परिचय वर्तमान में पशुओं हेतु उपयोगी पोषक तत्वों की उपलब्धता को देखते हुए अजोला को दुधारू जानवरों, मुर्गियों व बकरियों के लिए अच्छा पोषण विकल्प कहा जा सकता है। कम समय में अधिक उत्पादन देने के अपने विशिष्ट गुण की वजह से यह हरे चारे का भी अच्छा स्रोत बन गया है वातावरण एवं जलवायु का अजोला उत्पादन पर विशेष प्रभाव न पड़ने की कारण इसका उत्पादन देवह के सभी हिस्सों में किया जा सकता है। किसान सामान्य मार्गदर्शन से ही स्वयं अजोला का उत्पादन कर अपनी आय दोगुनी कर सकते हैं। यहाँ यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि अजोला पशुओं के बाँझपन में भी कमी लाता है। अजोला बुनियादी तौर पर पानी पर तैरने वाला एक फर्न है। इसका जैव उर्वरक व पशु आहार के रूप में प्रयोग किया जाता है हमारे देश में इतनी तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या के पोषण के लिए दूध की मांग दिन – प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। दुधारू पशुओं के पोषण तथा स्वास्थ्य रख रखाव में हरा चारा एक महत्वपूर्ण स्रोत है। देश का दूध उत्पादन क्षेत्र हरे चारे पर निर्भर है। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि आज के वातावरण में चारे की कमी एक जटिल समस्या न बन गयी है। हमारे यहाँ जनसंख्या बढ़ने से चारा उत्पादन हेतु जमीन भी कम होती जा रही है। ऐसे में कम क्षेत्र में चारा उत्पादन की बढ़ती जनसंख्या है। अजोला में अन्य चारा घासों की तुलना में वार्षिक उत्पादन अधिक होता है। गाजीपुर जनपद में मुख्य चारा फसल बरसीम, बाजरा तथा लूसर्न व चरी का वार्षिक उत्पादन 200 मीट्रिक टन प्रति हे. से कम है, जबकि अजोला का वार्षिक उत्पादन 1000 मीट्रिक टन प्रति हे. है। अजोला में सभी आवश्यक पोषक तत्व पाए जाने के कारण गाय व भैंसों की वृद्धि व उत्पादन में यह सहायक है। यही नहीं किसान इसका उत्पादन आसानी से कर सकते हैं। शुद्ध प्रजाति का बीज इस्तेमाल कर समय – समय पर कटाई करने से इसका अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। भारत में पायी जाने वाली अजोला प्रजाति की लंबाई 2 से 3 सें. मी. पर ही करनी चाहिए। पशुओं को चारा देने से पूर्व अजोला को अच्छी तरह धोना चाहिए, क्योंकि गोबर से मिश्रित होने के कारण प्राय: जानवर इसको पसंद नहीं करते है। अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए गोबर का प्रयोग किया जाता है। सामान्य पी – एच 5 से 7 के बीच रखना चाहिए। सूर्य के प्रकाश की अच्छी उपलब्धता होनी चाहिए। उगने की विधि अजोला उगाने के लिए उपलब्ध कई तकनीकों में से नेशनल रिसोर्स डेवलोपमेंट विधि हमारे यहाँ प्रयोग की जा रही है। इस विधि में प्लास्टिक शीट की मदद से 2 x 2 x 0.2 मीटर पानी रखने हेतु क्षेत्र बनाते हैं। इसमें 10 से 15 किग्रा. गाय के गोबर खाद व 30 ग्राम सुपर फॉस्फेट के मिश्रण से भर देते हैं। पुन: पानी डालकर जल स्तर 10 सें. मी तक पहुँचा देते हैं। लगभग एक वृद्धि के कारण 10 से 15 दिनों में 500 से 600 ग्राम अजोला प्रतिदिन मिलना शुरू हो जाता है। पुन: 10 ग्राम सुपर फॉस्फेट, एक कि. ग्रा. गोबर प्रत्येक 5 दिन पर डालते हैं इसके अलावा आयरन, कॉपर, सल्फर आदि मिलाना चाहिए। इस विधि द्वारा प्रति किग्रा. अजोला चारा उत्पादन के लिए 65 पैसे से कम खर्च आता है। दूध उत्पादन हेतु अजोला चारा अजोला का उपयोग जानवरों में दूध की मात्रा व वसा प्रतिशत बढ़ाने में किया जा रहा है, क्योंकि इसके उत्पादन में खर्च कम आता है। अत: दिन – प्रतिदिन इसकी उपयोगिता बढ़ती जा रही है। अजोला पोषण से दूध उत्पादन 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ता है। इसका प्रयोग 60 ग्राम तक करने पर 10 प्रतिशत तक सांद्र आहार घटाया जा सकता है। संकर नस्ल की गाय में 2 किग्रा. सांद्र आहार की जगह 2 कि. ग्रा. अजोला खिलाते हैं, तो दूध उत्पादन तथा श्रम दोनों मिलाकर लगभग 35 से 40 प्रतिशत तक खर्च कम किया जा सकता है। अजोला को राशन के साथ 1:1 के अनुपात में सीधे पशुओं को दिया जा सकता है। इस तरह अगर हम देखें तो अजोला सही मात्रा में दुधारू पशुओं के दूध को बढ़ाता हा व कम खर्च से आमदनी बढ़ती है। इससे यदि किसान की संकर प्रजाति की गाय 10 लिटर दूध देने वाली है तो वह उसे सांद्र आहार 5.5 किग्रा. देगा। यदि आहार की कीमत 20 रूपये प्रति किग्रा. रखी जाये तो 110 रूपये प्रतिदिन का सांद्र आहार किसान अपने पशु को देगा। भूसा व अन्य खाद्य सामान्य रखा जाये तो इसमें लगभग 3 से 3.50 कि. ग्रा. सांद्र की जगह अजोला का प्रयोग किया जा सकता है, जिसकी कीमत 65 पैसे प्रति किग्रा. है तो अजोला का प्रयोग करने से उस पशु के लिए 3 रूपये खर्च आएगा। इस तरह 70 रूपये की जगह केवल लगभग 3 रूपये में दूध उत्पादन में लगभग 2 लीटर बढ़ोतरी होगी। इससे उसको कुल लाभ 2 लीटर दूध तह 70 रूपये का राशन व मजदूरी तीनों से ही होगा। इस तरह किसान अपनी आय दोगुनी से भी ज्यादा कर सकते हैं। पोषक तत्वों से भरपूर है अजोला अजोला में सभी आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध होते हैं। इसमें लगभग 25 से 30 प्रतिशत तक प्रोटीन पाया जाता है, जो की लाइसिन, अर्जिनिन व मेथियोनिन का प्रमुख स्रोत है। अजोला में कम मात्रा में लिग्निन होने के कारण पशुओं के शरीर में पाचन सरल ढंग से हो जाता है। पारंपरिक खाद यूरिया के स्थान पर अजोला के प्रयोग से उत्पादन में वृद्धि होती है। इसमें नाइट्रोजन 28 से 30 प्रतिशत, खनिज 10 से 15 प्रतिशत, बीटा कैरोटिन कैल्शियम मैग्नीशियम, पोटेशियम, फॉस्फोरस, ऑयरन, कॉपर भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। पोषक तत्वों की उपलब्धता के आधार पर अजोला को ग्रीन गोल्ड की संज्ञा भी दी जाती है। अजोला उपयोगिता अच्छे दूध उत्पादन के लिए जरूरी है कि कम खर्चे में दूध उत्पादन बढ़ाया जाये। इस दृष्टि से अजोला चारे के रूप में आसान, सस्ता व लाभकर है। हमारे यहाँ चारा उत्पादन के लिए मात्र 5.25 प्रतिशत भूमि उपलब्ध है। अजोला का उत्पादन अत्यंत ही सरल है, जिसे गाय, भैंस, बकरी, मच्छली, सुअर, मुर्गीपालन आदि में आसानी से उगाया जा सकता है। भारतीय परिवेश में ज्यादातर अजोला पिन्नाटा का उपयोग किया जाता है। बहुउपयोगी अजोला गायों में दूध उत्पादन क्षमता बढ़ाता है। मुर्गियों के लिए सबसे अच्छा चारा माना गया है। आसानी से रबी व खरीफ में उगाया जा सकता है। अजोला निश्चित सीमा तक रासायनिक उर्वरक का एक अच्छा विकल्प है। पशुओं में बाँझपन की दर को घटाता है। लेखन: धर्म प्रकाश श्रीवास्तव स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार