एक उचित विकल्प सूक्ष्म सिंचाई पद्धति, फव्वारा सिंचाई जल की मांग-आपूर्ति के बीच अंतर कम करने एवं इसकी उपयोग दक्षता बढ़ाने का एक उचित विकल्प है। पिछले 3 वर्षों में सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत आच्छादित क्षेत्रफल में काफी बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2017-18 में यह क्षेत्रफल बढ़कर 9.2 मिलियन हैक्टर हो गया है। इसमें सुधार और किसानों के बीच इसके प्रसार के लिए और अधिक समन्वित प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। सिंचाई की उन्नत विधियां (फव्वारा एवं टपक) एवं अधिक कृषि क्षेत्रफल कृषि एवं पशुपालन में जल एक महत्वपूर्ण उत्पादन कारक है। इन कारकों की मात्राात्मक वृद्धि एवं इनकी प्रयोग दक्षता बढ़ाने में भी जल काफी सहायक होता है। देश में कुल उपलब्ध जल का लगभग 78 प्रतिशत हिस्सा कृषि में सिंचाई के रूप में प्रयुक्त होता है। जल की घटती उपलब्धता(मानसूनी वर्षा में आ रही गिरावट एवं अनियमिता), जलवायु परिवर्तन तथा अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों की बढ़ती मांग, भविष्य में जल की भारी कमी की तरफ संकेत करते हैं। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2050 तक कृषि में जल की उपलब्धता घटकर 68 प्रतिशत तक आने की आशंका है। नीति आयोग की रिपोर्ट में देश में जल की भयावह स्थिति के बारे में बताया गया है। अन्य वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर कृषि में जल की खपत को 50 प्रतिशत स नीचे लाने की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है। खेती में सिंचाई के लिए भूजल का लगभग एक तिहाई हिस्सा उपयोग किय जाता है। भूजल के अंधाधुंध दोहन के कारण इसके स्तर में तेजी से गिरावट आ रही है। सिंचाई की परंपरागत विधि (प्रवाह विधि) में अधिक जल खपत के कारण भी जल की उपयोग दक्षता पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। इसके अतिरिक्त सिंचाई क्षेत्र में सभी स्तरों (सरकारी एवं निजी) पर अथक प्रयास के बावजूद अभी भी देश के शुष्क कृषि क्षेत्रफल के आधे से कम (49 प्रतिशत) हिस्से में सिंचाई सुविधा सृजित की जा सकी है। शेष बुआई क्षेत्रफल मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहता है। जलवायु परिवर्तन का असिंचित (बारानी) क्षेत्रों पर सर्वाधिक असर होता है। एक अनुमान के अनुसार बारानी फसलों से प्राप्त वार्षिक आमदनी सिंचित क्षेत्रों की अपेक्षा 25-30 प्रतिशत कम होती है। ऐसी स्थिति में सिंचाई की उन्नत विधियों (फव्वारा एवं टपक) के तहत अधिक कृषि क्षेत्रफल को लाने की आवश्यकता है। इससे उपलब्ध जल का समुचित एवं लाभकारी प्रयोग हो सकेगा तथा प्रति बूंद अधिक उपज एवं आमदनी प्राप्त की जा सकेगी। अतएव कृषि में जल की उपलब्धता बनाये रखने, अधिक क्षेत्रफल में सिंचाई करन तथा लागत में कमी लाने के लिए फव्वारा सिंचाई विधि खाद्यान्न फसलों के लिए एक उचित विकल्प है। इस सिंचाई पद्धति में जल को छिड़काव के रूप में फसलों को दिया जाता है। इससे जल पौधों पर बारिश की बूंदों की तरह पड़ता है एवं खेत में जल भराव भी नहीं होता है। इस विधि से सिंचाई भूमि के ढलान के अनुरूप की जा सकती है एवं मृदा संरक्षण में सहायता मिलती है। सिंचाई की इस पद्धति में पौधों को समान मात्र में जल मिलता है, जिससे उनकी समान वृद्धि से अधिक उत्पादकता सुनिश्चित होती है। अनाज फसलों के अतिरिक्त दलहनी एवं तिलहनी फसलों के लिए भी यह विधि बहुत उपयोगी है। इन फसलों में कम जल की आवश्यकता होती है। प्रस्तुत लेख में फव्वारा सिंचाई पद्धति से प्राप्त लाभ का आकलन प्रक्षेत्र स्तर पर किसानों से एकत्र आंकड़ों पर आधारित है, जिसे राजस्थान राज्य के बीकानेर जिले से एकत्र किया गया। ये आंकड़े कृषि वर्ष 2017-18 से संबंधित हैं। बीकानेर जिले में फव्वारा सिंचाई पद्धति प्रमुखता से अपनायी जा रही है। इससे होने वाले लाभ के आकलन के लिए यादृच्छिक विधि से चयनित 120 किसानों से आंकड़े एकत्रित किए गए। आंकड़ों का संग्रहणीकरण भाकृअनुप-राष्ट्रीय कृषि आर्थिकी एवं नीति अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा एक प्रक्षेत्र सर्वेक्षण के तहत किया गया। चयनित किसानों के समूह में अंगीकृत तथा गैर अंगीकृत करने वाले दोनों प्रकार के किसानों से सूचनाएं संग्रहित की गईं। सारणी 1. फव्वारा सिंचाई अपनाने के बाद कृषि क्षेत्रफल एवं उपज में अंतर का आकलन फसल औसत कृषि क्षेत्रफल (हैक्टर) अंतर औसत उपज (क्विंटल/हैक्टर) अंतर अंगीकृत करने वाले किसान अन्य किसान अंगीकृत करने वाले किसान अन्य किसान खरीफ फसलें ग्वार 3.36 2.37 0.99 (41.८) 13.54 11.74 1.80 (15.३) माेथ 2.70 2.70 0.00 11.48 8.80 2.68 (30.5) बाजरा 2.64 1.16 1.58 (149.१) 11.76 8.33 3.43 (41.2) मूंग 2.90 1.80 1.10 (60.