परिचय परंपरागत फसलों के मुकाबले सब्जी वाली फसलें हमेशा से ही ज्यादा मुनाफा देने वाली साबित होती आई हैं, उन्हें वैज्ञानिक और उन्नत तरीके से उगाया जाए| इस के लिए जरूरी है मेहनत, जोखिम उठाना और सही जानकारियाँ मिलना, जो आमतौर पर एजेंसियों के माहिर ही दे पाते हैं| गेहूं और सोयाबीन की खेती के लिए मशहूर विदिशा जिले की सिरोंज तहसील के गाँव विशेपूर की किसान रूक्मणी कूशवाहा और कठेतिया गाँव की गुड्डीबाई ने हिम्मत करते हुए ठान लिया कि एक बार जरूर ऐसी फसल लेंगी| जो एक मौसम में ही साल भर के बराबर आमदनी दे सके| इस के लिए उन्होंने माहिरों के मशवरे पर मिर्च को चुना| हालाँकि फैसला लेते वक्त दोनों के मन में डर भी था कि कहीं ऐसा न हो कि मिर्च वैसी न लगे जैसा की माहिर बता रहे हैं| जिला गरीबी उन्मूलन योजना की रही प्रमुख भूमिका डीपीआईपी (जिला गरीबी उन्मूलन योजना) महकमे के अफसरों की सलाह पर रूक्मणी और गुड्डीबाई ने खेत की तैयारी की, उर्वरकों और कीटनाशकों के इंतजाम किए, सिंचाई की व्यवस्था की गई और हाइब्रिड किस्म अंकुर 309 की बोआई कर दी| ज्यादा पैदावार लेने के लिए उन्होंने ड्रिप सिस्टम से सिंचाई की और खेती के लिए मल्चिंग पद्धति का सहारा लिया| इस काम में डीपीआईपी के एक अफसर विनय सिंग ने उन की पूरी मदद की और समय समय पर मशवरा भी दिया| काम मुश्किल नहीं था| रूक्मणी बताती हैं कि लागत शुरू में ज्यादा लग रही थी| 1 बीघा में 20 हजार रूपए खर्च करना मुझे घाटे का सौदा लग रहा था| बीज और कीटनाशक मंहगे थे| रोजाना की मेहनत और देखभाल भी भारी पड़ रही थी| जैसा माहिरों ने बताया था उसी के मुताबिक उन्होंने खेत की जुताई की और मिर्च के पौधों और लाइनों की दूरी रखी| उन्होंने दिन सिंचाई की| मेहनत रंग लाने लगी जैसे जैसे मिर्च की फसल बढ़ती जा रही थी, खेत भी सलीकेदार और खूबसूरत दिखने लगा था| मिर्च इतने सलीके से लगाई गई थी कि इस की चर्चा जिले भर में हुई और लोग रूक्मणी और गुड्डीबाई का पता पूछते हुए विशेपूर और कठेतिया जाने लगे| बीते अगस्त की शूरूआत में जब मिर्च में फूल आने सूरू हुए, तो रूक्मणी और उन के घर वालों की उम्मीदें भी खिलने लगीं| इस से पहले वे उम्मीदें भी खिलने लगीं| इस स पहले वे भी रोजाना खेत में खोद मजदूरों की तरह निराई गूराई करते और खरपतवार निकालते थे, जिस से फसल की बढ़वार अच्छी हुई| केमिकल खादें तो बोआई के वक्त डाली ही गई थी, पर जैसा माहिरों ने कहा था फसल में केंचुए की खाद भी दी गई| गुड्डीबाई बताती हैं कि केंचुए की खाद उन्होंने घट पर ही तैयार की और डीएपी, यूरिया और म्यूरेट ऑफ पोटाश बाजार से खरीदे| जब मिर्च तोड़ने लायक हो गई, तो ऐसा लगा रहा था मानो हरा सोना लहलहा रहा है| हर पेड़ पर इफरात से मिर्च लगी थीं, जिन्हें वे रोजाना तोड़ कर मंडी ले जाती थीं| रोजाना खासे पैसे आने लगे, जिन का हिसाब रूक्मणी और गुड्डीबाई ने लगाया तो पाया की 20-22 हजार रूपए के करीब की लागत कूक ही दिनों में निकल चुकी है| अब फसल के आखिर तक जो मिले वह मेहताना भी होगा और मुनाफा भी| बीती 15 सितंबर तक 1 बीघे में बोई गई उन की मिर्च 80 हजार से ज्यादा मुनाफा दे चुकी थी| यह फसल अगर 1 हेक्टेयर में लगाई जाती. तो की गुना भी देखा देखी मिर्च उगा रहे हैं| गुड्डीबाई ने रूक्मणी की देखा देखी अपने खेत में हाइब्रिड किस्म अंकुर लगाई थी| गुड्डीबाई बताती हैं कि अभी मिर्च दिवाली की बाद तक फलेगी यानी और भी मुनाफा मिलेगा| अगर आप भी रूक्मणी और गुड्डीबाई की तरह मिर्च से मालामाल होना चाहते हैं, तो गुड्डीबाई आप को मिर्च की उन्नत खेती के तौर तरीका बताने को तैयार हैं उन का मोबाइल नम्बर है 09009253837| क्या है ड्रिप मल्चिंग का तरीका खेती किसानी की मल्चिंग पद्धति देश में बड़े पैमाने पर नहीं अपने जाती, विदिशा के नतीजों ने सोचने पर मजबूर किया है कि अगर इसे बड़े पैमाने पर अपनाया जाए तो खासा पैसा कमाया जा सकता है| ड्रिप मल्चिंग के माहिर विनय सिंह बताते हैं कि किसानों को समझा बूझा कर तैयार कर पाना टेढ़ी खीर था, पर कुछ किसानों ने बात मानी और फायदा उठाया| इस सिस्टम में खेत को प्लास्टिक बेड़ों से ढक दिया जाता है, जिसे खेत में नमी बनी रहती है और खरपतवार नहीं पनप पाते है| प्लास्टिक के बेड अलग अलग साइजों, मिलते हैं| इन में से 2200 वर्ग फूट साइज ज्यादा इस्तेमाल होता है| इन बेडों के बीच में तयशुदा दूरी पर छेद होते हैं| जिन में पौधा रोपा जाता हैं और रासायनिक खादें भी दी जाती हैं| सिंचाई ड्रिप सिस्टम से ही की जाती है, जो आजकल आम है| हरी मिर्च की खेती कैसे करें स्रोत: फार्म एन फ़ूड/ जेवियर समाज संस्थान, राँची