राजस्थान के पाली जिले में मारवाड़ तहसील की खारी जमीन और खारे पानी जैसी विषम परिस्थितियों में भी गेहूँ की सफल खेती हो रही है। यह लाल रंग का गेहूँ है, जो 'खार्चिया’ नाम से जाना जाता है।। यह गेहूँ यहां के किसानों को खुशहाल बना रहा है।। देश की ऐसी भूमि जो लवणीय और क्षारीय होने के कारण खेती के लिए उपयुक्त नहीं है, वहां पर खार्चिया गेहूँ की खेती वरदान बन सकती है। ऐसी मृदायें, जिनमें निष्क्रिय (उदासीन) घुलनशील लवणों की अधिक मात्रा के कारण बीज का अंकुरण एवं पौधों का विकास प्रभावित होता है, वे लवणीय मृदाएं कहलाती हैं। इन मृदाओं के संतृप्त घोल की वैद्युत चालकता 4 (ई.सी.) डेसी सीमन प्रति मीटर से अधिक, मृदा का पी-एच मान 8.2 से कम तथा विनियम योग्य सोडियम की मात्रा 15 प्रतिशत से कम होती है। लवणीय भूमि में सोडियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं उनके क्लोराइड एवं सल्फेट अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। ये आसानी से पानी में घुल जाते हैं। गर्मियों में बढ़ते तापमान के कारण वाष्पीकरण दर बढ़ने से घुलनशील लवण मृदा सतह की ओर आ जाते हैं। ऐसे में पानी तो वाष्प बनकर आसमान में उड़ जाता है, जबकि भूमि की ऊपरी सतह पर सफेद रंग का लवण रह जाता है। इस प्रकार यह लवण पपड़ी बना लेता है। इसी कारण से ऐसी मृदाओं को कभी-कभी सफेद कल्लर भी कहा जाता है। इन मृदाओं में नमी तो बनी रहती है, परंतु अधिक परासरणीय दाब के कारण पौधों को आवश्यकतानुसार जल की उपलब्धता नहीं हो पाती है। इसके कारण उनकी बढ़वार एवं उत्पादन क्षमता पर विपरीत असर पड़ता है। लवण प्रभावित भूमि में खेत की तैयारी पारंपरिक तरीके से ही करनी चाहिए, लेकिन जल प्लावन की समस्या से ग्रस्त भूमि में मेड़ बनाकर खेती करना अधिक लाभदायक रहता है। गेहूं की अच्छी पैदावार लेने के लिए खेत में उचित नमी की मात्रा तथा मिट्टी का भुरभुरा होना बहुत जरूरी है। इसके लिए सिंचित क्षेत्रों में पहली जुताई मिट्टी पलट हल से तथा बाद की दो-तीन जुताई तवेदार हैरो या देसी हल से करनी चाहिए। अंतिम जुताई के बाद भूमि में नमी संरक्षित करने तथा समतल परत बनाने के लिए दो बार सुहागा अवश्य लगाएं। बारानी क्षेत्रों में प्रत्येक बरसात के बाद हैरो/हल से जुताई कर नमी को संरक्षित करना चाहिए तथा प्रत्येक, जुताई के बाद 'पाटा' अवश्य लगाना चाहिए। गर्मी के मौसम में गहरी जुताई करने से कीड़े-मकोड़े नष्ट हो जाते हैं। पानी के संरक्षण एवं समान रूप से उपयोग के लिए ट्रैक्टरचालित लेजर लैंड लेवलर से भूमि को समतल बनाना चाहिए। खार्चिया गेहूं की विशेषताएं खार्चिया गेहूं लवण सहन करने वाली किस्म है। इसके संकरण से गेहूं की लवण सहन करने वाली किस्मों का विकास किया गया जैसे-खार्चिया 65, सी. 306, के.आर.एल. 19 आदि। जिस मृदा के संतृप्त घोल की वैद्युत चालकता 4 डेसी सीमन प्रति मीटर से अधिक, मृदा का पी-एच मान 8.2 से कम तथा विनियम योग्य सोडियम की मात्रा 15 प्रतिशत से कम होती है, उनमें यह किस्म अधिक उत्पादन देती है। कम पानी में भी उत्पादन देने में सक्षम है तथा जिन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा का स्तर लगभग 250 एम.एम. से कम हो वहां पर भी इसकी खेती की जा सकती है। इससे बने उत्पाद जैसे-रोटी, दलिया, बाटी और पूरी, चूरमा स्वादिष्ट होता है तथा अधिक समय तक खराब नहीं होता है। इसके आटे से बने लड्डू स्वादिष्ट और पौष्टिक होते हैं। गांवों में आज भी खार्चियागेहूं से बने लड्डू प्रसव उपरांत महिलाओं को खिलायें जाते हैं। चपाती बनाते समय आटा पानी ज्यादा सोखता है, जिससे चपाती दो दिनों तक खराब नहीं होती। इस किस्म की प्रमुख पहचान तथा गुण के कारण इस किस्म को भारत के अन्य राज्यों के किसान और व्यापारी पाली से खरीदकर अच्छा मुनाफा कमाते हैं। बाजार में सामान्य गेहूं का भाव 1,600 से 1,800 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि लाल गेहूं (खार्चिया) का भाव 2,500 से 3,000 रुपये प्रति क्विंटल है। यह गेहूं पाली जिले में रबी की मुख्य पफसल है। यहां पर किसान गेहूं की अन्य किस्मों की अपेक्षा लाल गेहूं को ज्यादा क्षेत्रा में उगते हैं, जिसका किसानों को अधिक लाभ प्राप्त होता है। इसकी मांग अधिक होने के कारण राजस्थान के पाली जिले में इसकी लगभग 36000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में खेती होती है, जिससे किसानों को सीधा लाभ मिलता है। आज देश के ऐसे राज्य जहां पर मृदा में लवणता अधिक है, वहां के लिए खार्चिया गेहूं वरदान है। इस गेहूं में रोग व कीटों का प्रकोप नगण्य होता है तथा अधिक पानी देने पर भी फसल गिरने (लोजिंग) की समस्या नहीं होती जिससे उत्पादन अच्छा मिलता है। इसका चारा मुलायम व पौष्टिक होता है। इसे पशु अधिक पसंद करते हैं तथा दुग्ध उत्पादन में भी वृद्धि होती है। यह गेहूं कम पानी वाले क्षेत्रों में भी अधिक पैदावार देता है। इसकी पफसल को पकने तक लगभग 2 से 4 बार सिंचाई की आवश्यकता होती है। फसल पर पाले का प्रभाव नहीं पड़ता। इसका बांध के पेटाकाश्त में असिंचित पद्धति अपनाकर पफसल उत्पादन किया जाता है। राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्रा के लिए यह गेहूं की किस्म एक ईश्वर का दिया उपहार है, जो विषम परिस्थियों में भी किसान का साथ देती है। खार्चिया गेहूं-सफलता की कहानी खार्चिया गेहूं की खेती राजस्थान के पाली जिले की मारवाड़ तहसील के खारची गांव में 1960 के दशक में 60-70 प्रतिशत क्षेत्रफल में की जाती थी। देसी अर्थात लाल गेहूं के रूप में इसकी उपज प्राप्त होती थी। यह किस्म यहां की विषम परिस्थितियों जैसे खारी जमीन और खारे पानी में भी अच्छा उत्पादन देने में सक्षम थी। इसका अन्य फसलों व किस्मों से अधिक उत्पादन भी प्राप्त होता था। लवणीय मृदा में दूसरे देसी गेहूं व कोई भी उन्नत किस्म तथा अन्य फसल के बीज अंकुरित हो जाने के बाद उनकी बढ़वार नहीं होती थी तथा उत्पादन बहुत नगण्य होता था। इन सब किस्मों व अन्य फसलों की तुलना में खार्चिया गेहूँ का उत्पादन बहुत अधिक होता है। 1960 के दशक में साधारण परिस्थितियों में गेहूं की फसल हो जाती थी। पाली जिले की विषम परिस्थितियों, जिसमें अधिकतर भूमि पैतृक रूप से थोड़ी से लेकर अधिक विभिन्न प्रकार की खारच (लवणीय मृदा) पायी जाती है।, पर अन्य फसल लेना कठिन है। इन परिस्थितियों में खार्चिया गेहूं ही मारवाड़ के लवणग्रस्त क्षेत्रों के लिए वरदान है। यह गेहूं असिंचित स्थिति में भी अच्छा उत्पादन देता है। और इसके पौधे में लवण सहन करने की क्षमता होती है। राजस्थान में मारवाड़ क्षेत्र के पाली जिले में 65.4 प्रतिशत भूमि लवण प्रभावित है। इसका पी-एच मान 8.3 से 9.4 तक है तथा ई.सी. लगभग 4.7 है। खार्चिया गेहूँ पाली जिले के मारवाड़ जंक्शन तहसील के खारची गांव से उत्पन्न हुआ है। आज से लगभग 40 वर्ष पहले से भी यह स्थानीय किस्म किसानो के द्वारा उगाई जा रही है। खारची गांव में 1996 में गेहूं अनुसंधान निदेशालय, करनाल के वैज्ञानिकों द्वारा यहां से जर्मप्लाज्म लेकर खार्चिया गेहूं से लवण व खारच सहन करने वाली किस्मों का विकास किया। इसके बाद इस किस्म पर कोई शोध कार्य नहीं हुआ। वर्ष 2010 में भाकृअनुप-भारतीय गेहूँ एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल के वैज्ञानिकों की एक टीम ने खार्चिया ग्राम पंचायत का सर्वे किया और खार्चिया गेहूं के बारे में गांव वालों से जानकारियां जुटाईं। इसके बाद कृषि विज्ञान केन्द्र, पाली के साथ मिलकर स्तर पर एक किसान सेमिनार का आयोजन किया जिसमें भाकृअनुप-केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान की निदेशक डा. इन्दु शर्मा, काजरी निदेशक डा. एम.एम. रॉय और डॉ डी.के. मिश्रा, सदस्य पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण, नई दिल्ली आदि ने भाग लिया। इसमें खार्चिया गेहूं की उपयोगिता पर सभी वैज्ञानिकों ने कृषकों को अवगत कराया तथा किसान-वैज्ञानिक संवाद का आयोजन किया गया। खार्चिया गेहूं की उपयोगिता और इसके क्षेत्रफल को देखते हुए पौध किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण, नई दिल्ली द्वारा खारची ग्राम पंचायत को वर्ष 2015-16 का किसान समूह का पुरस्कार प्रदान किया गया। खार्चिया गेहूँ का पंजीकरण खार्चिया गेहूँ की गुणवत्ता और उपयोगिता के कारण राजस्थान के पाली जिले के खार्चिया ग्राम पंचायत के किसानों ने इस स्थानीय किस्म को बचाया तथा उसका लगातार प्रचार-प्रसार किया। इसकी बदौलत वर्ष 2015-16 में भारत सरकार के 'पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण', नई दिल्ली द्वारा समूह पुरस्कार प्रदान किया गया। इस कार्यक्रम में केन्द्रीय कृषि मंत्री श्री राधा मोहन सिंह महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली) अध्यक्ष पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण, नई दिल्ली द्वारा खार्चिया गेहूँ का पंजीकरण प्रमाणपत्र तथा 10 लाख रुपये का नगद पुरस्कार खार्चिया ग्राम पंचायत को दिया गया। खार्चिया गेहूँ के उत्पाद दिल्ली में आयोजित प्रदशर्नी में दिखाये गए। इसकी सभी उच्च अधिकारियों ने सराहना की तथा उनका उपयोग करने के तरीके आदि के बारे में जानकरी प्राप्त की गयी। खार्चिया गेहूँ की इन सभी विशेष गुणवत्ता के कारण इसका पंजीकरण किया गया। भविष्य में इस प्रकार के स्थानीय जीन व किस्म को बचाया जा सकता है। आज राजस्थान व अन्य पड़ोसी राज्यों में खार्चिया गेहूँ की मांग इतनी बढ़ गयी कि इसका बीज मिलना मुश्किल हो रहा है।। विषम परिस्थितियों में भी खार्चिया गेहूँ का उत्पादन अच्छा होता है। राजस्थान में खार्चिया गेहूँ की वर्तमान में लगभग 5.3 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में खेती होती है। खार्चिया गेहूँ और सामान्य गेहूँ में अंतर सारणी-1 क्र.सं. खार्चिया गेहूँ सामान्य गेहूँ (राज. 4083, राज 3765) 1. यह स्थानीय वातावरण में अधिक उपयुक्त है। उन्नत किस्म के गेहूं स्थानीय वातावरण में कम पनपते हैं। 2. सिंचित परस्थितियों में भी उत्पादन देता है। इस किस्म के गेहूं केवल सिंचित परिस्थिति में ही उत्पादन देते हैं। 3. अधिक लवण सहन कर सकता है। लवणीय मृदा व पानी में इनका उत्पादन घट जाता है। 4. अधिक पी-एच मान यानी 8.2 से ऊपर तक सहन कर सकता है। जिन मृदाओं में पी-एच मान 8.2 से अधिक हो वहां पर इसका उत्पादन 40-45 प्रतिशत घट जाता है। 5. जब बालियां पकने लगती हैं तो फसल गिरती नहीं। लॉजिंग की समस्या नहीं होती है। इन किस्मों के पौधे बालियां पकते समय गिरने लगते हैं, जिससे उत्पादन में 15-20 प्रतिशत तक हानि होती है। 6. भूसा मीठा व मुलायम होता है, जिसे पशु अधिक पसंद करते हैं। इनसे प्राप्त भूसा कठोर होता जिसे पशु कम पसंद करते हैं तथा उनके जबड़े में इन किस्मों के पेनिकल फंस जाते हैं। 7. इससे बनी रोटियां स्वाद में मीठी और अधिक समय तक खराब नहीं होती हैं। इनसे बनी रोटी स्वाद में कम मीठी व जल्दी कठोर हो जाती है। 8. उन्नत किस्मों का आटा पानी कम सोखता है। चपाती अधिक समय तक रखने पर खराब एवं कठोर हो जाती है एवं खाने योग्य नहीं रहती है। 9. इसका आटा अधिक पानी सोखता है जिससे चपाती स्वादिष्ट व अधिक समय तक खराब नहीं होती। ठंडी होने पर उनका स्वादऔर अधिक बढ़ जाता है। इसके दानों का रंग लाल होता है, इसी कारण इन्हें लाल गेहूं के नाम से भी जाना जाता है। दानों का रंग भूरा होता है तथा दानों में कीटों का प्रकोप ज्यादा होता है। 10. इससे बने उत्पाद लापसी, चूरमा, दलिया और लड्डू अधिक स्वादिष्ट व मुलायम होते हैं। इसी कारण आज भी इसका बाजारभाव ज्यादा होता है। उन्नत गेहूं से बने उत्पाद खाने में कम पसंद किए जाते हैं, जिनका स्वाद खार्चिया गेहूं की बजाय कम होता है। 11. इसकी पकने की अवधि लगभग 124 से 135 दिनों की होती है। पौधों की ऊंचाई 125 से 130 सें.मी. तक होती है। राज. 4083 व अन्य गेहूं की किस्मों की औसतन ऊंचाई लगभग 94 से 96 सें.मी. तक होती है। इसकी पकने की अवधि लगभग 135 से 140 दिनों तक की होती है। 12. लवण सहनशीलता 6.9 डे.सी./मी. तक होती है। इन किस्मों में लवण सहन करने की क्षमता लगभग 4.6 डे.सी./मी. तक होती है। 13. लवणग्रस्त मृदा में उपज 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा सामान्य मृदा में उपज लगभग 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है। लवणग्रस्त मृदा में उत्पादन 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक ही होता है, जबकि सामान्य मृदा में लगभग 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन होता है। 14. इस गेहूं का पंजीकरण 2016 में पी.पी.वी.एफ.आर.ए. नई दिल्ली द्वारा हुआ। ये किस्में कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर द्वारा अनुमोदित की गई हैं। 15. इसका बाजार में औसत भाव लगभग 2500 से 3000 रुपये प्रति क्विंटल तक होता है। इन किस्मों का बाजार मूल्य लगभग 1,600 से 1,800 रुपये प्रति क्विंटल तक ही होता है। खार्चिया गेहूँ व अन्य किस्मों के गेहूँ में पोषक तत्वों की मात्रा इस गेहूं में अन्य गेहूं की तुलना में पोषक तत्व ज्यादा पाये जाते हैं। इसी कारण इसकी उपयोगिता वर्तमान समय में बहुत अधिक खार्चिया गेहूँ व अन्य किस्मों के गेहूँ में पोषक तत्वों की मात्रा इस गेहूं में अन्य गेहूं की तुलना में पोषक तत्व ज्यादा पाये जाते हैं। इसी कारण इसकी उपयोगिता वर्तमान समय में बहुत अधिक इसमें पाये जाने वाले पोषक तत्वों को सारणी-2 में दर्शाया गया है। सारणी 2. खार्चिया गेहूं और अन्य गेहूं के पोषक तत्वों की मात्रा क्र.सं पोषक तत्व सामान्य गेहूँ खार्चिया गेहूँ 1. प्रोटीन 11ग्राम 14.7 ग्राम 2. वसा 1.5 ग्राम 2.3 ग्राम 3. कार्बोहाईड्रेड 71 प्रतिशत 73.5 प्रतिशत 4 एनर्जी 341 कैलोरी 349 कैलोरी 5 जल 11.