भूमिका राज्य में कृषि का बदलाव साफ दिखायी देने लगा है| हर क्षेत्र में पिछड़े कृषि प्रधान इस राज्य में बड़ी संख्या में ऐसे भी किसान हैं, जो नित नये प्रयोग कर मिट्टी से सोना उपजाने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं| साथ ही अभावों के बीच सफलता की नयी ऊचाईयां छू रहे हैं| ऐसे ही सफल किसानों में से एक हैं रोहतास जिले के सासाराम प्रखंड के महद्दीगंज निवासी किसान दिलीप सिंह उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि कड़ी मेहनत व लगन से खेती की जाय तो निश्चित ही किसान अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर कर सकता हैं, वे खेती के बदौलत सालाना लगभग 5 लाख रुपये की कमायी करते हैं| इसके अलवा उन्हें कई राष्ट्रीय व अतंरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किये हैं| जिले में यह बेहतर खेती के लिए जाने जाते हैं| सासाराम के कई गांवों में फैली खेती 35 वर्षीय इस युवा किसान की खेती जिला मुख्यालय सासाराम के आस-पास के कई गांवों जैसे मिश्रीपुर, शुम्भा, अहराव ,नीमा, तारगंज, भदौरिया तथा धुंआ आदि गांवों में फैली है ये गांव इनके घर से एक से आठ किलोमीटर दूर हैं| इनकी दिनचर्या सुबह चार बजे से शुरू होकर रात्रि आठ बजे तक लगातार चलती रहती है| ये प्रति वर्ष लगभग 15 एकड़ टमाटर, बैंगन पांच एकड़, मिर्च छह एकड़, प्याज 10 एकड़, मसूर दो एकड़, सरसों तीन एकड़, धान 30 एकड़, गेहूं 10 एकड़ तथा बोक्रली व शिमला मिर्च की खेती करते हैं| मसूर प्रति एकड़ 20 क्विंटल, धान 55 से 60 क्विंटल तथा गेहूं 18 से 20 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन करते हैं| गेहूं व धान की खेती श्री विधि व परंपरागत विधि से करते हैं| इनके धान के एक पौधे से 40 से लेकर 90 कल्ले तक निकलते हैं, दिलीप सिंह का कहना है कि एक एकड़ बैंगन की खेती से आठ से दस माह तक फलन प्राप्त करते हैं जिससे प्रति एकड़ सवा लाख रुपये तक लाभ होता है| ये बैंगन का बीज स्वयं तैयार करते हैं| इनका बैंगन देशी है बैंगन का 100 ग्राम बीज तैयार करने के लिए आठ से दस बैंगन की की जरूरत होती है| जिसका स्वाद व रंग दोनों उपभोक्ताओं को पसंद आने वाला है, इनके बैंगन की दो किस्में हैं एक गोला गाढ़ा बैंगनी तथा दूसरा गोल थोड़ा लंबा हल्के बैंगनी रंग का होता है| इनकी भिंडी एक बार लगा देने से पूरे एक वर्ष तक फल देती है, इस भिंडी का पौधा चार पत्तियों का होने पर फल देने लगता है| एक एकड़ भिंडी की फसल में 10 से 15 हजार रुपये तक लागत आती है और एक वर्ष में एक से सवा लाख रुपये की आय होती है| इसका बीज स्वयं तैयार करते हैं इस बीज की खाशियत यह होती है कि इसके पौधे से 60 दिनों में फल प्राप्त होने लगताहै| पौधे के बढते हुए तने की प्रत्येक गांठ से 5 से 6 फल मिलता है साथ ही एक वर्ष तक फलन होता रहता है| अपनी खेती से जो बीज ज्यादा होता है उसे आसपास के किसानों को पांच सौ रुपये किलो की दर से बेच देते हैं, दूसरे राज्यों में आई हाईब्रिड भिंडी की कीमत जब दस रुपये होती है तो इनके खेत में उत्पादित भिंडी की कीमत 15 रुपये प्रति किलो बिकती है| दिलीप सिंह द्वारा उत्पादित हरी मिर्च भी देखने लायक होती है, मिर्च से इन्हें एक वर्ष में प्रति एकड़ एक लाख की आय होती है| यदि टमाटर की बात करें तो बीज स्वयं तैयार करते हैं| यह बीज लगभग 15 वर्षो से चला रहा है जिसे गुलशन के नाम से जाना जाता है| इस बीज को यह क्रास कर तैयार करते हैं जिससे इन्हें अधिक उत्पादन होता है | जिसकी बाजार में अच्छी कीमत मिलती है टमाटर एक पौधे से एक किलो से लेकर तीन किलो तक फल मिलता है| इनकी प्याज की खेती में अच्छी किस्म का बीज लगाया जाता है इनके द्वारा उत्पादित प्याज स्वादिष्ट, देखने में आकर्षक एवं भंडारण के लिए ज्याद टिकाऊ होता है| डेढ़ किलो बीज से तैयार पौधे को एक एकड़ में लगा कर दो सौ क्विंटल उत्पादन प्राप्त करना इनकी विशेष उपलब्धि में शामिल है| ब्रोकली एक पौधे से दिलीप सिंह को दस फूल मिल़े इनके खेत में शिमला मिर्च का उत्पादन भी राज्य के अन्य किसानों की अपेक्षा अधिक होती है| इस मिर्च की खेती एक बीघा में करते हैं| इसकी रोपनी नवम्बर में करते हैं जिससे मार्च तक फल प्राप्त होता है| अन्य फसलें, सब्जी के बाद धान की फसल लगाते हैं सब्जी के पौधे के पत्ते तथा डण्ठल को सड़ा कर खेत तैयार करते हैं, धान की किस्म सीता से मिलती हुयी 2355 है जिसकी नर्सरी 15 दिनों में तैयार हो जाती है, इस किस्म के धान की फसल रोपनी के 90-95 दिनों बाद काटने के तैयार हो जाती है| इसका उत्पादन लगभग 50 क्विंटल प्रति एकड़ होता है| दिलीप सिंह ने बताया कि एक बार रोपायी के समय जैविक खाद लेते हैं तथा दूसरी बार बाली निकलते समयक़ कीटनाशी के रूप में सिर्फ 500 मिली लीटर प्रति एकड़ नीम तेल का छिड़काव करते हैं इससे पौधे में अवशोषण की क्षमता बढ़ जाती है जिससे उत्पादन अधिक होता है़| प्रशिक्षण व वैज्ञानिक सहयोग भारतीय सब्जी अनुसंधान, अदलपुरा वाराणसी में नासिक द्वारा प्रयोजित सब्जी उत्पादन की उन्नतशील तकनीक प्रशिक्षण 2005 कार्यक्रम में शामिल होकर प्रशिक्षण प्राप्त किया़ साथ ही इन संस्थानों के वैज्ञानिकों के सहयोग से खेती को मूर्त रूप दे रहे हैं | दिलीप ने कहा कि हमारी खेती की इस सफलता का श्रेय हमारी मेहनत व लगन के साथ कृषि वैज्ञानिकों द्वारा समय-समय पर मिलने वाले मार्गदर्शन को भी जाता है| बाजार कई राज्यों में दिलीप सिंह ने कहा कि हमारी प्याज कोलकाता में अधिक बिकता है| टमाटर, बैंगन , मिर्च तथा भिंडी आदि खरीदने के लिए झारखंड, वाराणसी, गाजियाबाद तथा हरियाणा के व्यापारी आते हैं| जिन्हें हम अपनी शर्तो पर अपना उत्पादन बेचते हैं, खेती का 80 प्रतिशत जैविक होती है जिससे अधिक कीमत के साथ प्राथमिकता के आधार पर उत्पादक बिकता है| बड़े स्तर पर उत्पादन करने से उत्पादन लागत कम होने के साथ देश की बड़ी मंडियों में भेजने में सहूलियत होती है| इनकी 90 प्रतिशत खेती किराये की भूमि पर होती है, कर्म पर विश्वास करने वाले दिलीप सिंह ने कहा कि हमारी खेती में सब्जी से प्रति एकड़ उपज 50 पचास हजार से लेकर एक लाख पच्चीस हजार रुपये तक है वैसे नफा नुकसान अच्छी फसल व बाजार में अधिक मूल्य मिलने पर निर्भर करता है| इनकी प्रति वर्ष आय लगभग 20 लाख रुपये है इनके खेत में प्रतिदिन पचास से अधिक महिला व पुरुष कामगार काम करते हैं| पुरस्कार व सम्मान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद दिल्ली के वैज्ञानिकों का सहयोग एवं भारतीय सब्जी अनुसंधान, अदलपुरा वाराणसी में 2008 में डीन डा़. आरपी सिंह दूोरा एक किसान के रूप में विशेष जानकारी होने के लिए रजत पदक प्रदान किया| काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सह कृषि प्रदर्शनी में बैंगन लम्बा के सवश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए पहला स्थान प्राप्त किया़| अगस्त में 2010 में पटना में आयोजित ‘सब्जी की आर्गेनिक खेती व प्रमाणीकरण’ कार्यशला में भाग लेकर प्रमाण पत्र प्राप्त किया़ | 2005 में भारतीय सब्जी अनुसंधान वाराणसी द्वारा आयोजित सब्जी उगाने वाले महोत्सव में भी उन्हें पुरस्कार मिला़, इंटरनेशनल फूड प्रोसेसिंग का पुरस्कार 2010 में मिला़ नवार्ड ने भी राज्य स्तरीय किसान पुरस्कार 2011, जगजीवन अभिनव किसान पुरस्कार 2012 में दिया गया| इसके अलावा अच्छी खेती के लिए देश व विदेश स्तर पर भी कई पुरस्कार व सम्मान मिल चुके हैं| लेखक: संदीप कुमार, वरिष्ठ पत्रकार|