परिचय आलू में उत्तम गुणवत्ता वाले बीज कीजा उपलब्धता हमेशा ही आवश्यकता से कम रही है। गेहूं और धान जैसी फसलों में प्रति हैक्टर जितनी पैदावार होती है, लगभग उसके बराबर ही आलू में प्रति हैक्टर बीज कंद की आवश्यकता होती है। भारत में वर्ष 1968 आलू के गुणवत्तायुक्त बीज का उत्पादन कार्यक्रम शुरू किया गया था। यह वानस्पतिक फसलों में पहला बीज उत्पादन कार्यक्रम था। यह पद्धति आलू कंदों में सामान्यतः पाये जाने वाले विषाणुओं की जांच एवं उनके उन्मूलन तथा रोगमुक्त कंदों की चार पीढ़ी के कृन्तक बहुलीकरण (क्लोनल मल्टीप्लीकेशन) पर आधारित है। यह पारंपरिक बीज आलू पैदा करने की विधि बहुत विश्वसनीय है। इस विधि द्वारा पैदा किए गए बीजों को किसानों तक पहुंचाने में सात से आठ वर्ष लग जाते हैं। इस अवधि में बीज में कई तरह के रोग लगने की आशंका बनी रहती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए बीज आलू का उत्पादन ऊतक संवर्धन (टिशू कल्चर) विधि द्वारा शुरू किया गया। इस विधि में टिशू कल्चर तकनीकी से पैदा किए हुए छोटे पौधों को नेट हाउस में लगाया जाता है। इससे पौधे चैंपा (माहूं) एवं अन्य रोग फैलाने वाले कीट-पतंगों से बचे रहते हैं। इस विधि द्वारा प्रति पौधा चार से सात छोटे कंद मिलते हैं, जिनका वजन 2 से 40 ग्राम तक हो सकता है। ऐरोपोनिक विधि के लाभ ऐरोपोनिक विधि में प्रति पौधा 40-50 छोटे कंद मिलते हैं। ये पारंपरिक आलू बीज उत्पादन की विधियों से संख्या में 10-12 गुना अधिक होते हैं। इस विधि में बीज कंदों को हर चौथे, पांचवें दिन तोड़े जाने के कारण इनके आकार में समानता बनी रहती है।आवश्यकतानुसार तोड़े जाने वाले आलू का आकार भी हम सुनिश्चित कर सकते हैं।इनकी एकसार बिजाई करना भी आसान रहता है। ऐरोपोनिक में पौधों को हवा में ही उगाया जाता है। इस कारण मृदाजनित रोगों के होने की आशंका नहीं होती। खेत से प्राप्त होने वाले आलू बीज कंदों की अपेक्षा ऐरोपोनिक से बीज कंदों की प्रति पौधा पैदावार लगभग दोगुनी (वजन के अनुसार) प्राप्त होती है। इस प्रकार सभी पौधों की जड़ों को पोषक तत्वों की उपलब्धता पर्याप्त एवं एक समान होती है। इस विधि में छोटे आकार के बीज आलू कंद होने के कारण उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाना और ले जाना भी सुविधाजनक रहता है। मिट्टी की तुलना में ऐरोपोनिक विधि में सिर्फ 5-10 प्रतिशत पानी एवं 10-15 प्रतिशत पोषक तत्वों का इस्तेमाल होता है। इसलिए इस विधि को पानी की कमी वाले क्षेत्रों में भी आलू बीज उत्पादन के लिए प्रयोग किया जा सकता है। प्रति कंद उत्पादन लागत अन्य विधियों की तुलना में अपेक्षाकृत पांच से छः गुना कम आती है। ऐरोपोनिक विधि इस विधि में सर्वप्रथम टिशू कल्चर पौधों का दढीकरण (हार्डनिंग) किया जात है। दृढ़ीकरण के लिए टिशू कल्चर पौधों को 28° सेल्सियस तापमान पर 15-21 दिनों तक रहने दिया जाता है। इसके उपरांत इन पौधों को विशेष प्रकार से निर्मित ऐरोपोनिक बक्सों की ऊपरी सतह पर लगाया जाता है। इन बक्सों की ऊपरी सतह पर 20 मि.मी. गोल छेद निर्धारित या आवश्यकतानुसार दूरी पर बनाए जाते हैं एवं हर छेद में एक पौधा लगाया जाता है। इसमें जड का भाग डिब्बे में अंधेरे में जबकि ऊपरी भाग बाहर सूरज की रोशनी में रहता है। रोपाई के लिए जड़सहित सूक्ष्म कटिंग पौधों की जगह पौधे की कटिंग का भी प्रयोग किया जा सकता है। डिब्बों को अंदर से पूर्णतया काला किया जाता है।इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि अंदर प्रकाश जड़ तक बिल्कुल न जा पाये। इन छतों को केवल आलू की तुड़ाई एवं निरीक्षण के समय ही उठाया जाता है। पोषक तत्वों के मिश्रण को एक बड़े टैंक में पानी में घोला जाता है। इस घोल में सभी 13 आवश्यक तत्व एक निर्धारित मात्रा में मिलाये जाते हैं। ऐसी व्यवस्था की जाती है कि अतिरिक्त घोल जड़ों पर छिड़काव के बाद वापस एकत्र होकर दोबारा उसी टैंक में निरंतर आता रहे। विशेष तरह के स्वचालित स्प्रे यंत्रों एवं ग्रो बॉक्स में लगे नोजलों के माध्यम से हर पांच से दस मिनट के अंतराल पर 15-20 सेकेंड के लिए पोषक तत्वों के मिश्रण का जडों पर छिड़काव किया जाता है। इस विधि में पोषक घोल का पुनः संचरण होता रहता है। इसमें पानी और पोषक तत्वों का प्रयोग मिट्टी की तुलना में बहुत कम होता है। खेत की ही तरह 25-30 दिनों बाद डिब्बों के अंदर 30-40 सें.मी. लंबी जडे बनने के बाद छोटे-छोटे आलू कंद बनने आरंभ हो जाते हैं। तीन से चार ग्राम के आलू कंदों को 45 से 50 दिनों की फसल होने __ के बाद पहली बार चुना जाता है। एक निश्चित अंतराल पर पोषक तत्वों के घोल को बदलते रहते हैं। पौधों को समुचित मात्रा में पोषक तत्वों की उपलब्धता बनी रहनी चाहिए। पोषक तत्वों के घोल के पी-एच मान का निरतंर निरीक्षण करते रहना चाहिए एवं उसे 6.0 के लगभग बनाये रखते हैं। इसके बाद हर चौथे-पांचवें दिन पहले से निश्चित आकार के आलू तोड़ लिए जाते हैं। उनको फफूंदनाशक दवाई से उपचारित करने के बाद 10-15 दिनों के लिए हल्की रोशनी में रखा जाता है ताकि कंद हरे हो जायें। ये छोटे कंद अगले मौसम में जालीनुमा घर (नेट हाउस) में उगाये जाते हैं। इनका प्रयोग करके आने वाले वर्षों में बीज आलू की गुणात्मक पैदावार प्राप्त की जाती है। समूची ऐरोपोनिक प्रणाली को पॉलीकार्बोनेट शीट से बने घर में स्थापित किया जाता है। इसमें साफ-सफाई की विशेष व्यवस्था की आवश्यकता होती है। ऐरोपोनिक विधि के माध्यम से पारंपरिक विधियों की अपेक्षा 10-12 गुना अधिक संख्या में प्रति पौधा बीज कंदों का उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए इस विधि से भारत में कम समय में अधिक मात्रा में गणवत्तायुक्त बीज आलू उत्पादन करने की अच्छी संभावना दिखाई पड़ती है। इस विधि का गैर-पारंपरिक आलू बीज उत्पादन एवं पानी की कमी वाले क्षेत्रों में भी उपयोग किया जा सकता है। भाकृअनुप-केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला इस तकनीकी को यांत्रिकी एवं फसल उत्पादन के दृष्टिकोण से विभिन्न क्षेत्रों के लिए और अधिक मजबूत करने की कोशिशों में लगातार अग्रसर है। बीज आलू उत्पादन की पारंपरिक विधियों की कमियां इन विधियों में गुणनदर कम होने की वजह से किसान तक पहुंचते-पहुंचते बीज काफी पुराना हो जाता है और कई तरह के रोग लगने की आशंका रहती है। आलू की टिशू कल्चर विधि में प्रति पौधा पांच से आठ छोटे आलू मिलते हैं, इसलिए टिशू कल्चर पौधों की अधिक संख्या में जरूरत होने के कारण टिशू कल्चर प्रयोगशाला पर अधिक दबाव रहता है। यह अपेक्षाकृत अधिक महंगी भी होती है। पारंपरिक विधियों में मिट्टी से होने वाले रोगों की अधिक आशंका बनी रहती है, जिससे बीज की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इन विधियों द्वारा पैदा किए गए कंदों का आकार एक समान न होने के कारण आलू की बिजाई करना कठिन होता है और पौधे एक समान नहीं उगते। आलू के पौधे मिट्टी से एक सीमित मात्रा तक ही पोषक तत्व ले पाते हैं। इस कारण एक सीमित पैदावार ही प्राप्त हो पाती है। स्त्राेत: खेती पत्रिका(आईसीएआर) ,विनय सिंह, राजेश कुमार सिंह, सुखविन्दर सिंह, तनुजा बक्सेठऔर जागेश कुमार तिवारी.भाकृअनुप-केंद्रीय आलू अनुसंधान केन्द्र, मोदीपुर,भाकृअनुप-केंद्रीय आलू अनुसंधान केन्द्र शिमला; भाकृअनुप-केंद्रीय आलू अनुसंधान केन्द, जालंधर)।