অসমীয়া   বাংলা   बोड़ो   डोगरी   ગુજરાતી   ಕನ್ನಡ   كأشُر   कोंकणी   संथाली   মনিপুরি   नेपाली   ଓରିୟା   ਪੰਜਾਬੀ   संस्कृत   தமிழ்  తెలుగు   ردو

खुशहाली की फसल

श्री विधि:खुशहाली की फसल

बदलाव के संकेत

झारखंड के कृषकों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन नये प्रयोग करने वाले किसानों के लिए कृषि अब परेशानी का पर्याय नहीं रही। खेती में आधुनिक तकनीक का प्रयोग करके चपका गांव के किसान अपनी किस्मत संवार रहे हैं। पंचायत की पहल से ऐसा करना और भी आसान हो गया है। खेत-खलिहानी को घाटे का सौदा समझकर इससे दूर होते किसान भी अब अपनी जमीन से जुड़ने लगे हैं। इसके कारण चपका पंचायत में बदलाव की दस्तक के संकेत मिल रहे हैं।

गुमला जिले के घाघरा प्रखंड की इस पंचायत की मुखिया हैं लीलावती देवी। दो साल तक आंगनबाड़ी सेविकाके बतौर काम का अनुभव आज उन्हें ग्रामीण इलाके मेंकाम करने और विकास योजनाओं को समझने में मदद कररहा है। वह खुद को मिले इस अवसर का उपयोग अपनी पंचायत को संवारने के लिए करना चाहती हैं।

एनजीओ के साथ पहल

चपका पंचायत में सात राजस्व गांव हैं। 6500 कीआबादी है। इनमें से अधिकांश किसान परिवार हैं। तकरीबन सभी परिवारों के पास खेती लायक थोड़ी-बहुत जमीन है। किसान परिवार साल भर में धान की एक ही फसल लगाते आए थे। पिछले कुछ सालों में हुई अनियमित बारिश ने खेती से जुड़े परिवारों की हालत खराब कर दी। कुछ परिवारों ने तो खेती से नाता छोड़ मजदूरी से नाता जोड़ लिया। इन सबके बीच जब वह मुखिया बनीं तो किसान परिवारों की बेहतरी के लिए एनजीओ केएमवीएस,घाघरा के साथ मिलकर पहल की।

धान की खेती-श्री विधि तकनीक

इस क्रम में धान की खेती के लिए श्रीविधि तकनीक अपनाने और उससे होने वाले लाभ के बारे में जागरूकता कार्यक्रम शुरू हुआ। कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम सेनिःशुल्क प्रशिक्षण दिलाया गया। वैसे भी चपका पंचायतमें सिंचाई सुविधाएं अपेक्षाकृत कमजोर हैं। ग्राम सभा औरपंचायत की बैठक में कृषि समस्या और उसके निदानपर मंथन किया गया। इस तरह पंचायत और स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं की मेहनत रंग लाई। वर्ष 2011 में चपका केलगभग 70 परिवारों ने धान की खेती में श्रीविधि का प्रयोग किया।

मेहनत कम और फसल ज्यादा

इस पंचायत की 100 हेक्टेयर जमीन पर इस तकनीकके प्रयोग का लक्ष्य रखा गया था। धान की फसल उम्मीदसे तिगुनी तक पैदा हुई। एक एकड़ जमीन के बिचड़े के लिए दो किलो बीज की जरूरत पड़ी। पहले धान के बिचड़े जहां लगभग 25 दिनों में तैयार होते थे, वहीं श्रीविधि के प्रयोग से 14 दिनों में तैयार होने लगे। एक-एक पौधे से 40 से 45 कल्ले तक निकले। पानी की कम खपत से धान की फसलों के बीच होने वाले खर-पतवार की छंटाई के लिए लगने वाले मजदूर की जरूरत खत्म हो गई। खाद-बीज भी कम लगे। मेहनत कम लगी और फसल अधिक हुई। नतीजा यह हुआ कि हरेक किसान को प्रति एकड़ 1800-2000 किलो तक धान के उत्पादन का लाभ मिला। रोग वाले खेतों में भी इस विधि का इस्तेमाल हुआ। रोपाई में बीज की 80 प्रतिशत बचत हुई। किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए कोनोवीडर मशीन 50 प्रतिशत सब्सिडी पर दी गई। मार्केट में इसकी कीमत लगभग 1500 या इससे अधिक है। जबकि मात्र 400 रूपये में यह मशीन किसानों के हाथ में पहुंच गई। फिलहाल कुछ ही किसानों के पास यह मशीन है। ग्रामीण इन मशीनों का सामूहिक रूप से उपयोग कर रहे हैं।

नई तकनीक को सभी ने अपनाया

मुखिया लीलावती देवी कहती हैं कि श्रीविधि की कामयाबी देखकर इस साल चपका के 300 घरों में 100 परिवारों ने इसे अपनाया है। आंशिक रूप से 20-30 डिसमिल जमीन पर भी इसका प्रयोग करने का लाभ मिला है। धान की बंपर खेती हुई है। अभी धनकटनी का समय है। इसके बाद माल बेचने से हुई आय के अनुसार आगे और भी किसान इसका लाभ उठायेंगे। नयी तकनीक के लाभ से उत्साहित चपका के किसानोंने वर्ष 2012 में अपने खेतों में खरीफ फसल भी लगायी। अरहर, उड़द, हल्दी, अदरक और दूसरी अन्य फसलें उनके खेतों में दिखती हैं। इससे पहले केवीके ने भी लगभग 100 परिवारों को प्रशिक्षण दिया। हल्दी, अदरक और अन्य फसलों के लिए 40-40 किलो तक निशुल्क बीज मुहैया कराए गए। एक-एक एकड़ जमीन पर लगे इन फसलों केपरिणाम पर उन्हें आगे और भी सहायता देने का रास्ता खुल जायेगा। चपका सहित दूसरे गांवों में टपक प्रणाली केजरिए किसानों को सिंचाई सुविधाओं के बारे में जागरूक करने की कोशिश चल रही है। इसमें भी पानी की कम खपत होती है। अभी चपका में 25 किसानों का एक ग्रूप बनाया गया है। इनके उदाहरणों के जरिए दूसरों को भी प्रेरित किया जाएगा।

लीलादेवी के उदाहरण से नया भरोसा जगा

लीलावती देवी के मन में शुरू से ही अपने आसपासके समाज के लिए कुछ करने की इच्छा थी। इंटर की पढ़ाई के बाद शादी हो गई। आंगनबाड़ी सेविका के तौर पर काम करने का मौका मिला। फिर पति पारस जी की मदद से एक स्कूल भी खोला। पांचवीं क्लास के 200बच्चों को अन्य शिक्षकों के साथ मिलकर पढ़ाती थीं। परिस्थितिवश स्कूल बंद करना पड़ा। इसके कारण उन्होंनेसभी बच्चों का अन्य स्कूलों में नामांकन करा दिया। अबवह मुखिया के तौर पर अपनी पंचायत को प्रभावी बनाना चाहती हैं। उनके क्षेत्र के ग्रामीण विभिन्न सरकारी योजनाओंऔर प्राप्त अधिकारों का सीमित उपयोग ही कर पा रहे हैं। ऐसे में किसी उत्प्रेरक की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। लिहाजा, ग्रामीणों को इंदिरा आवास, बीपीएल कार्ड, विधवाऔर वृद्धावस्था पेंशन जैसी योजनाओं का लाभ दिलाने में पंचायत की उपयोगिता साबित हुई है। पारदर्शिता बढ़ी है। भारत साक्षर कार्यक्रम, घाघरा के जरिए ग्रामीण युवाओं के कौशल-क्षमता विकास हेतु योजनाएं बनाई जा रही हैं। इननयी पहलकदमियों से ग्रामीणों में भी नया भरोसा जगा है।

स्त्रोत : पंचायत का पगडंडी,राज्य ग्रामीण विकास संस्थान,झारखंड पंचायत महिला रिसोर्स सेंटर, रांची.



© 2006–2019 C–DAC.All content appearing on the vikaspedia portal is through collaborative effort of vikaspedia and its partners.We encourage you to use and share the content in a respectful and fair manner. Please leave all source links intact and adhere to applicable copyright and intellectual property guidelines and laws.
English to Hindi Transliterate