भूमिका अपने काम मुर्गीपालन के बारे में नीतू बताती है कि उन्होंने सन् 2013 के अप्रैल माह में मुर्गी पालन करने की सोची| उनके मुताबिक घर में पैसे की तंगी रहती थी| इसलिए कुछ और अलग करने का विचार मन में था| इसके लिए मुर्गी पालन करने को सोची लेकिन अब दिक्कत यह थी कि मुर्गी पालन कैसे हो? कहां से चूजे आएंगे, उनका दाना क्या है? कैसे खिलाना होगा ? इस बात की कोई जानकारी नहीं थी| इस बारे में जानकारी कहां से मिलेगी इस बात की बहुत दिक्कत थी| फिर उन्हें यह पता चला कि कोई एक सहकारी समिति है जो वैसी महिलाओं का मार्गदर्शन करती है जो अपने दम पर कुछ अलग करना चाहती है| नीतू ने उस समिति से मुलाकात किया और फिर अपना काम शुरू कर दिया| शुरू में हुई परेशानी नीतू बताती है कि समिति से तो मुर्गीपालन के बारे में तो जानकारी मिल गयी थी कि क्या करना है? कैसे करना है?लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि इस काम में जितना पैसा लगना था उसका कहां से जुगाड़ हो| पॉल्ट्री फॉर्म बनाने के विचार के साथ ही परेशानी प्रारंभ हो गयी| वो कहती है कि पहले तो उन्होने गांव से ही पैसा लेने की कोशिश की लेकिन कोई पैसा देने को तैयार नहीं हुआ| कोई तैयार भी होता था तो उसका ब्याज बहुत ज्यादा होता था| ऐसे में नीतू का साथ फिर उसी समिति ने दिया जिसने मुर्गीपालन के बारे में जानकारी दी थी| नीतू बताती है कि वो समूह से जुड़ गयी और वहीं से कुछ पैसा लेने के लिए सोचने लगी| वो बताती है कि समूह की सभी महिलाएं प्रति माह 50 रुपये बचत कर के जमा करती है| इनसे जब नीतू ने अपने काम के बारे में बताया तो उन्होने नीतू को मदद किया| उनके पैसे और अपने पास के कुछ पैसे को मिला नीतू ने मुर्गीपालन के काम की शुरुआत की| वो कहती है कि इस काम में एक लाख रुपये लग गये| खुद करती हैं सारा काम मुर्गी पालन जैसे दुश्वार काम को नीतू अकेले की करती है चाहे वह चूजे को खरीद कर लाना हो या फिर चूजे की देखभाल करना| चूजे के दाम के बारे में पूछने पर वह कहती है कि 30-35 रुपये में एक चूजा मिलता है| उन्होंने अपने काम की शुरुआत 500 चूजे के साथ किया था| आज उनके पास 1600 के करीब चूजे है जो पल रहे है| चूजे के दाना पानी के बारे में वो कहती है कि चूजा के बढ़ने के साथ ही उनका दाना भी बदलते रहता है और हर बदलते दाना का मूल्य अलग है| जैसे इन चूजों को तीन बार दाना देना पड़ता है और अगर चूजे ज्यादा छोटे है तो उनको चार बार भी दाना देना पड़ता है| छोटे चूजे के लिए जो दाना आता है उसका मूल्य 1675 रुपये प्रति बोरा है| बोरे का वजन 50 किलो होता है| उसके बाद के चूजे के लिए लगने वाला दाना 2210 रुपये प्रति बोरा मिलता है जिसका वजन 70 किलोग्राम होता है| सबसे अंत में फिनिशियर दाना दिया जाता है जिसका मूल्य 2160 रुपये प्रति बोरा आता है| इसका वजन 70 किलोग्राम होता है| इसके अलावा बदलते मौसम का असर चूजे पर ना हो इस बात का भी ख्याल रखा जाता है| जैसे ठंड में खिड़की बंद रख के फॉर्म के अंदर गर्मी रखने के लिए लकड़ी जलायी जाती है वैसे ही गर्मी में लू से बचाने के लिए भी उचित उपाय किया जाता है| नीतू यह सारा काम अकेले करती है| राज्य के अन्य जिलों में भी होती है मुर्गे की आपूर्ति चूजे जब बड़े हो जाते है तो उनको बाजार में ले जाने के लिए भी नीतू ही पहल करती है| उनके इस काम में टेहटा का व्यापारी सहयोग करते हैं| वो कहती है कि जिन व्यापारियों के पास से वह चूजे के लिए दाना खरीद कर लाती है वही व्यापारी उनके मुर्गा खरीद लेते है| वह अपनी गाड़ी लेकर आते है और मुर्गा लेकर चले जाते है| नीतू के पॉल्ट्री फॉर्म में तैयार हुए चूजे नजदीक के टेहटा इलाके के अलावा गया, जहानाबाद और आस-पास के जिलों में व्यापारी आपूर्ति करते है| लोगों ने खड़े किये थे सवाल, अब आते हैं पूछने ये पूछने पर की जब आपने मुर्गी पालन जैसे काम को जीवन यापन के लिए चुना तो गांव के लोगों की क्या प्रतिक्रिया थी? नीतू कहती है कि प्रतिक्रिया तो बहुत कुछ सुनने को मिला| लोग कहते थे कि अकेली महिला हो कैसे यह सब काम करोगी? वो कहती है लोगों की बात सुन के शुरू में अजीब तो लगा था लेकिन मन में यही था कि कुछ अलग करना है| वो यह भी कहती है कि कुछ लोगों ने तो इसे धर्म से भी जोड़ दिया कि हिन्दू धर्म में मुर्गी पालन नहीं होता| और जब आज मैं अपने काम में सफल हूँ तो यही लोग अब मुझसे पूछने आते है कि कैसे काम शुरू किया था हमें भी बताओ| वो बताती है कि रोज कम से कम तीन-चार लोग तो पूछने आ जाते हैं कुछ और करने का है इरादा मुर्गी पालने जैसे काम में खुद को साबित करने के बाद नीतू का उत्साह बढ़ गया है| वो कहती है कि वह जल्द ही एक और मुर्गी फॉर्म बना रही हैं साथ ही अपने खेत में ही मछलीपालन करने की योजना पर भी ध्यान दें रही हैं| नीतू के लिए एक खुशी की बात यह भी है कि पहले उनके पति जो कि दूसरे राज्यों में रोजगार की तलाश में जाते थे| मुर्गीपालन का काम शुरू होने के बाद वह अब घर पर ही रह के उनके काम में हाथ बंटाते हैं| लेखक: संदीप कुमार, वरिष्ठ पत्रकार|