मशरूम में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन के साथ-साथ बहुत से खनिज एवं लवण पाये जाते हैं। अधिक रेशा तथा कम वसा होने से यह हमारी सेहत को बनाए रखने में सहायक है। इसमें उपलब्ध बीटा ग्लूकॉन, कैंसररोधी क्षमता से युक्त होते हैं। मशरूम कैंसर के रोगियों को दी जाने वाली कीमोथिरेपी तथा रेडियोथेरेपी के बाद देने पर अत्यन्त लाभकारी है। जापानी खंभ शिटाके में लेन्टिनन नामक तत्व पाया जाता है, जो मानव शरीर की रोगरोधी क्षमता बढ़ाता है। इसको तोड़ने के बाद काफी समय तक रखा जा सकता है तथा इसका उपयोग ताजी तथा सूखे दोनों तरह से किया जाता है। सूखी मशरूम को सूप, चाय, चिप्स तथा भिगोकर सब्जी बनाने के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। इसके अन्य परिरक्षित उत्पाद जैसे-अचार आदि बनाकर भी इसे बेचा जा सकता है। बाजार में ताजी मशरूम काफी मंहगी दरों पर बकती है। सूखी मशरूम की कीमत लगभग 7,000 से 7,500 रुपये प्रति कि.ग्रा. तक होती है। मशरूम की विभिन्न प्रजातियों के बीच,शिटाके (लेटिनुला इडोड्स) एक महत्वपूर्ण औषधीय खुंभ है। उत्पादन दृष्टि से इसका बटन मशरूम के बाद विश्व में दूसरा स्थान है। इसके स्वाद के कारण उपभोक्ताओं के बीच इसकी अच्छी मांग है। विशेष रूप से उत्तर भारत में उपभोक्ता इस मशरूम को अधिक पसंद करते हैं। वर्तमान में चीन और जापान इस बेशकीमती मशरूम के थोक उत्पादक हैं। शिटाके मशरूम स्वादिष्ट होने के साथ-साथ औषधीय गुणों से भी भरपूर है। इसका उपयोग बहुत से रोगों के लिए औषधिके रूप में किया जाता है। इससे कैंसर, एड्स, एलर्जी, संक्रमण, फ्लू और जुकाम, ब्रोन्कियल सूजन तथा मूत्र असंयम को विनियमित करने के साथ-साथ उच्च कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए उपयोग किया जाता है। कुछ समय तक एक सफल व्यावसायिकपैमाने पर शिटाके मशरूम को विकसित करने के लिए कोई उचित तकनीक नहीं थी, लेकिन अब इसकी व्यावसायिक खेती की तकनीकी भारत में उपलब्ध है। इस कीमती मशरूम की खेती के बारे किसानों को जागरूक करने के लिए कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर में जेआईसीए केसहयोग एससीटीसी से (शिटाके कल्टीवेशन एंड ट्रेनिंग सेंटर) की स्थापना की जा रही है। जल्दी ही कृषकों को इस मशरूम की व्यावसायिक खेती करने के लिए प्रशिक्षण उपलब्ध करवाए जाएंगे। मशरूम उत्पादन की सही तकनीकी जैसे-ब्लॉक बनाने की विधि, निर्जमीकृत करने, स्पॉन की विधि, फलन, तुड़ाई , ग्रेडिंग, पैकिंग एवं परिरक्षण पर विस्तृत प्रशिक्षण दिए जाएंगे। भारत, फसल विविधता के लिए जाना जाता है। यहां कृषि फसलों की विशाल विविधता के साथ प्रत्येक वर्ष भारी मात्रा में कृषि अपशिष्ट जैसे-फसल अवशेष, वृक्ष अपशिष्ट एवं अन्य कृषि कचरा पैदा होता है। इसका बेहतर दोहन कर निष्पादन करने के लिए कम्पोस्टिंग के अलावा मशरूम उत्पादन में भी महत्वपूर्ण योगदान है फलन की क्रिया उपयुक्त फलन की क्रिया के लिए सही तापमान, उच्च आर्द्रता , अच्छा वेंटिलेशन और ठंडे पानी/शॉक ट्रीटमेंट की आवश्यकता होती है। 40-60 दिनों के स्पॉन के बाद सिंथेटिक लोग्स को पॉलीहाउस में रैक्स पर रखकर लिफाफों को निकाल दिया जाता है। ये 3-4 दिनों में बनने शुरू हो जाते हैं। अगले 5-7 दिनों में मशरूम परिपक्व होकरतोड़ने के लिए उपयुक्त हो जाते हैं। मशरूम परिपक्व होने पर जल्दी से जल्दी तोड़ लेने चाहिए तथा तुड़ाई के लिए कैंची का उपयोग करना चाहिए। इसे टोकरी में उल्टा कर रखना चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए की टोकरी में ये एक दूसरे से अलग रहें, नहीं तो इनकी गुणवत्ता कम हो जाती है। इस प्रकार तुड़ाई करने से मशरूम जल्दी खराब नहीं होता तथा उसकी गुणवत्ता बनी रहती है। पहले फ्लश के बाद ब्लॉक्स को एक सप्ताह तक छोड़ दिया जाता है। इस बीच उन पर पानी का छिड़काव कर किया जाता है। उसके अगले सप्ताह से ब्लॉक्स को प्लास्टिक की कम गहरी ट्रे में रखकर पानी दिया जाता है, ताकि ब्लॉक्स अच्छी तरह आर्द्रता ग्रहण कर लें। दूसरे फ्लश के लिए ब्लॉक को गहरी ट्रे में या ड्रम में डालकर शॉक दिया जाता है। एक बार ब्लॉक बनाने के बाद उससे कम से कम 8-10 बार मशरूम निकलती है। मशरूम के डंठल को कैंची से काट कर ग्रेडिंग कर, पैक व लेबल करके बेचा जा सकता है। बंद मशरूम की कीमत खुले मशरूम की अपेक्षा अधिक मिलती है। सामान्य पैदावार, सब्स्ट्रेट के गीले भार का 65-75 प्रतिशत होती है। प्राकृतिक एवं सिंथेटिक लोग्स लकड़ी के गट्ठों (प्राकृतिक लोग्स) पर मशरूम उत्पादन की विधि पुरानी है। इसमें काफी समय बाद फलन होता है इसलिए अब इस मशरूम की व्यावसायिक खेती मुख्य रूप से चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों (तुनी, आम, सफेदा, ओक, मेपल, शहतूत और चिनार) की छाल के बुरादे तथा चिप्स के मिश्रण पर की जा सकती है, जिन्हें सिंथेटिक लोग्स कहते हैं। बुरादे एवं गेहूं/धान के चापड़ के मिश्रण को मिलाकर पॉलीप्रोपयिलीन (गर्मी प्रतिरोधी) के बैग में भर दिया जाता है। बैग भरने के बाद लिफाफे के मुंह को बंद कर दिया जाता है तथा ब्लॉक बना दिया जाता है। तैयार ब्लॉक को 1-1/2-2 घंटे के लिए 22 पोण्ड पर आटोक्लेव कर निर्जमीकृत किया जाता है। इस तरह तैयार खाद के गट्ठों (ब्लॉकस) का प्रयोग मशरूम लगाने के लिए किया जाता है तथा इन्हें सिंथेटिक लोग्स कहते हैं। स्पॉनिंग बुरादे पर बने स्पॉन को 3 प्रतिशत (सूखे भार ) के आधार पर असेप्टिक कंडीशन में ब्लॉक पर डालकर बैग को सील कर दिया जाता है। स्पॉनिंग में 40-60 दिनों या उससे अधिक समय लग सकता है। यह पर्यावरण की स्थिति और मशरूम की प्रजाति पर निर्भर करता है। इस अवधि में यह मायसेलियल ग्रोथ, मायसेलियल कोट, मायसेलियल बम्प, रंजकता, भूरापन और कोट सख्त अवस्थाओं से गुजरता है। ग्रेडिंग, लेबलिंग, पैकिंग एवं ड्राईंग बंद मशरूम की कीमत खुली मशरूम से अधिक मिलती है। इसको खुलने से पहले तोड़ कर लिफाफों में या ट्रे में पैक करके अच्छी कीमत पर बेचा जा सकता है। अगर मशरूम खुल जाएं तो उनकी कीमत कुछ कम हो जाती है, लेकिन इस प्रकार के मशरूम को सुखाकर पूरी कैप, चिप्स या पाउडर के बेचा जा सकता है। इसके अलावा इसके परिरक्षित उत्पाद जैसे-शिटाके चाय, सूप, अचार एवं चिप्स आदि बनाकर अच्छा मूल्य प्राप्त किया जा सकता है।देश में इस मशरूम की खेती अभी नई है, किन्तु इससे जुड़ने वाले कृषक भविष्य में इससे बहुत धनोपार्जन कर अपनी आर्थिकी सुदृढ़ कर सकते हैं।