में ऐसा उपबंध रखेगा जिसमें किसी व्यक्ति, जो :-

सहकारी समिति का ऋणी हो, से यह अपेक्षा कि जाएगी कि वह लेखा-जोखा दे और देय कोई रकम परिसमापक को विनिर्दिष्ट समय और स्थान पर भुगतान करे, सहकारी समिति कि सम्पत्ति अपने जिम्मे रखे हो, से यह परिसमापक को सौंप दे, तथा सहकारी समिति के विरुद्ध कोई निर्धारित या अपरिनिर्धरित, भावी या समाश्रित दवा करता हो तो, नोटिस के प्रथम प्रकाशन से दो माह के भीतर दावों कि विशिष्टियाँ लिखित रूप में परिसमापक के पास प्रस्तुत करें;

(घ)     सहकारी समिति कि सम्पत्ति को अपनी अभिरक्षा और नियंत्रण में लेगा;

(ङ)      सहकारी समिति के धन के लिए न्यास लेखा खोलेगा और उसका संचालन करेगा;

(च)     सहकारी समिति से संबंधित उसे प्राप्त धन और उसके द्वारा भुगतान का का लेखा रखेगा;

(छ)    सदस्यों, लेनदारों और सहकारी समिति के विरुद्ध दावा करने वाले व्यक्तियों कि अलग-अलग सूचि संघरित करेगा;

(ज)    जहाँ किसी समय वह ये अवधारित करे कि सहकारी समिति भुगतान करने में या अपनी बाध्यताओं को उन्मोचित करने के लिए यथेष्ट प्रबंध करने में असमर्थ है तो निर्देश के लिए निबंधक के पास आवेदन करेगा; और

(झ)    निबंधन द्वारा या उस फार्म में या निबंच्क द्वारा यथापेक्षित फार्म में या निबंधक को धकारी समिति से संबंधित वित्तीय विवरण देगा।

परिसमापक कि शक्तियाँ:-

परिसमापक:-

(क)    वकीलों, लेखाकरों, अभियंताओं, मूल्य-निरुपकों और अन्य वित्तीय सलाहकारों को रख सकेगा;

(ख)    सहकारी समिति के नाम से या उसकी ओर से कोई सिविल, अपराधिक या प्रशासनिक कार्यवाही या कार्यवाही चला सकेगा, उनका प्रतिवाद कर सकेगा या उसमें भाग ले सकेगा;

(ग)     सहकारी समिति का ऐसा कारबार कर सकेगा, उनका प्रतिवाद कर सकेगा या उसमे भाग ले सकेगा;

(घ)     सहकारी समिति की किसी सम्पत्ति को लोक नीलम द्वार विक्रस कर सकेगा;

(ङ)      सहकारी समिति के नाम से या उसकी ओर से सभी कार्य कर सकेगा और किन्हीं दस्तावेजों का निष्पादन कर सकेगा;

(च)     सहकारी समिति की सम्पत्ति की प्रतिभूति पर धन उधर ले सकेगा;

(छ)    सहकारी समिति के द्वारा या उसके विरुद्ध किए गए किशी दावे का निपटारा के सकेगा या उसे निष्पादन कर सकेगा;

(ज)    सहकारी समिति के परिसमापन और इसकी सम्पत्ति एवं निधियों के वितरण के लिए अन्य सभी कार्य कर सकेगा, जो वह आवश्यक समझे।

जहाँ परिसमापक को यह विश्वास करने का कारण हो कि किसी व्यक्ति के कब्जे में या नियंत्रण में सहकारी समिति कि कोई सम्पत्ति है अथवा उसने सहकारी समिति कि किसी सम्पत्ति को छिपाकर या रोककर रखा है या उसका दुर्विनियोग किया है, तो वह न्यायालय में मामले के संबंध में विधि के अनुसार कार्यवाही के लिए आवेदन कर सकेगा।

जहाँ उप-धारा (२) के अधीन कार्यवाही से यह पता चले कि किसी व्यक्ति ने सहकारी समिति कि सम्पत्ति को छिपाकर या रोक कर रखा है या उसका दुर्विनियोग किया है, तो न्यायालय उस व्यक्ति को सहकारी समिति कि ओर से परिसमापक को वैसी सम्पत्ति प्रत्यावर्तित करने या उसके प्रतिकार का भुगतान करने का आदेश दे सकेगा।

कोई परिसमापक या उसका सम्बन्धी सहकारी समिति के व्यापार-स्टाक,ऋण या सम्पत्तियाँ के किसी अंश का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से क्रय नहीं करेगा।

अंतिम लेख :-

परिसमापक परिसमापन के खर्च का भुगतान सहकारी समिति कि सम्पत्ति से करेगा और सहकारी समिति के विरुद्ध सभी दावे का भूतन करेगा अथवा उसके लिए पर्याप्त उपबंध करेगा।

सहकारी समिति के विरुद्ध सभी दावे का भुगतान करने तथा उसके लिए प्रय्प्त उपबंध करने के पश्चात परिसमापक अपने अंतिम लेखा के अनुमोदनार्थ सहकारी समिति कि शेष सम्पत्ति का उपविधियाँ के अनुसार धन या वस्तु रूप में वितरण करने हेतु अनुमति प्राप्त करने लिए प्रबंधक के पास आवेदन करेगा।

जहाँ निबंधक परिसमापक द्वारा उपधारा (२) के अनुसरण में दिए गये अंतिम लेख को अनुमोदित कर दे, वहाँ वह :-

(क)    सहकारी समिति के दस्तावेजों और अभिलेखों कि अभिरक्षा या निपटान के संबंध में निर्देश निर्गत करेगा; और

(ख)    परिसमापक को सेवोंमुक्त करेगा।

जहाँ निबंधक उप-धारा (३) के अनुसरण में परिसमापक को सेवान्युमुक्त कर दे, तो वह एक विघटन-प्रमाण-पत्र निर्गत करेगा।

सहकारी समिति विघटन-प्रमाण-पत्र में दर्शायी गई तारीख को अस्तित्वहीन हो जायेगी जो परिसमापक कि नियुक्ति कि तारीख से चौबीस माह के बाद कि नहीं होगी।

खण्ड – ११ प्रकीर्ण

सेवा के लिए फ़ीस :- निवंधक इस अधिनिय के उपबंधों के अधीन स्वयं या उसके द्वारा प्राधिकृत किसी पदाधिकारी द्वारा प्रदान कि गई सेवा के लिए युक्तियुक्त फ़ीस प्रभारित कर सकेगा।

न्यायालय कि अधिकारिता का वर्जन :-

इस अधिनियम में अधिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय, किसी सिविल या राजस्व न्यायालय कि धारा-४० द्वार अपेक्षित सहकारिता अधिकरण को निर्देशित किए जानी वाले किसी विवाद या धारा-४१ के अधीन वसूली की कार्यवाही या धाराएँ ४३ एवं ४४ के अचिन विघटन किए जाने के संबंध में कोई अधिकारिता नहीं होगी।

जब कोई सहकारी समिति धारा-४५ के अधीन परिसमापनाधीन हो तब परिसमापक के विरुद्ध या सहकारी समिति के विरुद्ध या उसके किसी सदस्य के विरुद्ध सिवाय निबंधक की इजाजत के और उसके द्वार अधिरोपित निबंधनों के अध्यधीन, समिति के कार्यकलापों से संबंधित कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही न तो चलाई जाएगी और न दायर की जाएगी।

नियमावली :-

राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के सभी या किन्हीं उपबंधों को पूरा करने के लिए नियम बना सकेगी।

इस धारा के अधीन प्रदत्त की गई नियम बनाने की शक्ति पूर्व प्रकाशन के पश्चात नियम बनाए जाने की शर्त के अध्यधीन होगी।

इस धारा के अधीन बनाए गए सभी नियम राजपत्र में प्रकाशित किए जाएँगे और ऐसा प्रकाशन हो जाने पर उसका वैसा ही पराभव होगा मानों वे इस अधिनियम में अधिनियमित किये गये हों।

कठिनाई दूर करना :-

यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी बनाने में कोई व्यवहारिक कठिनाई उत्पन्न हो, तो राज्य सरकार परिस्थिति के अनुसार, राजपत्र में प्रकाशित अदिसुचना द्वारा, कठिनाई दूर करने क प्रायोजन से ऐसा कुछ भी कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो।

यदि इस अधिनियम के किसी उपबंध की बनावट एवं व्याख्या के संदर्भ में कोई शंका उत्पन्न हो तो उसे निबंधक या राज्य सरकार को निर्णय हेतु निर्देशित किया जा सकेगा।

 

स्रोत: सहकारिता विभाग, झारखंड सरकार, हलचल, ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान



© 2006–2019 C–DAC.All content appearing on the vikaspedia portal is through collaborative effort of vikaspedia and its partners.We encourage you to use and share the content in a respectful and fair manner. Please leave all source links intact and adhere to applicable copyright and intellectual property guidelines and laws.
English to Hindi Transliterate