आलू, विश्व में चावल, गेहूं, मक्का के बाद उपयोग की जाने वाली चौथी प्रमुख खाद्य फसल है। यह फसल विश्व की बढ़ती जनसंख्या को कुपोषण एवं भुखमरी से निजात दिलाने में अहम भूमिका निभा सकती है। आलू, मानव के दैनिक आहार का एक अहम हिस्सा है तथा इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से सब्जी के रूप में किया जाता है। आलू मुख्य रूप से स्टार्च, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, खनिज लवण, फाइबर, विटामिन 'सी', विटामिन बी, , एंटीऑक्सीडेंट और खनिजों का एक समृद्ध स्रोत है। आलू से कई प्रसंस्करित भोज्य उत्पाद तैयार किये जाते हैं, जैसे-चिप्स, पापड़, बड़ियां, दलिया, सूजी आदि। आलू की खेती मैदानी क्षेत्रों में अक्टूबर।से मार्च तक की जाती है। इसकी अगेती फसल की अवधि में उच्च तापमान के कारण उत्पादकता में कुछ कमी आ जाती है। नवंबर के मौसम में नये आलू की मांग के कारण, 60-70 दिनों में उगायी गयी फसल का किसान बाजार में अच्छा मूल्य प्राप्त कर सकते हैं।आलू की अच्छी खेती के लिए उन्नत प्रजातियों का चुनाव अत्यधिक महत्वपूर्ण है।शीघ्र पकने वाली किस्में लगभग 60-70 दिनों में तैयार हो जाती हैं। आलू की उन्नत प्रजातियां निम्न प्रकार हैं कुफरी सूर्या अगेती फसल के लिये ऊष्मारोधी प्रजाति कुफरी सूर्या तैयार की गयी है। यह किस्म 70-80 दिनों की अवधि में लगभग 200-250 क्विंटल/हैक्टर तक उत्पादन दे सकती है। इसके कंद हल्के पीले, अंडाकार, आंखें सतही व गूदा हल्का पीला होता है। यह अगेती फसल में लगने वाले कीटों, लीफ हॉपर व माईट अवरोधी है। इस प्रजाति को मैदानी क्षेत्रों में अधिक तापमान में अगेती फसलके रूप में व भारत के पठारी क्षेत्रों में मुख्य फसल के रूप में उगाया जा सकता है। कुफरी लीमा अगेती फसल के लिये ऊष्मारोधी प्रजाति कुफरी लीमा का विकास किया गया है। यह किस्म 70-80 दिनों की अवधि में लगभग 200-250 क्विंटल/हैक्टर तक उत्पादन दे सकती है। इसका कंद सफेद, क्रीमी, अंडाकार, आंखे सतही व गूदा सफेद पीला होता है। यह अगेती फसल में लगने वाले कीटों, लीफ हॉपर व माईट की अवरोधी है। इस प्रजाति को मैदानी क्षेत्रों में अधिक तापमान में अगेती फसल के रूप में तथा भारत के पठारी क्षेत्रों में मुख्य फसल के रूप में उगाया जा सकता है। कुफरी बहार यह उत्तर प्रदेश में उगायी जाने वाली मुख्य प्रजाति है तथा 70 से 80 दिनों में तैयार हो जाती है। इस किस्म में शीघ्र कंद बनाने की क्षमता है तथा उत्पादन लगभग 250-300 क्विंटल/हैक्टर होता है। इस प्रजाति के कंद सफेद, अंडाकार-गोल, आंखें मध्यम व गूदा सफेद होता है। कुफरी चन्द्रमुखी यह प्रजाति 70-80 दिनों में तैयार हो जाती है तथा औसत उपज 200-250 क्विंटल/हैक्टर है। इसके कंद सफेद, । अंडाकार, आंखें सपाट व गूदा सफेद होता है। कुफरी चंद्रमुखी के कंद देखने में आकर्षक व स्वाद में अच्छे होते हैं। इसको हरियाणा, पंजाब व उत्तर प्रदेश में अगेती फसल के रूप में उगाया जा सकता है। कुफरी ख्याति यह प्रजाति लगभग 70-80 दिनों में तैयार हो जाती है। इसमें आलू बनने की प्रक्रिया जल्दी शुरू होती है तथा उत्पादन लगभग 250-300 क्विंटल/हैक्टर है। इसके कंद मध्यम, सफेद-क्रीमी. अंडाकार. आंखें सतही मध्यम व गूदा क्रीमी होता है। यह उत्तरी मैदानी क्षेत्र में उगायी जा सकती है। यह प्रजाति पिछेता झुलसा के लिये मध्यम प्रतिरोधी है। कुफरी लवकार यह 70-80 दिनों में तैयार होने वाली अगेती ऊष्मारोधी प्रजाति है। इसकी उपज 200-250 क्विंटल/हैक्टर है। इसके कंद सफेद, गोल, आंखें सपाट व गूदा सफेद होता है। इस प्रजाति को भारत के पठारी क्षेत्रों में अगेती फसल के रूप में उगाया जा सकता है। जलवायु, मृदा एवं भूमि का चुनाव आलू की खेती के लिए ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है। 25 से 35 डिग्री सेल्सियस दिन का तापमान आलू की वानस्पतिक वृद्धि और 15-18 डिग्री सेंटीग्रेड रात का तापमान उत्तम होता है।आलू की खेती के लिए उपजाऊ मृदा का होना आवश्यक है। आलू की अच्छी उपज, शीघ्र परिपक्वता तथा सुरक्षित रहने की अवधि आदि गुण मृदा की उपयुक्तता की माप पर निर्भर करते हैं। मृदा का पी-एच मान 6.0-7.5 तक होना चाहिए एवं मृदा उपजाऊ, मध्यम आकार के कणों वाली, भुरभुरी व अधिक क्षारीय नहीं हो। आलू के लिए बलुई दोमट मृदा से हल्की दोमट मृदा सर्वोत्तम होती है। खेत की तैयारी आलू की खेती के लिए खेत को 3-4 बार गहरी जुताई करके मृदा भुरभुरी बाकी लेते हैं। खेत में पाटा लगाकर खेत को समतल करने के बाद खेत को बुआई के लिए तैयार कर लेते हैं। मृदा जितनी अधिक गहरी, खुली तथा भुरभुरी होगी उतनी ही वह आलू की फसल के लिए उपयक्त होगी। उर्वरकों को खेत में अंतिम जताई से पहले मिला देना चाहिए। बुआई के समय खेत में पर्याप्त नमी उपलब्ध होनी चाहिए। बीज बुआई का समय एवं विधि गुणवत्तायुक्त व अधिक उत्पादकता वाला हो। इसका भार 40-50 ग्राम बुआई के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। आलू की बीजाई के लिये लगभग 30-40 क्विंटल बीज/हैक्टर लगता है।आलू की अगेती फसल की बुआई के लिए मध्य सितंबर से अक्टूबर के प्रथम सप्ताह तक का समय उपयुक्त है। बीज आकार के आलू कंदों को मेड़ों पर बोया जाता है। आलू बोने के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सें.मी. तथा बीज से बीज की दूरी 20 सें.मी. हो एवं कंद को 3-4 इंच की गहराई पर बोना चाहिए। उर्वरक एवं सिंचाई पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए 25-30 टन प्रति हैक्टर की दर से कम्पोस्ट की खाद प्रयोग करनी चाहिए। रासायनिक उर्वरकों में 180 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 80 कि.ग्रा. फॉस्फोरस एवं 100 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करना चाहिए। उर्वरक की आधी मात्रा बुआई के समय व शेष मात्रा मिट्टी चढाने के समय प्रयोग करनी चाहिए।आलू की अगेती फसल के लिए 4-5 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। यदि आल की बआई से पहले पलेवा नहीं किया गया है, तो बुआई के 2-3 दिनों के अंदर हल्की सिंचाई करनी अनिवार्य है। मेड़ों के बीच की नालियों में आधी नाली तक पानी देना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण आलू में खरपतवार नियंत्रण के लिए पैंडीमिथेलीन (33 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी) या मैट्रीब्यूजिन (7 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी) का घोल बनाकर छिडकना चाहिये। फसल बोने के 20-25 दिनों बाद खेत में खुरपे की सहायता या 'हो' के माध्यम से निराई एवं गुड़ाई करनी चाहिए। फसल सुरक्षा आलू की अगेती फसल पर कई रोग एवं कीटों का प्रकोप होता है, जो निम्न प्रकार हैं इसके द्वारा रस चूसने के कारण पत्तियां किनारों से ऊपर की ओर मडने लग जाती हैं एवं उनका आकार प्याले की तरह हो जाता है। इसे हॉपर बन के नाम से भी जाना जाता है। इसे रोकने के लिये इमीडाक्लोप्रिड की 3 मि.ली. मात्रा 10 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करते हैं। माईट यह कीट सिंचाई की कमी से अधिक पनपता है व अत्यधिक छोटा होने के कारण आंखों से दिखायी नहीं देता। इससे ग्रसित पौधों की पत्तियां अधिक हरे रंग की हो जाती हैं तथा पत्ती को उलटकर देखने पर तांबे के रंग की झलक दिखायी देती है। लक्षण दिखायी देते ही डाइकोफाल 2 मि.ली. प्रति लीटर का बआई के 30-35 दिनों के अंदर फसल पर छिड़काव करें। खुदाई एवं विपणन खुदाई से दस दिनों पहले आलू की पत्तियों को काटकर, 10-15 दिनों बाद आलू की खुदाई करनी चाहिए। आलू की खुदाई खुरपी द्वारा या फिर ट्रैक्टरचालित हार्वेस्टर से करनी चाहिए। खुदाई के बाद आलुओं को छायादार स्थान पर रखना चाहिए एवं कटे-फटे आलुओं को अलग कर देना चाहिए। अगेती फसल लगाने हेतु किसान अगेती प्रजातियों एवं गुणवत्ता वाले आलू बीज का चयन करें। किसी सरकारी संस्था से प्रमाणित बीज ही खरीदें। अंकुरित बीज लगायें, सिंचाई व कीट प्रबंधन का विशेष ध्यान रखें तथा समय से खुदाई करें। इन विशेष बातों को ध्यान में रखकर कृषक बंधु कम समय में आलू की अच्छी पैदावार लेकर अच्छा मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं। सफेद मक्खी मुख्य रूप से पत्तियों की निचली सतह पर पाई जाती है। यह आलू में एपिकल लीफ कर्ल नामक विषाणुजनित रोग फैलाती है। इसकी रोकथाम के लिये बीज को एमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूएस की 5 ग्राम मात्रा 10 लीटर पानी में घोलकर उसमें अंकुरित कंद को 10 मिनट तक डुबोकर उपचारित करके बोना चाहिए। थायोमेथेक्साम 25 डब्ल्यजी की 5 ग्राम मात्रा 10 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से यह मक्खी कम हो जाती है। भाकृअनुप-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, क्षेत्रीय केंद्र, मोदीपुरम, मेरठ-250110 (उत्तर प्रदेश)