भूमिका बिहार राज्य के जिले के बोचहां प्रखंड में शहद उत्पादन में बड़ी संख्या में महिलाएं अपना योगदान दे रही हैं।सन् 2011 में शुरू हुए इस काम को पहले आधी आबादी कोई खास ध्यान नहीं दे रही थी़ शहद उत्पादन करने में लगी नीलम शर्मा बताती हैं, लीची का उत्पादन होने से इस इलाके में किसी और काम को करने के लिए ध्यान नहीं रहता था़ हालांकि हमलोग कुछ काम करना चाहती थी, लेकिन क्या करे, कैसे करें? इस बात को बताने वाला कोई नहीं था़।इलाके में कुछ लोग पहले से यह काम करते थे लेकिन बहुत सीमित मात्र में उनका द्वारा किये जा रहे काम का कोई वैज्ञानिक तरीका भी नहीं था़।इसी दौरान गांव में एक संस्था ने महिलाओं को काम करने के लिए पहल की़। तरक्की के लिए मिला सहयोग नीलम बताती हैं कि लीची का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने के कारण क्षेत्र में बाग बगीचों की कमी नहीं थी़, इसलिए शहद के उत्पादन की बात सोची गयी़।इसके लिए संस्था ने ही अपने स्तर पर करीब 45 महिलाओं का ग्रुप ‘चांद जीविका कपरेटिव सोसायटी’ बनाया़ सभी को शहद उत्पादन से होने वाले आर्थिक लाभ के बारे में बताया गया़ इसके लिए कैसे और किस स्तर पर वैज्ञानिक तरीका अपनाना होगा? यह भी बताया गयी़। महिलाओं की उत्सुकता और जागरूकता को देखते हुए संस्था ने इन्हें प्रशिक्षण देने का फैसला किया़ इसके लिए किसान विकास केंद्र की सहायता ली गयी़ साथ ही उत्पादन संबंधित हर पहलू की पूरी जानकारी हो, इसके लिए राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय का भी समय-समय पर दौरा कराया जाता है नीलम बताती है, ये दौरे ज्यादातर अफ सीजन में ही होते हैं। अधिक मात्रा में हो रहा उत्पादन शहद उत्पादन के काम में ही लगी मंजू देवी कहती हैं, शुरू में करीब 45 महिलाओं ने इस सोसायटी से जुड़ कर जब काम शुरू किया तो इसका अपेक्षित परिणाम सामने आया़ एक साल बाद ही इनकी संख्या बढ़ कर पांच सौ हो गयी़। पहले से इस काम में लगी इन महिलाओं से संपर्क में आने के बाद नयी महिलाएं खुद जुड़ने लगी हैं।सभी बोचहां प्रखंड कीहैइन महिलाओं को संस्था ने अपने स्तर पर दस - दस बॉक्स उपलब्ध कराये है।गुणवत्ता और जरूरत के हिसाब से एक बक्से की कीमत तीन से चार हजार रुपये तक होती है।ये महिलाओं कई तरह की शहद का उत्पादन कर रही हैं।प्रमुख तौर पर मार्च और अप्रैल में लीची की शहद और मई-जून में करंज की शहद का उत्पादन किया जा रहा है।इसके अलावे सरसों, मूंग और दलहन से भी शहद का उत्पादन हो रहा है एक सीजन में प्रत्येक बक्से से 30 से 35 किलो तक शहद की प्राप्ति होती है। बड़ी कंपनियों ने दिखाई रुचि शहद की इतनी बड़ी मात्र में उत्पादन होने खबर मिलने पर कई बड़ी कंपनियों ने इसे खरीदने को लेकर अपनी रुचि दिखायी है नीलम शर्मा बताती हैं, पहले अच्छी गुणवत्ता वाली शहद होती थी या कम गुणवत्ता वाली़ सबकी बिक्री स्थानीय बाजारों में ही होती थी़ एक ही दाम पर इसे बेचना हमारी मजबूरी होती थी़।हमारे काम की खबर बड़ी कंपनियों तक पहुंची तो उन्होंने इसे खरीदने के लिए खुद पहल की़ इसमें संस्था ने मदद की।कई कंपनियों से बात हो रही है इसमें से डाबर ने हमारे शहद को खरीदने के लिए हामी भर दी है।इसी साल हमारा समझौता हुआ है अगले पांच सालों तक कंपनी हमसे शहद खरीदेगी़ गुणवत्ता वाली शहद का और ज्यादा उत्पादन कैसे हो? इसका रख रखाव कैसे हो? इसके लिए भी कंपनी सहयोग कर रही है इसके वैज्ञानिक निश्चित समय पर आ कर हमें जरूरी बातें बताते रहते हैं।नीलम कहती हैं, स्थानीय बाजारों में कम दर पर ही शहद को बेचना होता था, लेकिन कंपनी इसकी श्रेणी बनाने के बाद खुद दर तय कर देती है।महिलाओं की भी पूरी कोशिश है कि इतनी बड़ी कंपनी से जुड़ने से बढ़िया उत्पादन पर विशेष ध्यान देना होगा़। एकमुश्त मिलेगा भुगतान शहद उत्पादन में लगी महिलाएं बताती हैं, कंपनी से जुड़ने के पहले इसके दर में कुछ उतार-चढ़ाव होते रहते थ़े पिछले साल कच्ची शहद का जहां 80 से 90 रुपये प्रति किलो की दर से बिका था, वहीं इस साल इसका मूल्य 120 से 140 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है, फिर भी यह कंपनी द्वारा तय किये गये दर कम है।थोक मात्र में शहद खरीदने के बाद इसका भुगतान चेक के माध्यम से संस्था द्वारा खुलवाये गये खाते में होगा़। जिम्मेदारी की होती है प्राथमिकता बक्से में मधुमक्खियां बराबर आती रहें, इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। साथ ही शहद की मात्र में वृद्घि को लेकर भी काफी जागरूक रहना होता है। बक्से को कई बार एक से दूसरे स्थान पर रखना भी पड़ता है हालांकि ऐसे बहुत कम होता है लेकिन इस को लेकर महिलाएं काफी सजग रहती हैं।अपनी मेहनत का सुखद परिणाम मिलते देख दूसरे प्रखंड की महिलाएं भी इस काम को शुरू करने के लिए पहल कर रही हैं इसमें संस्था का भी सहयोग मिल रहा है बोचहां के बाद यह काम अब सकरा प्रखंड में शुरू होने वाला है। बह रही है बदलाव की बयार छोटे स्तर पर काम कर के बड़ी कंपनियों तक अपनी मेहनत की धमक दिखाने के बाद आधी आबादी में अब बदलाव दिख रहा है। सकारात्मक संकेत मिलने से उत्साहित इन महिलाओं में बहुत बदलाव आया है।कड़ी मेहनत के दम पर खुद अपनी पहचान बना रही ये महिलाएं अपनी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो रही हैं।काम के साथ रोजमर्रा के जीवन में भी क्या गलत है और क्या सही? इसे समझने में भी सक्षम हो रही हैं। लेखक: संदीप कुमार, वरिष्ठ पत्रकार। मधुमक्खी पालन में जुटीं महिलाएं, कैसे बना रही है अपना भविष्य : देखिए यह विडियो