कटाई एवं गहाई एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया खेती-किसानी में फसलों की कटाई एवं गहाई एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। आजकल श्रमिकों की उपलब्धता एवं बहुत अधिक श्रमिकी किसानों के लिए एक गंभीर समस्या बन गयी है। परंपरागत रूप से कटाई व गहाई का महीनों तक चलने वाला यह कार्य मशीनों के उपयोग से कुछ दिनों में ही संपन्न हो जाता है। समय पर कटाई एवं गहाई न होने से फसल की क्षति की आशंका रहती है। इससे अगली फसल की बुआई में देरी होती है, जिससे उसकी उपज में कमी आती है। आज के समय में कटाई एवं गहाई के लिए बहुत सी मशीनों का विकास हो चुका है। किसान फसलों की कटाई के लिए उन्नत हंसिया, स्वचालित वर्टिकल कन्वेयर रीपर (पैदल चलाने वाला), स्वचालित वर्टिकल कन्वेयर रीपर (बैठकर चलने वाला) का प्रयोग कर सकते हैं। पॉवर टिलरचालित रीपर का भी प्रयोग कर सकते हैं। दांतेदार हंसिया से श्रम कम करना पड़ता है तथा व्यक्ति की उत्पादकता अधिक हो जाती है। कटाई के बाद किसान गहाई यंत्रों का प्रयोग कर फसलों की गहाई कर सकते हैं। छोटे किसान 10 अश्वशक्ति वाली गहाई मशीनों का उपयोग कर सकते हैं। बैठकर चलाने वाला स्वचालित तथा ट्रैक्टर से चलने वाला वर्टिकल कन्वेयर रीपर मध्यम और बड़े किसानों के लिए उपयोगी है। गहाई के लिए 25-35 अश्वशक्ति से चलने वाले एक्सियल फ्लो अथवा बहुफसली गहाई मशीनों का उपयोग बड़े किसान कर सकते हैं। बड़े किसानों के लिए सबसे उपयुक्त यंत्र कम्बाइन हार्वेस्टर है, जिसमें वे कटाई एवं गहाई एक साथ कर सकते हैं। इसमें समय की बहुत ज्यादा बचत हो जाती है। इससे अगली फसल की बुआई के लिए खेत की तैयारी करने का पर्याप्त समय मिलता है। गहाई के लिए विभिन्न प्रकार के शक्ति स्रोत आधारित थ्रेसर का प्रयोग होता है। गहाई यंत्रों को मुख्यतः उनके सिलिंडर की दर से विभाजित किया जाता है। हैमर टाइप मशीन इसको लुधियाना थ्रेसर के नाम जाना जाता है। इसमें गहाई सिलिंडर पर हथौड़ेनुमा संरचना लगी होती है, जो प्रहार से थ्रेशिंग करती है। पेग टाइप (नैनी या शेरपुर डिजाइन) इस प्रकार के थ्रेसर में सिलिंडर पर पेग लगे होते हैं जो कि कॉन्केव पर लगे पेग के बीच में फसल को रगड़कर अनाज को अलग करता है। रास्प बार टाइप थ्रेसर रास्प बार प्रकार के थ्रेसर में सिलिंडर के बाहरी हिस्से में नुकीली गंडासेनुमा रास्प लगी होती है, जो कि फसलों को काटकर अनाज को अलग करती है। रबी फसलों की गहाई खासकर गेहूं के लिए इस प्रकार के थ्रेसर सबसे उपयुक्त होते हैं। एक्सियल फ्लो मशीन (आई.आर.आर आई.) डिजाइन यह यह मुख्यत: धान के लिए होती है, लेकिन गेहूं की गहाई भी इसमें होती है। बहुफसली थ्रेशिंग मशीन इस थ्रेसर में रास्प बार प्रकार का थ्रेशिंग सिलेन्डर, दोलयमान करती छलनियां, अवतल, अनाज पछारने एवं सफाई के लिए प्रणाली इत्यादि का समावेश होता है। मशीन को विभिन्न फसलों की गहाई के लिए उपयुक्त बनाने के लिए सिलेन्डर एवं ब्लोअर गति तथा कॉन्क्लेव क्लियरेंस के समायोजन की व्यवस्था होती है। इस मशीन को चलाने के लिए 35 अश्वशक्ति की आवश्यकता होती है। इसकी कार्य क्षमता 600-1000 कि.ग्रा. प्रति घंटा होती है। कटाई के बाद बचे हुए फसल अवशेष का प्रबंधन कभी भी खेतों में बचे हुए फसल अवशेषों को जलाना नहीं चाहिए। खेतों में आग लगाने से किसान मित्र जैसे कि गिरगिट, केंचुए तथा कई प्रकार के लाभकारी जीवाणु इत्यादि मर जाते हैं। अन्य माइक्रो-न्यूट्रीएंट भी खत्म हो जाते हैं, जो कि मृदा में होने वाली माइक्रोबियल प्रक्रियायों को प्रभावित करते हैं। इससे उपज में भी कमी आती है। लगातार खेतों में आग लगाने से खेत बंजर होने की आशंका बनी रहती है। किसान बचे हुए फसल अवशेष को स्ट्रॉ बेलर से इकट्ठा कर बंडल बनाकर रख सकते हैं। स्ट्रॉ बेलर को ट्रैक्टर के पी.टी.ओ. द्वारा चलाया जाता है, जिसमें रील प्रकार की स्ट्रॉ पिकअप असेम्बली और स्ट्रॉ को संघननकर बांधने की इकाई होती है। यह स्वचालित रूप से रीली की मदद से खेत में से फसल अवशेष को उठाकर पफीडर की मदद से बेल चेम्बर में स्थानांतरित करता है। यह मशीन फसल अवशेष को दबाकर बंडल बनाती है। इन बंडलों को एकत्रित करके वर्षों तक रख सकते हैं। किसान कम्बाइन हार्वेस्टर से काटी गयी फसल के बचे हुए फसल अवशेषों को स्ट्रॉ कम्बाइन के उपयोग से भूसा बना सकते हैं। इस मशीन द्वारा ग्रेन कम्बाइन हार्वेस्टर के परिचालन उपरांत फसल की बची हुई खूंटी एवं पेंफके गए पुआल को एकत्रित कर मशीन के सिलेंडर कॉन्क्लेव इकाई में भेजा जाता है, जहां पर इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर कॉन्क्लेव से पारित किया जाता है। इस मशीन से भूसा बनाते समय किसान कुछ अनाज भी प्राप्त कर सकते हैं, जो कि अवशेष के साथ खेतों में ही रह जाते हैं। भंडारण पहले किसान अनाज का भंडारण बखरी, कोठार और मढ़ई में करते थे। आजकल भंडारण की आधुनिक तकनीकियों का विकास हो गया है। घर के अंदर किये जाने वाले भंडारण में कनाजा, कोठी, सन्दूक और मिट्टी से बने कूंड आदि के आकार से बने ढांचों का प्रयोग किया जाता हैं। घरके बाहर भंडारण करने के लिए बांस तथा मिट्टी से बने ढांचे का प्रयोग करते हैं। कचेरी अनाज भंडारण की एक पुरानी विधि है। हजेऊ जमीन के नीचे अनाज भंडारण की विधि को कहते हैं। बहुत लंबे समय तक के लिए भंडारण करने के लिए ये विधियां उपयुक्त नहीं हैं। पारंपरिक विधियों में आने वाली समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए आधुनिक अनाज भंडारण विधियों का उपयोग करना उचित होगा। छोटे स्तर के भंडारण के लिए पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित डिब्बे के आकार की संरचना, और पूसा में विकसित हापुर टेक्का प्रकार की संरचना का प्रयोग करते हैं। बड़े स्तर पर अनाज भंडारण के लिए ढक्कन और साइलोस प्रकार के ढांचे का उपयोग भी किया जाता है। साइलोस धातु या सीमेंट के बने होते हैं। भंडारित अनाज का कीटों, चूहों और नमी से बचाव करना चाहिए। सामान्यतः खपरा बेटल, रेड फ्रलोर बेटल, लेसर ग्रेन बोरर मुख्य कीट हैं, जो अनाज को नुकसान पहुंचाते हैं। गहाई मशीनों का प्रयोग करते समय सावधानियां गहाई मशीन से होने वाली दुर्घटनाओं से बचाव के लिए भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित परनाला (हापर) तथा हडम्बा थ्रेसर खरीदने वाले किसान फसल वापिस खींचने वाला यंत्र जरूर लगायें। बिजली की मोटर को बंद करने वाला बटन काम करने वाले व्यक्ति के पास लगा होना चाहिए, जिससे आपातकाल में मोटर जल्दी बंद कर सकें। गहाई मशीन पर काम करते समय ढीले कपड़े खासतौर पर धोती, दुपट्टा, खुली बाह वाली कमीज तथा घड़ी या कड़ा न पहनें। दस्तानों का प्रयोग करें। नशा या शराब का सेवन करके थ्रेसर पर काम न करें। धूल तथा भूसा से बचने के लिए नाक पर कपड़े या मास्क तथा आखों की सुरक्षा के लिए चश्मे का प्रयोग करें। किसी भी आदमी को गहाई मशीन पर लगातार 8 घंटे से ज्यादा काम नहीं करना चाहिए। थकावट व अनिद्रा से दुर्घटना की आशंका बढ़ जाती है। काम करते समय बात न करें या किसी और तरफ ध्यान न बांटे। गहाई मशीन चलते समय किसी भी पुर्जे को खोलने या कसने की कोशिश न करें। अनाज भंडारण में ध्यान देने योग्य मुख्य सावधानियां अनाज भंडारण से पहले अनाज को सूर्य की रोशनी में पूरी तरह सुखा लेना चाहिए। इसमें नमी 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। भंडारण से पहले अनाज साफ कर लेना चाहिए। टूटे अनाज में फफूंद आदि से संक्रमण की आशंका अधिक होती है। अतः टूटे दानों को अलग कर लेना चाहिए। अनाज भरने के लिए नए बोरों का इस्तेमाल करना चाहिए। प्रयोग किये गए बोरों में फिर से अनाज भरने से पहले बोरों को 1 प्रतिशत मैलाथियान के घोल में डुबो लेना चाहिए। अनाज को ढोने से पहले बैलगाड़ी, ट्रैक्टर, ट्रक आदि साफ कर लेनी चाहिए। भंडारणगृह को अच्छे से मैलाथियान के घोल 3 लीटर प्रति 100 वर्गमीटर से धुल लेना चाहिए। अनाज से भरी बोरियों को दीवाल से सटा कर न रखें तथा बोरियों से बोरियों के बीच भी कुछ दूरी रखें। अनाज को कीटों से बचने के लिए नीम का पाउडर का प्रयोग करें। चूहों को मारने के लिए जिंक फॉस्फाइड और वारफारिन का प्रयोग करें। यदि अनाज में कीट लग गए हों तो एल्युमीनियम फॉस्फाइड तथा एथिलीन डाइब्रोमाइड (ई.डी.बी.) एम्पुले का प्रयोग करना चाहिए। स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर) हिमांशु त्रिपाठी,पी-एचडी छात्र, शुआट्स, प्रयागराज (उत्तरप्रदेश), एन.एस. चंदेल, आईसीएआर.-सीआईएई, भोपाल (मध्यप्रदेश) और अशोक त्रिपाठी, प्रोफेसर, डीन, सीएईटी. एंड हेड, एफएमपी विभाग, शुआट्स, प्रयागराज(उत्तर प्रदेश)।