<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify;">परिचय</h3> <p style="text-align: justify;">पशुधन की उत्पादकता को बढ़ाने में सहायता प्रजनन एक महत्वपूर्ण साधन है था कृत्रिम वीर्यरोपण सहायता प्रजनन का एक अभिन्न अंग है, लेकिन कृत्रिम गर्भाधान की सफलता अनेक कारकों पर निर्भर करती है जैसे की उचित नर व मादा एवं वीर्य रोपण के लिए निपुण व्यक्ति का चुनाव, वीर्यरोपण के लिए सही समय का चुनाव, वीर्य की उर्वरता की जांच व गर्भवती मादा का उचित रखरखाव। इन कारणों की अपर्याप्त जानकारी से गर्भाधान दरों में कमी आ सकती है। असफल गर्भाधान से कृषकों को भारी आर्थिक क्षति पहुंचती है। अत: निम्नलिखित जानकारी सहायता प्रजनन की सफलता व कृषकों की आमदनी को बढ़ा सकती है।</p> <p style="text-align: justify;">जानवरों में वीर्यरोपण सिर्फ मदकाल के दौरान ही करना चाहिए। यही नहीं यह भी सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि वीर्यरोपण में प्रयुक्त होने वाले वीर्य के गुणवत्ता की जांच प्रयोगशाला में की गई हो। सरल मानकों द्वारा वीर्य के गुणवत्ता की जांच की जा सकती है। मदकाल के दौरान मादा विशेष लक्षण दर्शाती है जिससे उसके मदकाल में होने का पता चलता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">भैसों में मदकाल के दौरान प्रकट होने वाले लक्षण</h3> <ol style="text-align: justify;"> <li>मादा को भूख ना लगना</li> <li>पशु का रांभना</li> <li>मादा का विचलित व अधीर होना</li> <li>मादा का रुक-रुक कर मूत्र विसर्जन करना</li> <li>मादा की योनि में सुजन व गाढ़े सफेद रंग का स्राव</li> <li>मादा का पूंछ ऐंठना</li> <li>मादा का दूसरे पशुओं के साथ आलंबन।</li> </ol> <p style="text-align: justify;">मादा के मदकाल में होने का पता टीजर बैल से भी लगाया जा सकता है। टीजर बैल को मादा के पास ले जाने पर वह विशेष लक्षण दर्शाता है। टीजर बैल मादा के व्यवहार के आधार पर मादा के मदकाल में होने का पता चल जाता है।</p> <p style="text-align: justify;">टीजर बैल से मदकाल दर्शाती मादा की पहचान</p> <ol style="text-align: justify;"> <li>बैल का मादा के पुट्ठे पर ठुड्डी रखना</li> <li>बैल का फ्लेह्मन प्रतिक्रया दर्शाना</li> <li>बैल का मादा के साथ आलंबन</li> </ol> <p style="text-align: justify;">एक बार मादा की मदकाल में सही पहचान हो जाए तो दूसरा महत्वपूर्ण कार्य वीर्यरोपण में निपुण व्यक्ति का चुनाव है। पर जो बात सबसे ज्यादा ध्यान देने योग्य है वह यह कि वीर्यरोपण के लिए अच्छे वीर्य का प्रयोग हो। प्रयोगशाला में हिमीकृत वीर्य का गुणनिर्धारण गुनगुने पानी (37 डिग्री सेल्सियस) में 45 से 60 सैकेंड तक पिघला कर सरल मानकों द्वारा किया जा सकता है। शुक्राणुओं की प्रगामी गतिशीलता, जिव्यता तथा प्लाविका झिल्ली की अखंडता उसकी उर्वरता से सहसंबंधित है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कृत्रिम वीर्यरोपण में उपयुक्त होने वाले वीर्य की उर्वरता की जांच</h3> <ol style="text-align: justify;"> <li>वीर्य में शुक्राणुओं की गतिशीलता लगभग 40 प्रतिशत या उससे अधिक होनी चाहिए।</li> <li>शुक्राणुओं की गतिशीलता प्रगामी होनी चाहिए।</li> <li>शुक्राणुओं की प्लाविका झिल्ली अखंडित होनी चाहिए।</li> <li>शुक्राणुओं में वीर्यरोपण के समय धारिता की दर कम होनी चाहिए।</li> <li>शुक्राणुओं में धारिता को प्राप्त करने की क्षमता की जांच (भैसों के ताजा स्खलित वीर्य में 6 घंटे तथा हिमीकृत वीर्य में 4 घंटे) ।</li> </ol> <p style="text-align: justify;">मादा जननंगों की जानकारी व वीर्यरोपण की सही जगह भी गर्भाधान दर को सुनिश्चित करती है वीर्यरोपण मादा के गर्भाशय में ही होनी चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">हिमीकरण</h3> <p style="text-align: justify;">हिमद्रवण प्रक्रिया शुक्राणुओं में ऊनघातक क्षति पहुंचाती है। अंडपित्त युक्त वीर्य विस्तारक में ये क्षति ज्यादा होती है तथा जीवाणुओं और विषाणुओं से होने वाली बीमारियों का खतरा भी होता है जबकि सोयाबीन दूध युक्त वीर्य विस्तारक में यह क्षति तुलनात्मक कम होती है। सोयाबीन दूध, सोयाबीन से बनाया जाता है और पौधे से निर्मित होने के कारण ये जीवाणुओं और विषाणुओं से होने वाली बीमारियों के खतरे को भी टालता है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार।</p> </div>