<p style="text-align: justify;">वर्तमान खेती के तरीकों से पफसलों का लाभप्रद उत्पादन प्राप्त नहीं हो रहा है। इसके पीछे बहुत से कारण हैं जैसे-प्राकृतिक प्रतिकूलता, कीट एवं रोग-व्याधियों का बढ़ता प्रकोप, कृषि उत्पादन की बढ़ती लागत, मूल्य प्राप्ति की दरों की अनिश्चितता आदि। इन सभी परिस्थितिजन्य समस्याओं एवं आपदा से निपटने के लिए खेती की वर्तमान प(ति में संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार नए तरीके से खेती करने की ओर ध्यान दिया जाना आवश्यक हो गया है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownload.jpg" width="263" height="139" /></p> <p style="text-align: justify;">बदलते समय के साथ किसानों को और स्मार्ट होना पड़ेगा। उन्हें अपने खेत एवं खेती के तौर-तरीकों के बारे में नए सिरे से सोचना होगा। स्मार्ट खेती के महत्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि किसान अधिक तथा टिकाऊ उपज प्राप्त कर अपना जीवन स्तर सुधार सकते हैं। फसलचक्र एवं मृदा स्वास्थ्य कार्ड आधारित खेती करके, सिंचाई जल का समुचित उपयोग एवं जल संरक्षण की वैज्ञानिक विधियां, प्रक्षेत्र पर मिश्रित खेती और खाद्य प्रसंस्करण की वैज्ञानिक विधियों द्वारा जलवायु परिवर्तन आधारित टिकाऊ खेती की तकनीकों को अपनाकर परिवर्तन संभव है। ये सभी तकनीकियां मिलकर ही किसान की उपज तथा आय को सुदृढ़ कर सकती हैं। इनमें सबसे विश्वसनीय तथा नवीनतम भू-स्थानिक प्राद्योगिकियों का इस्तेमाल शामिल है। यह परिशुद्ध कृषि को बढ़ावा देती है। भौगोलिक सूचना तंत्र, सूचना प्रौद्योगिकी में आई क्रांति का एक सर्वाधुनिक तंत्र है और यह निर्णय सहायक तंत्र के नाम से भी जाना जाता है। यह तंत्र, वायुवीय एवं अवायुवीय गणकों के समायोजन में सक्षम है, जिससे योजना तथा निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। ये प्रौद्योगिकियां वास्तविक स्थिति डेटा संग्रह द्वारा सटीक स्थिति की जानकारी देने में सक्षम होती हैं। इस जानकारी से बड़ी मात्रा में भू-स्थानिक डेटा का विश्लेषण किया जा सकता है। सटीक खेती में जीपीएस आधारित अनुप्रयोगों का उपयोग खेत नियोजन, फील्ड मैपिंग, मृदा नमूनाकरण, ट्रैक्टर मार्गदर्शन, फसल स्काउटिंग, चर अनुपात अनुप्रयोगों और उपज मानचित्रण के लिए किया जा रहा है।</p> <h3 style="text-align: justify;">फसलचक्र एवं मृदा स्वास्थ्य कार्ड आधारित खेती</h3> <p style="text-align: justify;">वर्तमान में कृषक लगातार एक ही फसल बहुत बड़े क्षेत्रफल में कई वर्षों से ले रहे हैं। ज्यादातर कृषक मृदा स्वास्थ्य कार्ड आधारित संस्तुत तथा अपने खेत की मृदा उवर्रता के अनुसार फसलें नहीं बदलते हैं, जिसकी वजह से बहुत सी समस्याएं आ रही हैं। लगातार एक ही फसल लेने से उत्पादन एवं उत्पादकता में कमी, कीट व रोग-व्याधियों का बढ़ता प्रकोप, लगातार बढ़ती उत्पादन लागत, उत्पादन में भारी कमी, खेत की उवर्राशक्ति में ह्रास आदि कारणों से खेती, कृषकों को अपेक्षित लाभ प्रदान करने में असमर्थ सिद्ध हो रही है। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccdownload2.jpg" width="175" height="148" /></p> <p style="text-align: justify;">कृषकों द्वारा अंतरवर्ती खेती के अंतर्गत प्रत्येक सीजन में कम से कम पांच प्रकार की पफसलों का चयन करने से कीट रोगों का प्रकोप कम होगा। इससे लागत में कमी आएगी जैसे-खरीफ में सोयाबीन के अलावा मक्का, ज्वार, मूंगफली, सूरजमुखी, बाजरा, अरहर, उड़द, मूंग, फलदार बगीचे एवं उद्यानिकी फसलें लेना। रबी में गेहूं के अलावा मटर, मसूर, चना, सरसाें, अलसी के साथ अंतरवर्ती खेती के अंतर्गत कुछ चयनित सब्जीवर्गीय उद्यानिकी फसलें भी ले सकते हैं। कृषकों को अपनी कुल जमीन को चार या पांच हिस्सों में बांटकर उचित फसलचक्र अपनाकर एक खेत में समान फसलचक्र को तीन या चार वर्ष बाद अपनाना चाहिए। इसके साथ ही एक निश्चित क्षेत्रफल में फलोद्यान एवं उद्यानिकी फसलें भी लगानी चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">ऐसा देखने में आ रहा है कि प्राकृतिक आपदा या कीट रोगों से एक फसल में अधिक नुकसान होता है तथा अन्य फसलों में कम नुकसान होता है। विगत कुछ वर्षों में अधिक एवं कम वर्षा से सोयाबीन फसल में ज्यादा क्षति किंतु ज्वार, मक्का फसल में कृषकों को अपनी कुल जमीन को चार या पांच हिस्सों में बांटकर उचित फसलचक्र अपनाकर एक खेत में समान फसलचक्र को तीन या चार वर्ष बाद अपनाना चाहिए। इसके साथ ही एक निश्चित क्षेत्रफल में फलोद्यान एवं उद्यानिकी फसलें भी लगानी चाहिए। क्षति नहीं हुई। इसके साथ ही फलोद्यान एवं उद्यानिकी फसलों में बराबर उत्पादन प्राप्त हो रहा है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccdownload3.jpg" width="175" height="153" /></p> <p style="text-align: justify;">मृदा की बात करें तो प्रत्येक स्थान विशेष की मृदा भिन्न प्रकार की होती है जैसे-गहरी काली मृदा, जो धान फसल के लिए अच्छी है। इसी प्रकार हल्की एवं मुरम वाली मृदा, उद्यानिकी फसलों जैसे-अमरूद, सतंरा, अनार, आवंला, सुरजना एवं सब्जियाें के लिए अच्छी मानी जाती है। दाेमट ढलेदेार मृदा, दलहनी फसलों के लिये बेहतर मानी जाती है। खेत में लगातार एक ही फसल लेने से उत्पादन में असंतुलन हो जाता है। इससे मंडी मूल्य दरों में गिरावट आती है एवं कम क्षेत्र वाली फसलों की दरें एकदम बढ़ जाती हैं। यदि किसान के पास सभी प्रकार की फसलें होंगी तो उत्पादन में असंतुलन नहीं होगा व दरें भी नियंत्रित होंगी। </p> <h3 style="text-align: justify;">जलवायु परिवर्तन आधारित टिकाऊ खेती </h3> <p style="text-align: justify;">यह देखने में आया है कि रेजबेड पद्धति से बुआई करने पर अधिक एवं कम वर्षा दोनों परिस्थितियों में फसल का बचाव होता है। चने में लगने वाला उकठा रोग रेजबेड पद्धति से पूर्णतः नियंत्रित हो जाता है, साथ ही प्रति हैक्टर उत्पादन बढ़ता है। </p> <p style="text-align: justify;">आधुनिक संरक्षित खेती जैसे-प्लास्टिक पलवार, पॉलीहाउस, शेड नेटहाउस में विपरीत परिस्थितियों एवं कम क्षेत्रफल में 10 गुना तक उत्पादन प्राप्त होता है। यहां मौसम के प्रतिकूल प्रभाव से फसलों को बचाया जा सकता है और बेमौसम की फसलें उगाई जा सकती हैं। इजरायल जैसा देश इन तकनीकियों का उपयोग कर प्रति हैक्टर 3500 क्विंटल तक सब्जियों का उत्पादन प्राप्त कर रहा है। </p> <p style="text-align: justify;">वर्तमान में खेती बहुत खर्चीली हो गई है एवं प्राकृतिक आपदाओं से कृषकों को वर्ष दर वर्ष आर्थिक हानि होने का सामना करना पड़ रहा है। पारंपरिक रूप से होने वाली खेती में उत्पादन बढ़ने की संभावना नगण्य है। इन परिस्थितियों में कृषक अधिक एवं स्थाई आय प्राप्त करने के लिए अपने कुल रकबे में से कम से कम 20 प्रतिशत क्षेत्रफल में उच्च तकनीकी से उद्यानिकी (हाइटेक हार्टिकल्चर) फसलें लगाते हैं। इस प्रकार आर्थिक लाभ होने के साथ-साथ प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली हानि काफी हद तक कम की जा सकती है। इसके साथ ही उद्यानिकी फसलों के उत्पाद पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण देश में कुपोषण की समस्या को कम करके स्वस्थ जीवन संभव है व रोगों के प्रकोप से बचा जा सकता है। </p> <h3>भू-स्थानिक प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल कर प्रेसीजन कृषि </h3> <p style="text-align: justify;">आमतौर पर फसलों के नुकसान का मूल्यांकन अनुमान के आधार पर किया जाता है, जो प्रायः हकीकत से दूर होते हैं। वास्तविक आकलन के लिए बड़े पैमाने पर और जमीनी स्तर पर सर्वेक्षण करने पड़ते हैं। इसमें बहुत अधिक समय, धन और श्रम लगता है। इसके बावजूद प्राप्त आंकड़े पूरी तरह से सटीक नहीं कहे जा सकते। इन सब समस्याओं का समाधान भू-स्थानिक प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल करके किया जा सकता है। रिमोट सेंसिंग द्वारा चित्रों के उपयोग से क्षतिग्रस्त फसल क्षेत्र के मूल्यांकन के तौर पर एक वैज्ञानिक विकल्प मिल गया है। अब कृषि बीमा कंपनियां और नीति निर्माता ओलावृष्टि और भारी बारिश सहित अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसलों को होने वाले नुकसान का सही आकलन करने के लिए रिमोट सेंसिंग डाटा का उपयोग कर सकते हैं। अध्ययनकर्ताओं के अनुसार फसलों के नुकसान का आकलन करने के लिए यह एक सटीक तरीका साबित हो सकता है। यह तकनीक भारत सरकार के हाल ही में लाए गए फसल बीमा कार्यक्रम (प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना) के तहत खेतों के स्तर पर फसलों के नुकसान का आकलन करने में सहायक साबित हो सकती है। इसके लिए बहुत ज्यादा स्पष्ट दिखने वाले रिमोट सेसिंग चित्रों की आवश्यकता होगी। इसके साथ ही फसल के नुकसान की मात्रा के निधार्रण के लिए रिमोट सेंसिंग सूचकांक आधारित मॉडल विकसित करने की भी जरूरत है। </p> <h3>जल संरक्षण की वैज्ञानिक विधियां </h3> <p style="text-align: justify;">वर्तमान में कृषकों द्वारा पानी का बेतहाशा उपयोग किया जा रहा है, जिससे पानी की बर्बादी के साथ-साथ फसल उत्पादन में कमी हो रही है। कीटों व रोगों का बढ़ता प्रकोप और साथ ही गैर मापन आधारित ज्यादा पानी के सिंचाई क्षेत्र में उपयोग से जलाशय क्षेत्र में मृदा के अधिक अम्लीय/क्षारीय होने की आशंका बढ़ रही है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccdownload4.jpg" width="290" height="130" /></p> <p style="text-align: justify;">सिंचाई की उन्नत विधियां जैसे-स्प्रिंक्लर (बौछारी) एवं ड्रिप (टपक) सिंचाई पद्धतियाें से फसलों की अवस्था एवं मांग के अनुसार सिंचाई पानी की बचत करते हुए ज्यादा क्षेत्र में की जा सकती है। दूसरे शब्दों में कमांड क्षेत्र में वृद्धि की जा सकती है। सिंचाई जल के समुचित उपयोग से फसलों पर कीटों एवं रोगों से होने वाले प्रकोप से बचाव किया जा सकता है। इसके अलावा जमीन को अधिक क्षारीय एवं अम्लीय होने से सुरक्षा रखा जा सकता है। हमारे सामने इजरायल का स्पष्ट उदाहरण है, जो कम पानी में अधिक उत्पादन प्राप्त कर रहा है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccdownload5.jpg" width="300" height="131" /></p> <p style="text-align: justify;">वर्तमान में कृषक असंतुलित रूप से उर्वरकों का उपयोग कर रहे हैं, जो खेती एवं मानव के लिए बहुत ही घातक है। पंजाब का उदाहरण है, जहां खेती करना असंभव होता जा रहा है। इस प्रकार से लगातार रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से कृषि उत्पादकता में गिरावट हो रही है, जो कि चिंताजनक है। कृषक अपने सुविधाजनक तरीकों से रसायनों का उपयोग कर रहे हैं। इससे खेती की लागत बढ़ने के साथ-साथ भूमि की उत्पादकता नष्ट हो रही है। इसके अतिरिक्त भूमि में आवश्यक जीवांश पदार्थों की मात्रा घटती जा रही है। अतः किसानों को वर्मीकम्पोस्ट, फसल अवशेष एवं पलवार से मृदा की पोषकता में अपेक्षित सुधार पर जोर देना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">मिश्रित खेती और खाद्य प्रसंस्करण</h3> <p style="text-align: justify;">प्रत्येक किसान को 10 बीघा जमीन पर कम से कम चार दुधारू पशु पालने से दुग्ध उत्पादन बढ़ने के साथ ही खेत के लिए आवश्यक जैविक खाद की प्राप्ति भी होगी। यह खाद उसकी खेती के लिए काम आएगी। खाद एवं उर्वरकों का संतुलित उपयोग करने से उत्पादन एवं उत्पादकता में बढ़ोतरी होगी। प्रक्षेत्र में बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए ऊर्जा के नवीन स्रोतों सूर्य प्रकाश या पवन चक्की का इस्तेमाल करना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccdownload7.jpg" width="174" height="160" /></p> <p style="text-align: justify;">कृषि उत्पादन, भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन एवं विपणन की सही व्यवस्था करके इसके अभाव में नष्ट होने वाले लगभग 40 प्रतिशत उत्पादन को बचाया जा सकता है। इसके लिए कोल्ड स्टोरेज, वेयर हाउस, उचित ट्रांसपोर्ट, ग्रेडिंग-पैकिंग की सही व्यवस्था आदि के साथ विपणन एवं भंडारण करना स्वयं कृषकों का दायित्व है। कृषि उत्पादों की सही ग्रेडिंग, पैकिंग, ट्रांसपोर्ट करने पर लगभग 40 प्रतिशत हानि को बचाया जा सकता है। इसका स्पष्ट उदाहरण है केवल प्लास्टिक क्रेट के उपयोग से ही वर्तमान में फल, सब्जियों को दूरस्थ मार्केट में भेजना संभव हुआ है। इस प्रकार ट्रांसपोर्ट में भेजने से होने वाली हानि कम हुई है। उच्च गुणवत्ता की ग्रेडिंग एवं पैकिंग कर हानि को कम किया जा सकता है। उद्यानिकी उत्पादों की विदेशों में मांग अधिक होने के कारण सीधे प्रसंस्करण कर विदेशों में निर्यात करके विदेशी मुद्रा अर्जित कर आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका, सतीश कुमार शर्मा', मुजाहिदा सैयद' और आराधना कुमारी 'कृषि महाविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, गंज-बासोदा, विदिशा-464221 (मध्य प्रदेश)</p>