गेहूं और मूंग की खेती का रकबा भारत में गेहूं की खेती लगभग 30 मिलियन हैक्टर क्षेत्रफल में होती है। मध्य प्रदेश में लगभग 60 लाख हैक्टर क्षेत्र गेहूं के अंतर्गत आता है। इस रकबे का कम या ज्यादा होना प्रत्येक वर्ष की वर्षा पर निर्भर करता है। यहां पर गेहूं का औसत उत्पादन 18 क्विंटल प्रति हैक्टर है। देश का औसत उत्पादन 29 क्विंटल प्रति हैक्टर है, जो कि यहां के औसत उत्पादन से कहीं ज्यादा है। गेहूं के कम उत्पादन होने के प्रमुख कारणों में, बुआई के समय अधिक तापमान, फसल अवधि औसतन 125 दिनों से कम एवं सिंचाई जल की कमी का उल्लेख किया जा सकता है। वर्तमान में प्रदेश में 70 प्रतिशत रकबे में यह फसल अर्ध्द एवं सिंचित दशा में उगाई जा रही है। उन्नत किस्म एवं उत्पादन तकनीकी तथा एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन अपनाकर निश्चित तौर पर उत्पादन में आशातीत वृद्धि की जा सकती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश में गेहूं उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। केस अध्ययन- जबलपुर में कृषि जबलपुर जिले में सिंचाई संसाधनों के विकास के साथ फसल सघनता में आशातीत वृद्धि हो रही है। वर्तमान में जिले में गेहूं की खेती लगभग एक लाख हैक्टर क्षेत्रफल में की जा रही है। धान-गेहूं फसल प्रणाली में ग्रीष्मकालीन मूंग का रकबा भी तेजी से बढ़ रहा है। धान की कटाई के बाद गेहूं की बुआई के लिए खेत की तैयारी करना श्रम साध्य, अधिक लागत के साथ ज्यादा समय चाहने वाली एक आवश्यक कृषि क्रिया है। इसके साथ ही गेहूं की बुआई में अवांछित विलंब के कारण कम उत्पादन एवं ग्रीष्मकालीन फसलों की देरी से बुआई के कारण किसानों को बहुत कम उत्पादकता प्राप्त होती है। जीरो टिलेज तकनीक के प्रभावी प्रदर्शन किसानों की इस व्यावहारिक कठिनाई का समाधान कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा जीरो टिलेज तकनीक के प्रभावी प्रदर्शन एवं तकनीकी के प्रचार-प्रसार द्वारा संभव हो सका है। गहरी काली भारी मृदाओं में धान की कटाई के उपरांत, परंपरागत ढंग से खेत की तैयारी करके आगामी गेहूं फसल की बुआई करने में 20 से 25 दिनों का समय लग जाता है। इसी प्रकार गेहूं की कटाई के उपरांत आगामी ग्रीष्मकालीन मूंग-उड़द के लिए खेत की तैयारी कर बुआई करने में 10 से 15 दिनों का समय लग जाता है। इस बहुमूल्य समय की बचत करने के लिए हैप्पी टर्बो सीडर का प्रयोग लाभकारी सिद्ध हुआ है। हैप्पी टर्बो सीडर का प्रयोग करके जीरो टिलेज तकनीक से बुआई करने पर निजात मिलती है। सिंचाई जल की बचत होती है एवं मृदा में संरक्षित नमी का बेहतर उपयोग होता है। खेत की तैयारी के लिए ट्रैक्टर में प्रयुक्त होने वाले डीजल की बचत होती है। जीरो टिलेज तकनीकी प्रदर्शन से प्राप्त परिणामों का विश्लेषण केन्द्र द्वारा जिले के विभिन्न विकास खंडों में धान-गेहूं एवं धान-गेहूं-ग्रीष्मकालीन मूंग फसल प्रणाली में क्रमशः गेहूं एवं मूंग में हैप्पी टर्बो सीडर द्वारा जीरो टिलेज तकनीक से बुआई पर तकनीकी प्रदर्शन आयोजित किए गए। इससे प्राप्त परिणाम सारणीवार प्रदर्शित हैं। धान फसल कटाई के बाद गेहूं एवं ग्रीष्मकालीन मूंग विवरण सारणी 1. धान फसल कटाई के बाद गेहूं एवं ग्रीष्मकालीन मूंग विवरण विवरण गेहूँ मूंग किस्म जी.डब्ल्यू-322 जी.डब्ल्यू-273 पी.डी.एम.-139 आई.पी.एम. 02-03 उपज (क्विंटल/हैक्टर) 44.5 11.69 बुआई के लिए दिनों की बचत 20 दिन 15 दिन सिंचाई जल की बचत/हैक्टर (एक सिंचाई एक इंच गहराई का जल) 9075 घन फुट 9075 घन फुट लाभःलागत अनुपात 2.98 3.66 जीरो टिलेज तकनीक का क्षैतिज प्रसार सारणी 2. जीरो टिलेज तकनीक का क्षैतिज प्रसार फसल किस्म फसल किस्म तकनीक अंगीकरण वाले ग्रामों की संख्या तकनीकी अपनाने वाले किसानों की संख्या तकनीकी के अंतर्गत क्षेत्र (हैक्टर) औसत उपज (क्विं./ है.) शुद्ध लाभ (रुपये/ हैक्टर) लाभः लागत अनुपात गेहूं जी.डब्ल्यू-322 86 775 3550 44.8 59217 2.98 मूंग पी.डी.एम.-139 आई.पी.एम. 02-03 105 1655 2835 11.75 41730 3.66 जीरो टिलेज तकनीक अपनाने से परंपरागत पद्धति में प्रयुक्त होने वाले डीजल की बचत सारणी 3. जीरो टिलेज तकनीक अपनाने से परंपरागत पद्धति में प्रयुक्त होने वाले डीजल की बचत फसल प्रणाली डीजल उपभोग डीजल की बचत परंपरागत ढंग से खेतकी तैयार एवं बुआई-52(लीटर/हैक्टर) जीरो टिलीेज तकनीकसे बुआई-12.5(लीटर/हैक्टर) धान-गेहूं: 3550 हैक्टर 1,84,600 लीटर 44,375 लीटर 1,40,225 लीटर गेहू-मूंगः 835 हैक्टर 1,47,420 लीटर 35,437.5 लीटर 1,11,982.5 लीटर कुल डीजल बचत 2,52,207.5 लीटर जीरो टिलेज तकनीक अपनाने से होने वाली सिंचाई जल बचत सारणी 4. जीरो टिलेज तकनीक अपनाने से होने वाली सिंचाई जल बचत फसल सिंचाई जल की बचत सिंचाई कार्य की लागत(रु./है) सिंचाई लागत में बचत (रुपये में) गेहूं 9075 घनफुट/हैक्टर × 3550 हैक्टर=3.222 करोड़ घनफुट 1000 3550 × 1000 =35.5 लाख ग्रीष्मकालीन मूंग 9075 घनफुट/हैक्टर × 2835 हैक्टर =2.573 करोड़ घनफुट 1000 12835 × 1000 = 28.35 लाख जीरो टिलेज तकनीक का धान-गेहूँ- ग्रीष्मकालीन मूंग फसल प्रणाली पर प्रभाव जिले में तकनीकी अंगीकरण से धान-गेहूं (जीरो टिलेज तकनीक क्षेत्रफल-3550 हैक्टर), धान-गेहूं-मूंग (जीरो टिलेज तकनीक रकबा-2835 हैक्टर) फसल प्रणालियों में कुल 252207.5 लीटर डीजल की बचत। सिंचाई जल संरक्षण तकनीकी अंगीकरण से धान-गेहूं-मूंग फसल प्रणाली में 5.795 करोड़ घनपफुट सिंचाई जल की बचत। ऊर्जा संरक्षण जिले में सिंचाई के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले बहुमूल्य संसाधन विद्युत की 38310 किलोवाट की बचत। पर्यावरण पर दुष्प्रभाव में कमी 252207.5 लीटर डीजल की बचत से वायु प्रदूषण में कमी। सामाजिक प्रभाव धान-गेहूं-ग्रीष्मकालीन मूंग फसल प्रणाली अपनाने से एक फसल वर्ष में औसत 35 दिनों की बचत होने से किसानों के पास अन्य गतिविधियों के लिए समय की उपलब्धता। स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), लेखक :ए.के. सिंह, डी.के. सिंह, नितिन सिंघई, सिद्धार्थ नायक और मोनी थॉमस कृषि विज्ञान केन्द्र, जबलपुर, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर (मध्यप्रदेश)।