पशुधन के लिए सदाबहार चारा दुग्ध के लिए बढ़ती हुई मांग, पशुपालन व्यवसाय को लाभदायक बनाने की नई संभावनाओं का सृजन कर रही है। यद्यपि ठीक इसी समय हरे चारे की उपलब्धता में निरंतर कमी परिलक्षित हो रही है। वनों एवं चारागाहों का क्षेत्रफल घट रहा है। साथ ही साथ फसल प्रति उत्पादों में भी कमी आ रही है जो कि अन्यथा पशु आहार के रूप में उपयोग किया जाता रहा है। हरे चारे की इस कमी की पूर्ति व्यसायिक पशु आहार से की जा रही है। जिसके कारण दुग्ध के उत्पादन लागत में वृद्धि हो रही है। पशु आहार के विकल्प की खोज एक विस्मयकारी पौधे-अजोला पर समाप्त होती परिलक्षित होती है जिसमें कि पशुओं के लिए सदाबहार पौष्टिक आहार प्रदान करने की क्षमताएं विद्यमान है। अजोला जल की तरह पर तैरने वाला एक फर्न है। अजोला की सतह पर नीलहरित शैवाल सहजैविक के रूप में विद्यमान होता है। इस नीलहरित शैवाल को (एनाबिना अजोली) के नामा से जाना जाता है। जो कि वातावरण से नत्रजन के स्थायीकरण के लिए जिम्मेदार होता है। अजोला शैवाल की वृद्धि के लिए आवश्यक कार्बन स्रोत एवं वातावरण प्रदाय करता है। इस तरह या अद्वितीय पारस्परिक सहजैविक संबंध अजोला को एक अदभुत पौधे के रूप में विकसित करता है, जिसमें कि उच्च मात्रा में प्रोटीन उपलब्ध होता है। अजोला में पाये जाने वाले पोषक तत्व एवं शारीरिक बढ़त पर उनका प्रभाव अजोला में प्रोटीन आवश्यक एमिनो अम्ल एवं विटामिन (विटामिन ए, विटामिन बी 12 एवं बीटेकेरोटिन) वृधिकाक मध्यस्थ अवयव एवं खनिज जैसे कि कैल्सियम, फास्फोरस, पोटाश, लोहा, तांबा, मैग्नीशियम इत्यादि प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसमें शुष्क मात्रा के आधार पर 40-60% प्रोटीन, 10-15 % खनिज एवं 7-10% एमिनोअम्ल, जैव सक्रिय पदार्थ एवं जैव पोलीमर्स, इत्यादि पाए जाते है। अजोला में कार्बोहाइड्रेट एवं वासा की मात्रा अत्यंत कम होती है। इसकी संरचना इसे अत्यंत पौष्टिक एवं असरकारक पशु आहार बनाती है। इसे पशुओं द्वारा आसानी से पचाया जा सकता है। क्योंकि इसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक एवं लिगिन्न की मात्रा कम होती है। पशु बहुत ही जल्दी इसके अभ्यस्त हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त अजोला के उत्पादन की प्रकिया सरल एवं किफायती है। दुधारू पशुओं पर किये गये प्रयोगों से सिद्ध होता है कि जब पशुओं को उनके दैनिक आहार के साथ डेढ़ से दो किलोग्राम अजोला प्रतिदिन की दर से दिया जाता है तो दुग्ध उत्पादन में 15 प्रतिशत की वृद्धि होती है। उत्पादन दर में यह वृद्धि अजोला की पौष्टिकता के आधार पर की गई वृद्धि की गणना से कही अधिक है। इसलिए ऐसा माना जाता है कि अजोला में न केवल पौष्टिक तत्व बल्कि अन्य अवयव जैसे कि केरोटिन, जैवपालीमरस एवं प्रोबायोटिक भी पाए जाते हैं, जो कि इस अप्रत्याशित वृद्धि दर को अजाम देते है। कुक्कुट आहार के रूप में अजोला का प्रयोग करने पर ब्रायलर पक्षियों के औसत भार में वृद्धि तथा अंडा उत्पादन में वृद्धि पाई जाती है। अजोला को भेड़ों, बकरियों, सुकरों एवं खरगोश के आहार के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। चीन में धान सह-मछली उत्पादन के साथ अजोला की पैदावार करने पर धान के उत्पादन में 20% एवं मछली उत्पादन में 30% की वृद्धि पाई गई। अजोला की अन्य चारा फसलों से तुलनात्मक अध्ययन वार्षिक उत्पादन (टन/हेक्टेयर) शुष्क भार प्रोटीन की मात्रा (%) हाइब्रिड नेपियर 250 50 4 लुर्सन 80 16 ३.2 काउपी 35 7 1.4 सोरगम 40 32 0.6 अजोला 730 56 40.60 अजोला उत्पादन की विधि एक छायादार जगह में 2 मीटर लंबा, 2 मीटर चौड़ा तथा 0.2 मीटर गहरा गड्ढा खोदना है। इसे प्लास्टिक शीट से ढंक देना है। सीमेंट की टंकी में भी इसे उगाया जा सकता है। ऐसी परिस्थिति में प्लास्टिक शीट बिछाना आवश्यक नहीं है। जहाँ तक संभव हो पराबैंगनी किरणों रोधी प्लास्टिक शीट का उपयोग करें। प्लास्टिक शीट सिलापोलीन एक पोलीथिन तारपोलीन है जो कि प्रकाश की पराबैंगनी किरणों के लिए प्रतिरोधी क्षमता रखती है। लगभग 10-15 किलोग्राम मिट्टी गड्ढे में फैलाना है। 2 किलो गोबर एवं 30 ग्राम सुपर फास्फेट 10 लीटर पानी में मिलाकर गड्ढे में डालना है। पानी का स्तर 10 सेमी तक होना चाहिए। 500 ग्राम से 1 किलोग्राम तक अजोला कल्चर गड्ढे के पानी में डाल देना है। अजोला बहुत तेजी से विकसित होता है और 10-15 दिन के अंदर पूरे गड्ढे में फैल जाता है। इसके बाद से 800-1200 ग्राम अजोला प्रतिदिन बाहर निकाला जा सकता है। प्रत्येक पांच दिन में एक बार 20 ग्राम सुपर फास्फेट और लगभग 1 किलो गोबर गड्ढे में डालने से अजोला तेजी से विकसित होता है। 1.5-2.0 किलो अजोला नियमित आहार के साथ प्रतिदिन पशु को खिलाया जा सकता है। अजोला खिलाने की विधि अजोला को खिलाने से पूर्व 1 सेमी बड़े साइज के छेद किये हुए ट्रे (छलनी) में एकत्र करना चाहिए ताकि पूरा पानी झड़ जाए। ट्रे को एक बाल्टी के ऊपर रखकर पानी से अच्छे से धोना चाहिए ताकि गोबर की गंध निकल जाए। बाल्टी में एकत्रित पानी को पुनः गड्ढे में डाल देना चाहिए। प्राप्त अजोला को पशु दाने या पैरा के साथ मिलाकर पशु को खिलाना चाहिए। अजोला खिलाने से लाभ इसे उत्तम पौष्टिक आहार के रूप में विकसति किया जा सकता है। ग्राम में घर या बाड़ी में किसी भी स्थान में अजोला का उत्पादन किया जा सकता है। पशुओं के साथ-साथ मुर्गियों का भी उत्तम आहार। दुग्ध उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ पशु के शारीरिक विकास के लिए भी अजोला के उपयोग पशु आहार के रूप में कर सकते हैं। अजोला उत्पादन के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें अजोला की तेज बढ़त और दुगुना होने का न्यूनतम समय बनाये रखने हेतु यह आवश्यक हो जाता है कि अजोला को प्रतिदिन उपयोग के लिए बाहर निकाला जाए (लगभग 200 ग्राम प्रति वर्ग मीटर के मान से)। समय-समय पर गाय का गोबर एवं सुपुर फास्फेट डालते रहना चाहिए ताकि फर्न तीव्र गति से विकसित होता रहे। अजोला तैयार करने के लिए उपयुक्त तापमान है- 30 डिग्री सेंटीग्रेड। इससे अधिक तापमान करने का स्थान छायादार होना चाहिए। अजोला तैयार करने की टंकी में पी.एच. का समय-समय पर परिक्षण करना चाहिए। उचित पी.एच. 5.5-7.0 के बीच होना चाहिए। प्रति 30 दिनों के अंतराल में, एक बार, अजोला तैयार करने की टंकी की लगभग 5 किलो मिट्टी, ताजा मिट्टी से बदल देना आवश्यक है ताकि नाइट्रोजन की अधिकता तथा अन्य लघु खनिजों की कमी होने से बचाया जा सके। प्रति 10 दिनों के अन्तराल में, एक बार, अजोला तैयार करने की टंकी से 25-30% पानी ताजे पानी से बदल देना चाहिए ताकि नाइट्रोजन की अधिकता होने से बचाया जा सके। प्रति 6 माह के अंतराल में, एक बार अजोला तैयार् करने की टंकी को पूरी तरह से खाली कर साफ करना चाहिए तथा नये सिरे से पानी, गोबर एवं अजोला कल्चर डालना चाहिए। अजोला के उपयोग से पहले ताजे, साफ पानी से अच्छे से धोना चाहिए ताकि गोबर की गंध निकल जाए। अजोला उत्पादन में आने वाली आम समस्याओं के निराकरण अजोला के विकास की गति धीमी होने का आमतौर पर इन कारणों में से कोई एक हो सकता है - फोस्फोरस की कमी या तापमान की अधिकता/सूर्य का तेज प्रकाश । अ. फास्फोरस अल्पता - फास्फोरस की कमी से निबटने के लिए प्रति सप्ताह 5 किलो/हेक्टेयर के मान से मोनो अमोनियम फास्फेट (16-20-0) या सुपर फास्फेट(0-18-0) डालना चाहिए। ब. उच्च तापक्रम/तीव्र सूर्य प्रकाश - तापमान की अधिकता होने पर अजोला भूरा या लालपन लिए हुए गुलाबी रंग का हो जाता है तथा सूर्य का तेज प्रकाश अजोला को चमकीले लाल रंग में बदल देता है। अजोला का रंग बदल जाने पर “कोलोरोफिल’ कम हो जाता है तथा प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया ठीक प्रकार से नहीं हो पाती और अजोला के विकास की गति धीमी होने लगती है। अजोला उत्पादन को प्रभावित करने वाले वातावरण के कारक कारक अधिकतम एवं न्यूनतम सीमा तापमान 25 सेटीग्रेड- 30 सेंटीग्रेड प्रकाश 50% पूर्ण सूर्यप्रकाश आपेक्षिक आद्रता 65-80% जल सतह की गहराई 5-12 सेटीमीटर पी.एच. (अम्लता) 4-7.5 लवणता 90-150 मिग्रा. प्रति लीटर अजोला उत्पादन के संबंध में आमतौर पर पूछे जाने वाले प्रश्न अजोला उत्पादन हेतु किस तरह की फास्फोरस खाद प्रयुक्त की जानी चाहिए? अजोला उत्पादन हेतु मिट्टी में 30 पी.पी.एम. फास्फोरस की मात्रा होनी चाहिए। यदि मिट्टी परिक्षण से यह इंगित होता है कि फास्फोरस की मात्रा कम है तो 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मोनो अमोनियम फास्फेट या सुपर फास्फेट प्रति सप्ताह दिया जाना चाहिए। अजोला की संधारण क्षमता एवं प्रयोग के संबंध में कुछ जानकारी दें? अजोला प्रत्येक सात दिन में दुगुना हो जाता है। अजोला को पशु आहार के रूप में ताजा ही खिलाया जाना उचित है। ग्रीष्म ऋतु में अजोला की देखरेख कैसे की जाए? वातावरण का तापक्रम 35 सेटीग्रेड से अधिक होने पर अजोला का उत्पादन प्रभावित होने लगता है। ऐसे में अजोला के गड्ढों के ऊपर पौध नर्सरी हेतु प्रयुक्त नेट( जाली) का उपयोग छाया देने हेतु किया जा सकता है। दूसरे उपाय के तौर पर गड्ढे में पानी का स्तर कम कर, संतृप्त (सेचुरेटेड) मिट्टी पर अजोला उत्पादन ले सकते हैं। क्योंकि पानी की तुलना में सेचुरेटेड मिट्टी का तापमान कम होगा। स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार अज़ोला चारा – जानकारी एवं अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न