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सशक्तीकरण का प्रमुख आधार

स्‍वयं सहायता समूह


स्‍वेच्‍छा से किसी विशेष काम के लिए बनाया गया एक छोटा समूह (जिसमें 15 से 20 सदस्‍य हों)। यह एक ऐसा समूह होता है जिसके सदस्‍य बचत, ऋण और सशक्तिकरण के उपकरणों के रूप में सामाजिक भागीदारी का प्रयोग करते हैं।

पूर्व स्थिति

देश में औपचारिक ऋण प्रक्रिया का तेजी से विस्तार होने के बावजूद, बहुत से क्षेत्रों में, विशेष रूप से आकस्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए गरीब ग्रामीणों की निर्भरता किसी तरह साहूकारों पर ही थी । ऐसी निर्भरता सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग और जनजातियों के सीमान्त किसानों, भूमिहीन मजदूरों, छोटे व्यवसायियों और ग्रामीण कारीगरों में देखने को मिलती थी जिनकी बचत की राशि इतनी सीमित होती है कि बैंकों द्वारा उसे इकठ्ठा नहीं किया जा सकता। कई कारणों से इस वर्ग को दिए जाने वाले ऋण को संस्थागत नहीं किया जा सका है। गैर सरकारी संगठनों द्वारा बनाए गए अनौपचारिक समूहों पर नाबार्ड, एशियाई और प्रशांत क्षेत्रीय ऋण संघ (एप्राका) और अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आइ एल ओ) द्वारा किए गए अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि स्वयं सहायता बचत और ऋण समूहों में औपचारिक बैंकिंग ढांचे और ग्रामीण गरीबों को आपसी लाभ के लिए एकसाथ लाने की संभाव्यता है तथा उनका कार्य उत्साहजनक था।

स्‍वयं सहायता समूहों की सेवाएं

  • बचत और ऋण की गतिविधियां
  • समूहों की भागीदारी जांच करना
  • सामूहिक स्‍तर पर गरीबी उन्‍मूलन की योजना बनाना

वित्‍त-पोषण में लाभ

आर्थिक रूप से गरीब व्‍यक्ति यदि किसी समूह का हिस्‍सा बने, तो थोड़ा समृद्ध बनता है। वित्‍त-पोषण के अलावा स्‍वयं सहायता समूह कर्जदाताओं और कर्जदारों के लिए लेन-देन की लागत को कम करता है। जहां कर्जदाताओं को कई छोटे-छोटे व्‍यक्तिगत खाते संभालने के स्‍थान पर सिर्फ एक स्‍वयं सेवा समूह संभालना होता है, वहीं एक स्‍वयं सहायता समूह का हिस्‍सा बनने से कर्जदारों के कागजी कामों के लिए किए जाने वाले यात्रा खर्च (शाखा या अन्‍य स्‍थानों से और शाखा व अन्‍य स्‍थानों तक) में कटौती होती है। साथ ही उनके काम के दिनों में उनको ऋण लेने के लिए अवकाश भी नहीं लेने पड़ते।

नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्‍चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) का एसएचजी-बैंक लिंकेज कार्यक्रम

गरीबों को एक बेहतर और सुचालित बैंकिंग उपलब्‍ध करवाने के मद्देनजर, 1991-92 में नाबार्ड द्वारा बैंकों के साथ स्‍वयं सहायता समूहों को जोड़ते हुए लघु ऋण का प्रबंध करने के लिए एक परियोजना की शुरुआत की गई। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने तब वाणिज्यिक बैंकों को सलाह दी कि वे लिंकेज कार्यक्रम में पूरी भागीदारी करें। तब से इस योजना का विस्‍तार आरआरबी और सहकारी बैंको तक कर दिया गया है।



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