सहजन (ड्रमस्ट्रिक) का वैज्ञानिक नाम मोरिंगा ओयलेफेरा है। इसे कई और नामों से भी जाना जाता है। इसमें कई तरह के गुण होते हैं, जिसके कारण यह काफी प्रसिद्ध है। भारत में सहजन की खेती व्यापक रूप में की जाती है। इसमें पाए जाने वाले औषधीय गुणों के कारण इसका उपयोग पूरे विश्व में किया जाता है। सहजन का पेड़ बहुत ही लाभकारी है। इसके पत्ते, फल और फूल मनुष्य एवं पशुओं के लिए आवश्यक पोषक तत्वों का भंडार हैं। सहजन की सब्जी ही नहीं बल्कि इसके पेड़ के विभिन्न भागों का अनेक उपयोग पुराने जमाने से ही किया जा रहा है। इसके फूल, फली व पत्तों में इतने पोषक तत्व होते हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मार्गदर्शन में दक्षिण अफ्रीका के कई देशों में कुपोषण पीड़ित लोगों के आहार के रूप में सहजन का प्रयोग करने की सलाह दी गई है। इसकी सब्जी को अपने आहार में शामिल कीजिये और इसका लाभ उठाइये। आयुर्वेद में 300 रोगों का सहजन से उपचार बताया गया है। सहजन के बीज से तेल निकाला जाता है और छाल, पत्ती, गोंद, जड़ आदि से आयुर्वेदिक दवाएं तैयार की जाती हैं। यह कई रोगों को दूर करता है और शरीर के हर अंग को मजबूती भी देता है, क्योंकि इसमें बहुत सारे पोषक तत्व भरे हुए हैं। सहजन के विभिन्न भागों का उपयोग सहजन बहु-उपयोगी है, इसकी पत्तियों से लेकर पफलियां तक हमारे इस्तेमाल में आती हैं। वैज्ञानिकों की खोज के अनुसार प्राकृतिक तौर पर पाए जाने वाली पोषक तत्व युक्त सामग्री से कई गुना अधिक तत्व सहजन में पाए जाते हैं। इससे कई प्रकार के उत्पाद हमें प्राप्त होते हैंः पत्ती फली फूल छाल जड़ बीज सहजन के लिए अनुकूल जलवायु सहजन की एक बड़ी विशेषता है कि यह कम पानी या सूखे की स्थिति में भी जीवित रह सकता है। इसके साथ ही साथ खराब मृदा में भी इसकी सही उपज प्राप्त होती है। सहजन के फूल का विकास गर्म और आर्द्र जलवायु एवं 25-30 डिग्री सेल्सियस में अच्छी तरह से होता है। मृदा सहजन का विकास मृदा के व्यापक स्तर के अनुरुप होता है। इसकी अच्छी पैदावार शुष्क बलुई मृदा ममें होती है। मूलरूप से सहजन अपने विकास के लिए थोड़ी अम्लीय मृदा पसंद करता है। इसकी मृदा का पी-एच मान 6.2 से 7.0 होना चाहिए। सहजन के लाभ वैज्ञानिकों द्वारा यह दावा किया जाता है कि सहजन में पाए जाने वाले पोषक तत्व अन्य खाद्य पदार्थों की अपेक्षा कई गुना अधिक हैं। इसके साथ ही यह मनुष्य के कई रोगों का इलाज करता है जैसेः सहजन मानव की तंत्रिका प्रणाली और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है। यह सर्दी और फ्लू से लड़ने में सहायक है। सहजन के इस्तेमाल से पित्त की थैली स्वस्थ रहती है। शर्करा रोगी के लिए सहजन का इस्तेमाल काफी फायदेमंद है। कैंसर रोगी को सहजन के इस्तेमाल से कैंसर के स्तर को कम किया जा सकता है। अस्थमा, गले में सूजन एवं प्रोस्टेट ग्रंथि के लिए सहजन कापफी पफायदेमंद है। यह हमारे पाचन शक्ति को और भी मजबूत करता है। सहजन, मूत्र विकार से भी राहत दिलाता है। यह हमारी हड्डियों को मजबूत करता है। अगर आपके आंत में अल्सर या ट्यूमर हो गया हो तो आप सहजन की सहायता से निजात पा सकते हैं। देखभाल अगर आप पौधों को किसी नर्सरी से न लाकर अपने पास ही उगाते हैं तो बीज को लगाते समय इन बातों पर विशेष ध्यान दें। बीज को लगाने से पहले इनको रातभर पानी में डालकर भिगो लें। भिगोए हुए बीज को बीच से फाड़ दें और इसका छिलका निकल दें। अब एक 18×12 आकार के प्लास्टिक पात्र में 3 भाग मृदा और 1 भाग बालू के मिश्रण वाली मृदा भर दें। इसमें 2-3 सें.मी. आकार का गड्ढा कर 2-3 बीज को लगाएं। इस मृदा में नमी बनाए रखें। 5-12 दिनों में बीज अंकुरित होकर पौधा निकल आएगा। जब पौधा 60-90 सें.मी. का हो जाए तो इसे अपने खेतों में लगाएं। अगर आप नर्सरी तैयार नहीं करना चाहते हैं तो 10 सें.मी. मोटी एवं 45 सें.मी. से 1.5 मीटर लंबी डाल को सीधा लगाकर पेड़ तैयार कर सकते हैं। सारणीः सहजन में पाये जाने वाले विभिन्न पोषक तत्व एवं उनकी मात्रा पोषक तत्व फलियां (प्रति 100 ग्राम) पत्तियां (प्रति 100 ग्राम) नमी 86.9 प्रतिशत 75 प्रतिशत ऊर्जा 26 कैलोरी 92 कैलोरी प्रोटीन 2.5 ग्राम 6.7 ग्राम वसा 0.1 ग्राम 1.7 ग्राम कार्बोहाइड्रेट 3.7 ग्राम 13.4 ग्राम रेशा 4.8 ग्राम 0.9 ग्राम खनिज 2 ग्राम 2.3 ग्राम कैल्शियम 30 मि.ग्रा. 440 मि.ग्रा मैग्नीशियम 24 मि.ग्रा. 24 मि.ग्रा फाॅस्फाेरस 110 मि.ग्रा. 70 मि.ग्रा पोटेशियम 24 मि.ग्रा. 24 मि.ग्रा काॅपर 3.1 मि.ग्रा. 1.1 मि.ग्रा. लोहा 5.3 मि.ग्रा. 0.7 मि.ग्रा ऑक्जालिक एसिड 10 मि.ग्रा. 101 मि.ग्रा गंधक 137 मि.ग्रा. 137 मि.ग्रा स्त्रोत : फल-फूल पत्रिका(आईसीएआर), अर्चना कुमारी, भाकृअनुप-कृषि विज्ञान केन्द्र, कस्तूरबाग्राम, इन्दौर(मध्य प्रदेश)