किसानों की आय बढ़ाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के विभिन्न संस्थानों से जुड़े वैज्ञानिक फलों और मसालों के मूल्यवर्धित उत्पाद बनाने की प्रौद्योगिकियों को विकसित करने में लगे हुए हैं। इस क्रम में जायफल के छिलके से बनी टॉफी का भी विकास किया जा रहा है।और उम्मीद है कि जल्द ही लोगों को यह खाने को मिलेगी। अखरोट की तरह दिखने वाला जायफल विविध औषधीय गुणों से भरपूर ऐसा मसाला है, जिसका इस्तेमाल खाना पकाने में किया जाता है। इसमें कई ऐसे पोषक तत्व भी पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होते हैं। जायफल के मूल्यवर्धित उत्पादों को उपभोक्ताओं के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए ही जायफल के छिलके से व्यावसायिक स्तर पर टॉफी बनाई जा रही है। उपयाेग संस्करण उद्योग में खासकर, डच व्यंजनों में, मानक मसालों के रूप में प्रयोग होता है। जायफल मांस उत्पादों, शोरबा, सॉस, बेक्ड खाद्यों, मिष्ठानों, पुडिंग एवं सब्जी आदि की पकाई में प्रयुक्त होता है। स्वादिष्ट जायकेदार व्यंजनों में भी जावित्री प्रयुक्त की जाती है। अपने उत्तेजक एवं वातहर गुणों के कारण पूर्वी देशों में दवा के रूप में इसका इस्तेमाल किया जाता है। जायफल का सेवन करने से अनिद्रा की परेशानी दूर होती है, साथ ही पाचन तंत्र भी दुरुस्त रहता है। यह इतनी असरदार औषधि है कि जिससे कैंसर से लेकर मधुमेह तक का इलाज किया जा सकता है। इसके अलावा शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी जायफल बेहद असरदार है। जायफल में लगभग 80-85 प्रतिशतजापरिकॉर्प (जायफल का बाहरी छिलका) होता है। अधिक उपज देने वाली इसकी किस्में प्रति पेड़ 100 कि.ग्रा. तक ताजा परिकॉर्प की पैदावार देती हैं। वर्तमान समय में किसान जायफल के बीज और गूदे का इस्तेमाल करते हैं और पेरिकॉर्प को खेत में ही सड़ने के लिए छोड़ देते हैं। यह तकनीक व्यर्थ छोड़ दिए गए पेरिकॉर्प से जायफल टॉफी बनाकर इसके प्रभावी इस्तेमाल में मदद करेगी। व्यावसायिक नजरिए से यह जायफल टॉफी काफी महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ है। यह उत्पाद जायफल से निर्मित मसाला उत्पादों जैसे-जायफल के बीज और गूदा की उपज के अलावा किसानों और उद्यमियों को अतिरिक्त आय दिलाने में मदद करता है। खास बात यह है कि किसी सिंथेटिक प्रिजर्वेटिव का इस्तेमाल किए बिना ही, कमरे के सामान्य तापमान पर इस उत्पाद का एक वर्ष तक भंडारण किया जा सकता है। तकनीक का पेटेंट भाकृअनुप-केन्द्रीय तटीय कृषि अनुसंधान संस्थान, गोवा ने जायफल के छिलके से टॉफी बनाने की तकनीक का पेटेंट करवाने के लिए आवेदन (आवेदन संख्या: 201621012414) कर दिया है। इस तकनीक के व्यावसायीकरण की दिशा में अनुबंध ज्ञापन पर हस्ताक्षर को साकार बनाने में संस्थान की प्रौद्योगिकी प्रबंधन इकाई (आईटीएमयू) ने मदद की है। जायफल प्रायः 9-12 मीटर ऊंचाई तक बढ़ने वाला सदाबहार पेड़ है। इसके फल से दो मसाले, जायफल और जावित्री, प्राप्त होते हैं। जायफल, फल के अंदर पाई जाने वाली गुठली अथवा बीज होता है, जबकि जावित्री, गुठली पर जालीदार परत (बीजचोल) है। जायफल के पेड़ की उत्पत्ति इंडोनेशिया के मोलुक्का मसाला द्वीपों में से सबसे बड़े द्वीप, बांदा में हुई थी। हालांकि, शब्द नटमेग लैटिन शब्द नक्स से आता है, जिसका अर्थ है काष्ठफल (नट), और मस्कट, जिसका अर्थ है 'कस्तूरी जैसा'। इसके फल मांसल गुठलीदार, गोलाकार और रंग में फीके पीले होते हैं। इस मसाले का इतिहास पहली शताब्दी ईसवी से प्रारंभ होता है, जब रोमन लेखकप्लिनी ने इस एक पेड़ के बारे में बताया था कि इसमें दो अलग-अलग स्वाद वाले दो काष्ठफल होते हैं। इसे प्रसिद्धि 1600 के दशक में मिली, जब हॉलैंडवासियों (डच) ने ईस्ट इंडीज में केवल जायफल उत्पादन को अपने अधीन करने के लिए बांदा के द्वीप पर एक चहुमुखी युद्ध छेड़ दिया था। यहां तक कि बाद में हॉलैंडवासियों ने अंग्रेजों के स्वामित्व वाले एक जायफल उत्पादक द्वीप पर नियंत्रण के लिए मैनहट्टन द्वीप का सौदा तक किया था। जायफल, उष्णकटिबंधीय जलवायु का पौधा है। इसकी खेती के लिए उचित जल निकासी वाली गहरी उपजाऊ भूमि की जरूरत होती है। व्यावसायिक रूप से पौधों के जल्द विकास करने के लिए बलुई दोमट मृदा या लाल लैटेराइट मृदा में इसे उगाना लाभकारी रहता है। इसके पौधे को विकास करने के लिए, सर्दी और गर्मी, दोनों मौसम की आवश्यकता होती है, लेकिन अधिक सर्दी अथवा अधिक गर्मी इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती। सर्दियों में पड़ने वाला पाला इसकी खेती के लिए नुकसानदायक होता है। इसके पौधों को विकास करने के लिए सामान्य वर्षा की जरूरत होती है। इसके अलावा शुरुआत में पौधों के विकास के दौरान उन्हें हल्की छाया की जरूरत होती है। भारत में इसे दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है। स्त्राेत: खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर) प्रस्तुति द्वारा अश्वनी कुमार निगम।