परिचय बारानी तथा वर्षा आधारित कृषि के अंतर्गत स्थान विशिष्ट उन्नत उत्पादन प्रौद्योगिकियों के उपयोगी के साथ विविधता को ध्यान में हुए कदन्न फसलों (मोटे अनाजों) की खेती से संसाधनों की कमी वाली वाले कृषकों की आय को बढ़ाने की अत्यधिक संभावनाएं हैं। इसके लिए प्रौद्योगिकियों, विपणन प्रणालियों आगत आपूर्तियों, ऋण और नीतियों में तालमेल की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त कृषकों की आय को दोगुना करने हेतु संस्थानों को खेत से रसोई प्रणाली पर बल देना होगा। पोषक तत्वों का सस्ता स्त्रोत कदन्न फसलें ऊर्जा, पाच्या देशों रेशे की अधिक मात्रा, प्रोटीन, विटामिनों तथा खनिजों की सस्ता स्रोत हैं। पोषक तत्वों के सेवन के संदर्भ में कुल सेवन की गई कैलरीज, प्रोटीन, आयरन तथा जिंक में लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा कदन्न फसलों का होताहै। इसलिए यह आवश्यक है कि देश के, विशेषकर कम तथा औसत वर्षा वाले, क्षेत्रों में क्द्न्नों को सबसे ज्यादा पंसदीदा फसल विकल्पों के रूप में तैयार किया जाये। कदन्न (ज्वार, बाजरा, रागी, कंगनी, सावां, कोदों, चेना, कुटकी) मानव के लिए भोजन, पशुओं के लिए चारा तथा उद्योगों के लिए कच्चे माल के मुख्य स्रोत हैं। ये फसलें अर्द्धशुष्क जलवायु के अंतर्गत वृद्धि करती है। जहाँ अन्य फसलों का विकास ठीक से नहीं हो पाता है। जलवायु परिवर्तन का कृषि, उद्योगों के साथ – साथ आजीविका पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है। इससे केवल खाद्य सुरक्षा ही नहीं, बल्कि स्थिरता को भी खतरा है। अत: जलवायु अनुकूल श्रेष्ठ फसलों (क्लाइमेट स्मार्ट क्रौप्स) जैसे कदन्न के तत्काल प्रचार की आवश्यकता है। कदन्न 400 मि. मी. से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में वृद्धि करके अपना जीवन चक्र पूरा करने की क्षमता के कारण जलवायु परिवर्तन के परिदृश्य में अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। कृषकों की आय को दोगुना करने के लक्ष्य की पूर्ति हेतु इन फसलों के लिए उपयुक्त उत्पादन प्रौद्योगिकियों के विकास एवं मूल्य- श्रृखंला तैयार करने की आवश्यकता है। प्रौद्योगिकी प्रयोग नई प्रौद्योगिकियों को कम निवेश, लागत प्रभावी, कम श्रमयुक्त तथा आर्थिक रूप से व्यवहार्य होना चाहिए। कदन्नों की खेती के आधार पर कुछ आशाजनक एवं आवश्यक हस्तक्षेप निम्नलिखित हैं उन्नत कृषि कार्य एवं समय प्रबंधन अग्रिम पंक्ति प्रदर्शनों के अंतर्गत प्रदर्शित प्रौद्योगिकियों का प्रभाव दर्शाता है कि अग्रिम उन्नत कृषि कार्यों को 48 प्रतिशत से ज्यादा, विशेषकर बीजोपचार (85 प्रतिशत), उच्च उपजाऊयुक्त किस्मों के उपयोग (70 प्रतिशत), नाइट्रोजन उर्वरक के उपयोग (57 प्रतिशत), बुआई समय के अनुकरण (49 प्रतिशत) तथा पौधों में पर्याप्त अंतर (48 प्रतिशत) पर अपनाया गया। इसके कारण बेहतर गुणवत्ता (78 प्रतिशत) के साथ धान्य उपज (58 प्रतिशत) तथा चारा उपज (58 प्रतिशत) तथा चारा उपज (26 प्रतिशत) में वृद्धि पाई गई। परिणामस्वरुप शुद्ध लाभ में अत्यधिक वृद्धि (170 प्रतिशत) हुई। इससे यह सिद्ध होता है कि संस्तुत कम – लागतयुक्त कृषि के उपयोग एवं यथासमय प्रबंधन के द्वारा थोड़ा परिवर्तन करने से ही उपज तथा आर्थिक लाभ में अत्यधिक सकरात्मक प्रभाव देखा जा सकता है। मोटे अनाजों का महत्व कदन्न प्रजातियां/किस्मों के व्यापक जलवायु अनुकूलनशील होने के बावजूद, चावल व गेहूं की अपेक्षा संस्थागत सहायता की कमी के कारण पिछले कुछ समय से इनकी खेती में धीरे-धीरे गिरावट आई है। इसलिए हमें उपभोक्ताओं में इन अनाजों की मांग को बढ़ाने हेतु ध्यान केंद्रित करना होगा। इस प्रकार लंबे समय तक कदन्नों की खेती की मांग बनी रह सकती है। कदन्नों की विकास प्रक्रिया के महत्व को ध्यान में रखते हुए तीन प्रमुख तत्वों पर ध्यान देना होगा i) भागीदारी प्रणाली से फसलों की वैज्ञानिक खेती तथा एकल खिड़की प्रणाली में निवेश आपूर्ति के साथ अनुसंधान एवं विकास संस्थानों के समर्थन से क्षमता निर्माण, ii) मूल्य-वर्धन को बढ़ावा तथा कृषक निर्माता संगठनों एवं स्वयं सहायता समूहों जैसी समूह प्रणाली के माध्यम से बाजार में मांग में वृद्धि तथा iii) न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ पुनर्खरीद की व्यवस्था, फसल बीमा, मध्यान्ह भोजन तथा लोक-वितरण प्रणाली में शामिल करने के अतिरिक्त कटाई उपरांत प्राथमिक प्रसंस्करण एवं गोदामों हेतु नीतिगत सहायता की आवश्यकता है। इसके अलावा महिला एवं युवा तथा ग्रामीण एवं शहरी सभी वर्ग के लोगों को केंद्र में रखकर कदन्न आधारित उत्पादों पर उद्यमिता विकास हेतु कौशल को मजबूती प्रदान करनी होगी, ताकि लक्षित लाभार्थियों को सीधे लाभ मिल सके। जल संरक्षण कार्य खरीफ फसलों में वर्षा तथा रबी फसलों हेतु अवशिष्ट नमी पर निर्भरता चिंता का प्रमुख विष्ट है। रबी ज्वार तथा बाजरे की उत्पादकता में कमी का मुख्य कारण अवशिष्ट मृदा नमी पर रबी ज्वार व बाजरे की खेती तथा अंतस्थ (टर्मिनल) सूखे की स्थिति है। स्व –स्थाने नमी संरक्षण कार्य जैसे रबी ज्वार में क्यारी निर्माण (कम्पार्टमेंटल बांडिंग) से 12.6 प्रतिशत मृदा नमी संरक्षण ज्यादा हुआ तथा कृषक विधि की तुलना में इससे 20.6 प्रतिशत ज्यादा धान्य उपज प्राप्त हुई। इसके अलावा जैविक पलवार (आर्गेनिक मल्चिंग) उत्पादकता वृद्धि के महत्वपूर्ण प्रबंधन विकल्प हैं। कदन्न – आधारित अंत:फसल भूमि के उचित उपयोग हेतु मृदा प्रकार, वर्षा एवं वृद्धि की अवधि के आधार पर उपयुक्त अंतर व अनुक्रम फसल प्रणाली की सिफारिश की जाती है। ज्वार की फली की साथ अंत: फसल लेने पर प्रति इकाई क्षेत्र एवं समय में केवल उपज जी ज्यादा नहीं मिलती, बल्कि पोषण सुरक्षा और अधिक आर्थिक लाभ भी प्राप्त होता है। अलावा मृदा स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। ज्वार+अरहर (2:1/3:1/6:2) तथा ज्वार + सोयाबीन (3:6/2:4) दप अत्यधिक प्रचलित अंत:फसल प्रणालियाँ हैं। मध्यम अवधि के ज्वार जीन प्ररूप अंत:फसल हेतु ज्यादा उपयुक्त होते हैं। वार्षिक 700 मि. मी. से ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्रों तथा उच्च जल धारण क्षम्तायूक्त, मध्यम से गहरी मृदाओं में सोयाबीन – रबी ज्वार को तथा सीमित सिंचित परिस्थितियों के अंतर्गत ज्वार (खरीफ)- चना, कुसूम तथा सरसों (रबी) को ज्यादा उत्पादक एवं आर्थिक रूप से व्यवाहारिक प्रणाली पाया गया है। अन्य कई कदन्न – आधारित अंत:फसल तथा अनुक्रम फसल प्रणालियों को ज्यादा लाभप्रद पाया गया। कदन्न खेती के नए पहलू इसके अतिरिक्त धान – परती में ज्वार अथवा कद्न्नों की खेती कृषकों की आर्थिक सुरक्षा में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आंध्र प्रदेश के गूंटूर जिले में धान – परती में 2012 से 2016 के दौरान स्थानीय लोकप्रिय किस्म महालक्ष्मी 296 (5.86 टन हेक्टर) की अपेक्षा ज्वार संकर – सीएसएच 17 (7.50 टन हेक्टर) ने अत्यधिक उपज प्रदान की। धान्य उपज में 27 प्रतिशत अत्यधिक वृद्धि दर्ज की गई। परिणामस्वरूप कृषकों को 73 प्रतिशत ज्यादा आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ। यह कृषकों को अतिरिक्त आय का आश्वासन प्रदान करता है। मूल्यवर्धन तथा कटाई उपरांत प्रसंस्करण ज्वार व कदन्नों के मूल्यवर्धन तथा प्रसंस्करण के द्वारा नियमित व्यवसाय की अपेक्षा ज्यादा आय अर्जन की संभावनाएं हैं। कदन्नों की स्वास्थ्यवर्धक खाद्य के रूप में प्रस्तुत करने तथा इनके मूल्यवर्धित उत्पादों हेतु मांग निर्माण करने पर इनके उत्पादन एवं खपत को बढ़ावा मिलेगा तथा इसका दीर्घकालीन प्रभाव होगा। कदन्न – आधारित मूल्यवर्धित उत्पादों के माध्यम से कृषकों की आय में भी पर्याप्त वृद्धि होगी। मशीनीकरण कदन्न, विशेषकर ज्वार व बाजरे, की खेती अत्यधिक श्रम प्रधान होने के कारण 55 प्रतिशत से ज्यादा लागत श्रम में आती है। कटाई कार्यों में ज्यादा श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है तथा लागत का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस कार्य हेतु खर्च हो जाता है। अत: कटाई व गहाई हेतु संयूक्त रूप से कार्य करने वाली मशीन की अत्यधिक आवश्यकता है। इसके अलावा बारानी नम क्षेत्रों में सफलतापूर्वक फसल लेने हेतु उचित जुताई एवं बीजों की सटीक बुआई व उर्वरकों का उचित प्रयोग अत्यधिक महत्वपूर्ण कम हो सकती है। इससे कृषकों को कदन्नों की खेती हेतु भी प्रोत्साहन मिलेगा। स्थाई कदन्न उत्पादन तथा समूह प्रणाली के माध्यम से मूल्य – श्रृंखला अंतर्राष्ट्रीय व घरेलू बाजारों में ज्वार व अन्य कदन्नों की प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने में धान्य गुणता व जैविक उपज अत्यधिक महत्वपूर्ण कारक हैं। पीड़क एवं रोग प्रतिरोधी किस्मों का उपयोगी तथा जैविक कदन्न उत्पादन से हमें ज्यादा सुअवसर प्राप्त होंगे। कृषक निर्माता संगठनों (एफपीओ) के माध्यम से लक्षित घरेलू बाजारों के साथ – साथ अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भारतीय कदन्नों की निर्यात प्रतिस्पर्धा में वृद्धि करने पर कृषकों को अच्छी आय पाने में सहायता मिलेगी। मृदा के अनुसार उपजशील किस्मों का उपयोग अग्रिम पंक्ति प्रदर्शनों के अंतर्गत सात राज्यों के सभी वर्षा आधारित क्षेत्रों में वर्तमान किस्मों की अपेक्षा नवीनतम 20 खरीफ किस्मों ने ज्यादा उपज प्रदान की। नवीनतम किस्मों ने स्थानीय किस्मों की अपेक्षा 78 प्रतिशत धान्य उपज तथा 60 प्रतिशत चारा उपज ज्यादा प्रदान की। परिणामस्वरूप शुद्ध आय में 51 प्रतिशत वृदधि हुई। इन क्षेत्रों में रबी ज्वार में भी इसी तरह के परिणाम प्राप्त हुए। ज्वारवर्ध्दक क्षेत्रों की मृदा को कम-मध्यम जलधारण क्षमता के साथ मृदा गहराई अर्थात हल्की (<45 सें.मी. गहराई), मध्यम (45-60 सें.मी. गहराई) तथा गहरी (>45 सें.मी. गहराई) के आधार पर तीन प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया। इसी तरह ओडिशा के कोरपुट जिले में रागी की चार उच्च उपज देने वाली किस्मों ने भी उत्साहजनक परिणाम दर्शाए। समेकित कृषि प्रणाली के रूप में संबद्ध उद्यमों का संवर्धन एकल – फसल प्रणाली तथा पारंपरिक खेती व्यवाहरिक नहीं है। कृषि प्रणाली के किसी एक घटक अर्थात फसल किस्म, उर्वरक उपयोग अथवा फसल पालन से भी उत्पादकता में महत्वपूर्ण वृद्धि होने की संभावना नहीं है। सिंचित क्षेत्रों में इसका उदाहरण हमारे समक्ष प्रस्तुत है। पशुओं द्वारा सेवन किये जाने वाले सभी पशु – आहारों के आधार मृदा, पौधा, पशु चक्र हैं। उत्पादकता स्तर एवं मूल्य – श्रृंखला के प्रयोग हेतु अत्यधिक अप्रयुक्त संभावनाएं मौजूद हैं। कदन्न – आधारित समेकित कृषि प्रणाली में महिला केंद्रित गतिविधियों, जैसे – कूक्कूट पालन, दुग्ध उत्पादन, बकरी पालन, सूअर पालन तथा मधुमक्खी पालन द्वारा भी आय अर्जन के पर्याप्त अवसर संभव हैं। मोटे आनाजों का महत्व कदन्न प्रजातियाँ/किस्मों के व्यापक जलवायु अनुकूलशीलता होने के बावजूद, चावल व गेहूं की अपेक्षा संस्थागत सहायता की कमी के कारण पिछले कुछ समय से इनकी खेती में धीरे – धीरे गिरावट आई है। इसलिए हमें उपभोक्ताओं में इन अनाजों की मांग को बढ़ाने हेतु ध्यान केंद्रित करना होगा। इस प्रकार लंबे समय तक अनाजों की मांग बढ़ाने हेतु ध्यान केन्द्रित करना होगा। इस प्रकार लंबे समय तक कदन्नों की खेती की मांग बनी रह सकती है। कदन्नों की विकास प्रक्रिया के महत्व को ध्यान में रखते हुए तीन प्रमुख तत्वों पर ध्यान देना होगा (1) भागीदारी प्रणाली से फसलों की वैज्ञानिक खेती तथा एकल खिड़की प्रणाली में निवेश आपूर्ति के साथ अनुसंधान एवं विकास संस्थानों के समर्थन से क्षमता निर्माण, (2) मूल्य – वर्धन को बढ़ावा तथा कृषक निर्माता संगठनों एवं स्वयं सहायता समूहों जैसी समूह प्रणाली के माध्यम से बाजार में मांग में वृद्धि तथा (3) न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ पुनर्खरीद की व्यवस्था, फसल बीमा, मध्याहन भोजन तथा लोक – वितरण प्राणाली में शामिल करने के अतिरिक्त कटाई उपरांत प्राथमिक प्रसंस्करण एवं गोदामों हेतु नीतिगत सहायता की आवश्यकता है। इसके अलावा महिला एवं युवा तथा ग्रामीण एवं शहरी सभी वर्ग के लोगों को केंद्र में रखकर कदन्न आधारति उत्पादों पर उद्यमिता विकास हेतु कौशल को मजबूती प्रदान करनी होगी, ताकि लक्षित लाभार्थियों को सीधे लाभ मिल सके। मृदा के अनुसार उपजशील किस्मों का उपयोग अग्रिम पंक्ति प्रदर्शनों के अंतर्गत सात राज्यों के सभी वर्षा आधारित क्षेत्रों में वर्तमान किस्मों की अपेक्षा नवीनतम 20 खरीफ किस्मों ने ज्यादा उपज प्रदान की। नवीनतम किस्मों ने स्थानीय किस्मों की अपेक्षा 78 प्रतिशत धान्य उपज तथा 60 प्रतिशत उपज ज्यादा प्रदान की। परिणाम स्वरुप शुद्ध आय में 51 प्रतिशत वृद्धि हुई। इन क्षेत्रों में रबी ज्वार में भी इसी तरह के परिणाम प्राप्त हुए। ज्वारवर्द्धक क्षेत्रों की मृदा को कम – मध्यम जल धारण क्षमता के साथ मृदा गहराई अर्थात हल्की (<45 सें. मी. गहराई), मध्यम (45 -60 सें. मी. गहराई) तथा गहरी (>45 सें. मी. गहराई) के आधार पर तीन प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया। इसी तरह ओड़िशा के कोरपुट जिले में रागी की चार उच्च उपज देने वाली किस्मों ने भी उत्साहजनक परिणाम दर्शाए। स्त्रोत:राजेन्द्र आर. चापके महेश कुमार और विलास ए. टोणापि ,खेती पत्रिका(दोगुनी आय विशेषांक) भाकृअनुप, भारतीय कदन्न अनुसंधान संस्थान, राजेन्द्र नगर, हैदराबाद (