অসমীয়া   বাংলা   बोड़ो   डोगरी   ગુજરાતી   ಕನ್ನಡ   كأشُر   कोंकणी   संथाली   মনিপুরি   नेपाली   ଓରିୟା   ਪੰਜਾਬੀ   संस्कृत   தமிழ்  తెలుగు   ردو

सिडबी ऋण नीति

प्रस्तावना

भारतीय अव्यवस्था में अत्यंत लघु, लघु एंव मध्यम उद्यमियों (एमएसएमई) की महत्वपूर्ण भूमिका सर्वविदित हैं। एमएसएमई  उद्यमिता क्षेत्र के लिए नर्सरी की भूमिका निभाते हैं और ये अक्सर व्यक्तिगत सर्जनात्मक एवं नवोन्मेष से संचालित होते हैं। ये उद्यम देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), विनिर्माण उत्पादन, निर्यात और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं एमएसएमई क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्पाद में दूसरा सबसे बड़ा योगदान करने वाला क्षेत्र हैं। अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों का भौगिलिक वितरण भी अधिक सुसम है। एमएसएमई समान एवं समावेशी संवृद्धि के राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।

एमएसएमई क्षेत्र की चुनौतियों  का समाधान करने के लिए जिससे कि वे अपने कार्यनिष्पादन और pratisprd प्रतिस्पर्द्धा क्षमता में वृद्धि कर सकें बैंक ने सहायता के विभिन्न लिखतों/उत्पादों के माध्यम से उनकी पूँजी, प्राप्य वित्त, उर्जा खपत में कमी, मुलभूत संरचना (उद्यम-समूह में), आदि से सम्बन्धित जरूरतों को पूरा करने के लिए बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाया है।

बैंक ने निम्नलिखित गतिविधियों को प्रमुख/विशिष्ट व्यवसाय क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया है:

  • उर्जा दक्षता, स्वच्छ प्रोद्योगिकियाँ, संरचित ऋण के साथ-साथ दीर्घकालिक वित्तीयन ।
  • ईक्विटी उत्पाद जैसे जोखिम पूंजी (संरचित ऋण सहित), निधियों को अंशदान, आदि।
  • सेवा क्षेत्र
  • प्राप्य वित्त एवं फैक्ट्रियाँ
  • अप्रत्यक्ष ऋण अर्थात  बैंकों/वित्तीय संस्थाओं को पुनर्वित्त, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को लाभान्वित करने वाली सावर्जनिक वित्तीय संस्थाओं तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को संसाधन सहायता, आदि।
  • एमएसएमई से सम्बद्ध मूलभूत संरचना के लिए वित्त
  • ऋण सुगमता एवं समूहन

उपर्युक्त के अनुरूप, बैंक के व्यवसाय को प्रमुख उत्पादों/व्यवसाय भागों में बाँटा गया है। यद्यपि बैंक विशिष्ट क्षेत्रों के वित्तीयन पर बल देता रहेगा, तथापि यह paarpaarpaarpaarपात्र अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों की सावधि ऋण, कार्यशील पूंजी वित्तीयन (निधि-आधारित एवं गैर-निधि आधारित दोनों) सहित विभिन्न जरूरतें और अन्य निधि आवश्कताएं पूरी करने के लिए उन्हें वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना जारी रखेगा।

बैंक ने ऋण के श्रेणी-निर्धारण के लिए जोखिम मूल्यांकन के कई उपाय किये हैं, जिससे मूल्यांकन एवं ऋण प्रक्रिया में लगने वाले समय को कम कर एमएसएमई क्षेत्र के लघुतर ग्राहकों तक सीधे पहुँच बनाने में बैंक समर्थ हुआ है। इस बीच, जीखिम प्रबंध के क्षेत्र में वैश्विक मानकों  की शुरुआत के फलस्वरूप, भारतीय रिजर्व बैंक ने भारतीय बैंकिंग प्रणाली  में जोखिम प्रबंध के लिए प्रचलित उपायों में आवश्यकता-आधारित समुचित परिवर्तनों को अपनाया है।

एमएसएमई विकास अधिनियम, 2006

एमएसएमई विकास अधिनियम, 2006 में विनिर्माण एंव सेवा क्षेत्र को निम्नवत परिभाषित किया गया है:

उद्यम की श्रेणी

विनिर्माण (संयंत्र व मशीनों में मूल निवेश)

सेवा (उपकरण में मूल निवेश)

अत्यंत लघु

25 लाख रूपये तक

10 लाख रूपये तक

लघु

500 लाख रूपये तक

200 लाख रूपये तक

मध्यम

1000 लाख रूपये तक

500 लाख रूपये तक

नई व्यवसाय योजना बैंक के अनुरूप, बैंक से वित्तपोषित की जा रही/वित्तपोषित की जाने वाली गतिविधियों के लिए विनिर्माण एवं सेवाक्षेत्र के वे उद्यम शामिल किये जायेंगे, जो एमएसएमईडी अधिनियम के अंतर्गत पात्र हैं और इनमें सेवाक्षेत्र  की वे परियोजनाएं शामिल होंगी, जिन्हें बैंक अनुमोदित करे सहायता प्राप्त परियोजनाओं के एमएसएमई से सम्बद्धता पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया जायेगा

विनिर्माण उद्यमों के लिए, उन उपकरणों की सूची पहले ही एमएसएमईडी अधिनियम के अधीन, अधिसूचित हैं जिन्हें संयंत्र एंव मशीनों में पात्र निवेश का निश्चय करने के लिए छोड़ दिया जाना है।

ऋण नीति का ढांचा

इस नीति में प्रमुखता से उस दृष्टिकोण का वर्णन किया गया है, जो बैंक विभिन्न ऋण प्रक्रियाओं, ऋण जोखिम प्रबंध, नियंत्रण एवं निगरानी के लिए अपनाता है और समय-समय पर जारी विशिष्ट परिपत्र, नियम-पुस्तिकाएं, दिशानिर्देश इस नीति को पूर्णता प्रदान करते हैं। व्यवसाय और आर्थिक परिवेश में होने वाले बदलावों  के अनुरूप इस नीति में समय-समय पर संशोधन किये जायेंगे और वार्षिक आधार पर इसकी समीक्षा की जाएगी। वित्तवर्ष 2016  की ऋण नीति का केन्द्रीय बिदु ग्राहकों की आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए, व्यवसाय के प्रत्येक हिस्से के अंतर्गत आय वृद्धि के साथ गुणवत्तायुक्त आस्तियों में वृद्धि करना है।

बढ़ती प्रतिस्पर्धा और फलतः मार्जिन पर पड़ने वाले दबाव को देखते हुए, बैंक गैर-ब्याज/शुल्क-आधारित आय कमाने के लिए अपने संविभाग के आकार और दायरे का तेजी से विकास करने अंतर्गत, राज्य स्तरीय संस्थाओं के सम्बन्ध में, ऋण वितरण में सावधानी बरती जाती रहेगी।

ऋण नीति में बैंक के रूपये व विदेशी मुद्रा ऋण सम्बन्धी परिचालन, जोखिम पूंजी और अल्पवित्त परिचालन शामिल हैं। तथापि, बैंक के कोषागार सम्बन्धी परिचालन इस नीति के दायरे से बाहर रखे गये हैं क्योंकि कोषागार सम्बन्धी परिचालनों के लिए अलग प्रकार का प्रंबध किया जाना अपेक्षित है।

सिडबी अत्यंत लघु, लघु एवं मध्यम उद्यमों को पात्र गतिविधियों के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराएगा, चाहे उद्यम का संघटनात्मक स्वरुप कुछ भी हो। तदनुसार, बैंक किसी व्यक्ति, स्वामित्त्व संस्था, व्यक्तियों के संघ, भागीदारी फर्म, सिमित देयता वाली भागीदारी, कम्पनी, संस्था (सोसाइटी) यह न्यास (ट्रस्ट) को सहायता दे सकता है।

ऋण नीति के उद्देश्य

बैंक की ऋण नीति के प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन नीचे दिया गया है:

  1. उच्च गुणवत्ता वाला आस्ति संविभाग निर्मित करना व उसे दीर्घकालिक बनाना, जो ग्राहकों, बाजारों और उत्पादों के सन्दर्भ में अच्छी तरह वैविध्यपूर्ण हो और स्वीकार्य जोखिम समायोजन के साथ प्रतिफल दायी हो।
  2. समय-समय पर यथासंशोधित सिडबी अधिनियम, 1989 के अनुसार संस्था के अधिदेश की पूर्ति के लिए विस्तृत ऋण कार्यनीति बनाना और अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे सभी कार्यकलाप करना, जो एमएसएमई क्षेत्र के लिए लाभकारी हों।
  3. विभिन्न कर्मियों को प्रोत्साहित करना कि वे बाजार की जरूरतों के अनुसार नवोन्मेष करें और प्रतिस्पर्धा तथा आवश्यकता-आधारित उत्पाद विकसित करें।
  4. अल्प वित्त एवं जोखिम पूंजी के माध्यम से समावेशी विकास को बढ़ावा देना।
  5. ऋण जोखिमों का उपयुक्त मूल्यन करने के लिए जोखिम प्रबंध प्रणालियों को सुदृढ़ बनाना और ऋण संविभाग की सघन निगरानी सुनिश्चित करना, ताकि आस्तियों को गैर-निष्पादक आस्तियों में परिवर्तित होने से रोका जा सके।
  6. नया व्यवसाय प्राप्त करने के लिए मध्यवर्त्ती संस्थाओं के साथ गहन सहयोग सम्बन्ध बनाना।

ऋण नीति का विहंगावलोकन/पर्यवलोकन

स्वस्थ ऋण संविभाग के विकास, उसके प्रबंध और जोखिम कम करने के बारे में बैंक का जो दृष्टिकोण हैं उसे ऋण वितरण रणनीति में ध्यान में रखा गया है तदनुसार, बैंक की ऋण नीति में निम्नलिखित प्रमुख पहलुओं को व्यापक रूप में शामिल किया गया है:

सामान्यतः बैकिंग क्षेत्र में अप्रत्यक्ष  ऋण की काफी मांग बनी हुई है। एमएसएमई क्षेत्र के लिए प्रमुख वित्तीय संस्था होने की बैंक की अतुलनीय स्थिति के कारण, रणनीति यह होगी कि प्रतिस्पर्धा रूप से संसाधन जुटाए जाएँ और यथासंभव बैकिंग क्षेत्र के ऋण मांग पूरी की जाये।

ऋण की नीति वैधता/प्रधिकारिता

  1. यह ऋण नीति बैंक के ऋण परिचालनों के लिए प्रमुख दस्तावेज है, जिसे निदेशक मंडल ने विधिवत अनुमोदित किया है। यह अपेक्षा की जाती है कि यह बैंक के ऋण-परिचालनों के लिए मार्गदर्शी दस्तावेज सिद्ध होगा।
  2. यह ऋण नीति अगले पुनरीक्षण और उसके प्रचारित किये जाने तक प्रभावी रहेगी। इसका पुनरीक्षण वार्षिक आधार पर किया जायेगा।
  3. प्रधान कार्यालय (प्र.का.) से जारी किये जाने के बाद, क्षेत्रीय कार्यालय (क्षे.का.)/केन्द्रीय ऋण संसाधनकक्ष/विस्तार शा.का. सहित शाखा कार्यालय (शा.का.) इसके अनुसार कार्य करने के लिए अधिकृत हैं। यदि आवश्यक होगा, तो इस सम्बन्ध में स्पष्टीकरण/अगले दिशानिर्देश जोखिम प्रबंध उद-विभाग/सम्बन्धित व्यवसाय उदभाग द्वारा जारी किये जायेंगे।
  4. ऋण नीति के दिशानिर्देश उन सभी ऋण सुविधाओं के लिए लागू होंगे, जो भिन्न-भिन्न उदभाग विभिन्न ग्राहकों को प्रदान करेंगे।
  5. बैंक भारतीय रिजर्व बैंक के उन सभी दिशानिर्देशों निर्देशों और सलाहों/सूचनाओं का पालन करेगा, जो समय-समय पर प्रभावी होंगे। इस दस्तावेज के दिशानिर्देश विभिन्न उत्पादों/व्यवसाय प्रकार्यों के परिचालनगत दिशानिर्देशों और ऋण मूल्यांकन, संसाधन, मंजूरी, दस्तावेजीकरन, आदि के प्रक्रियागत पहलुओं को संकलित करने वाले परिपत्रों/मास्टर परिपत्रों/ऋण नियम-पुस्तिका के साथ पढ़े जाने चाहिए।

 

स्रोत: भारतीय लघु, उद्योग विकास बैंक (सिडबी)



© 2006–2019 C–DAC.All content appearing on the vikaspedia portal is through collaborative effort of vikaspedia and its partners.We encourage you to use and share the content in a respectful and fair manner. Please leave all source links intact and adhere to applicable copyright and intellectual property guidelines and laws.
English to Hindi Transliterate