देश में सौर ऊर्जा उत्पादन करने और उसके इस्तेमाल की क्षमता को देखते हुए पिछले कुछ वर्षों से इस क्षेत्रा में काफी काम शुरू हुआ है। वर्तमान में भारत के 15 राज्यों में सोलर ऊर्जा की पॉलिसी है। सबसे पहले वर्ष 2009 में गुजरात ने अपनी सोलर पॉलिसी लॉन्च की थी। यह सोलर पॉलिसी कई राज्यों के लिए मॉडल बनी और अब गुजरात का एक गांव और यहां के किसान, देश के अन्य सभी गांवों और किसानों के लिए सौर ऊर्जा के सही इस्तेमाल पर एक अनोखा मॉडल प्रस्तुत कर रहे हैं। दुग्ध क्रांति का केन्द्र रहा गुजरात का आणंद जिला अब ऑरेंज रिवोल्यूशन (सोलर एनर्जी क्रांति) का केंद्र बन गया है। यहां सिर्फ सरकारी और निजी स्तर पर सोलर पार्क ही नहीं विकसित हो रहे हैं, बल्कि खेती करने वाले लोग भी अब सोलर फार्मर बन गए हैं। इसकी शुरुआत आणंद जिले में थामणा गांव के रहने वाले 45 वर्षीय किसान श्री रमण परमार ने की है। गुजरात के खेड़ा जिले में स्थित ढूंडी गांव में विश्व की पहली सौर सिंचाई सहकारी समिति 'ढूंडी सौर ऊर्जा उत्पादक सहकारी मंडली' का गठन हुआ है। यहां के किसान सौर ऊर्जा से प्राप्त बिजली से खेती करने के साथ ही अतिरिक्त बिजली बेचकर कमाई भी कर रहे हैं। श्री रमण परमार कुछ साल पहले तक अपने 12 बीघा खेत में फसलों को सिंचित करने के लिए एक डीजल पंप का इस्तेमाल किया करते थे, जिसमें ईंधन पर 500 रुपये प्रतिदिन खर्च होता था। पिछले वर्ष मार्च में उन्होंने एक सौर ऊर्जाचालित सिंचाई पंप स्थापित किया और चार महीनों के भीतर ही इससे अपनी पहली पफसल का उत्पादन किया। उन्होंने सोलर पैनल से उत्पादित बिजली को बेचकर 7,500 रुपये भी कमाए हैं। खेत में सोलर पैनल लगाने वाले श्री रमण परमार के मुताबिक वे अपने खेत की सिंचाई साेलर पैनल से प्राप्त ऊर्जा से करते हैं। सरकारी बिजली आपूर्ति पर अब उनकी निर्भरता खत्म हो गई है। श्री परमार जी देश के पहले सोलर फार्मर हैं। उनसे प्रेरित होकर, आणंद जिले से लगभग 35 किमी दूर ढूंडी गांव में छह किसानों ने विश्व की पहली सौर सिंचाई सहकारी समिति 'ढूंडी सौर ऊर्जा उत्पादक सहकारी मंडली' का गठन किया है। इस सहकारी मंडली के सचिव श्री प्रवीण परमार ने बताया, 'दो महीने के भीतर, हम में से छह किसानों ने सोलर पंप द्वारा सिंचाई के बाद सोलर पैनल से उत्पन्न अतिरिक्त 5,000 किलोवॉट बिजली को मध्य गुजरात विज कंपनी लिमिटेड (एमजीवीसीएल) को बेचा है।' एक गैर-लाभकारी वैज्ञानिक अनुसंधान संगठन, अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान (आईडब्ल्यूएमआई) किसानों को सौर ऊर्जा से बिजली प्राप्त करने के लिए लगातार प्रोत्साहित करता रहा है। इसके साथ ही वह किसानों को सौर ऊर्जा के लाभ के बारे में जागरूक भी कर रहा है। उदाहरण के तौर पर यह संगठन श्री रमण परमार की सफलता की कहानी किसानों से साझा कर रहा है। एक किसान को 8 किलोवॉट की सौर ऊर्जा उत्पादन प्रणाली को स्थापित करने के लिए लगभग 80 वर्गमीटर भूमि की आवश्यकता होती है। यह प्रणाली एक किसान को 4.63 रुपये प्रति किलोवॉट पर अतिरिक्त सौर ऊर्जा को ग्रिड से बाहर निकालने की अनुमति देती है, जब वह अपने 7.5 एचपी सिंचाई पंप को चलाने के लिए बिजली का उपयोग नहीं कर रहा होता है। सौर ऊर्जा से किसानों को अतिरिक्त आमदनी श्री प्रवीण परमार ने बताया कि पहले जब हम डीजल पंपों पर निभर्र थे, तब हम एक दिन में 500 रुपये से लेकर 700 रुपये तक डीजल पर खर्च करते थे। अब हमारे खेतों को सिंचित करने के लिए शून्य लागत है, पानी मुफ्त में उपलब्ध है और हमें प्रतिदिन 200 से 250 रुपये की अतिरिक्त आय मिलती है। उन्होंने बताया कि पहले जो किसान मानसून के पानी पर निर्भर रहकर केवल धान की फसल उगाते थे, अब वे सौर ऊर्जा की मदद से कई फसलें उगाते हैं। क्योंकि वे सिंचाई के लिए मानूसन के पानी पर निर्भर नहीं हैं। अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबधंन संस्थान, जो मध्य गुजरात विज कंपनी लिमिटेड (एमजीवीसीएल) और गुजरात एनर्जी रिसर्च एंड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के साथ काम करता है, का अनुमान है कि एक सोलर पंप एक वष र्में एक चाैथाई हेक्टेयर क्षेत्रफल में एक वर्ष में 65,000 रुपये मूल्य की 13,000 यूनिट बिजली पैदा कर सकता है। इस तरह दस मिलियन सौर किसान 130 बिलियन यूनिट सारै ऊर्जा का उत्पादन करके प्रतिवर्ष 65,000 करोड़ रुपये की शुद्ध कमाई कर सकते हैं। स्त्राेत : खेती पत्रिका(नंबवर