<p style="text-align: justify;">सेवण घास (लसियुरूस सिडीकुस) एक बहुवर्षीय घास है। यह पश्चिमी राजस्थान के शुष्क एवं अति शुष्क क्षेत्रों में जहां वार्षिक वर्षा 250 मि.मी. से कम होती है, वहां आसानी से पायी जाती है। इसमें जड़ तंत्रा अच्छा विकसित होता है, जिसकी वजह से यह सूखा सहन करने की क्षमता रखती है। यह कम वर्षा वाली रेतीली भूमि में आसानी से पनप जाती है। सेवण घास पशुओं के लिये बहुत पौष्टिक एवं पाचक होती है। इसको रेगिस्तान की घासों का राजा कहते हैं। सेवण घास का तना उध्र्व, शाखाओं से युक्त लगभग 1 मीटर तक लंबा, पत्तियां रेखाकार, 20 से 25 सें.मी. लंबी तथा पुष्प गुच्छ 10 सें.मी. लंबा होता है। इस घास को उगाकर शुष्क क्षेत्रों में सूखे व हरे चारे की कमी को कम किया जा सकता है। हरे चारे के लिए इसकी पुष्पण अवस्था सबसे उपयुक्त होती है। यदि भूमि में नमी होती है तो सेवण घास से लगातार कल्ले निकलते रहते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">सेवण घास सूखारोधी एवं कम व अधिक तापमान की स्थिति में भी सरलतापूर्वक वृद्धि करने में सक्षम होती है। इसके कारण यह रेगिस्तान में आसानी से उगाई जाती है। सेवण घास मुख्यतः राजस्थान के जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर, श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में पायी जाती है। </p> <h3 style="text-align: justify;">बुआई </h3> <p style="text-align: justify;">सेवण घास का चरागाह विकसित करने के लिए वर्षा का मौसम सबसे उपयुक्त रहता है। बरसात के मौसम में बोई गयी घास बहुत जल्दी भूमि में पनप जाती है। इसकी जल्दी-जल्दी बढ़वार होने से यह पशुओं को समय से उपलब्ध हो जाती है। इस घास की बुआई के लिए 5 से 7 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर के लिए पर्याप्त रहता है। बरसात के मौसम के अलावा पफरवरी-मार्च में भी इसका रोपण किया जा सकता है। बुआई के समय भूमि में नमी की उपलब्धता का विशेष महत्व है। पश्चिमी राजस्थान में मानसून की प्रथम वर्षा के तुरन्त बाद बुआई का समय उचित माना जाता है। बुआई के लिए बीज व खेत की गीली मिट्टी को 1:5 अनुपात में अच्छी प्रकार मिलाकर इस प्रकार बुआई करें, ताकि बीजों पर मिट्टी कम से कम आये। जहां मृदा कठोर हो, वहां बुआई से पूर्व खेत में आड़ी-तिरछी जुताई कर देनी चाहिए और खेत में से खरपतवार हटा देनी चाहिए। सेवण घास का बीज आकार में बहुत छोटा एवं हल्का होता है। सेवण घास की बुआई बीजों को छिड़ककर या पंक्तियों में की जा सकती है। यदि इसका चरागाह एक बार स्थापित हो जाता है तो यह कई वर्षों तक बना रहता है तथा मृदा कटाव को रोकने में भी सहायक होता है। इस घास से 50 से 75 क्विंटल सूखा चारा प्रति हैक्टर प्राप्त होता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">भूमि व जलवायु </h3> <p style="text-align: justify;">सेवण घास के लिए शुष्क जलवायु उत्तम मानी जाती है। यह घास उन क्षेत्रों में जहां वार्षिक वर्षा 250 मि.मी. से भी कम व तापमान अधिक होता है, आसानी से उगाई जा सकती है। सेवण घास की खेती वैसे तो सभी प्रकार की मृदाओं में की जा सकती है, किन्तु अच्छी पैदावार के लिए दोमट मृदा उपयुक्त होती है। </p> <h3 style="text-align: justify;">उन्नत किस्में </h3> <p style="text-align: justify;">गुणवत्तापूर्ण चारा लेने के लिए अच्छी किस्मों का चयन करना चाहिये। काजरी, जोधपुर द्वारा विकसित की गई काजरी-305, काजरी-317 व काजरी-319 किस्में उपयुक्त पाई गई हैं।</p> <p style="text-align: justify;"> <img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownload.jpg" width="195" height="323" /></p> <h3 style="text-align: justify;">उर्वरक प्रबंधन </h3> <p style="text-align: justify;">सेवण घास की अच्छी फसल के लिए 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन व 20 कि.ग्रा. फॉस्फोरस प्रति हैक्टर ;चार बीघाद्ध की दर से देना उपयुक्त रहता है। 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन को प्रति हैक्टर की दर से खेत में बुआई के समय देना चाहिये। देसी सड़ी गोबर की खाद आठ से दस टन प्रति हैक्टर की दर से देने पर इसकी बढ़वार अच्छी होती है। </p> <h3 style="text-align: justify;">चारा कटाई </h3> <p style="text-align: justify;">सेवण घास को खेत में लगाने के 90 दिनों बाद प्रथम कटाई अगस्त के अंत में तथा दूसरी नवंबर में उपयुक्त रहती है। शीतकालीन वर्षा होने पर तीसरी कटाई मार्च-अप्रैल में करनी चाहिए। सिंचाई की सुविधा होने पर चौथी कटाई जून के अंत में की जा सकती है। चारा घास लगाने के बाद पहले वर्ष में खेत में पशुओं को नहीं चराना चाहिये। प्रथम वर्ष में खेत से घास काटकर खिलाना ही अच्छा रहता है। सेवण घास का सूखा चारा अधिक मात्रा में प्राप्त करने के लिए चारे की वर्षभर में तीन से चार कटिंग की जा सकती है। वर्षा के अनियमित एवं अल्प मात्रा में होने के कारण पैदावार कम हो सकती है। दूसरे वर्ष से नियंत्रित चराई, एकांतर चराई या बाधित चराई पद्धति से चराई होनी आवश्यक है। घास की चराई करवाते समय खेत के एक हिस्से की घास को बीज उत्पादन के लिए रखना लाभप्रद रहता है। सेवण घास को एक बार लगाने के उपरांत 10 से 15 वर्षों तक संरक्षित रखा जा सकता है। इस प्रकार बार-बार बुआई पर आने वाले खर्चे को कम किया जा सकता है। </p> <h3 style="text-align: justify;">उपज </h3> <p style="text-align: justify;">इसका उत्पादन वषार्, भूमि की स्थिति व चराई-कटाई प्रबंधन पर निभर्र करता है। अच्छी उपजाऊ, रेतीली भूमि व सामान्य वर्षा में सेवण घास से 100 क्विंटल/हैक्टर तक सूखा चारा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। वर्षा की विषमता एवं कम वर्षा की स्थिति में इसकी औसत उपज 35 से 40 क्विंटल/हैक्टर सूखा चारा एवं 20 से 25 कि.ग्रा./हैक्टर अनुकूल स्थिति में बीज का उत्पादन होता है। इसकी बीज उत्पादन क्षमता 250 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर तक होती है।</p> <p style="text-align: justify;">पोषक तत्वों से भरपूर यह घास शुष्क क्षेत्र के पशुओं का मुख्य चारा है। सेवण घास के चारे में अन्य घासों के चारे की अपेक्षा स्ट्रार्च व प्रोटीन भी अधिक मात्रा में पाई जाती हैं। इसमें 10 से 12 प्रतिशत कच्ची प्रोटीन व 30 से 35 प्रतिशत रेशा पाया जाता है।</p> <p style="text-align: justify;">पशुओं के लिये उपयोगिता सेवण घास का चारा उच्च गुणवत्तायुक्त होता है। यह घास गाय के लिये सबसे अधिक पौष्टिक एवं उपयुक्त है। यह ग्रामीण क्षेत्रों के आसपास पाये जाने वाले चरागाहों में आसानी से दिखाई दे जाती है। गाय के अलावा यह घास भैंस, ऊंट, भेड़ व बकरी भी बहुत पसंद करते हैं। भेड़ व बकरी पुष्पन के समय इसे बड़े चाव से खाती हैं। यदि सेवण घास ज्यादा मात्रा में उपलब्ध हो तो किसान इसको ‘हे’ के रूप में संरक्षित कर सकते हैं। इसको सूखा चारा के नाम से या सेवण कुत्तर के नाम से पश्चिम राजस्थान में जाना जाता है। परिपक्व अवस्था में इस घास का तना कठोर हो जाता है, जिसको पशु कम पसंद करते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), राम निवास,विषय विशेषज्ञ(पशुपालन), चारू शर्मा, विषय विशेषज्ञ(गृह विज्ञान प्रसार), सुनील कुमार शर्मा विषय विशेषज्ञ(प्रसार शिक्षा), चंद्र प्रकाश मीणा, सहायक आचार्य (उधान विज्ञान), और साकेत कुशवाह कृषि विज्ञान केन्द्र (स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय) पोकरण-345021(जैसलमेर) और कुलपति, राजीव गांधी विश्वविद्यालय (अरुणाचल प्रदेश)</p>