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पशुपालन और दुधिया ग्राम पंचायत की कहानी

पशुपालन और दुधिया ग्राम पंचायत की कहानी

परिचय

आमतौर पर लोगों को लगता है की पशुधन एक निजी आर्थिक गतिविधि है इसलिए ग्राम पंचायत (ग्राम पंचायत) की इसमें कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं हो सकती | दुधिया ग्राम पंचायत के नव निर्वाचित सदस्यों के सामने यही सवाल था |

जनवरी 2009 में ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों के रूप में निर्वाचित होने के बाद सरपंच और नौ अन्यPic1 वार्ड सदस्य सरकारी पदाधिकारियों के साथ मिलकर ग्राम पंचायत के परिवारों के आर्थिक विकास के लिए योजना बना रहे थे | कृषि और पशुपालन पंचायत में परिवारों के प्राथमिक व्यवसाय हैं लेकिन गंभीर नुकसानों ने इस व्यवसाय को अलाभकारी बना दिया था | परिणामस्वरूप, कई परिवारों ने काम की तलाश में गाँव छोड़ दिया | पिछले वर्ष पंचायत के 20 परिवार काम की तलाश में स्थायी रूप से शहर पलायन कर गए | इस प्रकार पिछले पाँच वर्षो में कुल 143 परिवार गाँव से शहरों को चले गए थे | ऐसी स्थिति में परिवारों पर कर्ज का औसत बोझ बढ़ रहा था, खेत परती छोड़े जा रहे थे और जानवरों को बेचा जा रहा था |

ग्राम पंचायत के सदस्यों ने खुद को एक कठिन परिस्थिति में पाया | उन्होंने ब्लॉक पंचायत से सम्पर्क करने का फैसला किया और उनसे मार्गदर्शन करने का अनुरोध किया | ब्लॉक पंचायत के अध्यक्ष ने समस्या को हल करने के लिए विभिन्न विभागों के अधिकारियों की एक बैठक बुलाई| इस बैठक में यह महसूस किया गया कि दुधिया ग्राम पंचायत को कृषि और पशुपालन दोनों पर काम करने की जरूरत है | ग्रामीणों के आर्थिक विकास के लिए उत्पादक खेतों की और उत्पादक खेतों के लिए पर्याप्त पशुधन की आवश्यकता थी | लेकिन दुधिया ग्राम पंचायत में अक्सर सूखा पड़ता था और हरे चारे की कमी सामान्य वर्षा वाले सालों में भी एक बड़ा मुद्दा था| तो प्रश्न यह था कि पशुपालन को लाभदायक कैसे बनाया जा सकता है और चारा, पशु आहार और पानी की उपलब्धता को किस तरह से सुनिश्चित किया जा सकता है?

इन समस्याओं का समाधान करने के लिए ग्राम पंचायत ने अगले सप्ताह ग्राम सभा की एक बैठक आयोजित की जिसमें एक अस्थायी समिति का गठन किया गया था | समिति में तेरह सदस्य शामिल किये गये | ग्राम पंचायत ने समिति से पशुपालन विभाग के कर्मचारियों की मदद से पंचायत में पशु-पालन व्यवसाय के विभिन्न मुद्दों और इस संबंध में आवश्यक प्रयास का आकलन से पता चला कि पशुपालन जो परिवारों की आय का मुख्य जरिया था, पिछले एक दशक में नष्ट चुका था | पशुओं के दूध का विपणन और पशु स्वास्थ्य देखभाल के लिए आवश्यक समर्थन संरचना धीरे-धीरे अप्रभावी होती जा रही थी | पशु चिकित्सा पर खर्च बढ़ गया था, जिसका पशु स्वास्थ्य देखभाल पर नकारात्मक असर पड़ा था | चारे की अनुपलब्धता के कारण सीमांत परिवार बकरी पालन करने लगे थे | काम की तलाश में लोगों के गाँव से पलायन करने की वजह से गाय और भैंसों की संख्या में भी काफी कमी आई थी |

ग्राम पंचायत की भूमिका

दुधिया गाँव में, इस परिदृश्य और पशुधन की स्थिति को ग्राम सभा के समक्ष प्रस्तुत किया गया|  चर्चा के बाद ग्राम सभा ने निर्णय लिया कि ग्राम पंचायत को निम्नलिखित पहलुओं पर प्राथमिकता पर काम करना चाहिए:

  • चराई की भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराना और उनके कायाकल्प के प्रयास
  • सरकारी योजनाओं में पहुंच और समानता के मुद्दों को संबोधित करना
  • पोषण प्रबंधन (चारा, पूरक आहार, खनिज पदार्थ)
  • पशु स्वास्थ्य देखभाल (टीकाकरण सहित)
  • नस्ल सुधार, प्रजनन और उत्पादकता
  • बीमा और अन्य समर्थन सेवाएँ
  • स्वच्छता, सफाई और मवेशियों का दैनिक रखरखाव
  • पशु पालन समिति का सशक्तिकरण
  • योजना और अभिसरण
  • डेयरी को बढ़ावा देना
  • छोटे पशुओं, मुर्गी और सुअर पालन इत्यादि गतिविधियों को प्रोत्साहित करना

पशुपालन विभाग की ओर से समर्थन की मांग की और ग्राम पंचायत में स्वयं सहायता समूह(एसएचजी) के साथ सहयोग किया तथा पाँच साल में पशुपालन का परिदृश्य बदल दिया | अब 2015 में औसतन 1200 लीटर से अधिक के दैनिक दुग्ध उत्पादन के साथ पशुपालन, परिवारों की औसत वार्षिक आय में लगभग 40 प्रतिशत से अधिक का योगदान दे रहा

प्रत्येक ग्राम पंचायत इस तरह का परिवर्तन ला सकती है | लेकिन इसके लिए पशुपालन के मुख्य मुद्दों और समस्याओं को समझना और इन्हें संबोधित करने के लिए रणनीतियाँ और गतिविधियाँ बनाना आवश्यक हैं |

किस प्रकार एक ग्राम पंचायत द्वारा वैज्ञानिक और आर्थिक रूप से लाभप्रद पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए की जाने वाली रणनीतियों और गतिविधियों के बारे में हम आगे के लेखों में सीखेंगे | हम दुधिया ग्राम पंचायत द्वारा शुरू की गई गतिविधियों में से कुछ को जानेंगे |

स्त्रोत: पंचायती राज मंत्रालय, भारत सरकार



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