पांच सितारा होटलों की शोभा बिखेरती हैं केर, सांगरी व कुंमट की सब्जी। इसमें काचरी व अमचुर का मेल बेहद निराला होता है। कोई राजस्थान की शाही सब्जी की बात करे तो समझ लीजिए वह सांगरी व कुंमट की बात कर रहा है। प्रसंस्करित ग्वारपफली बेमौसमी सब्जियों की अहसास दिलाती है। राजस्थान का सुप्रसिद्ध पंचकुट इन्हीं से बनता है। शीतला सप्तमी के बास्योड़ा का दारोमदार इन्हीं सब्जियों पर निर्भर है। गांवों में महिला किसान, खेतिहर महिला श्रमिक, घर-परिवार संभालने वाली कुशल गृहणी आदि कई बहुमुखी भूमिकाओं में देखी जा सकती हैं। इसके अलावा ये अपने हुनर से कृषिगत सहायक उद्यमों के साथ-साथ बागवानी, सब्जी उत्पादन, उपज बिक्री, प्रसंस्करण आदि के कार्य बखूबी से कर रही हैं। प्रसंस्करण एक ऐसा विषय है, जिसमें महिलाओं की सक्रिय भूमिका आवश्यक है। महिला सशक्तिकरण के लिए कृषक महिलाओं को इसके लिए और अधिक प्रशिक्षित व प्रेरित किया जाना बेहद जरूरी है। राजस्थान के रेगिस्तान व अर्द्ध रेगिस्तानी जिलों में वर्तमान में बेर, खजूर, अनार आदि की बागवानी का विस्तार हो रहा है। पश्चिमी राजस्थान की महिलाओं द्वारा परंपरागत विधि 'सुखाना' ग्रामीण रोजगार की दृष्टि से बहुत ही लाभदायक साबित हो सकती है। केर, सांगरी, कुंमट, काचरी आदि उत्पादों को पानी के साथ उच्च तापमान पर उबालकर सूर्य की धूप में सुखाया जाता है। फिर इनकी नमी की दर की जांच करके पैकिंग की जाती है। धूप में सुखाने की यह विधि कोई नई नहीं है। हमारे पुरखों द्वारा काम में ली जाने वाली प्रसंस्करण की यह लोकप्रिय विधि है। इसे गांवों में प्रत्येक महिला द्वारा उपयोग में लाया जाता रहा है। महिलाओं को प्रसंस्करित उत्पादों की अच्छी पैकिंग व बाजार में भेजने तक की प्रक्रियाओं के लिए प्रशिक्षित किया जाना जरूरी है। सांगरी का प्रसंस्करण सांगरी राजस्थान के परंपरागत पंचकूट का अभिन्न हिस्सा है। भाकृअनुप-केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीकानेर द्वारा तैयार थारशोभा खेजड़ी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ग्रामीण महिलाओं की किस्मत बदल सकती है। राजस्थान के राजकीय पेड़ खेजड़ी से हरी अवस्था में फलियां प्राप्त होती हैं, इन्हें सांगरी कहते हैं। सांगरी को दाना पकने से पूर्व की अवस्था में काटकर पानी के साथ उच्च ताप पर नमक डालकर उबाला जाता है। उबलकर सांगरी गलने लगती है, पिफर इसे एक जाली में पानी सहित उड़ेलकर पानी को अलग किया जाता है। इसके बाद कपड़े या ओढ़नी पर इसे सूर्य की धूप में सुखा देते हैं। दो-तीन दिनों तक सूखने पर यह सखत हो जाती है, वह काले-भूरे रंग में कुरकुरी बन जाती है। इसके बाद इसे मसल कर बारीक टुकड़े बनाकर पैकिंग कर दिया जाता है। सांगरी का बाजार भाव 900 से 1000 रुपये प्रति कि.ग्रा. है। एक खेजड़ी के पेड़ से सालाना 4-5 हजार की सांगरी मिल जाती है। यदि अपने खेत में 50 खेजड़ी के पेड़ हों तो सालाना 2 लाख से ऊपर की आमदनी बिना किसी खर्च से होने की गुंजाइश है। केर, कुंमट और सांगरी की सब्जी में काचरी या अमचूर का मेल बेहद स्वादिष्ट होता है। राजस्थान में इसे शाही सब्जी भी कहते हैं। आजकल यह सब्जी घरों से निकलकर पांच सितारा होटलों की शोभा बिखेरती नजर आ रही है। केर का प्रसंस्करण केर का अचार राजस्थान में काफी लोकप्रिय है, केर को कई रूपों में काम में ले सकते हैं। यह गोलाकार होता है, जिसे कच्ची अवस्था में तोड़ा जाता है। केर का अचार केर को 5 घंटे तक भिगोकर रखें, छोटी कड़ाही में तेल डालकर 3 मिनट तक तेज आंच पर गर्म करें। आंच बंद करके तेल को ठंडा होने दें। दूसरे बर्तन में सरसों के दाने, मेथी के दाने, लाल मिर्च पाउडर, सौंफ, हल्दी, अमचूर, नमक आदि को गर्म सरसों के तेल में डालकर अच्छी तरह मिलाकर मसाला तैयार कर लें। केर को पानी से निकालकर तेल वाले मसाले में डालें व उसमें अन्य गर्म किया हुआ शेष तेल डाल दें। इसके बाद अचार को चीनी मिट्टी या कांच के बर्तन में डालकर रख लें। केर को सुखाना केर को हरी अवस्था में तोड़कर उनके डंठल हटाकर नमक के पानी में डाल दें। पानी को हर 12 घंटे बाद बदल दें। दो-तीन दिनों बाद इसे बाहर निकालें व कड़ाही में वापस नमक के पानी में उबालें। उबलने पर ये गल जाएंगे, उसके बाद इन्हें जाली पर गिराकर पानी को अलग कर दें। केर को कपड़े पर बिखेरकर दो-तीन दिनों तक धूप में सुखा दें। सूखने के बाद इसका आकार छोटा हो जाएगा। इन्हें कठोर अवस्था में पैकिंग करते हैं। सूखे हुए केर 1200 से 1500 रुपए प्रति कि.ग्रा. के भाव से बाजार में बिकते हैं। कुंमट का प्रसंस्करण कुंमट पश्चिमी राजस्थान में उपजने वाली जंगली वनस्पति है। कृषि वानिकी के अंतर्गत यह अब खेती का भी हिस्सा बनने लगी है। कुछ किसानों ने इसे खेती के रूप में भी अपनाया है। कुंमट की फलियों से दानों को अलग कर दें, फिर दानों को पानी में उबाल लें। इन्हें तब तक उबालें, जब तक कि यह गलने लग जाएं। गलने के बाद इनको जाली पर उड़ेलकर पानी को अलग कर दें। इसके बाद कपड़े पर धूप में सुखा दें। सूखे हुए कुंमट की पैकिंग कर दें। कुमट को भी 400-500 रुपये प्रति कि.ग्रा. की दर से बाजार में बेचा जा सकता है। काचरी का प्रसंस्करण काचरी, वर्षा ऋतु में खेतों व बाड़ों पर फैलने वाली बेलों से प्राप्त होती है। इसे उगाया भी जा सकता है। इनका आकार अंडाकार होता है। यह 70-80 दिनों में तोड़ने योग्य हो जाती है। काचरी को अधपकी अवस्था में तोड़कर चाकू या दरांती से पतली-पतली फांक या चिप्स के रूप में काटा जाता है। काटने के बाद सीधे ही कपड़े पर डालकर धूप में सुखाया जाता है। 5-7 दिनों बाद सूखने पर यह कठोर हो जाती है। पिफर इसे पैकिंग करके घर पर बैमौसमी सब्जी के रूप में काम में ले सकते हैं और बाजार में भी भेज सकते हैं। ग्वारफली का प्रसंस्करण ग्वार जायद व खरीफ में हाेने वाली वाली फसल है। यह अपनी नाइट्रीकरण शक्ति से जमीन को उपजाऊ बनाती है। इसके साथ ही यदि इसकी सब्जी बनाई जाए तो राजस्थानी शाही स्वाद का अहसास कराती है। इसकी कच्ची फलियों की सब्जी में ककड़ी व कच्ची केरी का संगम हाे ताे और भी निराला है। ग्रामीण राजस्थान में होने वाली शादियों में ग्वारफली की सब्जी की भूमिका बहुत ज्यादा है। बात करें इसके प्रसंस्करण की तो प्रसंस्करण का कार्य बहुत आसान है। इसे कच्ची अवस्था में तोड़कर पानी में उबाला जाता है। इसके बाद पानी को अलग करके धूप में सुखा देते हैं। सूखी हुई ग्वारफली को पैकिंग करके रख देते हैं। प्रसस्ंकरित ग्वारफली बैमोसमी सब्जी के रूप में काम आती है, उस समय यह ताजा ग्वारफली का अहसास करवाती है। महिला सशक्तिकरण में योगदान महिलाएं परम्परागत प्रसंस्करण के कार्यों से कुछ आमदनी कमाना चाहती हैं तो वे स्वयं सहायता समूह बनाकर या अन्य रजिस्टर्ड महिला समूह के माध्यम से अपने उत्पादों को आकर्षक पैकिंग व ग्रेडिंग करके बाजार में भेज सकती हैं। राज्य विपणन बोर्ड या जिला उद्योग केन्द्र से सम्पर्क करके सरकारी सहयोग का भी लाभ ले सकती हैं। इसके अलावा खाद्य लाइसेंस लेकर केर, सांगरी, काचरी, ग्वारफली आदि का प्रसंस्करण करके उत्पादों को किसी कम्पनी के साथ अनुबंध करके भी आय का विकल्प बनाया जा सकता है। कृषि विज्ञान केन्द्रों में महिलाओं के लिए समय-समय पर प्रशिक्षणों कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिसमें महिलाएं हिस्सा लेकर अपने कौशल को बढ़ा सकती हैं। राजस्थान में इनके भडांरण की तकनीकी भी परंपरागत है। प्रसंस्करित सांगरी, केर, कुंमट, ग्वारफली आदि को पुराने मटके में रख देते हैं, फिर उसको कपड़े से बांध देते हैं। जब आवश्यकता हो तब इनको सब्जी बनाने के काम में लेते हैं। इस प्रकार पश्चिमी राजस्थान में जहां एक तो वर्षा की कमी, है तो दूसरी ओर संसाधन भी कम ही हैं। ऐसे में महिलाओं को संस्थागत व गैर संस्थागत रूप से प्रशिक्षित करके उन्हें आजीविका अर्जन के लिए मजबूत बनाया जा सकता है। कृषि विज्ञान केंद्रों में समय-समय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ग्रामीण महिलाओं को इसके लिए जागरूक रहकर प्रशिक्षण में हिस्सा लेना चाहिए। कृषि विज्ञान केंद्रों में गृह विज्ञान के तहत महिला विशेषज्ञ द्वारा समय-समय पर महिला सशक्तिकरण के लिए कौशल संबंधित कार्य सिखाए जाते हैं। स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), अरविन्द सुथार और नेहा गहलोत ’कृषि विशेषज्ञ, गृह विज्ञान विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केन्द्र, केशवना, जालौर (राजस्थान)’