शुष्क खेती अनुसंधान परियोजना, कृषि महाविद्यालय (इंदौर) शुष्क खेती अनुसंधान परियोजना, कृषि महाविद्यालय (इंदौर) के वैज्ञानिक, किसानों को वर्षा जल बचाने के लिए खेतों में तालाब बनाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के सांवेर तहसील के ग्राम निग्नोटी के किसान श्री बालू सिंह ने इस परियोजना का लाभ उठाते हुए अपने खेत में तालाब बनाकर वर्षा जल का संरक्षण किया। आज इस तालाब के पानी से सिंचाई करके वह सोयाबीन, चना और प्याज की भरपूर उपज ले रहे हैं। इससे एक तरफ जहां अतिरिक्त उत्पादन होने से उनकी आय बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर बरसात के समय बहकर बेकार चले जाना वाला जल अब खेत तालाब के जरिये फसलों की पैदावार बढ़ाने के काम आ रहा है। उन्नत तकनीक के लिए लगातार अध्ययन शुष्क खेती परियोजना, कृषि महाविद्यालय इन्दौर के वैज्ञानिकों का दल मालवा क्षेत्र के विभिन्न स्थानों का समय-समय पर भ्रमण कर क्षेत्र के किसानों द्वारा अपनाई जा रही विभिन्न कृषि पदधतियों का अध्ययन करता रहता है। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य उनकी कमियों की पहचान कर उसमें वैज्ञानिक दृष्टि से अनुसंधान कर कृषकों को उन्नत तकनीक प्रदान करना है। इसका लक्ष्य किसानों की फसल पैदावार व आय में वृद्धि करना है। यह मैदानी अध्ययन इस क्षेत्र में भविष्य में किए जाने वाले अनुसंधान कार्यों की दिशा तय करता है। राष्ट्रीय नवाचार मौसम अनुकूलित कृषि परियोजना(एनआईसीआरए) इस दल के अध्ययन में यह पाया गया कि उन्नत वैज्ञानिक विधियों को अपनाने के लिए कृषक बंधुओं में कुछ अवधारणाओं की भी मान्यता रहती है। कृषकों को उन्नत तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित करने हेतु दल के सदस्य लगातार प्रयासरत रहते हैं। ऐसा ही एक प्रयास इस दल द्वारा वर्ष 2010-2011 में इन्दौर जिले की सांवेर तहसील में ग्राम निग्नोटी में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा वित्त पोषित परियाजेना 'राष्ट्रीय नवाचार मौसम अनुकूलित कृषि परियोजना (एनआईसीआरए)' द्वारा प्रारंभ किया गया। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य बदलते मौसम के तारतम्य में फसलों पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को कम करना है। इसके लिए आकस्मिक कार्य योजना, सिंचाई जल की उपलब्धता बढ़ाना तथा उन्नत कृषि यंत्रों का उपयोग कर फसल उत्पादन में लगने वाले खर्च को कम करना था। वर्ष 2010 में प्रारंभिक अध्ययन में यह ज्ञात हुआ कि किसान फसलों की सिंचाई के लिए प्रायः नलकूप का प्रयोग करते हैं। अधिकतर कृषकों के यहां एक से अधिक नलकूप हैं। इसके कारण भूजल काफी गहराई पर चला गया है। निग्नोटी गांव में खुले कुएं प्रचलन में ही नहीं हैं। हालांकि इस गांव की मृदा काली गहरी होने के कारण उपजाऊ है। सिंचाई जल की कमी के कारण अधिकांश किसान खरीफ के उपरांत रबी में चने की फसल लेते हैं। अच्छी वर्षा होने के बाद भी नलकूपों से जल की उपलब्धता दिसंबर के पश्चात अत्यधिक कम हो जाती है। अतः यह आंकलन किया गया कि यदि खेतों से प्रवाहित होने वाले जल अपवाह को एक स्थान पर संग्रहित किया जाये तो इसके उपयोग से न केवल रबी फसलों की पैदावार को बढ़ाया जा सकता है बल्कि वर्षाकाल के दौरान पड़ने वाले लंबे शुष्क दिनों में खरीफ फसलों को जीवनदायिनी सिंचाई जल प्रदान किया जा सकता है। इसलिए प्रत्येक किसान के खेत में उचित स्थान पर वर्षा जल संग्रहित कर फसलों की पैदावार को बढ़ाने के साथ-साथ रबी मौसम में चने के स्थान पर मुख्य फसलों जैसे आलू, प्याज, लहसुन व गेहूं इत्यादि का समावेश किया जा सकता है। शुरू में इस गांव के किसान इस तकनीक को अपनाने के लिए हिचकिचा रहे थे। उनकी अवधारणा यह है कि खेत में तालाब बनाने से उनके खेत का एक बहुत बड़ा भाग व्यर्थ होकर फसल उत्पादन में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है। निरंतर प्रयासों के उपरांत श्री बालूसिंह को इस कार्य के लिए टीम के सदस्य मनाने में सफल हुए। मार्च 2011 में श्री सिंह के खेत में एक उचित स्थान का चयन मौजूदा जल निकास मार्ग में ही किया गया। इस कार्य के लिए सहभागिता के आधार पर परियाजेना के माध्यम से 150 घंटे के लिए जे.सी.बी. मशीन उपलब्ध कराई गई। साथ ही खोदी गई मिट्टी को दूसरे कृषकों के अन्यत्र खेतों के निचले भागों में खेतों को समतल बनाने के लिए 2 डम्परों का उपयोग किया गया। इसका पूर्ण व्यय किसानों द्वारा स्वयं उठाया गया। इस प्रकार श्री सिंह की तालाब खुदाई में जो भी लागत आई उसे उन्होंने तालाब की मिट्टी बेचकर पूर्ण कर लिया। वर्ष 2011 में ही लगभग 1400 घनमीटर का तालाब, जिसका आकार 37×25 मीटर तथा गहराई 4 मीटर थी, खोदा गया। वर्ष 2011 के वर्षाकाल के दौरान यह तालाब पूरी तरह से भर गया। इसका उपयोग उन्होंने खरीफ एवं रबी फसलों के लिए किया। इसके साथ ही कृषक द्वारा तालाब खाली होने के बाद इसे नलकूल के माध्यम से (जिनसे बहुत ही कम मात्रा में जल निकासी हो रही थी) पुनः भरा गया। इस प्रकार श्री बालूसिंह द्वारा सतही एवं भूजल का संयुक्त रूप से उपयोग किया जाने लगा। वर्ष 2011 से लेकर आज तक यह तालाब वर्षा जल से लगातार भर रहा है एवं प्रतिवर्ष किसानों द्वारा भूजल एवं सतही जल का समुचित उपयोग किया जा रहा है। तालाब निर्माण के पूर्व तालाब निर्माण के पूर्व श्री सिंह खरीफ के दौरान सोयाबीन का उत्पादन करते आ रहे थे। इससे मात्र 12 क्विंटल/हैक्टर उपज प्राप्त हो रही थी। वर्षाकाल के उपरांत अधिकतर भाग में चने की पैदावार रबी मौसम में की जाती थी, जिससे मात्र 6 क्विंटल/हैक्टर उपज प्राप्त होती थी। पानी के अभाव में इस बार रबी की कोई भी फसल सफलतापूर्वक नहीं उगाई जा सकती थी। तालाब निर्माण के बाद वर्ष 2011 में कृषि महाविद्यालय इन्दौर, निक्रा (एनआईसीआरए) परियोजना के अंतर्गत पूर्णतः सहभागिता के आधार पर श्री बालूसिंह के खेत में एक जल संग्रहण तालाब बनाया गया, जिसकी जल संग्रहण क्षमता 1400 घन मीटर थी। तालाब निर्माण के लिए उचित स्थान का चयन इस प्रकार से किया गया था कि प्राकृतिक रूप से खेतों में बहने वाले जल निकास मार्ग अवरूद्ध न हों बल्कि तालाब भरने के उपरांत अपने पूर्व मार्ग पर ही अतिरिक्त जल की निकासी करते रहें। यह भी ध्यान रखा गया कि तालाब भरने के उपरांत श्री सिंह के किसी भी खेत में जल जमाव न हो तथा तालाब के निचले वाले खेतों में बहने वाला अतिरिक्त जल किसी प्रकार का भूक्षरण न करें। मार्च 2011 में तालाब बनाया गया और प्रथम वर्षा में ही जून 2011 में यह तालाब पूर्णतः भर गया। इस संचयित जल का उपयोग खरीफ के दौरान लंबे समय तक अवर्षा की स्थिति में जीवनदायिनी सिंचाई सोयाबीन फसल को प्रदान की गयी। इससे अन्य किसानों की तुलना में श्री बालूसिंह को लगभग 10 क्विंटल/हैक्टर अधिक उपज प्राप्त हुई। पुनः यह तालाब सितंबर 2011 में जल अपवाह से पूर्णतः भर गया जिसका उपयोग रबी फसल के लिए पलेवा के रूप में किया गया। इससे 7 बीघा जमीन सिंचित की गई। इस प्रकार तालाब में संचयित जल और ट्यूबवेल के जल के समन्वित उपयोग से 12 बीघा में दूसरा पानी 15-20 दिनों की अवस्था में देना संभव हो सका। इस कारण वर्षा जल के उचित संग्रहण से तालाब बनाने के उपरांत श्री बालूसिंह द्वारा 80 क्विंटल चना का उत्पादन प्राप्त किया गया जो कि तालाब निर्माण पूर्व के चने के उत्पादन से लगभग तीन गुना अधिक था। इससे उन्हें देसी चने की तुलना में अधिक कीमत प्राप्त हुई। अतः इस बात से यह स्पष्ट है कि तालाब निर्माण श्री सिंह के लिए प्रथम वर्ष ही अत्यंत लाभदायक रहा एवं उनके द्वारा अतिरिक्त उत्पादन के साथ-साथ अधिक आय भी प्राप्त की गई। अतिरिक्त उत्पादन वर्ष 2013 से उनके द्वारा रबी में चने के अतिरिक्त प्याज का उत्पादन भी 1 बीघा में प्रारंभ किया गया तथा लगभग 100 क्विंटल प्याज का उत्पादन कर अतिरिक्त आय प्राप्त की गई। इसके उपरांत लगातार 3 बीघा में उनके द्वारा प्याज उगाया जा रहा है तथा 300 क्विटंल प्याज का उत्पादन कर अतिरिक्त लाभ प्राप्त किया जा रहा है। तालाब निर्माण के पूर्व उनके द्वारा सिंचाई जल प्राप्त करने के लिए कई बार बोरिंग कर ट्यूबवेल से पानी प्राप्त करने का प्रयास किया गया। पर्याप्त भूजल उपलब्ध न होने के कारण इनमें किया गया खर्च व्यर्थ गया। तालाब निर्माण के समय भी श्री सिंह द्वारा खुदाई में निकली मिट्टी का उपयोग न केवल अपने खेतों को समतल बनाने बल्कि उसकी उर्वरता बढ़ाने के लिए किया गया। अतिरिक्त खुदी हुई मिट्टी को अन्य किसानों के खेतों में डालकर प्रति डम्पर 300 रुपये की दर से लगभग 53,100 रुपये की आय भी प्राप्त की गई। वर्ष 2012 के उपरांत श्री बालूसिंह तालाब में संचित जल का उपयोग खरीफ व रबी की फसलों के लिए करते हैं। तालाब खाली होने के बाद उसको ट्यूबवेल से पुनः भरकर इसका उपयोग सिंचाई के लिए करते हैं। ट्यूबवेल से निकलने वाला जल नवम्बर-दिसंबर के पश्चात एक-एक कर झटके मार कर निकलता है, जिससे पर्याप्त सिंचाई संभव नहीं हो पाती। अतः इस रिक्त तालाब में पानी का कई दिनों तक संग्रहण कर बड़ी मोटर द्वारा इसका उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है। श्री बालूसिंह का तालाब निर्माण का फैसला उनके लिए अत्यंत लाभदायक रहा। साथ ही साथ अन्य किसानों को प्रोत्साहित करने वाला व प्रेरणादायक रहा। इसके अलावा उनकी अवधारणा कि तालाब निर्माण में खेती का एक हिस्सा देना नुकसानदायक होता है, गलत साबित हुई। स्त्रोत : खेती पत्रिका,भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर),लेखक: दीपक हरि रानडे, इन्दु स्वरूप, ओम प्रकाश गिरोठिया, दुष्यंत भगत और आशीष उपाध्याय अखिल भारतीय समन्वित शुष्क खेती अनुसंधान परियोजना, राविसिकृविवि परिसर, कृषि महाविद्यालय, इन्दौर-452001 (मध्य प्रदेश)