आलू, रबी मौसम की महत्वपूर्ण नगदी फसल है। यह एक ऐसी सब्जी है, जो सभी वर्गों द्वारा उपयोग में लाई जाती है। इस फसल में प्रति इकाई, समय और क्षेत्र में सर्वाधिक खाद्य पदार्थ प्राप्त होता है। खाद्यान्न की कमी के कारण होने वाली गंभीर खाद्य समस्या को हल करने में आलू का महत्वपूर्ण योगदान है। इसे विश्व के लगभग समस्त देशों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ के रूप में अपनाया गया है। भारत में गेहूं, चावल व मक्का के बाद आलू चौथी मुख्य फसल है। आलू की फसल में बुआई से लेकर उत्पादन, खुदाई तथा भण्डारण तक समय-समय पर अनेक प्रकार के रोगों का प्रकोप होता है। परन्तु अत्यधिक नुकसान फफूंदजनित झुलसा रोग के कारण होता है। आलू की फसल में झुलसा रोग दो अवस्थाओं में आता है, अगेती झुलसा व पछेती झुलसा। इस लेख में इस रोग के लक्षण व रोकथाम के उपाय दिए जा रहे हैं: अगेती झुलसा लक्षण यह एक मृदाजनित रोग है तथा अल्टरनेरिया सोलानी नामक फफूंद से होता है। फसल पर अगेती झुलसा रोग 3-4 सप्ताह बाद प्रकट होने लगता है। रोग की प्रारम्भिक अवस्था में पौधों की निचली पत्तियों पर पीले भूरे रंग के छोटे-छोटे धब्बे बनते हैं। कुछ समय बाद ये धब्बे काले-भूरे रंग के तथा गोलाकार व अण्डाकार हो जाते हैं। धीरे-धीरे ये धब्बे आपस में मिल जाते हैं तथा पूरी पत्ती सूखी दिखाई देती है। अधिक प्रकोप में तनों, शाखाओं व कन्दों पर भी काले रंग के धब्बे बनते हैं। इस रोग की तीव्रता 20-26 डिग्री सेल्सियस तापमान पर अधिक होती है। रोकथाम रोग दिखाई पड़ते ही ब्लाइटॉक्स-50 या मैंकोजेब में से किसी एक दवा की 600-800 ग्राम मात्रा का 200 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति एकड़ की । दर से छिड़काव करें। छिड़काव 15दिनों के अंतराल पर दोहराएं। पछेती झुलसा आलू का यह सबसे विनाशकारी रोग है। पछेती झुलसा का मुख्य कारक फाइटोप्थोरा इन्फेस्टान नामक फफूंद है। इस रोग को पछेती झुलसा, अंगमारी, महामारी तथा झुलसा इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। लक्षण पछेती झुलसा के लक्षण पौधे के सभी भागों पर जैसे-पत्तियों, तना और कंद पर दिखाई पड़ते हैं। रोग का शुरू में प्रकोप । पत्तियों पर जलीय धब्बे के रूप में दिखता है. जो बाद में गहरे भूरे तथा बैंगनी रंग में बदल जाता है। प्रभावित भाग के चारों तरफ हल्के पीले रंग का घेरा बनता है तथा धब्बे : पानी से भीगे हुए लगते हैं। अधिक नमी (80-100 प्रतिशत) तथा बादल छाये रहने ।की स्थिति में धब्बे बड़े हो जाते हैं। पत्तियों 7 की निचली सतह फफूंदी की परत जम जाती है। रोग का प्रकोप बढ़ने से पौधे के अन्य भाग जैसे-डंठल तथा तना भी प्रभावितहो जाते हैं। इन पर छोटे-छोटे धब्बे बनते हैं, जो बाद में काले पड़ जाते हैं। रोग की उग्र अवस्था में पूरा पौधा गिर जाता है। रोग के लिए अनुकूल परिस्थितियां इस रोग की फफूंद वृद्धि (16-20 डिग्री सेल्सियस), बीजाणु अंकुरण के लिए(10-20 डिग्री सेल्सियस), बीजाणु उत्पादन । के लिए (18-22 डिग्री सेल्सियस), ग्रसन र तथा रोग (10-22 डिग्री सेल्सियस), विकास । के लिए (18+1 डिग्री सेल्सियस), तापमान . तथा 100 प्रतिशत आर्द्रता हो, तो रोग के । बीजाणु रात्रि के दौरान पैदा होते हैं। ये प्रकाश ; से संवेदनशील होते हैं। रोग का पूर्वानुमान यदि रोग का पूर्वानुमान प्राप्त हो जाए, तो किसान अपने खेतों में आवश्यकतानुसार ही उचित फफूंदनाशक दवाओं का प्रयोग करके अपनी फसल को होने वाले नुकसान से बचा सकते हैं। तापमान, आपेक्षिक आर्द्रता तथा वर्षा की मात्रा के आधार पर किसान स्वयं सचेत रह सकते हैं, जैसे-यदि 10 दिनों तक लगातार या रुक-रुक कर बारिश होती रहे और औसत तापमान 20 डिग्री सेल्सियस या उससे कम रहें और 18 से 25 दिनों के अंदर यदि 12 से 17 डिग्री सेल्सियस एवं आपेक्षिक आर्द्रता 80 से 90 प्रतिशत तक लगातार दो या तीन दिनों तक बनी रहे, तो झुलसा रोग का संक्रमण एक सप्ताह के भीतर हो सकता है। महामारी फैलने में सहायक अवस्थाएं कम से कम 4 घंटे तक रात्रि का ताप ओसांक से कम होना। 10-12 डिग्री सेल्सियस तक निम्न ताप का होना। अगले दिन आसमान में बादलों की उपस्थिति और आगामी 24 घण्टों में कम से कम 0.1 मि.मी. वर्षा का होना। कुछ अन्य बातें यदि रोग की तीव्रता 70 प्रतिशत से अधिक हो तो तनों को काटकर गड्ढों में दबा देना चाहिए। खुदाई के दौरान झुलसा से ग्रसित कन्दों को छांटकर उन्हें गड्ढों में दबा देना चाहिए। कन्दों और पत्तियों के बीच सम्पर्क नहीं होने देना चाहिए। रोगग्रस्त फसल की खुदाई देर से करनी चाहिए। आलू की खुदाई के तुरन्त बाद भूमि पर पड़े फसल के रोगी पौध अवशेषों को इकट्ठा करके जला दें। खुदाई के समय छूट गए कन्दों को अंकुरित होने के तुरन्त बाद जड़ सहित उखाड़ देना चाहिए रोकथाम आलू की फसल में पछेती झुलसा रोग के नियंत्रण के लिए निम्नलिखित सुझाव अपनाने चाहिए हमेशा रोगमुक्त बीज का प्रयोग करें। खेतों के चारों ओर खरपतवार नष्ट करते रहें। कुफरी ज्योति, कुफरी नवीन, कुफरी बादशाह, कुफरी सतलुज, कुफरी पुखराज, कुफरी नीला तथा कुफरी मुथु नायक जैसी प्रतिरोधी किस्मों की ही बुआई करनी चाहिए। पछेती झुलसा रोग के लक्षण दिखाई देते ही या इस रोग के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनते ही मैंकोजेब (इंडोफिल एम 45) या मैंकोजेब दवा की 600-800 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ की दर से 4-5 छिड़काव प्रत्येक 15 दिनों के बाद करें। जब मौसम ठंडा तथा नम हो, तो यह छिड़काव, 7 दिनों बाद भी किए जा सकते हैं। रोग फैलने की अवस्था तथा अनुकूल परिस्थितियों में मेटालिक्सलयुक्त दवा (रिडोमिल एम.जेड.-72 डब्ल्यू पी.) की 400-500 ग्राम मात्रा दवा को 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव करना चाहिए व उसमें कोई चिपकने वाला पदार्थ अवश्य मिला लें। स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), आदित्य, आर.एस. जरियाल और कुमुद जरियाल, पादप रोग विज्ञान विभाग, डा.वाई.एस.परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, बागवानी एवं वानिकी महाविद्यालय, नेरी, हमीरपुर-