बुद्ध के धरती की कर्मठ महिला का प्रयास भगवान विष्णु एवं बुद्ध की धरती पर नक्सल की समस्या से जूझ रहे गांव की महिला जहां घर के चौखट से बाहर निकलने को तरसती हैं वहीं घोड़ाघाट की रजनी श्वेता ने मधुमक्खी पालन करके क्षेत्र के महीलाओं के लिए प्रेरणास्त्राेत बन गयी है। जिसके वजह से गांव व आस पास की महिला व पुरूष किसान मधुमक्खी पालन के लिए प्रशिक्षण के लिए पहुंच रहें हैं। पांच एकड़ खेती कराने वाली इस महिला ने मधुमक्खी पालन के संबंध में बताया कि इसे समाजिक संगठन इम्पावर पीपूल के द्वारा वैशाली एवं गया में प्रशिक्षण दिलवायी गयी। प्रशिक्षण के बाद मुझे यह कार्य काफी अच्छा लगा जिसमें हमारे पति, सास और ससुर का भी भरपुर सहयोग मिला। शहद की मिठास घुल रही जीवन में आजकल बिहार सरकार द्वारा नब्बे प्रतिशत अनुदान पर रानी मधुमक्खी समेत बक्से भी उपलब्ध कराये जा रहें हैं। दस बक्से से मधुमक्खी पालन शुरू करने वाली इस महिला के पास आज एक साल के भीतर पच्चीस बक्से मधुमक्खी हो चुके हैं। जिसका माल बेचने के लिए उन्हें कहीं और नहीं जाना पड़ रहा बल्कि जानकार लोग घर से हीं मधु ले जाते हैं। श्रीमति श्वेता ने बताया कि शुरू में मधुमक्खी उड़ते देख काफी डर लगी, प्ररन्तु प्रशिक्षण के बाद मालूम हो गया की पालतू होने के कारण उसे जब तक छेड़ा नहीं जाता तबतक वे काटता नहीं है। मधुमक्खी काटना भी एक उपचार व इलाज है। स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद-शहद बक्से में तीन तरह के मधुमक्खी होते हैं रानी ,ड्रोन और वर्कर जिसमें वर्कर को सुरक्षा से लेकर रानी के लिए खाना लाने समेत अन्य कई तरह के कार्य होते हैं। रानी के घर को कावेरी का घर जबकि नर के घर को ड्रान का घर कहते हैं। शहद में रसायनिक तत्व फुट्रोज, प्रोटीन , एमीनो एसीड , सुक्रोज , मिनरल ग्लूकोज रासनायिक भस्म एसीड तथा अन्य पदार्थ मौजूद हाते हैं जो प्रकृतिक होती है जिसके कारण यह स्वादिस्ट और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है। आयुर्वेद एवं एलोपैथ के अलावा सभी तरह के दवाओं के साथ पूजा पाठ में इसकी शुद्धता के साथ उपयोग किया जाता है।यह अमृत के समान है। मगर इन्हें इनका दुश्मन चींटी, बिड़नी , गिरिगट अदि से बचाना पड़ता है। कैसे होता है शहद का उत्पादन यह मुख्यत: फूलों पर से पराग एवं मिठी रस को ढोकर अपने बक्से के छत्ते में में इकठ्ठा करती है अधिक फूल वाले सीजन में एक बक्सा पांच से सात किलो शहद प्राप्त होता है। उत्पाद बढने के बाद इसकी उपयोगिता और महतता को लेकर खादी ग्रामोद्योग एवं खुले बाजार समेत विदेशों में काफी मांग है। खादी ग्रामोद्योग के कई पदाधिकारी भी इनसे शहद लेने को तैयार हैं। बाजार में शहद की कीमत दो से ढाई सौ रूपये प्रति किलोग्राम है। इसके लिए प्रोसेंसिंग के लिए गया भेजना पड़ता है। राज्य सरकार से है आशाएं अर्थाभाव के कारण प्रोसेसिंग यूनिट एवं इसकी शुद्धता जांच हेतू लैब आदि का प्लांट स्थापित नहीं कर पा रही हैं। बिहार सरकार और स्थानीय बैंक सहयोग से सहयाेग मिलने पर प्रोसेसिंग प्लांट लगाकर लाखों रूपये सालीना घर बैठे कमा सकती हैं। कल तक पैसों के मोहताज इस महिला की अपनी कमाई से व जानकारी से समाज में मान सम्मान दुगुनी हो गई है। मधुमक्खी पालन से अनुमानित आय 80,000 रूपए प्रति वर्ष है। शायद यही कारण है की इनके पति निलेश भी अपनी पत्नी से प्रभावित हो कर डेयरी प्रोजेक्ट गौ पालन के लिए डेयरी फार्म हेतु प्रयासरत हैं। पढ़ाई के साथ साथ दे रही दूसरी महिलाओं को प्रशिक्षण श्वेता मेट्रिक पास करने के बाद ससुराल से हीं इंटर की पढ़ाई की है और अभी ग्रेजुएशन करने में जुटी हैं। वो कहती है इम्पावर पीपुल ने शहद की मिठास मेरी जिंदगी में घोल दी अब मुङो शहद का मीठास उन तमाम महिलाओं से बाटना है जो गरीबी और मज़बूरी के कारण तस्करी का शिकार हो जाती हैं! ज्ञात रहे की इम्पावर पीपुल बिहार और झारखण्ड में महिलाओं द्वारा घरेलु स्तर पर किये जा सकने वाले छोटे रोजगारों की संभावनाओ पर लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है। इसके कार्यकर्ता सुदूर गाँव में घूम घूम कर लैपटाप पर तस्वीर और वीडियो दिखा कर ग्रामीणों को प्रशिक्षण प्राप्त करने को प्रेरित कर रहे हैं। श्वेता उन्हीं प्रेरित महिलाओ में से एक है जो अब इम्पावर पीपुल के कार्यकर्मो को संयोजन कर रही है। बेरोजगारी से निबटने के लिए वो इस प्रोजेक्ट के अलावा गांव पर ही मशरूम की खेती, वर्मी कम्पोस्ट, जड़ी बूटी की खेति, स्टीविया का पौधा, डेयरी बागवानी जैसे कुटीर उद्योग को शुरू करने का लक्ष्य रखा है। उन्हें आशा है कि शहद से हरित व स्वेत क्रांति की तरह बिहार और झारखण्ड के पिछडे इलाकों में एक स्वर्णिम क्रांति लायी जा सकती है। ताकि समाज का युवा अपनी मिटटी से स्वयं ही सोना उगा सकें। स्त्रोत : संदीप कुमार, वरिष्ठ पत्रकार, पटना,बिहार