भूमिका विष्णुदेव सिंह, पिता श्री चिखन सिंह, माता श्रीमती बुधनी देवी, ग्राम – जगलदगा, पंचायत – जालिमखुर्द, प्रखंड – लातेहार, जिला – लातेहार, राज्य – झारखंड के रहने वाले हैं। इनका जन्म सन 1986 ई. में हुआ। शैक्षणिक योग्यता – बी.ए. भूगोल (प्रतिष्ठा) । गरीब आदिवासी कृषक होने के कारण उन्हें आर्थिक तंगी झेलना पड़ रहा था। गाँव में वर्षो से किसान पारंपरिक विधि से अरहर की खेती करते आ रहे थे। इस विधि से उत्पादन इतना कम हो रहा था कि किसी तरह परिवार का भरण-पोषण हो रहा था। परिवार की आर्थिक तंगी से उबकर विष्णुदेव ने स्वयं खेती भी करने का निर्णय लिया। अरहर, धान, मक्का के अलावा, सब्जी, आलू, बैंगन, प्याज इत्यादि की खेती भी विष्णुदेव ने प्रारम्भ कर दिया। साथ ही कृषि विभाग, लातेहार से जुड़ गया। जिला कृषि पदाधिकारी श्री राजेन्द्र किशोर के अलावा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (दलहन) लातेहार के जिला परामर्शी एवं तकनीकी सहायक के मार्गदर्शन से प्रभावित होकर विष्णुदेव प्रशिक्षण के लिए भारतीय दलहन अनुसंधान केंद्र, कानपुर गए। वहां विष्णुदेव ने अरहर की वैज्ञानिक ढंग से खेती देखी, अरहर की झुलती हुई फलियाँ उसके दिल को छू गया। प्रशिक्षण में बताया गया कि वैज्ञानिक तरीके से खेती कर कम लागत से अधिक उपज प्राप्त किया जा सकता है। जिला कृषि पदाधिकारी, लातेहार के द्वारा वैज्ञानिक विधि से अरहर कही खेती करने तथा संपूर्ण तकनीकी सहायता प्रदान करने की बात कही गई। आत्मा, लातेहार द्वारा आयोजित विशेष प्रशिक्षण में भी श्री विष्णुदेव ने भाग लिया, जिसमें बताया गया कि इस विधि को अपनाकर उत्पादन को दोगुना बढ़ाया जा सकता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (दलहन) के अंतर्गत मिली सहायता विष्णुदेव को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (दलहन) के अंतर्गत प्रत्यक्षण हेतु बीज (बिरसा अरहर-1) 20 किग्रा. (जिसमें 4 किग्रा. शतप्रतिशत अनुदान पर तथा 16 किग्रा. बीज 50% अनुदान पर क्रय किया), कार्बेन्डाजिम – 40 ग्राम, राईजोवीयम कल्चर – 500 ग्राम, पी.एस.बी.-500 ग्राम, बोरेक्स – 10 किग्रा., साईप्र मेथलिन – 1.50 लीटर, मटालेक्सील – 1.50 किग्रा., फेरोमेन ट्रैप + ल्यूर्स – 10, स्प्रेयर मशीन – 1, यूरिया -10 किग्रा., डोलोमाईट – 3 क्विं., नीम बेस ऑयल – 2.50 लीटर उपलब्ध कराया गया। कार्बेन्डाजीम तथा राईजोवियम कल्चर एवं पी.एस.बी. से बीज उपचार के कारण बीज का अंकुरण अच्छा हुआ। 75 सें.मी. पंक्ति से पंक्ति तथा 25 सें.मी. बीज से बीज की दूरी बनाए रखते हुए जुलाई के प्रथम सप्ताह में बीज की बुआई की। विष्णुदेव ने दो बार निकाई-गुड़ाई की। पहली बुआई के 30-35 दिनों बाद तथा दूसरी बुआई के 50-55 दिनों बाद। फसल को कीट-व्याधि से बचाने के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन तथा आत्मा के विशेषज्ञ समय-समय पर फसल का निरीक्षण करते रहे और फेरोमेन ट्रैप + ल्यूर्स तथा अन्य आवश्यक कीटनाशी जैसे साईपर मेथलिन, मेटालेक्सील, नीम बेस ऑयल का छिड़काव आवश्यकता आधारित किया। इससे फसल फली छेदक तथा अन्य कीट से सुरक्षित रही। अधिक उत्पादन के लिए जीवाणु खाद जैसे राईजोवियम कल्चर तथा पी.एस.बी. से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ी। इसके अलावा उपज में लगभग 200 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सूक्ष्म पोषक तत्व बोरेक्स के अलावा डोलोमाईट के उपयोग से पौधे की वृद्धि अच्छी हुई तथा पौधे स्वस्थ पाए गए, फसल काटने के बाद कुल दानों का उपज 22 क्विं., डंठल 70 क्विं. तथा भूसा करीब 35 क्विं. प्राप्त हुआ। डंठल का उपयोग जलावन के रूप में तथा भूसा का उपयोग पशु आहार के लिए हुआ। 15 क्विं. बीज अपने गाँव तथा आस-पास के गाँवों के किसानों को बेचा, शेष दाना का उपयोग दाल के रूप में खाने में हुआ। अरहर की फसल के बाद विष्णुदेव ने उसी खेत में मक्के की खेती की, फसल काफी अच्छी हुई और तो और यूरिया का उपयोग भी नहीं करना पड़ा। विष्णुदेव की फसल देख आस-पास के पंचायत एवं प्रखंडों के किसान इस ओर आकर्षित हुए और विष्णुदेव से तकनीकी की जानकारी लेने लगे। आज विष्णुदेव सिंह अपने गाँव ही नहीं पंचायत, प्रखंड एवं जिला के कृषकों के लिए प्रेरणा के श्रोत बने हुए हैं और उन्नत तकनीकी से अरहर की खेती करने के लिए अन्य कृषकों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। इनकी सफलता को देखकर गाँव के पुरुष एवं महिला कृषकों ने अगले खरीफ मौसम में अरहर की उन्नत खेती करने का निश्चय किया है। स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार