बकरियां गरीब, सीमांत या छोटे किसानों के लिए बहुत कम आदानों के साथ उनकी आजीविका में अच्छा समर्थन देती हैं। ये किसी भी समय दूध/मांस/पैसा के रूप में अपने पालक की तत्काल आवश्यकता को पूरा करती हैं। इनका दूध पौष्टिक गुणों के साथ शिशुओं और वृ) लोगों के लिए उपयुक्त होता है। बकरी का मांस कोमल होता है और दुनियाभर में खाया जाता है। ये जितनी बड़ी और स्वस्थ होंगी, उतने ही ज्यादा मांस की मात्रा मिलेगी। बकरी की त्वचा, रेशा/बाल, समान रूप से महत्वपूर्ण उत्पाद हैं। नर बकरियां पहाड़ों के दुर्गम क्षेत्रों में भार ले जाने के लिए अच्छी वाहक होती हैं। इन पशुओं का उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों के लिए भी किया जाता है। बकरी एक बहु उपयोगी पशु है, जो अपने पालकों के लिए आय का एक उत्तम साधन है। पशुपालन और कृषि पर निर्भर किसानों के लिए ये आपदा के समय बीमा के रूप में काम आती हैं। बकरी पालन कृषि प्रणाली का एक अभिन्न अंग है। घरेलू बकरी व्यापक रूप से एक छोटी जुगाली करने वाली प्रजाति है। यह मुख्य रूप से छोटे व भूमिहीन किसानों द्वारा उत्पादन की विस्तृत, अर्द्ध गहन, गहन प्रणालियों के अंतर्गत रखी जा सकती है। बहुत कम आदानों के साथ कोई भी व्यक्ति बकरी पालन से आजीविका के लिए पर्याप्त लाभ कमा सकता है। यह एक ऐसा मित्रवत पशु है, जिसे किसी भी उम्र का व्यक्ति (पुरुष/ महिला) आसानी से काबू कर सकता है। बकरियों का वैश्विक वितरण खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ वर्ष 2019) के अनुसार 2017 में डेरी बकरी की कुल आबादी विश्व में 218 मिलियन थी। बकरी आबादी का अनुपात विभिन्न महाद्वीपों में 52 प्रतिशत एशिया, 39 प्रतिशत अफ्रीका, 5 प्रतिशत यूरोप, 4 प्रतिशत अमेरिका और एक प्रतिशत ओशिनिया में था। पिछले एक दशक इसमें लगभग 22 प्रतिशत की कुल वृद्धि हुई है। अफ्रीका में 32 प्रतिशत, एशिया में 19 प्रतिशत, ओशिनिया में 3 प्रतिशत वृद्धि तथा यूरोप और अमेरिका में 0.9 प्रतिशत और 0.7 प्रतिशत की मामूली गिरावट दर्ज की गई। भारत में बकरियों की आबादी 148.88 मिलियन आंकी गई है, जो पिछली गणना की तुलना में 10.14 प्रतिशत अधिक है। दुग्ध देने की क्षमता दुनियाभर में 300 से अधिक बकरी की नस्लें उपलब्ध हैं। वैसे तो सभी बकरियां कुछ न कुछ दूध की मात्रा देती हैं, लेकिन मांस के लिए पाली बकरियों का दूध नहीं दुहा जाता। दुग्ध उत्पादक नस्लों में फ्रांस की अल्पाइन, अमेरिका की लमंचा और गुरेंसी, इंग्लैंड की कीन्युबियन, स्विट्जरलैंड की सानेन, तोगेनबग, सेबल एंव ओबेरशली और अफ्रीका की नाइजीरियाई ड्वार्फ हैं। भारत में बकरी की पंजीकृत नस्लों की संख्या 34 है (NBAGR,वर्ष 2019), जिसमें दूध उत्पादन के लिए ज्ञात नस्लें जमनापारी, जखराना, बीटल और सुरती हैं। अल्पाइन बकरी औसत वसा 3.5 प्रतिशत के साथ 1-2 गैलन दूध प्रतिदिन उत्पादन कर सकती है। लमंचा बकरियां 4.2 प्रतिशत वसा के साथ दूध की अच्छी मात्रा देती हैं। न्यूबियन बकरी 5 प्रतिशत वसा के साथ 0.5-1.5 गैलन प्रतिदिन दूध दे सकती है। सानेन प्रतिदिन 2.5-3.0 प्रतिशत वसा वाला 1 गैलन तक दूध दे सकती है। टोगेनबर्ग बकरियां 3.3 प्रतिशत वसा के साथ दुग्ध का उत्पादन करती हैं। ओबेरहाली बकरियों का एक दिन में दुग्ध उत्पादन 0.5-3.6 प्रतिशत वसा के साथ 1.5 गैलन हो सकता है। नाइजीरियाई ड्वार्फ बकरियों के दूध की मात्रा कम परन्तु बटरफैट अच्छी मात्रा (6.1 प्रतिशत) में होता है। सेबल बकरियां आमतौर पर 3-4 प्रतिशत वसा वाले दुग्ध का उत्पादन करती हैं। गुरेंसी बकरी 3.72 प्रतिशत वसा वाले 3.0 कि.ग्रा. तक दुग्ध का उत्पादन कर सकती है। मांस उत्पादन के लिए बकरी के मांस को अधिकांश स्थानों में पोषण का एक अच्छा स्त्रोत माना जाता है। मांस उत्पादन के लिए बकरी की लोकप्रिय नस्लें स्पेन की स्पैनिश व्रता, दक्षिण अफ्रीका की बोअर औप कालाहारी, आस्ट्रेलिया की रेंजलैंड, न्यूजीलैंड की किको, इंग्लैंड की न्यूबियन, अमेरिका की मायोटोनिक तथा भारत की ब्लैकबंगाल हैं। बोअर बड़े आकार के कारण मांस उत्पादन के लिए सबसे लोकप्रिय नस्लों में से एक है। ये रोग प्रतिरोधी हैं और अक्सर प्रजनन के लिए प्रयोग में लायी जाती हैं। रेंजलैंड बकरियां मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया से हैं। उद्योग में 90 प्रतिशत बकरी का मांस इन्हीं बकरियों से आता है। कालाहारी(कालाहारी लाल) ज्यादातर दक्षिण अफ्रीका में रहती हैं। इनका मांस पतला और कोमल होता है। किको न्यूजीलैंड में वर्ष 1980 के दशक में बनाई गई मांस बकरी की एक अनुकूल नस्ल है। यह नस्ल जंगली बकरियों को एंग्लो-न्यूबियन बकरियों, सानेन बकरियों और टोगनबर्ग बकरियों के साथ प्रजनन द्वारा विकसित की गई है। ये बकरियां कम रखरखाव वाली हैं और अधिकांश परिस्थितियों में जीवित रह सकती हैं। कीको बकरी की विशेषताओओं में अधिक वजन, अच्छी प्रजनन क्षमता, बेहतर दुग्ध उत्पादन, दुबला मांस और अच्छा खुर शामिल हैं। किकोनर का वजन 175 पाउंड तक हो सकता है। कभी-कभी इनका विशेष रूप से अधिक मांस प्राप्ति के लिए बड़े बकरे पाने के लिए बोअर्स के साथ प्रजनन करवाया जाता है। मायोटोनिक बकरी, मासं बकरियों की छोटी नस्लों में से एक है। मायोटोनिक बकरियों को बेहोशी बकरियों के रूप में भी जाना जाता है। जब ये बकरी डर जाती हैं या उत्तेजित होती हैं तो कुछ क्षणों के लिए बेहोशी की हालत में चली जाती हैं। इस वंशानुगत स्थिति को मायोटोनिया कांगेनिटा कहा जाता है। यह स्वैच्छिक मांसपेशियों का 15-20 सेकंड के लिए सिकुड़न के कारण संतुलन बिगड़ने पर होता है। इसमें वास्तव में बकरियां पूरी तरह से बेहोश न होकर सचेत रहती हैं। ब्लैक बंगाल भारत और बांग्लादेश में पाई जाने वाली अच्छी प्रजनक बकरियां हैं, जो वर्ष में दो बार 2-3 मेमनों को जन्म दे सकती हैं। यह बकरी एक बार में 11 कि.ग्रा. मांस का उत्पादन कर सकती है। वेरटा बकरी मुख्य रूप से अपनी अद्वितीय मुड़े सींगों के लिए जानी जाती है। उचित परिस्थितियों के तहत, वेरटा बकरी हर दो वर्ष में तीन मेमने दे सकती है। दुग्ध उत्पादन दूध, बकरियों से प्राप्त एक महत्वपूर्ण उत्पाद है। अधिक विशेषज्ञता और व्यावसायीकरण के कारण यूरोप में कुल बकरियों की केवल 5 प्रतिशत आबादी द्वारा 15 प्रतिशत दुग्ध का उत्पादन होता है। नीदरलैंड 798.4 किग्रा. प्रति बकरी प्रतिवर्ष दुग्ध उत्पादन में शीर्ष पर है। इसके बाद फांस (686.6 किग्रा.), स्पेन (352.1 कि.ग्रा.) और इजरायल (304.8 कि.ग्रा.) हैं। पिछले एक दशक (वर्ष 2007 से वर्ष 2017) के दौरान, एशिया में बकरियों के दुग्ध उत्पादन (22 प्रतिशत) में सबसे अधिक वृद्धि हुई है। इसके बाद अफ्रीका (13 प्रतिशत), ओशिनिया (9 प्रतिशत), अमेरिका (5 प्रतिशत) और यरूापे (4 प्रतिशत) का स्थान है। मांस उत्पादन में एशिया का योगदान लगभग 71 प्रतिशत है। इसके बाद अफ्रीका (24 प्रतिशत), अमेरिका (2.53 प्रतिशत), यूरोप (2.22 प्रतिशत), ईयू (1.65 प्रतिशत) और ओशिनिया (0.51 प्रतिशत) आते हैं। उपयोगिता बकरियों को मुख्य रूप से मांस, दूध और बाल/रेशा के लिए पाला जाता है। ये अपने उत्पादों और उप-उत्पादों के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान देते हुए रोजगार भी पैदा करती हैं। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब और कमजोर वर्गों के लगभग 15 मिलियन परिवार बकरियां पाल रहे हैं। बकरियों से विभिन्न प्रकार की उपज का अनुमानित मूल्य लगभग 2612 मिलियन/वर्ष है। यहां चमड़े के उत्पादन की गुणवत्ता कई अन्य बकरी की खाल निर्यातक देशों की तुलना में बेहतर है। बकरियों के दुग्ध के उत्पाद को निर्यात भी किया जाता है।बकरियां चलती-फिरती संपत्ति हैं, जिन्हें संकट के समय आसानी से भुनाया जा सकता है। इसलिए इन्हें चलता-पिफरता ‘एटीएम’ (किसी भी समय दूध/पैसा/मांस) या मूविंग रेप्रिफजिरेटर भी कहा जाता है। भारत में बकरी का दूध देश के कुल दुग्ध उत्पादन का 3 प्रतिशत है। जमनापारी और जखराना भारत की अच्छी दुधारु नस्लें हैं जिनसे 4.5 लीटर प्रतिदिन तक दूध प्राप्त कर सकते हैं। बीटल, सुरती, गोहिलवाड़़ी दुधारू बकरी की अन्य नस्लें हैं। बकरी के दूध का औषधीय महत्व भी है। यह आसानी से पचने वाले छोटे वसा ग्लोब्यूल्स के कारण तथा वसा, प्रोटीन, खनिज और इम्यूनोग्लोबुलिन की पर्याप्त मात्रा वाला होता है (वर्मा, वर्ष 2018)। बकरी का दूध बच्चों और वृ) लोगों के लिए एक संपूर्ण भोजन है। बेहतर प्रबंधन से दुग्ध उत्पादन में सुधार किया जा सकता है। दुधारू बकरियों से प्राप्त दूध की मात्रा 3-4 सदस्यों के परिवार के लिए पर्याप्त होती है। इसके दूध से बना पनीर एक स्वादिष्ट और अच्छी आय देने वाला व्यंजन है। मांस उत्पादन बकरी के मांस को शेवान कहा जाता है। यह 76.8 प्रतिशत पानी, 2.6 प्रतिशत वसा, 19.6 प्रतिशत प्रोटीन और 1 प्रतिशत खनिजों से बना होता है। वसा और उच्च प्रोटीन की तुलनात्मक रूप से कम मात्रा के कारण बकरी का मांस स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माना जाता है। शेवान की लगातार बढ़ती मांग के कारण, बकरी पालन हमेशा एक महत्वपूर्ण उद्यम बना हुआ है। बकरी के मांस का स्थानीय स्तर पर ज्यादा उपभोग किया जाता हैं। फाइबर उत्पादन पश्मीना, लेह लदाख में पाई जाने वाली चांगथांगी बकरी की नस्ल से प्राप्त किया जाता है। गद्दी, चेगू, सुमी-ने अन्य ठंडे क्षेत्र की भारतीय बकरियों की नस्लें हैं। ये महीन के साथ-साथ मोटे पफाइबर भी देती हैं। बकरियों से प्राप्त लंबे बालों का उपयोग गहने, वस्त्र और हथियारों के सौंदर्यीकरण के लिए किया जाता है। मांस की उपलब्धता प्रति व्यक्ति/वर्ष एशिया में 0.88, अप्रफीका में 1.19 और ओशियाना में 0.73 कि. ग्रा है तथा अन्य महाद्वीपों में यह काफी कम है। विभिन्न वर्गों के अधिकांश लोग शेवान को पसंद करते हैं, जिससे बकरे के मांस की मांग हमेशा बढ़ती रहती है। भारत में कुल मांस उत्पादन में बकरियों का योगदान 433 मिलियन कि.ग्रा. (37 प्रतिशत) है। विश्व में बकरी मांस उत्पादन में 41.66 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिसमें एशिया का 70.7 प्रतिशत और अप्रफीका का 24 प्रतिशत का योगदान हुआ। बकरी मांस उत्पादन में अग्रणी देश चीन है, जो कुल विश्व बकरी मांस का 35.89 प्रतिशत उत्पादन करता है। बकरी का चमड़ा वर्ष 1990-2012 की अवधि में दुनियाभर में बकरी के कच्चे चमड़े का उत्पादन ओशिनिया में अधिक वृद्धि के साथ 44.93 प्रतिशत बढ़ा। बकरी की खाल का बड़ा उत्पादक चीन है, उसके बाद भारत, जॉर्डन और पाकिस्तान हैं। जीवित पशुओं की बिक्री बकरियों में एक से अधिक मेमनों को जन्म देने की क्षमता होती है। दो वर्ष की अवधि में बकरी तीन बार मेमने दे सकती है। अन्य पशुओं को पालने की तुलना में बकरी पालन में जीवित पशुओं को बेचकर जल्दी आय अर्जित की जा सकती है। धार्मिक उद्देश्य के लिए परंपराओं या त्योहारों के लिए बकरे की जरूरत होती है। देश के कई हिस्सों में बकरों को देवी-देवताओं के लिए प्रतिब)ताओं को पूरा करने के लिए बलिदान किया जाता है। परिवहन के लिए हिमालयन और पहाड़ों के दुर्गम क्षेत्रों में जहां परिवहन के लिए सड़क संपर्क नहीं हैं, माल ढोने के लिए पहाड़ी बकरियों का उपयोग किया जाता है। स्त्राेत : खेती पत्रिका( भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद,आईसीएआर) एन.के. वर्मा ’प्रधान वज्ञैानिक, भाकृअनपु-राष्ट्रीय पशु आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो, करनाल-132001 (हरियाणा)