ढिंगरी मशरूम उत्तर भारत का प्रचलित नाम है तथा इसका वैज्ञानिक नाम प्लूटोरस है। इसका आकार बटन मशरूम से भिन्न है। यह सीपीनुमा/चम्मच या प्लेट की तरह होती है, जिसे छत्रक कहते हैं। ढिंगरी मशरूम की विभिन्न प्रजातियों का रंग अलग-अलग होता है। ये भूरा, सफेद, पीला, गुलाबी एवं कथई इत्यादि होते हैं। छत्रक का ऊपरी भाग दबा हुआ होता है तथा निचले भाग पर धारियां होती हैं, जिसे गील्स या बीजधारक कहते हैं। इस मशरूम में भरपूर प्रोटीन व औषधीय गुण पाए जाते हैं। एक शाकाहारी भोजन के तौर पर आने वाले समय में इसका उत्पादन निरंतर बढ़ने की संभावना है। ढिंगरी खेती के लिए फसलों के अवशेषों का भरपूर रूप से प्रयोग किया जाता है। इन अवशेषों का प्रयोग कर बचे हुए अपशिष्टों को खाद के रूप में उपयोग कर भूमि की उर्वराशक्ति को बढ़ा सकते हैं। देश में जलवायु अलग-अलग होने की वजह से ऋतु के अनुसार हवा में नमी व तापमान अलग-अलग रहता है। इन बातोंको ध्यान में रखते हुए अलग-अलग मौसम में विभिन्न मशरूम उगा सकते हैं। ढिंगरी मशरूम की खेती पूरे वर्ष ऋतु के अनुसार कर सकते हैं। इसमें लगभग 80 लाख टन प्रतिवर्ष उपज प्राप्त होती है। यह दुनिया में बटन और शीटाके के बाद तीसरी सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली खुंभ है। ऑयस्टर मशरूम शीतोष्ण एवं उपोष्ण प्रजाति की खुम्भ है।वर्तमान में ढिंगरी मशरूम की खेती महाराष्ट्र, तमिलनाडु, ओडिशा, पश्चिम बंगाल तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों में हो रही है। इसकी खेती पूरे भारत में ही नहीं अपितु विश्वभर में लोकप्रिय हो रही है। ढिंगरी मशरूम को किसी भी प्रकार के कृषि अपशिष्ट पर आसानी से उगाया जा सकता है। इसका फसलचक्र 45-60 दिनों का होता है। ढिंगरी मशरूम में अन्य मशरूमों की तरह ही विटामिन, लवण, औषधीय तत्व मौजूद होते हैं तथा इसकी सही प्रजाति का चयन कर इसे वर्षभर उगाया जा सकता है। देश की जलवायु ढिंगरी मशरूम की खेती के लिए बहुत ही अनुकूल है। आने वाले समय में इसके बढ़ने की बहुत अधिक संभावना है। ढिंगरी मशरूम की लगभग 32 प्रजातियां पूरे विश्व में पाई जाती हैं। इनमें से लगभग16 किस्मों का व्यावसायिक उत्पादन किया जाता है। कुछ समय पहले ढिंगरी मशरूम की खेती मुख्यतः गर्मी (अप्रैल-सितंबर) में ही की जाती थी, लेकिन अब सर्दियों में जब तापमान 14-20 डिग्री सेल्सियस तक होता है, यह आसानी से उगाई जा सकती है। उत्पादन विधि ढिंगरी मशरूम उत्पादन करने के लिए उत्पादन कक्ष की जरूरत होती है। ये बांस कच्ची ईंट, पॉलीथीन तथा पुआल से बनाए जा सकते हैं। इन उत्पादन कक्षों में खिड़की तथा दरवाजों पर जाली लगी होनी चाहिए। ये किसी भी आकार के बनाए जा सकते हैं। 18 फीट लंबाई x 15 फीट चौड़ाई x 10 फीट ऊंचाई के मशरूम कक्ष में लगभग 300 बैग रखे जा सकते हैं। इस बात का ध्यान रखा जाए कि हवा के उचित प्रबंधन के लिए दो बड़ी खिड़कियों तथा दरवाजे के सामने भी एक खिड़की होनी चाहिए। उत्पादन कक्ष में नमी बनाए रखने के लिए एक एयर कूलर लगाया जा सके तो, बेहतर होगा। पोषाधार तैयार करनाढिंगरी मशरूम किसी भी प्रकार के ऊपर लिखित फसल के अवशेषों का प्रयोग कर लिया जा सकता है। इसके लिए यह जरूरी है कि भूसा तथा पुआल सड़ा-गला नहीं होना चाहिए। जिन पौधों के अपशिष्ट सख्त तथा लंबे होते हैं उन्हें मशीनों से लगभग 2-3 सें.मी. आकार का काट लिया जाता है। कृषि अवशेषों में कई प्रकार के हानिकारकसूक्ष्मजीव जीवाणु पाए जाते हैं। सर्वप्रथम कृषि अवशेष को जीवाणुरहित किया जाता है। कृषि अवशेषों का निर्जमीकरण करना। इस विधि में 200 लीटर के पात्र में 90 लीटर पानी लेकर 10 से 12 कि.ग्रा. तुड़ी डालकर इसमें 10 लीटर पानी जिसमें 7.5 से 10 ग्राम फॉर्म एल्डिहाइड 125 मि.ली. मिलाएं हुए को पात्र में उड़ेल देते हैं। इस ड्रम को प्लास्टिक शीट अथवा लोहे की जाली पर डालकर दो से ढाई घंटे छोड़ दिया जाता है। इससे अतिरिक्त पानी तथा फॉर्मलीन की गंध खत्म हो जाती है। तुड़ाई ढिंगरी मशरूम की छतरी के बाहरी किनारे ऊपर की तरफ मुड़ने लगे तो यह तोड़ने के लिए तैयार हो जाती है। इसको तोड़ने के बाद डंठल के लगे हुए भूसे को चाकू से काटकर हटा देना चाहिए। पहली फसल के 8 से 10 दिनों बाद दूसरी फसल आयेगी। पहली फसल कुल उत्पादन का लगभग आधी या उससे ज्यादा होती है। एक कि.ग्रा. सूखे भूसे से लगभग 700 से 800 ग्राम तक पैदावार मिलती है। उपज ढिंगरी मशरूम की पैदावार 35 से 40 डिब्बों तक आती है। एक कि.ग्रा. सूखे भूसे से लगभग 500 से 700 ग्राम तक मशरूम प्राप्त हो सकती है। पहली फसल के कुछ दिनों बाद दूसरी फसल बैगों से आती है। ढिंगरी मशरूम की तुड़ाई के बाद डंठल के साथ लगी घास को काटकर हटा लिया जाना चाहिए तथा दो घंटे बाद छिद्रदार पॉलीथीन में पैककर बाजार में भेजना चाहिए। आमदनी ढिंगरी मशरूम का फसलचक्र 40-50 दिनों का होता है। इसका लागत मूल्य लगभग 50-55 रुपसे प्रति कि.ग्रा. तक होता है। सारणी : ढिंगरी मशरूम की विविध प्रजातियां ढिंगरी की प्रजातियां उचित तापमान समय (दिन) बीज फैलने का समय (दिन) प्लूटोरस फलेबीलेटस 22-26 12-14 18-22 प्लूटोरस साजोर काजू 22-26 12-14 18-25 प्लूटोरस सेपीडस 22-26 16-18 22-28 प्लूटोरस ईयोस 22-26 16-18 25-30 प्लूटोरस आस्ट्रीएटस 12-22 20-25 30-35 प्लूटोरस फलोरीडा 15-22 16-18 55-60 प्लूटोरस ईरेन्जाई 12-20 55-60 70-75 स्त्राेत: खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), दिनेश राज तंवर-शोधार्थी , सुरेन्द्र सिंह एवं कृष्णा कंवर- वरिष्ठ अध्ययेता और ओम प्रकाश कुमावत-जोधपुर एवं शोधार्थी एमपीयूएटी, उदयपुर (राजस्थान)