<h3 style="text-align: justify;">परिचय</h3> <p style="text-align: justify;">फसल की बेहतर बढ़वार व पोषण के लिए जीवधारियों या उनके अवशेषों के उपयोग को जैविक पोषक तत्व या जैविक खाद कहा जाता है| जैविक खादें वातावरण में उपलब्ध नाइट्रोजन को संरक्षित करने अथवा पोषक तत्वों जैसे-फास्फोरस को पौधों को उपलब्ध कराने में सहायक होती हैं| जैविक खादें पौधों की प्रभावकारी वृद्धि के लिए पोषक तत्व वाहक का काम भी करती है|</p> <h3 style="text-align: justify;">जैविक खादों के लाभ</h3> <p style="text-align: justify;">जैविक खादें जैविक पदार्थों से बनाई जाती हैं| ये खादें पर्यावरण संतुलन को बनाये रखने में मदद करती हैं व मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है| जैविक खादों से मिट्टी की नमी को लम्बे समय तक संरक्षित रखा जा सकता है साथ ही भूमि के कटाव को भी कम किया जा सकता है|</p> <h3 style="text-align: justify;">कम्पोस्ट क्या है?</h3> <p style="text-align: justify;">खेतों में बेकार पड़ी जैविक चीजों को सड़ाकर कम्पोस्ट के रूप में परिणित कर पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की कमी को किसी हद तक पूरा किया जा सकता है| कम्पोस्ट परोक्ष रूप से पर्यावरणीय संतुलन को बनाये रखने में सहायता करते हैं| कम्पोस्ट पोषक तोत्वों का बहुत अच्छा स्त्रोत हैं| कम्पोस्ट पौधों के लिए आवश्यक हैं व पर्यावरण को नुकसान भी नहीं होता|</p> <p style="text-align: justify;">कम्पोस्ट खेत की मिट्टी को भुरभुरा बनाता है| इससे मिट्टी में पौधों के लिए उचित पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में मिलते हैं| अपने आस-पास उपलब्ध बेकार पड़ी जैविक सामग्रियों द्वारा कम्पोस्ट बनाने के कुछ सरल तरीके जिन्हें आम किसान प्रयोग में ला सकते हैं आगे दिए गए हैं|</p> <h3 style="text-align: justify;">कम्पोस्ट बनाने की विधियाँ</h3> <p style="text-align: justify;"><strong>कम्पोस्ट की गड्ढा विधि</strong></p> <p style="text-align: justify;">कम्पोस्ट गड्ढा बनाने के लिए ऐसे स्थान का चयन करें जो गौशाला के निकट हो, थोड़ा, ऊँचाई पर हो तथा जल स्रोत के नजदीक हो| कम्पोस्ट बनाने के लिए सूखी पत्तियाँ, टहनियाँ, फसल के अवशेष (पुआल इत्यादि) घास-फूस एकत्रित करें| इसके बाद कम से कम 2 से 5 फीट गहरा, 3 से 5 फीट चौड़ा व 6 से 10 फीट लम्बा गड्ढा तैयार करें| इसमें पहली परत में सूखे डंठल, झाड़ियाँ या बेकार पड़ी लकड़ियाँ बिछाएँ| दूसरी परत सूखी पत्तियों व सूखी घास की बिछाएँ| तीसरी परत हरी घास की बिछाएँ| ध्यान रहे कि परतें 6 इंच से मोटी न हों वरना कम्पोस्ट देर से बनेगा| प्रत्येक परत के ऊपर कम से कम 4 किली गोबर के घोल का छिड़काव करें| इसके बाद सूखे व हरे कचरे की परतें जमीन से 2 से 3 फीट ऊपर तक बिछाएँ| गड्ढा पूरी तरह भरने के बाद इसे गोबर व मिट्टी से लीपकर बंद कर दें| यह खाद तीन माह में तैयार हो जाती है| इसमें पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं| गड्ढे के कचरे को 21 दिन बाद पलटकर दोबारा लीपने पर खाद जल्दी तैयार हो जाती हैं|</p> <p style="text-align: justify;"><a href="../../../../../../../agriculture/91594393793f-906917924/90591c94893593f915-90692693e928/91693092a92493593e930-92893f92f90292494d930923">खरपतवार नियंत्रण</a> हेतु आस-पास की खरपतवार व झाड़ियाँ जैसे कालाबांसा, लैंटाना व गाजर घास आदि का प्रयोग कम्पोस्ट बनाने के लिए (इनमें फूल आने से पहले) करें|</p> <p style="text-align: justify;"><strong>मटका खाद</strong></p> <p style="text-align: justify;">मटका खाद जैविक उर्वरक के साथ-साथ कीटनाशक का भी काम करती है| यह खाद 21 दिन में तैयार हो जाती है| इसके लिए दुधारू गाय का गोमूत्र 5 लीटर, गोबर 5 किलो, पानी 5 लीटर व चुलु की खली 2 किलो लें| एक मटका अथवा ढक्कनदार बर्तन में सारी सामग्री मिलाकर अच्छी तरह घोल बनाएं| घोल बनाने के बाद इस बर्तन को ढककर 21 दिन के लिए छाया में रख दें| 21 दिन बाद यह प्रयोग के लिए तैयार हो जाती है| मटका खाद में 5 गुना पानी मिलकर इसका प्रयोग करें| इसे धान, दालों, मडुआ, झंगोरा व सब्जियों पर इस्तेमाल किया जा सकता है|</p> <p style="text-align: justify;"><strong>देसी केंचुओं की खाद (वर्मीकम्पोस्ट)</strong></p> <p style="text-align: justify;">जैविक कचरे जैसे सब्जी के छिलके, घास, पराल इत्यादि को केंचुओं द्वारा प्रयोग करने के पश्चात उसके अवशेष मल को वर्मी कम्पोस्ट कहते हैं | किसी छायादार स्थान पर जहाँ जल भराव की समस्या न हो 2.5 फीट गहरा, 3 फीट चौड़ा व 6 से 10 फीट लम्बा गड्ढा तैयार करें| इसमें सबसे पहले एक-एक तह बड़े-बड़े कंकड़ या रोड़े बिछाने के बाद एक तह रोड़ी व बालू की बिछाएँ| इसके ऊपर 9 इंच उपजाऊ मिट्टी की तह बिछाकर पानी का हल्का छिड़काव करें| इसके ऊपर केंचुए डालकर नम गोबर के छोटे छोटे गोले रख दें| ऊपर से घर का जैविक कचरा डाल दें व बोरी से ढक दें|</p> <p style="text-align: justify;">इस तरह तैयार वर्मी बैड में नमी बनाये रखने के लिए पानी का छिड़काव समय-समय पर करते रहें| लगभग 10-12 दिनों के अन्तराल में गड्ढे की ऊपरी परत को पलटते रहें| केंचुएँ गड्ढे का फर्श सीमेंट का बनाएं, या जमीन में मोटी पालीथीन भी बिछा सकते हैं| लगभग 45 दिनों के बाद तैयार खाद को निकालने से 3 दिन पहले ढेर में पानी का छिड़काव बंद कर दें| इससे नमी की तलाश में केंचुए नीचे चले जायेंगे| खाद को अलग निकाल कर ढेर बना दें| इसके बाद तैयार खाद को 2 मि०मी० बारीक़ छलनी से छानकर खाद के रूप में प्रयोग किया जा सकता है| यह बहुत ही प्रभावकारी व उच्च गुणवत्ता की खाद होती है| इस प्रक्रिया को दोहराने के लिए इन्हीं केंचुओं का पुनः प्रयोग करें|</p> <p style="text-align: justify;">लाल केंचुआ से खाद बनाने के लिए छायादार जगह या छप्पर के नीचे सीमेंट का फर्श बनाएं, यह जमीन में मोटी पालीथीन बिछा कर उसके ऊपर 6 इंच मोटी मिट्टी के तह बिछा दें| इसके ऊपर 2 फीट ऊँचा व 2 फीट चौड़ा गोबर का ढेर बनाकर कर उसमें केंचुए मिला दें ध्यान रहे की गोबर एक हफ्ते पुराना हो| ढेर में जमी बनी रहे इसके लिए पानी का छिड़काव करते रहें| इस विधि से भी खाद 45 दिनों में तैयार होती है|</p> <p style="text-align: justify;">वर्मीवाश केंचुओं से तैयार एक उत्तम तरल जैविक उर्वरक है यह सब्जियों व पत्तियों पर छिड़काव हेतु बहुत उपयोगी है| इसे बनाने के लिए मिट्टी, प्लास्टिक या धातु की 40 से 100 लीटर की जल लगी टंकी अथवा बाल्टी, ईंट के छोटे-छोटे टुकड़े, बालू गोबर, खेत की मिट्टी, केंचुए, जैविक कचरा, 2-5 लीटर क्षमता का डिब्बा या मिटटी का बर्तन ( जिसमें छेद हों) की जरूरत होती है|</p> <p style="text-align: justify;">वर्मीवाश बनाने के लिए 40 से 100 लीटर की नल लगी टंकी अथवा बाल्टी में सबसे पहले 25 से 30 से०मी० तक ईंट के छोटे-छोटे टुकड़े डालें| टंकी का नल खुला रखें| टंकी में तब तक पानी डालें जब तक ईंट के टुकड़े पानी में पूरी तरह भींग जाएँ| इसके ऊपर 25-30 सेमी बालू डालें व जब तक बालू पूरी तरह गीली ना हो जाये पानी डालते रहें| इसके ऊपर 30-45 से०मी० तक खेत की अच्छी मिट्टी डालें व इसे भी गीला करें| मिट्टी पर जगह-जगह गोबर के छोटे-छोटे गोले बनाकर रखें| अब इसके ऊपर केंचुए छोड़ दें, व फिर जैविक कचरे से ढककर सतह को पानी से भिगो दें| टंकी में से अतिरिक्त पानी निकल जाने पर टंकी का नल बंद कर दें| लगातार 15 दिनों तक हर रोज एक बार टंकी से अतिरिक्त पानी बाहर निकाल दें| अंत में डिब्बे अथवा <a href="../../../../../../../rural-energy/energy-technologies/92893f92e94d928-93293e917924-93593e932940-924915928940915947902/92e93f91f94d91f940-915947-92c93094d924928-92a94991f-92e947902-93894d92a93e90793094193293f92893e-915940-916947924940">मिट्टी के बर्तन</a> को पानी से भरकर टंकी के ऊपर टांग दें| पानी धीरे-धीरे टपक कर व रिसकर केंचुओं द्वारा छोड़ी पौष्टिक विष्ठा व उनके शरीर से निकले लिसलिसे (पादप हार्मोन युक्त) पदार्थ को साथ ले जा कर टंकी की तली में एकत्रित हो जाता है| इसके बाद हर सुबह टंकी का नल खोलकर 10% गोमूत्र मिलाने से यह प्रभावकारी कीटनाशक भी साबित होता है| साथ ही यह आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर प्रभावी तरल जैविक उर्वरक भी है|</p> <p style="text-align: justify;"><strong>परिष्कृत बायोडंग पद्धति</strong></p> <p style="text-align: justify;">यह पद्धति नवधन्य द्वारा ग्रामोपयोगी विज्ञान केंद्र, वर्धा द्वारा विकसित विधि में बदलाव कर तैयार की गई है| बरसात के मौसम में निकलने वाली हरी घास, कचरा, खरपतवार आदि से खाद बनाने का यह आसान परतों से 10x5x5 फीट ऊँचा ढेर बनाएँ| इस बात का विशेष ध्यान रहे कि कचरे की परत 6 इंच से मोटी न हो| हर परत पर 100 लीटर पतला गोवर का घोल छिड़कें 1 बाल्टी पानी में कम से कम 4 किलो गोबर की आवश्यकता होती है| कचरे के ढेर की परतें 5 फीट होने पर अंत में गोबर व मिट्टी की आवश्यकता होती है| कचरे के ढेर की परतें 5 फीट होने पर अंत में गोबर व मिट्टी ले लेप दें|</p> <p style="text-align: justify;">करीब 15 से 20 दिन बाद इस ढेर को पलटकर पानी डालकर पुनः गोबर व मिट्टी से लीप दें इसमें रोज पानी डालना जरुरी नहीं है| इस तरह 45-60 दिन बाद अच्छी काली खाद बन जायेगी| इस ढेर से करीब 300 किली खाद बनती है| अन्य खादों के मुकाबले इसमें अधिक नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम तथा जमीन की उर्वरता बढ़ाने वाले सूक्ष्म जीवाणु होते हैं| खरपतवार को कम्पोस्ट खाद में बदलने का यह अच्छा व उपयोगी तरीका है|</p> <p style="text-align: justify;">अधिक गर्म या अधिक ठन्डे इलाकों में इस विधि को 2.5 फीट जमीन के अंदर गड्ढे में बनायें| ध्यान रहे की ढेर 2.5 फीट से अधिक जमीन के ऊपर न हो व 5 फीट से अधिक चौड़ा न हो| गड्ढे की लबाई आवश्यकता के अनुसार कम व अधिक कर सकते हैं|</p> <p style="text-align: justify;"><strong>नाडेप कम्पोस्ट</strong></p> <p style="text-align: justify;">नाडेप कम्पोस्ट बनाने के लिए मजबूत नींव रखकर जमीन के ऊपर 9 इंच मोटी ईंट या पत्थरों की आयताकार हौदी बनायें| ईंट या पत्थरों को सीमेंट या मिट्टी से इस तरह जोड़ें कि ईंटों की पहली व अंतिम पंक्ति में कोई छेद ना रहे, लेकिन बीच की सभी पक्तियों में छेद हों| 1 मी० ऊँची, 2 मी० लम्बी व 1.5 मी० चौड़ी हौदी के तैयार होने के बाद भीतरी सतह को गाय किए गोबर के पतले घोल से अच्छी तरह लीप दें| अब हौदी खाद के बनाने के लिए तैयार है| सबसे पहले हौदी में 20 से 25 से०मी० जैविक कचरा भरें| फिर एक तसला गाय के गोबर को 5 बाल्टी पानी मने मिलाकर इस पर छिड़क दें| इसके ऊपर छनी हुई सूखी मिट्टी ikikiकी एक इंच मोटी परत बिछाकर पानी का छिड़काव कर दें| इसी क्रम में हौदी को भरने के बाद इसे गोबर, मिट्टी व पानी से लीप दें| उसके ऊपर समय-समय पर पानी छिड़कते रहें जिससे ऊपरी परत सूखने न पाए| गोमूत्र को भी हौदी में डालने से बेहतर परिणाम मिलते हैं| ध्यान रहे कि हौदी में नमी बनी रहे, यह खाद के लिए अच्छा है| इस विधि द्वारा तीन माह बाद अच्छी खाद तैयार हो जाती है|</p> <h3 style="text-align: justify;">नर्सरी के लिए मिट्टी तैयार करना</h3> <p style="text-align: justify;">आधुनिक कृषि पद्धति के रसायनों पर निर्भर होने से भूमि की उर्वरता खत्म हुई है व कृषि उपज घटी है| अच्छी उपज के लिए अच्छी मिट्टी जरुरी है| अच्छी मिट्टी तैयार करने के लिए मिट्टी, सूखा जैविक कचरा, गोबर का पतला घोल, तिलहनों की बीज, दालें व मसालों के एक-एक मुट्ठी बीजों (जो भी स्थानीय फसल हो) की आवश्यकता होती है|</p> <p style="text-align: justify;">जितना जैविक कचरा उपलब्ध हो उसके अनुसार जमीन को खोद लें व चारों ओर मेढ़ बना लें\ गोबर के पानी से इस क्षेत्र को भली भांति गीला करके एक इंच मोटी सूखे कचरे की तह बिछाकर गोबर घुले पानी से भिगो दें| इन दोनों परतों को बिछाने की प्रक्रिया तब तक चलाएँ जब तक ढेर की ऊंचाई 12 इंच तक न हो जाये| यह ढेर हमेशा गीला रहना चाहिए एक सप्ताह बाद ऊपर लिखे सभी अन्न, दालें, मसाले व तिलहन के बीजों को मिलाकर उनको इस ढेर पर बो दें| एक हफ्ते बाद जब सभी बीज अंकुरित हो जाएँ तो उन्हें उखाड़ दें व एक ढेर बना लें| इस ढेर को पूरा मिलाकर कुछ दिनों के लिए छोड़ दें| पुनः सभी दालों, अनाजों, मसालों व तिलहनों के बीज लें व उनको अलग-अलग लाइनों में बो दें| इस बार उनको फूल आने तक बड़ा होने दें| जैसे-जैसे जो भी पौधा फूल आने की अवस्था तक आता जाए उसे काटकर वहीँ डाल दें| इस मिट्टी से आप नर्सरी शुरू कर सकते अहिं| ध्यान रहे यह ढेर हमेशा गीला रहना चाहिए|</p> <h3 style="text-align: justify;">तरल कम्पोस्ट</h3> <p style="text-align: justify;"><strong>पंचगव्य</strong></p> <p style="text-align: justify;">पंचगव्य बनाने के लिए 1 लीटर गाय का दूध, 1 लीटर दही, 250 ग्राम घी, 1 लीटर गौमूत्र, 1 किलो गाय का गोबर व 250 ग्राम गुड़ की आवश्यकता होती है| इस सामग्री को एक मिट्टी, स्टील अथवा प्लास्टिक के बर्तन में अच्छी तरह मिला दें| 2-4 दिन के बाद इस मिश्रण को 1:10 के अनुपात से पानी में मिलाकर छिड़कें अथवा सिंचाई के समय खेत में डाल दें|</p> <p style="text-align: justify;"><strong>जीवामृत</strong></p> <p style="text-align: justify;">अमरावती (महाराष्ट्र० के श्री सुभाष पालेकर के अनुसार अच्छे उत्पादन हेतु खेत में गोबर से निर्मित टनों खाद डालने की कोई आवश्यकता नहीं है, केवल 30 किलोग्राम गोबर से निर्मित खाद एक एकड़ खेत के लिए पर्याप्त है| गाय के गोबर एवं गौमूत्र का उपयोग एक जीवाणु कल्चर के रूप में करने पर समुचित उत्पादन प्राप्त किया जा सकता अहि| गाय के गोबर में बे सभी जीवाणु होते हैं, जो मिट्टी में विद्यामान पोषक तत्वों को घुलनशील एवं पौधों द्वारा ग्रहण करने योग्य तत्वों में परिवर्तित करते हैं| जीवामृत व घनजीवामृत इसी प्रकार का कल्चर है जिसका प्रयोग कर हजारों किसान लाभ प्राप्त कर रहे हैं|</p> <p style="text-align: justify;">जीवामृत हेतु 10 किलोग्राम गाय का ताजा गोबर (या भैस का गोबर), 10 लीटर गाय का मूत्र, 2 किलोग्राम गुड़, 2 किलोग्राम बेकार पड़ी दाल का आटा, 1 मुट्ठी मेड़ या सागबाड़ी की उपजाऊ मिट्टी एवं लगभग 190 लीटर पानी की आवश्यकता होती है|</p> <p style="text-align: justify;">जीवामृत बनाने के लिए एक 200 लीटर खुले मुँह का ड्रम लें, इसे खेत में उस जगह पर रखें जहाँ से खेत में पानी जाता है, इस ड्रम को पानी से भर दें, तथा साथ ही साथ उपरोक्त सभी चीजों को अच्छी प्रकार से मिलकर इसे किसी बोरी से ढक कर रखें| दिन में दो बार एक लंबे डंडे से घड़ी की दिशा में इस मिश्रण को घुमाएँ|</p> <p style="text-align: justify;">तीन दिन में जीवामृत प्रयोग हेतु तैयार हो जाता है और इसमें से खुशबू आने लगती है| इस विलयन को पानी के साथ 1 एकड़ खेत मने डालें| इसे पौधे जमने के 10 दिन बाद, कल्ले निकलने पर तथा बीज पड़ने के समय डाला जाता है| जीवामृत एक फसल में 3 या 4 बार डाला जाना चाहिए| इस प्रकार कुल 30 से 40 किलोग्राम गोबर एवं 30 से 40 लीटर गौमूत्र की आवश्यकता होती है| अच्छे उत्पादन हेतु जीवामृत को कपड़े से छानकर खड़ी फसल पर छिड़काव भी किया जाता है| छिड़काव करने हेतु जीवामृत में 5 गुना पानी मिलाएँ|</p> <p style="text-align: justify;"><strong>सावधानियां</strong></p> <p style="text-align: justify;">यह ध्यान देना आवश्यक है कि जीवामृत 4 दिन के बाद सड़ना शुरू हो जाता है, और अगले 2 दिन में यह पुर्णतः सड़ हुआ जीवामृत प्रभावी नहीं होता, यह फसल को नुकसान भी पहुँचा सकता है| यदि आपको मात्र 1 या 2 नाली हेतु जीवामृत बनाना है तो सभी चीजें इसी मात्रा में कम करें, एक एकड़ में 20 नाली होती हैं|</p> <p style="text-align: justify;"><strong>घनजीवामृत</strong></p> <p style="text-align: justify;">घनजीवामृत या घनामृत बनाने के लिए 100-120 किलोग्राम गाय का ताजा गोबर (या भैंस का गोबर) 10 लीटर गाय का मूत्र (या भैंस का मूत्र) किलोग्राम गुड, 2 किलिग्राम दाल का आटा व 1 मुट्ठी मेड़ या सागवाड़ी की उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है|</p> <p style="text-align: justify;">घनजीवामृत बनाने के लिए छायादार स्थान पर लगभग 100-120 किलोग्राम (ताजे या 2-3 दिन पुराने) गोबर को गौमूत्र, गुड तथा बेकार पड़ी दाल के आटे को पॉव से अच्छी तरह से गुंथे| गूंथने के बाद इसे छाया में फैलाकर अगले 2 दिन तक सूखने के लिए छोड़ दें| जब इसमें 20% के लगभग नमी रह जाए, इसके छोटे-छोटे (1 इंच) टुकड़े करके जूट की बोरियों में भर दें| इस घनजीवामृत को 3 माह तक सुरक्षित रखा जा सकता है| इन बोरियों को अँधेरी एवं नमी युक्त स्थान पर रखा जाना चाहिए| घनजीवामृत को 3 माह तक सुरक्षित रखा जा सकता है| इन बोरियों को अँधेरी एवं नमी युक्त स्थान पर रखा जाना चाहिए| घनजीवामृत को खेत तयारी के समय, जुताई से पहले सम्पूर्ण एक एकड़ खेत में बीज के साथ छिड़क दें, तथा तुरंत हल लगाकर इसे मिट्टी की ऊपरी सतह में मिला दें| घनजीवामृत बिना सिचाई वाले(उखड़ी) खेतों हेतु अत्यंत उपयोगी है, इसमें नमी बनी रहनी चाहिए, यदि इसे लम्बे समय तक रखने की योजना है तो प्रत्येक 15-20 दिन में एक बार बोरियों पर 5-10 लीटर पानी का छिड़काव करें| वर्षा पर आधारित उखड़ी खेती में गुड़ाई के समय भी घनजीवामृत डालने से अधिक फायदा होता है|</p> <p style="text-align: justify;"><strong> स्रोत: उत्तराखंड राज्य जैव प्रौद्योगिकी विभाग; नवधान्य, देहरादून</strong></p>