परिचय टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च, मिर्च, फूलगोभी, बंदगोभी, ब्रोकली, गांठगोभी, चाइनीज बंदगोभी, प्याज आदि पौध से उगाई जाने वाली प्रमुख सब्जियां हैं। अच्छी फसल उगाने के लिए पौध का स्वस्थ होना आवश्यक है। ऐसे में सब्जियों के पौध उत्पादन के लिए विभिन्न प्रकार की नई और उन्नत तकनीकों का विकास किया गया है। इन तकनीकों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि किसान संरक्षित वातावरण में सब्जियों की स्वस्थ पौध तैयार कर सकते हैं। इनमें खरपतवार निकालने तथा अन्य कृषि कार्यों को संपन्न करने में सुविधा रहती है। आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग कर किसान अधिक लाभ कमा सकते हैं। सब्जियों की खेती में पौधशाला में पौध तैयार करना एक कला है। इसे सुचारू रूप से तैयार करने के लिए तकनीकी जानकारी का होना आवश्यक है। एक सफल किसान का प्रयास रहता है कि कम से कम लागत में अधिक से अधिक उत्पाद प्राप्त कर सके। सामान्य मौसम की दशाओं में सब्जियों का खुले वातावरण में साधारण देखभाल के साथ पौध उत्पादन किया जाना संभव है। प्रतिकूल मौसम में खुले वातावरण में सब्जियों की पौधशाला उगाने पर पौधा के नष्ट होने की आशंका रहती है। इसके लिए सब्जी-उत्पादन में आधुनिक तकनीक के रूप में प्रयोग में ली गई विधियों को उच्च तकनीक या हाईटेक कहते हैं। ये तकनीकें आधुनिक मौसम और वातावरण पर कम निर्भरता वाली एवं अधिक लाभ देने वाली हैं। सब्जियों की पौध को साधारण और असाधारण मौसम की दशाओं में सफलतापूर्वक उगाने के लिए अब उन्नत वैज्ञानिक तकनीकें उपलब्ध हैं, जिन्हें अपनाकर सब्जियों की व्यावसायिक खेती करके किसान अधिक उपज प्राप्त कर सकते हैं। हरितगृह इस विधि द्वारा हरितगृह (ग्रीनहाउस) की पौधशाला में प्रो ट्रे में पौध तैयार की जाती है। ग्रीनहाउस में विभिन्न प्रकार के उत्पादों-कपड़ा, जालीनुमा अलग-अलग रंग का जाल, कांच आदि का उपयोग लोहे के फ्रेमों को ढकने के लिए किया जाता है। हरितगृह में 40 मेश का कीट अवरोधी नायलॉन नेट लगाकर छत को प्लास्टिक से ढका जाता है। इस नायलॉन नेट के कारण रसचूसक कीट जैसे-सफेद मक्खी, एफिड (माहूं), जैसिड, थ्रिप्स आदि हरितगृह में प्रवेश नहीं कर सकते हैं, जिसके कारण विषाणु रोगों से भी सुरक्षा होती है। ग्रीनहाउस में दो दरवाजे लगाने चाहिए तथा दोनों दरवाजों के बीच कुछ स्थान खाली होना चाहिए। पहला दरवाजा खोलने के बाद अन्दर घुसकर दरवाजा बंद करने के बाद ही दूसरा दरवाजा खोलना चाहिए, ताकि दरवाजों के द्वारा भी कीटों का प्रवेश पूर्ण रूप से रुक सके। हरितगृह में आवश्यकतानुसार 50-75 प्रतिशत छाया करने वाले शेडनेट का उपयोग किया जाता है। इसे गर्मियों में दिन के समय फैलाकर बाहर से आने वाली अत्यधिक धूप को रोककर अन्दर 50-75 प्रतिशत तक छाया की जा सकती है। सर्दी के मौसम में इसे दिन में खुला रखा जा सकता है (4 -5 बजे के बाद) में इसे बंद कर देना चाहिए, ताकि दिन के समय हरितगृह के अंदर अर्जित गर्मी को रात के समय उपयोग करके तापमान को संतुलित किया जा सके। छाया करने वाले नेट को हाथ से या मशीनों द्वारा बंद किया जाता है। लगभग 500 वर्ग मीटर के क्षेत्रफल में हरितगृह में लगभग 2-2.5 लाख सब्जियों की पौध तैयार कर अपनी आय को दोगुना कर सकते हैं। माध्यम प्रो-ट्रे में कोकोपीट, परलाइट व वर्मीकुलाइट 3:1:1 अनुपात का मिश्रण (आयतन के आधार पर) तैयार करके भरा जाता है। प्लास्टिक की खानेदार ट्रे के प्रत्येक खाने में एक ही बीज बोया जाता है। इसके बाद बीज के ऊपर माध्यम मिश्रण को पतली परत के रूप में डालते हैं। सर्दी में बीज बोने के बाद ट्रे को अंकुरण कक्ष में रखा जाता है, ताकि बीजों का अंकुरण जल्दी व अधिक हो सके। अंकुरण के बाद सभी प्रो-ट्रे हरितगृह में बने फर्श, जमीन से उठी हुई क्यारियों या लोहे के बने प्लेटफार्म आदि पर या ईंटों से बने फर्श पर रखते हैं। उपरोक्त माध्यमों में से कोकोपीट को नारियल के फलों की जटा में उपस्थित रेशों को गलाकर बनाया जाता है। यह जड़ों की बढ़वार के लिए माध्यम का कार्य करता है। वर्मीकुलाइट माइका चट्टानों के अत्यधिक तापमान पर गर्मी के फलस्वरूप फैलाव से बनता है। यह एक प्रकार का खनिज होता है। इसमें मैग्नीशियम व पोटेशियम लवण आंशिक मात्रा में होते हैं, जो माध्यम में उचित नमी बनाये रखने का काम करता है। परलाइट ज्वालामुखी फटने से विकसित चट्टानों से निकाले गये पदार्थ से विकसित हुआ है। यह माध्यम भी उचित जल निकास व माध्यमों के मिश्रण के बीच उचित हवा उपलब्ध करवाने में सहायता करता है। यह सफेद रंग का बहुत हल्का माध्यम है, जिसका एक भाग (आयतन के अनुसार) मिश्रण में मिलाया जाता है। इसके अलावा प्रो-ट्रे में पौध तैयार करने के लिए केंचुए की खाद, कोकोपीट आदि का भी उपयोग हो रहा है। माध्यम के मिश्रण को प्रो-ट्रे में भरने से पूर्व अच्छी तरह से रोग एवं कीटाणु मुक्त करना चाहिए, ताकि पौध गलन रोगों से बचाव हो सके। सर्दी के मौसम में पौध की प्रारंभिक अवस्था में 50-70 पीपीएम (50-70 मि.ग्रा. प्रति लीटर), नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व पोटाश को मिलाकर बने घोल को दिया जाता है। इसके बाद में यह मात्रा 150 पी.पी.एम. प्रति सप्ताह तीन से चार बार घोल बनाकर दें। उर्वरक व पानी बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली द्वारा दिया जाता है, जिससे उर्वरक व पानी की मात्रा समान रूप से पौध को मिले। इससे पौध की बढ़वार अच्छी व गुणवत्तापूर्ण होती है। इस विधि द्वारा पौध तैयार होने में लगभग 25-30 दिन लगते हैं। पौध को माध्यम सहित निकालकर खेत में रोपाई सायंकाल के समय कर, झारे की सहायता से हल्की सिंचाई करें। पौध को एक स्थान से दूसरे स्थान तक माध्यम सहित ले जाने के लिए आसानी से पैकिंग करके ले जाया जा सकता है। इस विधि को अपनाकर कद्वर्गीय सब्जियों की पौध 15 से 18 दिनों में तैयार कर सकते हैं। कीट व्याधियों की समस्या होने पर रसचूषक कीट के प्रकोप से बचाव के लिए मैलाथियॉन 50 ई.सी. नामक कीटनाशी दवा 1.25 मि.ली. प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर छिड़काव करें। जड़ एवं तनागलन आदि रोगों से बचाव के लिए प्रो-ट्रे के माध्यम को काबेंडाजिम नामक फफूंदनाशी दवा 1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल से उपचारित या छिड़काव अवश्य कर लें। ट्रे पौध उत्पादन प्रौद्योगिकी का आर्थिक विश्लेषण 500 वर्ग मीटर क्षेत्र वाले साधारण हरितगृह में एक बार में 2.0 लाख तक विभिन्न प्रकार की सब्जियों की पौध तैयार करना संभव है। इससे वर्षभर में 6 से 8 किश्तों में पौध तैयार करना भी संभव है। इस प्रकार एक वर्ष में हरितगृह में 15 से 20 लाख पौध तैयार की जा सकती है। पौध तैयार करने में 30 से 35 पैसे की सम्पूर्ण लागत (जिसमें बीज की कीमत सम्मिलित नहीं है) आती है। यदि उस पौध को उत्पादक 50 पैसे में बेचता है, तो उसे वर्षभर में 3.0 से 4.0 लाख रुपये का लाभ अर्जित हो सकता है। पौध उत्पादन की यह विधि एक लघु उद्योग के रूप में अपनाने से बेरोजगार युवकों को स्वरोजगार का अवसर मिलेगा। इसके साथ ही साथ दो से तीन लोगों को वर्षभर रोजगार देने में सक्षम हो सकेंगे। रोजगार के इस तरीके से पौध उत्पादन कर शिक्षित नवयुवक सब्जी उत्पादन व बीज उत्पादन को एक नई दिशा दें सकते हैं। कम लागत वाले शेड नेट हाउस में सब्जियों की पौध तैयार करना सब्जियों की स्वस्थ (विषाणु रोग रहित) व बेमौसमी पौध को विभिन्न प्रकार की अलग-अलग लागत वाली संरक्षित संरचनाओं में भी सफलतापूर्वक तैयार किया जा सकता है। इसके लिए कृषक बरसात के मौसम में जी.आई. पाइप, जिनका व्यास 2 इंच का हो, को अर्द्ध गोलाकार में मोडकर उन्हें जमीन में सीमेन्ट, कंक्रीट की सहायता से (40 से 50 मेश आकार) से ढक लेते हैं। यह धूपरोधी होनी चाहिए। इस प्रकार 50 वर्ग मीटर के शेड नेटहाउस बनाने में 6 जी.आई. पाईप व 100 वर्ग मीटर नेट लगेगा, जिसकी कुल कीमत लगभग 5000 से 5500 रुपये होगी। इस प्रकार सब्जी उत्पादक विषाणु रोगरहित एवं स्वस्थ पौध तैयार कर सकते हैं। शेड नेटहाउस के अंदर क्यारियां बनाकर उनमें भी पौध तैयार की जा सकती है। इसमें मदाजनित रोगों की भी रोकथाम की जा सकती है। खेत में विषाणु रोग से बचाव संभव नहीं है। पौधे को प्लास्टिक प्रो-ट्रे में मृदारहित माध्यम में तैयार किया जा सकता है। मृदारहित माध्यम में पौध तैयार करने के लिए प्लास्टिक प्रो-ट्रे का उपयोग किया जाता है। इसमें यहां तक कि कवर्गीय सब्जियों की पौध को भी तैयार कर सकते हैं, जिसे परम्परागत विधि द्वारा तैयार करना संभव नहीं है। परम्परागत विधि द्वारा अन्य सब्जियों की स्वस्थ पौध तैयार करने के लिए पौधशाला की मृदा को फार्मेल्डिहाइड के घोल (0.1 प्रतिशत) द्वारा कीटाणुरहित किया जा सकता है। सर्दी के दिनों में पौध कम समय में वातावरण की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कम लागत वाले पॉलीहाउस में पौध तैयार की जाती है। इसमें नेटहाउस की तरह ही जी.आई. पाइपों का ढांचा तैयार करके ऊपर से ढकने के लिए 180 से 200 माइक्रॉन की पॉलीथीन, जो सूर्य के प्रकाश व तापमान से प्रभावित नहीं हो, का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार फ्रेम को ऊपर से ढककर कम लागत का पॉलीहाउस तैयार किया जा सकता है। पॉलीहाउस में सर्दी के दिनों में पौध को दिसम्बर से जनवरी में ही तैयार कर लिया जाता है। इससे यह परम्परागत विधि की अपेक्षा पहले तैयार हो जाती है तथा उन्हें फरवरी में खेत में रोपित करके, सब्जी उत्पादक अपने उत्पाद को 30 से 40 दिन अगेती पैदा कर बाजार में बेचकर अधिक लाभ कमा सकते हैं। ठीक इसी प्रकार यदि सब्जियों की पौध को मई या जून में तैयार करना है, खासकर फूलगोभी की, तो इस कीट अवरोधी नेट के ऊपर 50-75 प्रतिशत छाया करने वाले नेट ढककर सफलतापूर्वक तैयार किया जा सकता है। इस समय हमारा उद्देश्य तापमान तथा प्रकाश की तीव्रता को कम करना होता है। इसके लिए काले रंग का छाया करने वाला नेट ज्यादा उपयोगी रहता है। छाया करने वाले नेट को मई, जून, जुलाई तथा अगस्त में ही उपयोग में लिया जा सकता है, बाद में इसे हटा लिया जाता है। लाभ पौध जल्दी समय रहते 20 से 25 दिनों में तैयार की जा सकती है। सब्जी की पौध वर्षभर में तैयार की जा सकती है। खासकर मौसम से पहले फसल उगाने के लिए ताकि बेमौसमी उत्पादन द्वारा अधिक लाभ कमाया जा सके। कद्वर्गीय सब्जियों की पौध को भी इस विधि द्वारा सरलतापूर्वक तैयार किया जाता है, जो परंपरागत विधि द्वारा तैयार करना संभव नहीं होता है। बीज की मात्रा को भी काफी कम (40-60 प्रतिशत) किया जा सकता है। इस विधि द्वारा प्रत्येक खाने में 1-2 बीज बोया जाता है। पौध को मृदाजनित रोगों, कीटाणुओं एवं विषाणु रोगों से बचाया जा सकता है। खेत में विषाणु रोगों का फैलाव का एक कारण संक्रमित पौध भी होता है। जब पौध बाहर पौधशाला में तैयार की जाती है, तो पौध रोपण के समय जड़ों आदि के टूटने से पौधों की रोपण उपरांत मरण क्षमता में लगभग 15 से 20 प्रतिशत बढ़ोतरी हो जाती है। प्लग ट्रे विधि द्वारा पौध तैयार करने में पौध के मरने की आशंका बहुत कम रहती है। इससे पौधे को रोपण उपरांत घात नहीं लगता है। पौधे में जड़तंत्र का विकास अच्छा होता है, जिसके कारण पौधे ओजस्वी होते हैं। पौध मुख्य खेत में रोपाई के बाद बहुत जल्दी स्थापित होती है। पौध की गुणवत्ता अच्छी होने से उत्पादन अधिक प्राप्त होता है। पौध को उचित पैकिंग के बाद दूरस्थ स्थानों तक भेजा जा सकता है, जहां इनको उगाया जाना मुश्किल एवं उपलब्धता बहुत कम हो। सब्जियों में संकर किस्मों के बीज बहुत महंगे होने के कारण इस विधि द्वारा वातावरण की प्रतिकूल दशाओं में भी उचित प्रबंधन आसान होता है। उर्वरक व पानी का समुचित उपयोग होता है। इस विधि से तैयार पौध की बढ़वार एक समान होने के कारण खेत में रोपाई के बाद फसल की बढ़वार भी एक समान होती है। सब्जियों की संरक्षित खेती के लिए पौध तैयार करने की यह आवश्यक एवं आधुनिक विधि है। आचार्य (प्रसार शिक्षा) एवं उपनिदेशक अनुसंधान एवं विपणन, सहायक आचार्य (पादप प्रजनन एवं आनुवंशिक) एवं सहायक निदेशक (अनुसंधान), श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर, जयपुर (राजस्थान), सहायक आचार्य (उद्यान विज्ञान), उद्यान विभाग, एस.के.एन. कृषि महाविद्यालय, जोबनेर, जयपुर (राजस्थान)