<h3>परंपरागत तरीके और अधिक जल की आवश्यकता</h3> <p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">परंपरागत तरीके से बुआई करने पर फसल को </span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">25-30</span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;"> प्रतिशत अधिक जल की आवश्यकता होती है। वर्षा ऋतु वाली फसल में अधिक जल भराव से क्षति होती है। इस पद्धति में बुआई करने और मृदा को भुरभुरा बनाने के लिए बार-बार जुताई एवं बक्खर चलाना पड़ता है। इससे अतिरिक्त ऊर्जा एवं धन खर्च होता है। ऐसी परिस्थिति में कूंड </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-ascii-font-family: Calibri; mso-ascii-theme-font: minor-latin; mso-hansi-font-family: Calibri; mso-hansi-theme-font: minor-latin; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi; mso-bidi-language: HI;">एवं</span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;"> नाली विधि से बुआई करने पर उपज में </span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">20-25 </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">प्रतिशत तक वृद्धि होती है। इस पद्धि में खरपतवार एवं कीट का प्रकोप कम होता है तथा धन एवं ऊर्जा की बचत होती है। इससे अतिरिक्त वर्षा जल का एकत्रीकरण एवं संरक्षण अधिक होता<span style="mso-spacerun: yes;"> </span>है। इसका उपयोग जल अभाव की स्थिति में किया जा सकता है। इसके फलस्वरूप पौध विकास एवं उपज में वृद्धि संभव<span style="mso-spacerun: yes;"> </span>है। इस प्रकार कृषक बदलती जलवायु में उत्पादन लागत कम करके अत्यधिक लाभ कमा सकते हैं।</span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;"><img src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccImage3.jpg" width="250" height="210" /></span></p> <h3 class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">वर्षा जल के वितरण में असमानता</span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">वर्ष के दौरान विभिन्न स्थानों पर जलवायु एवं भौगोलिक परिस्थितियां भी भिन्न होती हैं। पिछले दशक से यह देखा जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन से अनिश्चितता काफी बढ़ गयी है। उदाहरण के लिए कहीं पर वर्षा का ज्यादा हो जाना या बहुत कम हो जाना एवं तापमान का अचानक बढ़ जाना इत्यादि। जलवायु परिवर्तन से वर्षा ऋतु की फसल सोयाबीन</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">उड़द</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">मूंग</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">अरहर एवं मक्का का उत्पादन काफी प्रभावित हो रहा है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जलभराव से या कम वर्षा वाले क्षेत्रों में आवश्यक जल की कमी से फसल का नुकसान हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में यदि कृषक फसल बुआई की विधि में परिवर्तन कर फसल की बुआई कूंड एवं नाली विधि से करें तो ज्यादा लाभकारी होगा। कूंड एवं नाली मशीन का विकास धान एवं गेहूं पद्धि के लिए किया गया तथा इसका प्रयोग सर्वप्रथम योगी वैली</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">मैक्सिको में किया गया। इन स्थानों पर धान-गेहूं की बहुलता प्रचलित है। यह विधि वहां के लिए वरदान साबित हो रही थी। इसी के आधार पर स्वतंत्रता के पश्चात देश की आर्थिक निर्भरता के लिए कृषि पर विशेष ध्यान दिया गया।</span></p> <h3 class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">कूंड एवं नाली विधि के प्रयोग और सफलता</span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">कृषि के बहुत से आवश्यक संसाधनों का इस क्रम में युद्ध स्तर पर विकास किया गया। इसके साथ ही समय-समय पर कृषि कार्यों के लिए विभिन्न प्रकार के यंत्रों को विकसित किया जा रहा है। देश की मिट्‌टी एवं जलवायु विविधता बाध्य करती है नये नये कृषि यंत्रों के प्रयोग करने के लिए। वैज्ञानिकों का प्रयत्न ऐसे यंत्र बनाने में रहा है</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">जिससे कार्यक्षमता बढ़े तथा लागत एवं ऊर्जा खपत कम हो। इसी संदर्भ में ट्रैक्टरचालित कूंड एवं नाली विधि का विकास किया गया। भारत में इस यंत्र से बुआई सर्वप्रथम </span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">1991 </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">में धान-गेहूं की फसल पद्धति की बहुलता वाले गंगा नदी के मैदानी क्षेत्रों में की गई। यह विधि काफी प्रचलित हुई और धीरे-धीरे अन्य फसल पद्धतियों में भी इसका विस्तार हुआ। इसी प्रकार यह विधि मध्यप्रदेश में उन क्षेत्रों में काफी प्रचलित हो रही है</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">जहां पर खरीफ मौसम में मध्यम से भारी मृदा में सोयाबीन</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">उड़द</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">मूंग एवं अरहर उगायी जा रही है। इस यंत्र से बुआई करने पर फसल की बुआई कूंड पर होती है। इससे फसल का अति वर्षा की स्थिति में भी नुकसान नहीं होता है। यह यंत्र बुआई करते समय </span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">2-3 </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">कूंड नाता है। उसके ऊपर यह प्रत्येक कूंड पर दो लाइन में बुआई करता है। इस यंत्र के प्रयोग से ऊर्जा एवं समय की बचत होती है। देश के विभिन्न अनुसंधान संस्थानों एवं कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा प्रमाणित हो चुका है कि इस विधि से बुआई करने पर कम समय एवं लागत पर अत्यधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इसी प्रकार इस यंत्र का प्रयोग कैमूर पठार एवं सतपुड़ा पहाड़ी क्षेत्र के अंतर्गत जिला पन्ना (मध्यप्रदेश) में सोयाबीन फसल की बुआई के लिए प्रयोग किया जा रहा है। इसके सार्थक परिणाम परिलक्षित हो रहे हैं। इसी आधार पर</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">यंत्र से खरीफ फसल की बुआई के लिए अनुशंसा की जाती है।</span></p> <h3 class="MsoNormal"><span lang="HI">क्यों आवश्यक है यह विधि </span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">जलवायु परिवर्तन औरर वर्षा में अनिश्चितता होने से वर्षा ऋतु में सोयाबीन की बुआई में बाधा उत्पन्न होती है। इसलिए पूरे बुन्देलखंड क्षेत्र में खरीफ ऋतु में फसल का रकबा</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">रबी ऋतु की अपेक्षा बहुत कम होता है। खरीफ ऋतु की मुख्य फसलों सोयाबीन</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">उड़द एवं अरहर की उत्पादकता स्थिर हो गई या गिरती जा रही है। ऐसी परिस्थिति में कूंड एवं नाली विधि से बुआई करने पर फसल का बीज बिल्कुल कूंड के ऊपर गिरता है। कम वर्षा की स्थिति में बने कूंड में मृदा में नमी बनी रहती है</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">जिसके कारण पर्याप्त मात्रा में अंकुरण होता है। अत्यधिक वर्षा की स्थिति में अधिक पानी कूंड के साथ बनी नाली द्वारा निष्कासित हो जाता है</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">जिसमें उक्त फसल का अंकुरण</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">वृद्धि एवं विकास पर्याप्त मात्रा में होता है। परंपरागत विधि से बुआई करने पर वर्षा की अनिश्चितता में अचानक कम वर्षा का होना या अत्यधिक वर्षा के कारण अंकुरित हो रही फसल की वृद्धि एवं विकास प्रभावित होता है। फसल कमजोर हो जाती है और उत्पादन प्रभावित होता है। ऐसी परिस्थिति में इस विधि से बुआई करने पर फसल बच जाती है और अत्यधिक उत्पादन देती है।</span></p> <h3 class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">खरपतवार प्रबंधन </span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">सोयाबीन की फसल में कूंड एवं नाली विधि और परंपरागत विधि (छिटकवां/लाइन) से बुआई का तुलनात्मक अध्ययन कर देखा गया कि इस विधि से बुआई वाले प्रक्षेत्र में खरपतवार का प्रकोप बहुत कम हुआ। इसका मुख्य कारण है कूंड का बनना। इससे मृदा सतह पर पड़े खरपतवार के बीज नीचे चले जाते हैं। इसके कारण उनके अंकुरण प्रतिशत में कमी आती है। खरपतवार के वही बीज अंकुरित होते हैं</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">जो जमीन की सतह पर </span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">1-1.5 </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">सें.मी. गहराई पर पड़े रहते हैं और सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आते हैं। इसके कारण इस विधि से बुआई करने से खरपतवार का प्रकोप कम होता है।</span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><img src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccImage1.jpg" width="280" height="220" /></p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3 class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">कूंड एवं नाली विधि से बुआई का लाभ </span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">परंपरागत विधि से बुआई करने और पर्याप्त वर्षा नहीं होने पर मृदा नमी के अभाव एवं अत्यधिक वर्षा की स्थिति में जलभराव के कारण बीज की अंकुरण क्षमता प्रभावित होती है। यदि अंकुरण पश्चात अत्यधिक वर्षा होती है तब जलभराव की स्थिति में फसल के जड़ क्षेत्र में ऑक्सीजन का अभाव होता है। इससे फसल पीली पड़ जाती है औ उसकी वृद्धि एवं विकास रुक जाता है। ऐसी परिस्थिति में यदि वर्षा ऋतु की फसल सोयाबीन</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">उड़द एवं मूंग की बुआई कूंड एवं नाली विधि से करते हैं तो बीज हमेशा कूंड पर रहता है। इससे अंकुरण अच्छा होता है और उसके जड़ क्षेत्र के पास की मृदा भुरभुरी रहती है</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">क्योंकि जल भराव नहीं होता है। इसी प्रकार कम वर्षा की स्थिति में वर्षा जल का संरक्षण नाली में कर देते हैं और अत्यधिक वर्षा की स्थिति में पानी का निष्कासन कूंड निर्मित नाली से होता रहता है और आवश्यकतानुसार जल फसल के जड़ क्षेत्र में संरक्षित रहता है। इस प्रकार फसल अपने जीवन चक्र में पर्याप्त ऑक्सीजन लेती रहती है। ऐसे में फसल की वानस्पतिक वृद्धि एवं विकास पर्याप्त मात्रा में होती है। मृदा के छोटे-छोटे कण आपस में संघटित होकर जड़ क्षेत्र के पास-पास रहते हैं और पर्याप्त ऑक्सीजन की उपस्थिति में जड़ क्षेत्र में नॉड्यूल्स की संख्या में वृद्धि होती है</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">जिससे नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्षमता बढ़ती है। इसकी जड़ों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया जीवाणु एरोबिक होते हैं</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">जिन्हें अपनी क्रिया करने के लिए पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन चाहिए। इसकी पूर्ति कूंड में लगाई गई फसल में पर्याप्त मात्रा में होती रहती है। पर्याप्त ऑक्सीजन व निश्चित तापमान बरकरार रहने से मृदा में पड़े पोषक तत्वों का खनिजीकरण आसानी से होता है और पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है। उसका समुचित उपयोग होने से फसल की वृद्धि एवं विकास अत्यधिक होता है। इससे फसल की उत्पादकता में </span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">20-25 </span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">प्रतिशत तक बढ़ोतरी संभव है। इस प्रकार इस विधि से बुआई करने पर अधिक दिनों तक नमी संरक्षित रहती है। इसका उपयोग फसल अपनी आवश्यकतानुसार करती रहती है।</span></p> </td> </tr> </tbody> </table> <h3 class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">कीट प्रबंधन</span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">अधिकतम कीट अपना जीवनचक्र जमीन की ऊपरी सतह पर पूरा करते हैं। कूंड एवं नाली विधि से बुआई करने पर मृदा का ढेर लग जाता है। अधिकाशतः कीट के अंडे जमीन में काफी गहरे स्थान में चले जाते हैं। इससे वे नष्ट हो जाते हैं। इसके कारण उक्त विधि से बुआई करने पर कीट का प्रकोप कम होता है।</span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;"><img src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccImage2.jpg" width="210" height="250" /></span></p> <h3 class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">अधिक आय </span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;"> </span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">इस विधि से बुआई करने पर कम लागत में अधिक लाभ पाया जा सकता है। इस विधि से बुआई करने के लिए बार-बार खेत को जोतना नहीं पड़ता है। कूंड भी हमेशा भुरभुरा बना रहता है। इसके फलस्वरूप निराई-गुड़ाई की आवश्यकता नहीं पड़ती और पौधों की वानस्पतिक और प्रजनक वृद्धि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से होती रहती है। इससे फसल उत्पादन में वृद्धि होती है</span><span style="font-family: 'Mangal',serif;">,</span><span lang="HI" style="font-family: 'Mangal',serif; mso-bidi-language: HI;">जो आर्थिक रूप से लाभदायक है।</span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align: justify;">स्त्रोत: खेती पत्रिक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), लेखक: आर.के. सिंह वैज्ञानिक(सस्य विज्ञान)और वीणापाणि श्रीवास्तव वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख, कृषि विज्ञान केन्द्र, छतरपुर, जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर (मध्यप्रदेश)।</p>