आलू की फसल को लगभग 400-600 मि.मी. सिंचाई जल की आवश्यकता होती है। इसलिए पौधों में वृद्धिकाल के दौरान मृदा में उचित नमी के साथ-साथ पोषक तत्वों की उपलब्धता उपयुक्त स्तर पर बनाये रखने के लिए फसल को हल्की एवं लगातार सिंचाइयों की जरूरत होती है। यह फसल की प्रजाति, उगाने का समय एवं उद्देश्य, मृदा की संरचना एवं प्रकार तथा जलवायु इत्यादि पर निर्भर करती है। हमारे देश में लगभग 90 प्रतिशत आलू की खेती समतल मृदाओं में सिंचित दशाओं में की जाती है। परंपरागत कूड सिंचाई विधि द्वारा आलू की खेती करने से जल उपयोग दक्षता 40-50 प्रतिशत तक ही होती है। वाष्पीकरण द्वारा जल की हानि एवं लीचिंग द्वारा पौधों के पोषक तत्वों विशेषतः नाइट्रेट की हानि को क्रमशः मल्चिंग एवं ड्रिप सिंचाई विधि अपनाकर नियंत्रित किया जा सकता है। आलू की पैदावार की गुणवत्ता मुख्यतः पौधों के जड़ क्षेत्र में मृदा नमी एवं मृदा वायु के मध्य समुचित अनुपात पर निर्भर करती है जिसे उचित जल प्रबंधन द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। देश में आलू उत्पादन एवं उपयोग का तरीका तेजी के साथ बदल रहा है। इसलिए आलू की गुणवत्तापूर्ण उपज, जैसे बड़े आकार के चमकदार कंद, एक समान आकार एवं आकृति के आकर्षक कंद, बीज आलू उत्पादन, बेबी पोटेटो आदि पैदा करना अति आवश्यक होता जा रहा है। यह सूक्ष्म सिंचाई विधियों द्वारा खेती करने से संभव हो सकता है।खेत में उचित नमी के अभाव में बुआई से पूर्व पलेवा अवश्य करें। यदि आलू बिजाई से पूर्व पलेवा नहीं किया गया है तो बिजाई के 2-3 दिनों के अंदर कूड़ विधि से सिंचाई करना अनिवार्य है। इस तरह पौधों के विकास के लिए खेत में पानी की कमी हानिकारक होती है, उसी प्रकार मिट्टी में नमी की अधिकता होने से, मृदा में वायु का प्रवेश कम हो जाता है। इससे पौधों को श्वसन के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है। ऐसी परिस्थितियों में पौधों में रोग बढ़ जाते हैं तथा कंद एवं जड़ें सड़कर नष्ट हो जाती हैं। खेत में फसल के एक समान एवं शीघ्र अंकुरण के लिए कूड सिंचाई विधि से पहली सिंचाई आलू बिजाई के 8-10 दिनों के अंतर्गत अवश्य करनी चाहिए। इसके बाद फसल से अच्छी पैदावार लेने के लिए बलई दोमट व दोमट मृदाओं में 7-10 दिनों तथा भारी मृदाओं में 10 से 12 दिनों के अंतराल पर कूड सिंचाई विधि द्वारा हल्की सिंचाई करना अनिवार्य है। सिंचाई करते समय ध्यान रखें कि आलू की गूलें दो-तिहाई से अधिक न डूबें अन्यथा पानी की अधिकता के कारण मदा की ऊपरी सतह के रंध्र (बारीक छेद) बंद हो जाते हैं, जिससे आलू की पैदावार प्रभावित होती है। आलू की फसल में नियमित हल्की सिंचाइयां करके उचित नमी बनाये रखना अति आवश्यक है। आलू बिजाई की उभरी क्यारी विधि आधुनिक ड्रिप सिंचाई विधि के अंतर्गत उभरी चौड़ी गूलों वाली क्यारियों में दो या तीन पंक्तियों में आल बआई के लिए गूलों एवं नालियों की चौड़ाई क्रमश: 60x30 सें.मी. एवं 90x30 सें.मी. होनी चाहिए। आलू बिजाई की दोहरी पंक्ति में 20 सें.मी. की दूरी पर पंक्तियां बनाकर 15-20 सें.मी. की दूरी पर बीज कंदों की बुआई करें, जबकि तीन पंक्तियों वाली पद्धति में 20 सें.मी. के अंतराल पर पंक्तियों में 20 सें.मी. की दूरी पर 10 सें.मी. गहराई पर बीज कंदों की बिजाई करनी चाहिए। टपक सिंचाई विधि भाकृअनुप-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान-क्षेत्रीय केन्द्र, मोदीपुरम पर सिंचाई की आधुनिक पद्धतियों का कूड सिंचाई विधि से तुलनात्मक अध्ययन किया गया। परीक्षणों के परिणाम दर्शाते हैं कि ड्रिप सिंचाई विधि परंपरागत सिंचाई की अपेक्षा अधिक प्रभावी है। ड्रिप सिंचाई विधि के अंतर्गत खेत में निर्धारित ले-आउट में बिछाये गए एलडीपीई से निर्मित 16 मि.मी. बाय व्यास वाले ड्रिप लेटरल्स पर 30 सें.मी. कीदूरी पर स्थित 1.5 से 2.0 लीटर प्रति घंटा जल बहाव (डिस्चार्ज) वाले (0.8-1.0कि.ग्रा. प्रति वर्ग सें.मी. दाब पर नान पी.सी तथा 1.0-2.5 कि.ग्रा. प्रति वर्ग सें.मी. दाब पर पी.सी.) ड्रिपर्स से जल को बूंद-बूंद करके पौधों के जड़ क्षेत्र में पहुंचाया जाता है। आलू की परंपरागत बिजाई के अंतर्गत ड्रिप सिंचाई पद्धति द्वारा 125-150 प्रतिशत सीपीई (वाष्पीकृत जल स्तर) पर 35-45 मिनट तथा आलू बिजाई की उभरी क्यारियों में चौड़ी गूलों पर दोहरी व तीन पंक्ति विधि के लिए 70-90 मिनट तक एक दिन के अंतराल से सिंचाई करें। उर्वरीकरण के अंतर्गत फसल में एनपीके उर्वरकों की 1/3 मात्रा बिजाई के समय खेत में डालें तथा उर्वरकों की शेष 2/3 मात्रा को आठ बार में सप्ताह में दो बार सिंचाई जल के साथ-साथ ड्रिप विधि से पौधे निकलने के उपरांत अर्थात बिजाई के तीन सप्ताह बाद शुरू करके बिजाई के लगभग 50 दिनों बाद तक फसल को देनी चाहिए। ड्रिप सिंचाई विधि से आलू उत्पादन आलू बिजाई की परंपरागत विधि इस विधि में प्रत्येक नाली एवं मेड़ की चौड़ाई 30 सें.मी. होती है, तथा बीज आलू को गूलों में 60x20 सें.मी. के अंतराल पर 10 सें.मी. गहराई में बोया जाता है। ड्रिप सिंचाई विधि से परंपरागत कूड़ सिंचाई विधि की तुलना में पानी की लगभग 40 प्रतिशत तक बचत के साथ-साथ, 15-20 प्रतिशत तक आलू की अधिक उपज प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त 25-30 प्रतिशत तक बड़े आकार के अच्छी गुणवत्तायुक्त कंदों की पैदावार प्राप्त हो सकती है। इसके अतिरिक्त आलू में शुष्क पदार्थ की अधिक मात्रा, कंदों की संख्या तथा वजन प्रति पौधा एवं प्रति इकाई क्षेत्र अधिक प्राप्त होता है। बिजाई की दोहरी पंक्ति विधि ड्रिप सिंचाई के अंतर्गत उभरी क्यारी की चौड़ी गूलों में 120 सें.मी. की दूरी पर एकल ड्रिप लेटरल्स के साथ दो पंक्तियों में 20 सें.मी. के अंतराल पर 15-20 सें.मी. की दूरी पर (83,333 से 1,11,111 पौधे/हैक्टर) रखते हुए बीज कंदों की बुआई करने से परंपरागत कूड़ सिंचाई विधि के तहत आलू बिजाई की तुलना में 15-20 प्रतिशत आलू की अधिक पैदावार प्राप्त होती है। यही नहीं 90 सें.मी. की दूरी पर बिजाई की दोहरी पंक्ति विधि के अंतर्गत 20 सें.मी. की दूरी पर लाइनों में 20 सें.मी. के अंतराल पर (1,11,111 पौधे/हैक्टर) रखते हुए बीज कंदों की 10 सें.मी. गहरी बिजाई करने से कूड सिंचाई विधि के तहत परंपरागत बुआई की अपेक्षा लगभग 15-25 प्रतिशत आलू की अधिक उपज प्राप्त होती है। इसी प्रकार मध्यम (25-75 ग्राम) आकार के कंदों की पैदावार में भी बढ़ोतरी पाई गई। बिजाई की तीन पंक्ति विधि ड्रिप सिंचाई विधि के अंतर्गत उभरी क्यारी की चौड़ी गूलों पर 120 सें.मी. की दूरी पर एकल ड्रिप लेटरल्स के साथ तीन पंक्तियों में 20 सें.मी. के अंतराल पर 20 सें.मी. की दूरी पर (1,25,000 पौधे/हैक्टर) रखते हुए बीज कंदों की 10 सें.मी. गहरी बुआई करने से कूड़ सिंचाई विधि के तहत परंपरागत आलू बुआई की तुलना में लगभग 15-25 प्रतिशत आलू की अधिक पैदावार प्राप्त होती है। इसी प्रकार मध्यम (25-75 ग्राम) आकार के कंदों की उपज भी अधिक प्राप्त होती है जिनका प्रयोग बीज आलू के लिए किया जा सकता है। भाकृअनुप-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, क्षेत्रीय केन्द्र, मोदीपुरम, मेरठ (उत्तर प्रदेश),भाकृअनुपकेंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला (हिमाचल प्रदेश),भाकृअनुप-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान-क्षेत्रीय केन्द्र, मोदीपुरम, मेरठ (उत्तर प्रदेश)