परिचय विश्व के कुल भूमि क्षेत्र का 2.4 प्रतिशत एवं कुल जनसंख्या का 18 प्रतिशत हिस्सा भारत देश के अंतर्गत आता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान महत्वपूर्ण है। देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा कृषि से आता है। देश का व्यापक आर्थिक विकास होने के बाद भी सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का आर्थिक योगदान तेजी से घट रहा है फिर भी कृषि, जनसंख्या की दृष्टि से मुख्य आर्थिक क्षेत्र बना हुआ है। कृषि, भारत की कुल जनसंख्या के 58 प्रतिशत से अधिक लोगों की आजीविका का मुख्य स्त्रोत है किन्तु कई समस्याओं की वजह से यह क्षेत्र अच्छी तरह से विकसित नहीं हुआ है। हरित क्रान्ति के 4 दशक बाद भी बढ़ती जनसंख्या व भाहरीकरण के कारण खेती की जोत का आकार सिकुड़ना व फसलों की कम उत्पादकता है। देश में कृषि की खराब स्थिति भारतीयों के लिए चिंता की बात है। आज देश में 50 प्रतिशत किसानों के पास एक हैक्टेयर से भी कम जमीन है एवं 80 प्रतिशत किसानों के पास दो हैक्टेयर से भी कम जमीन है। लगभग 70-75 प्रतिशत क्षेत्रफल सीमांत एवं लघु किसानों के अंतर्गत आता है जहां पर धान-गेहूं फसल प्रणाली को अपनाया जाता है। भारत के पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश से कुल खाद्यान का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त होता है जिस कारण इस क्षेत्र को देश का अनाज का कटोरा कहा जाता है। किन्तु यह क्षेत्र भी कई समस्याओं से ग्रस्त होता जा रहा है जैसे लगातार धान उगाने से भूमिगत जलस्तर काफी नीचे गिरता जा रहा है जो आज चिंता का विषय बन गया है। आजकल धान-गेहूं फसल प्रणाली के टिकाऊपन पर भी सवालिया निशान लगा हुआ है क्योंकि अधिक पैदावार पाने के लिए खेती की सघन पद्धति को लगातार अपनाने से मृदा में कार्बनिक पदार्थो एवं पोषक तत्वों की कमी, उनका बिगड़ता संतुलन, भूजल स्तर का नीचे जाना, कीटों, रोगों तथा खरपतवारों का अधिक प्रकोप इत्यादि समस्याएं आ रही है। इसके अतिरिक्त वैश्विक तपन के प्रभाव से उत्तरी भारत में सर्दी की अवधि कम होती जा रही है और फरवरी माह से ही तापमान में वृद्धि शुरू हो जाती है जिसके फलस्वरूप गेहूं के उत्पादन में पिछले कुछ वर्षों से कमी आई है। ऐसे में उम्मीद के मुताबिक़ उपज पाने के लिए किसानों को 5-10 प्रतिशत अधिक खर्च करना पड़ता है। आने वाले समय में उपरोक्त समस्याएं और अधिक विकराल हो जाएंगी यदि अभी कोई कारगर उपाय नहीं अपनाया गया। धान-गेहूं फसल प्रणाली को अपनाने से वर्ष में केवल दो बार फसल की कटाई के समय ही आमदनी प्राप्त होती है जबकि किसान को प्रतिदिन खर्चे के लिए पैसे की आवश्यकता पड़ती है। मध्य एवं दक्षिण भारत में जहां एकल फसल प्रणाली अपनाई जाती है वहां फसल में रोग की सम्भावनाएं अधिक रहती हैं व अन्य कारणों से भी वांछित उपज प्राप्त नहीं होती है जिसके कारण किसान कर्ज के बोझ तले आ जाता है व उसे चुकाने में असमर्थ हो जाता है। सीमांत एवं लघु किसानों के लिए अपने औसतन 5-6 सदस्यों के परिवार एवं उतने ही पशुओं की दैनिक जरूरतों को पूरा करना एक बड़ी समस्या है। अत: हमें ऐसी खेती की जरूरत है जो प्राकृतिक संसाधनों की दक्षता में वृद्धि के साथ-साथ किसान की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा कर सके एवं किसान के परिवार के सभी सदस्यों के लिए रोजगार के अवसर प्रदान कर सके। इसके लिए यह आवश्यक है की प्रचलित धान-गेहूं फसल प्रणाली में सुधार किया जाए, फसल विविधिकरण किया जाए और फसलोत्पादन को कृषि के अन्य सहायक व्यवसायों के साथ जोड़ा जाए जिससे की भूमि की उर्वराशक्ति को कायम रखने और भूमिगत जलस्तर को गिरने से रोका जा सके, साथ ही किसान को वर्ष भर लगातार आमदनी प्राप्त होती रहे। ऐसी स्थिति में बहुउद्देशीय कृषि मॉडल हमारे सामने उपयुक्त समाधान के रूप में उभर कर आता है। बहुउद्देशीय कृषि मॉडल, कृषि के विभिन्न घटकों/उद्यमों जो एक दूसरे से संबंधित और परस्पर पूरक होते हैं, से बनी एक समन्वित कृषि तकनीक है। इस तकनीक में किसान, फसलोत्पादन (अन्न, चारा, सब्जी, फूल एवं फल उत्पादन) के साथ-साथ कृषि से सम्बधित अन्य घटकों या उद्यमों/कृषि आधारित उद्योगों जैसे पशुपालन, मछली पालन, मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन, बत्तख पालन, मशरूम उत्पादन, कम्पोस्ट उत्पादन, सौर ऊर्जा उत्पादन एवं जैविक गैस (बायो गैस) उत्पादन इत्यादि को अपनाकर उपलब्ध संसाधनों का समुचित उपयोग करते हुए परिवार की नियमित आमदनी और रोजगार को कई गुणा बढ़या जा सकता है। बहुउद्देशीय कृषि मॉडल में एक घटक से बचे हुए उत्पादों तथा अवशेषों को दूसरे घटकों में उपयोग किया जा सकता है जिससे उत्पादन लागत कम होने से शुद्ध लाभ में वृद्धि होती है और रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं। इस मॉडल में फसलों के अवशेषों को कम्पोस्ट बनाने में प्रयोग किया जा सकता है और पशुओं से प्राप्त गोबर का उपयोग गोबर गैस, मछली उत्पादन और वर्मीकम्पोस्ट आदि बनाने में किया जाता है। अतएव बहुउद्देशीय कृषि सीमांत एवं लघु किसानों के जीविकोपार्जन की एक नई दिशा प्रदान करता है, साथ ही साथ भूमि एवं जल संसाधनों की गुणवत्ता को भी स्थिरता प्रदान करता है। इस मॉडल के उद्देश्य इस प्रकार है: बहुउद्देशीय कृषि मॉडल में उपलब्ध फसलों एवं घटकों के विविधिकरण का सुधरी हुई क्षारीय मृदाओं में मूल्यांकन करना। सीमांत एवं लघु किसानों हेतु लाभदायक, टिकाऊ एवं पर्यावरण अनुकूल बहुउद्देशीय कृषि मॉडल का विकास करना। फसल विविधिकरण प्रणाली द्वारा जल एवं भूमि की उर्वरता तथा ऊर्जा प्रयोग की दक्षता को बढ़ाना। फसलों के अवशेषों को पूरक घटकों में प्रयोग करके प्रति इकाई उत्पादन लागत कम करना। बहुउद्देशीय कृषि के घटक संस्थान प्रक्षेत्र के 2 हेक्टेयर क्षेत्रफल को मुख्य घटकों के लिए 0.2 हेक्टेयर के बराबर आकार के भागों में विभाजित किया गया जिसमें विभिन्न कृषि उत्पादों का उत्पादन निम्नांकित ढंग से किया गया। बहुउद्देशीय कृषि मॉडल के विभिन्न घटकों को मुख्यत: दो भागों (फसल घटक एवं सहायक घटक) में विभाजित किया गया है। फसल घटक: 1.8 हेक्टेयर (1) अन्न उत्पादन (40 प्रतिशत क्षेत्रफल/0.8 हेक्टेयर) धान-गेहूं फसल प्रणाली को अपनाने से भूजल स्तर एवं भूमि की उर्वरा शक्ति में कमी आ रही है क्योंकि इस फसल प्रणाली को अधिक सिंचाईयों एवं पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। इस मॉडल में धान-गेहूं फसल प्रणाली के अलावा 3 अन्य वैकल्पिक फसल प्रणालियों का चयन किया गया है। भूमि उर्वरता को बनाए रखने के लिए धान-गेहूं फसल प्रणाली के अलावा सभी फसल प्रणालियों में एक दलहनी फसल को सम्मिलित किया गया जो की वायुमंडल से नत्रजन लेकर भूमि में नत्रजन का समावेश कर मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ाती है। अन्न उत्पादन के अंतर्गत 4 फसल प्रणालियों को अपनाया गया है जो इस प्रकार है- 10प्रतिशत/0.2 हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान-गेहूं फसल प्रणाली 10 प्रतिशत/0.2 हेक्टेयर क्षेत्रफल में मक्का-गेहूं फसल प्रणाली 10 प्रतिशत/0.2 हेक्टेयर क्षेत्रफल में सोयाबीन-मक्का फसल प्रणाली 10 प्रतिशत/0.2 हेक्टेयर क्षेत्रफल में अरहर-सरसों-मक्कचरी फसल प्रणाली (2) चारा उत्पादन (20 प्रतिशत क्षेत्रफल/0.4 हेक्टेयर) मॉडल में सम्मिलित चार बड़े पशुओं की वर्षभर हरे चारे की पूर्ति करने के लिए कुछ क्षेत्रफल के 20 प्रतिशत क्षेत्रफल में चारा फसलें जैसे खरीफ में ज्वार, बाजरा एवं मक्का और रबी में बरसीम, बरसीम + सरसों और जई को लगाया जाता है। चारा फसलों को इस प्रकार क्रम में लगाया जाता है ताकि हरे चारे की सालभर कमी नही आये। (3) सब्जी उत्पादन (10 प्रतिशत क्षेत्रफल/0.2 हेक्टेयर) पूरे वर्ष सब्जियों की उपलब्धता बनाए रखने के लिए खरीफ के मौसम में टमाटर, घीया, खीरा, भिन्डी आदि एवं रबी में पत्ता गोभी, फूल गोभी, टमाटर आदि एवं जायद के मौसम में टमाटर, घीया, खीरा आदि सब्जियों को लगाया गया है। बाजार में सब्जियों की कीमत को ध्यान में रखते हुए इन्हें उचित समय पर लगाया गया है। (4) फूल उत्पादन (10 प्रतिशत/0.2 हेक्टेयर) इस उत्पादन घटक के अंर्तगत रबी के मौसम में गेंदा और ग्लेडियोलस को लगाया गया है। खरीफ के मौसम में कोई उपयुक्त फूल वाली फसल उपलब्ध नहीं होने के कारण बेबीकार्न, की फसल को लगाया गया है। मधुमक्खी पालन के लिए मधुमक्खी के बक्सों को फूल उत्पादन क्षेत्रफल के पास रखा गया है। (5) फल एवं सब्जी उत्पादन (10 प्रतिशत क्षेत्रफल/0.2 हेक्टेयर इस उत्पादन घटक के अंतर्गत अमरुद की इलाहाबादी सफेदा प्रजाति को 5 मीटर x 5 मीटर की दूरी पर सब्जी वाली फसलों के साथ लगाया गया है। फलों के वृक्षों की कतारों के बीच पड़े खाली स्थान पर अंतर फसल के रूप में मौसमी सब्जियां उगाई गई। सब्जियां जैसे टमाटर, भिन्डी, पत्ता गोभी, फूलगोभी आदि को लगाया जाता है जहां तक हो सके फैलनें वाली सब्जियों (घीया एवं खीरा) को नहीं लगाना चाहिए। सहायक घटक: 0.2 हेक्टेयर मछली उत्पादन (10 प्रतिशत क्षेत्रफल/0.2 हेक्टेयर): बहुउद्देशीय कृषि मॉडल में मछली पालन 0.2 हेक्टेयर क्षेत्रफल के तालाब में किया गया है। मछली पालन के साथ-साथ तालाब की मुंडेर (6-8 मीटर चौड़ाई की डाइक्स/बंड) पफ फलदार वृक्ष जैसे अमरुद, केला, आंवला एवं करौंदा को लगाया गया है तथा वृक्षों के बीच खाली स्थान पर मौसम के अनुसार विभिन्न सब्जियां जैसे पालक, मेथी, मूली, गोभी तथा गर्मी और बरसात में भिन्डी, कद्दू, तरोई, लौकी आदि उगाई जाती है। फलों एवं सब्जियों में सिंचाई सौर ऊर्जा द्वारा चलित ड्रिप तथा ऊँचाई पर स्थित पानी की टंकी से उत्पन्न होने वाले दबाव द्वारा चलित ड्रिप विधि से की गई है। इसके अलावा तालाब की मुंडेर के पास बहुउद्देशीय कृषि के अन्य घटकों/व्यवसायों को अपनाया गया है। पशुपालन मुर्गी एवं बत्तख पालन मशरूम उत्पादन मधुमक्खी पालन जैविक गैस उत्पादन कम्पोस्ट उत्पादन एवं सौर ऊर्जा उत्पादन तालिका 1. बहुउद्देशीय कृषि मॉडल के विभिन्न घटकों से प्राप्त आमदनी, क्रियान्वयन लागत एवं शुद्ध आय का लेखा-जोखा बहुउद्देशीय कृषि के घटक औसतन वार्षिक (रु.) कुल आमदनी क्रियान्वयन लागत शुद्ध आय फसल घटक – 1.8 हेक्टेयर अन्न उत्पादन – हेक्टेयर 70125 17854 52271 चारा उत्पादन- हेक्टेयर 33242 6091 27151 फूल उत्पादन – हेक्टेयर 14023 4891 9232 सब्जी उत्पादन – हेक्टेयर 18027 3901 14126 फल एवं सब्जी उत्पादन – हेक्टेयर 20200 3590 16610 उपयोग 155617 (426) 36327 (100) 119390 (327) सहायक घटक – 0.2 हेक्टेयर पशुपालन (दूध+कम्पोस्ट+जैविक गैस) 179122 70231 108891 तालाब की मुंडेर पर फलदार वृक्ष एवं सब्जियां 22979 2250 20729 मछली उत्पादन 20662 2566 18096 मुर्गी एवं बत्तख पालन 14828 18397 -3570 मशरूम उत्पादन 2415 1733 682 मधुमक्खी पालन 16178 9449 6728 उपयोग 256182 (702) 104627 (287) 151556 (415) कुल योग 411799 (1128) 140954 (386) 270946 (742) कोष्ठक में आंकड़े औसतन आमदनी प्रतिदिन (रु.) को दर्शाते है। बहुउद्देशीय कृषि घटकों का उत्पादन बहुउद्देशीय कृषि मॉडल को अपनाने से फसल घटकों से वर्ष में केवल दो बार फसल की कटाई के समय ही आमदनी प्राप्त होती है जबकि सहायक घटकों से प्रतिदिन आमदनी प्राप्त होती है जोकि किसान की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने एवं रोजगार के अवसर प्रदान करने में सहायक होती है। फसल एवं सहायक घटकों से उत्पन्न कुल आमदनी, क्रियान्वयन लागत एवं शुद्ध आमदनी का विवरण तालिका-1 में दर्शाया गया है। 2 हेक्टेयर बहुउद्देशीय कृषि मॉडल को अपनाने से कुल आमदनी 411799/- रूपये आर्जित हुई जबकि इससे कुल 270946/- रूपये की शुद्ध आमदनी प्राप्त हुई। परिणामों में यह निष्कर्ष निकलता है कि 2 हेक्टेयर के बहुउद्देशीय कृषि मॉडल से प्रतिदिन 742/- रूपये की शुद्ध आमदनी प्राप्त होती है। फसल घटकों से कुल आमदनी 155617/- रूपये अर्जित हुई जबकि इससे प्रतिवर्ष 119390/- रूपये एवं प्रतिदिन 327/- रूपये की शुद्ध आमदनी प्राप्त हुई। फल आधारित उत्पादन पद्धति से सबसे अधिक 16610/- रूपये प्रति 0.2 हेक्टेयर का शुद्ध लाभ मिला। पशु पालन कृषि का एक महत्वपूर्ण घटक है जिसके द्वारा वर्षभर आमदनी और रोजगार मिलता है। पशु पालन के बिना बहुउद्देशीय कृषि अधूरी प्रतीत होती है इसलिए इसका समावेश करना बेहद जरूरी है। पशुओं से दुग्ध उत्पादन के अलावा गोबर एवं मूत्र भी मिलता है जो की कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट एवं जैविक गैस इत्यादि बनाने में काम में लिया गया है। पशुओं के लिए दाना मिश्रण को भी फसल उत्पादों से फार्म पर ही बनाया गया है ताकि लागत को कम किया जा सके तथा उसकी गुणवत्ता को बनाए रखा जा सके। सहायक घटकों से कुल आमदनी 256182/- रूपये अर्जित हुई जबकि इससे प्रतिवर्ष 151556/- रूपये एवं प्रतिदिन 415/- रूपये की शुद्ध आमदनी प्राप्त हुई है जोकि रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए उपयुक्त हो सकती है। सहायक घटकों के तहत पशु पालन के घटकों (दूध+कम्पोस्ट+जैविक गैस) से सबसे अधिक शुद्ध आमदनी 108891/- रूपये प्राप्त हुई। बहुउद्देशीय कृषि मॉडल का फसल उत्पादन घटकों के साथ तुलनात्मक विश्लेषण विभिन्न फसलों का आर्थिक विश्लेषण तालिका-2 में दिखाया गया है। परिणामों से ज्ञात हुआ की फल आधारित उत्पादन पद्धति से सबसे अधिक 166104/- रूपये प्रति 2 हेक्टेयर का शुद्ध लाभ मिला जबकि फूल उत्पादन से सबसे कम 92317/- रूपये प्रति 2 हेक्टेयर का लाभ प्राप्त हुआ। अन्न उत्पादन के अंतर्गत आने वाली सभी 4 फसल प्रणालियों (धान-गेहूं, मक्का-गेहूं-मूंग, सोयाबीन-मक्का एवं अरहर-सरसों-मक्कचरी) को अपनाने से 130677/- रूपये प्रति 2 हेक्टेयर का लाभ प्राप्त हुआ। सभी फसल प्रणालियों के तहत, धान-गेहूं फसल (174849/- रूपये प्रति 2 हेक्टेयर) एवं मक्का-गेहूं-मूंग प्रणाली (164375/- रूपये प्रति 2 हेक्टेयर) का सबसे अधिक योगदान रहा। बहुउद्देशीय कृषि मॉडल से प्राप्त शुद्ध आमदनी को फसल उत्पादन घटकों से तुलना करने पर यह पाया की फल एवं सब्जी उत्पादन एवं धान-गेहूं फसल प्रणाली से लगभग 100000/- रूपये की शुद्ध आमदनी अधिक प्राप्त हुई। तालिका 2: फसल उत्पादन घटकों एवं फसल प्रणालियों का बहुउद्देशीय कृषि मॉडल के साथ आकलन एवं आर्थिक विश्लेष्ण (रूपये/2 हें.) फसल उत्पादन घटक कुल आमदनी क्रियान्वयन लागत शुद्ध आमदनी बहुउद्देशीय कृषि मॉडल 411799 140954 270946 अन्न उत्पादन 175313 44636 130677 चारा उत्पादन 166208 30455 135754 सब्जी उत्पादन 180270 39011 141259 फूल उत्पादन 140230 48913 92317 फल एवं सब्जी उत्पादन 201999 35895 166104 धान-गेहूं फसल प्रणाली 222197 47349 174849 मक्का-गेहूं-मूंग फसल प्रणाली 221037 56662 164375 संसाधनों का पुनर्चक्रण/समेकित प्रबन्धन बहुउद्देशीय कृषि मॉडल में उपलब्ध विभिन्न संसाधनों को कृषि विविधिकरण प्रणाली में पुनर्चक्रण किया गया ताकि पानी, पोषण और ऊर्जा की दक्षता को बढ़ाया जा सके। पशु, मछलियाँ, मुर्गियां एव बत्तखें अपना भोजन चारा और खाद्यान्न फसलों से प्राप्त करते हैं। पशुओं से प्राप्त गोबर का अधिकतर भाग कम्पोस्ट बनाने में इस्तेमाल किया जाता है और उस खाद का उपयोग तालाब के ऊपर बनी मेड़ों पर उगाए गए फल वृक्षों और सब्जी उत्पादन में किया जाता है। तालाब की मेड़ों पर कोई भी रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं किया जाता है ताकि जैविक उत्पाद लिया जा सकें। ऐसा करने से मृदा में जैविक कार्बन का प्रतिशत बढ़ा है। गोबर से उत्पन्न बायोगैस एक औसत परिवार के खाना बनाने के लिए पर्याप्त होती है। पशुओं का मूत्र एवं उनके शेड की धोवन को मछलियों के भोजन हेतु तालाब में डाला गया है जिससे तालाब में उपस्थित पादप प्लावकों (फाइटोप्लेंकटोंस) एवं जीव प्लावकों (जूप्लेंकटोंस) की संख्या में अच्छी बढ़ोतरी होती है जो मछलियों के लिए खाने का अच्छा स्रोत है। केले के पत्ते, अधिक पक्के फलों और पकी हुई सब्जियों को भी मछलियों के भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। तालाब का पौष्टिक पानी गर्मी के मौसम में चारा फसलों की सिंचाई में इस्तेमाल किया जाता है। तालाब की मिट्टी को भी खेत में प्रयोग करने से मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशा में सुधार होता है। स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार