शून्य जुताई द्वारा इंफाल में तोरिया सरसों की उपज में वृद्धि पूर्व स्थिति एवं नई शुरुआत वर्ष 2011 की रबी फसल के दौरान जनजातीय उप योजना के अंतर्गत सरसों अनुसंधान निदेशालय (डीआरएमआर), भरतपुर के सहयोग से शिक्षा विस्तार निदेशालय, केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (सीएयू), इंफाल ने “उत्तर-पूर्वी राज्यों के आदिवासी किसानों की स्थायी आजीविका सुरक्षा के लिए सरसों उत्पादन में वृद्धि” नामक परियोजना को लागू किया। रबी की फसल में सिंचाई सुविधाओं की कमी और वर्षा की अनिश्चितता के कारण मणिपुर के किसान रबी की फसल नहीं लेते थे जिसके कारण नवंबर से जून के बीच चावल की फसल के बाद खेत खाली रह जाते थे। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए तोरिया सरसों की किस्मों एम-27, टीएस-36 और रागिनी तथा सरसों की किस्मों पूसा अग्रणी, पूसा महक, एनआरसीएचबी-101 और एनपीजे-112 को 55 हैक्टर क्षेत्र में शून्य जुताई तकनीक से बोया गया एवं पारंपरिक जुताई से 40 हैक्टर में की गई फसल से इसकी तुलना की गई। शून्य जुताई तकनीक यद्यपि फसल के दौरान वर्षा नहीं हुई परन्तु चावल की फसल के बाद मिट्टी में मौजूद नमीं के कारण इन किस्मों से पारंपरिक जुताई तकनीक की अपेक्षा शून्य जुताई तकनीक से अच्छी पैदावार प्राप्त हुई। किस्मों के चयन परीक्षण के अंतर्गत पीली सरसों और रागिनी की उपज 10 क्विंटल प्रति हैक्टर के औसत के साथ सर्वाधिक रही जबकि एनआरसीएचबी-101 द्वारा सरसों की किस्मों में 10.2 क्विंटल प्रति हैक्टर के औसत के साथ सर्वाधिक उपज दी। जैविक शहद तैयार करने के लिए तोरिया सरसों के खिलने पर प्रति हैक्टर चार मधुमक्खियों की कॉलोनी भी बनाई गईं। भ्रमण इस परियोजना में पूर्वी इंफाल जिले के नौ गांवों के 172 किसान शामिल थे। परियोजना द्वारा साढ़े तीन माह के कम समय में किसानों ने केवल 7800 रुपये प्रति हैक्टर की कम लागत पर शहद की कीमत सहित लगभग 27000 रुपये प्रति हैक्टर का शुद्ध लाभ अर्जित किया। सभी किसानों ने खेतों पर आठ तथा संस्थान में दो प्रशिक्षण सत्रों में भाग लिया। साथ ही, 60 किसानों को जागरूक करने के लिए डीआरएमआर, भरतपुर की यात्रा भी करवाई गई। वर्तमान स्थिति उच्च उत्पादकता वाली सरसों की किस्मों जैसे एनआरसीएचबी-101, पूसा अग्रणी आदि की वैज्ञानिक विधि से खेती को लोकप्रिय बनाने के लिए सीएयू ने तीन गावों में लघु सिंचाई प्रणालियों युक्त तीन जल संचयन संरचनाओं का निर्माण किया है। वर्ष 2012 के रबी फसल काल में शून्य जुताई की इस अभिनव तकनीक से साथ के जिलों के किसान भी प्रभावित हुए हैं और तीन जिलों में लगभग 1000 हैक्टर में इस तकनीक से खेती की जा रही है। स्त्रोत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद,सीएयू, इंफाल और डीआरएमआर, भरतपुर।