देश के विभिन्न हिस्सों में लगभग 70 से अधिक प्रकार की सब्जियां उगाई जाती हैं। जिनमें कद्दूवगीर्य समूह की 20 से अधिक सब्जियों की खेती की जाती है। गमिर्यों के मौसम में उगाई जाने वाली सब्जियों का यह सबसे बड़ा समूह है, जोकि कुकुरबिटेसी वंश के अंतर्गत आता है। ये सब्जियां पोषण एवं आर्थिक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण होती है। इनमें विटामिन एवं खनिज तत्व भरपूर होते हैं।साथ ही जल की भी पर्याप्त मात्रा होती है, जिससे शरीर तरोताजा रहता है। कद्दूवर्गीय फसलों के पौधों बेलनुमा होते हैं। जिस वजह से प व फल भूमि के संपर्क में रहते हैं। वर्षा के मौसम में खेत में पानी भर जाने से फसलों में कीट व रोगों का आक्रमण भी अधिक होता है। इसके परिणामस्वरूप पैदावर के साथ ही फलों की गुणवत्ता में भी कमी आ जाती है। बारिश के समय बाजार में सब्जियों की आवक कम होने की वजह से सब्जियों के भाव बढ़ जाते हैं। अतः इस समय किसान कद्दूवर्गीय फसलों की मचान विधि से खेती करके अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। बेल वाली सब्जियां, जिनके फल अधिक भारी नहीं हों, का चयन मचान पर चढ़ाने के लिए कर सकते हैं। करेला, लौकी, तोरई, खीरा, सेम आदि इस के लिए उपयुक्त फसलें हैं। नीचे की जगह में अल्पावधि फसलें, जो छाया में अच्छी पैदावार दे सकें, का चयन कर सकते हैं। उन्नत किस्में लौकी पूसा नवीन, पूसा मंजरी, पूसा मेघदूत, पूसा संदेश, अर्का बहार, पूसा संतुष्टि, पूसा समृद्धि, पूसा हाइब्रिड-3, काशी गंगा, काशी बहार, अर्का बहार आदि। करेला पूसा रसदार, पूसा पूर्वी, पूसा औषधि, पूसा दो मौसमी, पूसा विशेष, पूसा हाइब्रिड-1, पूसा हाइब्रिड-2, काशी उर्वशी, अर्का हरित आदि। नसदार तोरई पूसा नसदार, काशी शिवानी, स्वर्ण मंजरी, कल्याणपुर धारीदार, पंत तोरई-1, फुले सुजाता, पूसा नूतन, काशी खुशी, अर्का सुजात, अर्का सुमीत, अर्का प्रसन आदि। चिकनी तोरई काशी सौग्या, काशी ज्योति, पूसा सुप्रिया, पूसा स्नेहा, स्वर्ण प्रभा, पूसा चिकनी, काशी दिव्या, कल्याणपुर हरी चिकनी, राजेन्द्र नेनुआ-1, पंत चिकनी तोरई-1 आदि। खीरा पूसा उदय, पूसा बरखा, पोइनसेट, पूसा संयोग आदि। मचान तैयार करने के लिए सामग्री मचान तैयार करने के लिए 8-10 फीट लंबे बांस, बल्लियां, लोहे के एंगल अथवा सीमेंट के पोल आदि में से किसी का भी चयन कर सकते हैं, जो कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो सके। सीमेंट के पोल व लोहे के एंगल महंगे होने के कारण प्रारंभिक लागत अधिक आती है, परन्त कई वर्षों तक ये स्थायी होते हैं। ऊर्ध्वाधर खंभों के अलावा तार अथवा प्लास्टिक की रस्सी की आवश्यकता ऊपर जाल तैयार करने के लिए पड़ती है। मचान तैयार करने की विधि ऊर्ध्वाधर खंभों को सीधा खड़ा करने के लिए 2-2.5 फीट के गहरे गड्ढे तैयार कर लें। गड्ढे से गड्ढे की दूरी लगभग 6 फीट की रखें, अधिक दूरी होने से फसल के भार से मचान झूलने लगती है। खंभों को सीधा खड़ा करके मिट्टी में अच्छी तरह दबा दें। सीमेंट के पोल का उपयोग कर रहे हैं, तो कोई समस्या नहीं आती, परन्तु जब लकड़ी के खंभों का प्रयोग करते हैं, तो दीमक से खराब हो जाते हैं। अतः इनके बचाव के लिए मिट्टी में दबने वाले हिस्से पर प्लास्टिक का पाईप अथवा पॉलीथीन चढ़ा दें। इसके तदुपरान्त सभी खंभों के ऊपरी सिरों को एक से दूसरे खंभे को जोड़ते हुए लोहे के तार से बांध दिया जाता है व फिर प्लास्टिक की रस्सी अथवा जाल से ऊपरी भाग को ढक दिया जाता है, जिससे बेल नीचे नहीं झूले। मचान की ऊंचाई 1.5-2.0 मीटर रख सकते हैं। बीजों की बुआई व पौधों को मचान पर चढ़ाना खेत की तैयारी के बाद फसल के बढ़वार के स्वभाव के अनुसार 2.5-4.0 मीटर की दूरी पर 45 सें.मी. चौड़ी तथा 30-40 से.मी. गहरी नालियां (चैनल) बना लें। नालियों के दोनों किनारों (मेड़) पर 50-60 से.मी. की दूरी पर बीजों की बुआई करते हैं। जब टपक सिंचाई प्रणाली अपनायी जाती है, तो नालियां (चैनल) बनाने की आवश्यकता नहीं होती है व रेज्ड क्यारी तैयार की जाती है, ताकि जल निकास अच्छा हो। लगभग एक फीट के पौधे होने पर, मचान पर चढ़ाने का कार्य आरंभ कर देना चाहिए। प्रारंभिक अवस्था में निकलने वाली शाखाओं को हटाते रहें, जिससे बेल सीधी बढ़ सके व ऊपर तैयार जाल पर फैल सके। फसलचक्र भी है जरूरी एक स्वभाव वाली फसलों की लगातार बुआई करने से भूमि की उर्वराशक्ति का हृास होता है। इसके साथ ही कीट व रोगों का प्रकोप भी अधिक होने लग जाता है। अतः जरूरी है कि अलग-अलग फसलों की निर्धारित समयांतराल और तय क्रम में बुआई करें। इससे जमीन की उर्वराशक्ति बरकरार रहने की वजह से पैदावार भी अधिक मिलती है। फसलचक्र में फसलों का समावेश जलवायु, फसलों के स्वभाव तथा किसान की आर्थिक क्षमता के अनुरूप कर सकते हैं। दलहनी फसलें इसके लिए अधिक उपयुक्त हैं। पादप संरक्षण लाल भृंग, फल मक्खी, पर्ण सुरंग, सफेद मक्खी, मृदुल आसिता, चूर्णिल आसिता, एंथ्रेक्नोज, विषाणु रोग आदि इन फसलों के मुख्य कीट व रोग हैं। इनकी रोकथाम के लिए समेकित नाशीजीव प्रबंधन युक्तियां अपनानी चाहिए। जहां तक हो सके, जैविक व यांत्रिक तरीके अपनायें व रसायनों का प्रयोग, जब आवश्यकता हो, तभी सिफारिश की गई मात्रा की दर से ही करें। मचान विधि लता या बेल वाली सब्जियों को किसी सहारे की सहायता से जमीन से ऊपर तैयार संरचना पर फैला देते हैं, जिसे मचान, मंडप, ट्रेलिस अथवा पंडाल कहा जाता है। इसमें पौधों को लकड़ी, लोहे या सीमेंट के पोल पर तार अथवा प्लास्टिक जाल से तैयार संरचना पर फैला दिया जाता है। यह कई तरह से तैयार कर सकते हैं जैसे खड़ी मचान, छतनुता मचान, तिकोनी मचान आदि। मचान विधि से खेती करने के फायदे उपज में वृद्धि तैयार संरचना पर पौधों को फैला देने से फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिल जाती है, जिसके परिणामस्वरूप प्रकाश संश्लेषण के कारण पैदावार में बढ़ोतरी होती है। गुणवत्ता में सुधार फल, भूमि के संपर्क में नहीं आने से आकार में लंबे, मुलायम एवं रंग में समरूप रहते हैं, जिससे फलों का बाजार मूल्य अधिक मिलता है। कीट व रोगों का कम प्रकोप मचान विधि में पौधे भूमि से दूर रहने के कारण कीट व रोगों से कम प्रभावित होते हैं व नियंत्रण करना भी आसान होता है। भूमि का इष्टतम उपयोग लता वाली सब्जियों को मचान पर चढ़ा देने की वजह से नीचे बची खाली जगह में आंशिक छाया वाली फसलें जैसे-धनिया, पालक, हल्दी, अरबी, मूली आदि उगाकर दोहरा लाभ ले सकते हैं। फसल की देखभाल व फलों की तुड़ाई में सुविधा इस विधि से खेती करने पर सम-सामयिक कार्य में आसानी होने के साथ ही फलों की तुड़ाई भी आसानी से कर सकते हैं। स्त्रोत: फल-फूल पत्रिका, महेश चौधरी एवं रमेश कुमार दुलड़-कृषि विज्ञान केंद्र फतहेपुर-शेखावटी, सीकर-332301, (श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर, राजस्थान) अनोप कुमारी-कृषि विज्ञान केंद्र मौलासर-341506, नागौर (कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर, राजस्थान), सन्तोष चौधरी-कृषि महाविद्यालय, मंडोर, जोधपुर (कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर-342304, राजस्थान)।