कद्रूवर्गीय सब्जियां, गर्मी और वर्षा के मौसम की महत्वपूर्ण फसलें हैं। पोषण की दृष्टि से ये बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। इनमें बहुत ही आवश्यक विटामिन और खनिज तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। कद्दूवर्गीय फसलों में लौकी, करेला, कद्दू, तरबूज, खरबूजा, पेठा ब्जयों के उत्पादन में अनेक बाधाएं, व्याधियों के रूप में सामने आती हैं। इनका सही समय पर नियंत्रण करना अति आवश्यक है। कदूवर्गीय सब्जियों के प्रमुख कीटों का कनियंत्रण किन तरीकों से किया जा सकता है। इस संबंध में विभिन्न कीटों के अनुसार प्रबंधन से संबंधित जानकारियां लेख में बताई गई हैं। प्रमुख कीट एवं प्रबंधन लाल कद्दू भंग इस कीट का वैज्ञानिक नाम रेपिडोपाल्पा (एल्युकोफोरा) फोविकोलिस है। यह कोलियोपटेरा गण के क्राइसोमेलिडी कुल का कीट है। पहचान इसका वयस्क भंग चमकदार नारंगी रंग का होता है। यह लगभग 7 मि.मी. लंबा और 45 मि.मी. चौड़ा होता है। मादा, नारंगी अथवा पीले रंग के अंडों को पौधों के निकट जमीन में देती है। इसका ग्रब पीलापन लिए हुए सफेद होता है। इसका सिरा भरे रंग का होता है। पूर्ण विकसित ग्रब लगभग 12 मि.मी. लंबा और 3.5 से 4 मि.मी. चौड़ा होता है। इनका प्यूपा भी जमीन में बनता है। नुकसान की प्रकृति ग्रब एवं वयस्क दोनों अवस्थाएं हानिकारक होती हैं। ग्रब, पौधों की मुलायम जडों को खाकर एवं फलावस्था में भमि पर रखे फलों में छेद बनाकर इन्हें खाकर खोखला कर देती है। इससे छोटे फल सड़ जाते हैं। वयस्क भृग बीजपत्र फूलों व पत्तियों में छेदकर नुकसान पहुंचाती है। इससे पौधों की बढ़वार रुक जाती है। प्रबंधन फसल खत्म होने पर बेलों को खेत से हटाकर नष्ट कर दें। फसल लेने के बाद खेत की गहरी जुताई करने से भूमि में उपस्थित अपरिपक्व अवस्थाएं नष्ट हो जाती हैं। अगेती बुआई करने से इस कीट का प्रकोप कम होता है। कीट प्रतिरोधी किस्मों की बुआई करें। कार्बोरिल 50 डब्ल्यू.पी 2 ग्राम/लीटर या इंडोक्साकार्ब 14.5 एस.सी. 1 मि.ली./2 लीटर का छिड़काव करें। भूमिगत शिशुओं के लिए क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. 2.5 लीटर/हैक्टर हल्की सिंचाई के साथ प्रयोग करें। चेपा/माहूं इस कीट का वैज्ञानिक नाम ऐफिस गोसीपाई है। यह हेमिप्टेरा गण एफिडिडी कुल का कीट है। पहचान वयस्क कीट हल्के हरे रंग के होते हैं।कीट की पंख वाली अवस्था में इसका रंग भूरा होता है। ये लगभग 1.25 मि.मी. लंबे होते हैं। इसके शिशु तथा वयस्क अधिकतर पंखहीन होते हैं। शिशु दिखने में वयस्क के समान, लेकिन आकार में छोटे होते हैं। फसल पकने के बाद पंखदार वयस्क भी दिखाई देते हैं। इनके पंख पारदर्शी होते हैं, जिनमें काली नसें दिखाई पड़ती हैं। नुकसान की प्रकृति वयस्क और शिशु दोनों अवस्थाएं पौधों को नुकसान पहुंचाती हैं। कीट पौधों का रस चूसते हैं। इससे पौधा कमजोर हो जाता है तथा विकास रुक जाता है। लगातार रस चसने के कारण पत्तियां का रंग पीला पड जाता है, जो बाद में सूख जाती है। इसके अलावा ये एक चिपचिपा पदार्थ निकालते हैं,जिसे हनीड्यू कहते हैं। इस पदार्थ से पत्तियों । में काला कवक बनने की स्थिति बढ़ जाती है, जो प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में बाधा डालती है। ये कीट खीरे व तरबूज में वायरस रोग फैलाते हैं। कद्दू में पर्ण कुंचन रोग भी इस कीट द्वारा फैलता है। प्रबंधन नाइट्रोजन खाद का अधिक प्रयोग न करें। आसपास के खरपतवार को नष्ट कर लेडी बर्ड भृग का संरक्षण करें। इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 1 मि.ली./3 लीटर या डाइमेथोएट 30 ई.सी. 2 मि.ली./लीटर का छिड़कावकरें। बरूथी कीट इसका वैज्ञानिक नाम टेट्रानिकस निओक्लेडिनीकस है। यह ट्रोम्बिडिर्पोमिस गण के टेट्रानिकिडी कुल का कीट है। पहचान ये मकडी प्रजाति के बहुत छोटेछोटे जीव होते हैं, जो आंखों से मुश्किल से दिखाई देते हैं। यह कीट हल्का भूरा, शरीर पर दो आंखों जैसे-धब्बे, चार जोड़ी टांगे व बहुत सक्रिय होता है। पूर्ण विकसित नर 0.52 मि.मी. लंबा व 0.30 मि.मी. चौड़ा होता है। मादा का शरीर अंडाकार, पायरीफॉर्म व रंग परिवर्तनीय होता है। यह लाल, हरा व जंगदार हरे रंग का हो सकता है तथा दो बडे रंगदार धब्बे शरीर पर होते हैं। इसकी मादा 60-80 तक अंडे पत्तियों की निचली सतह पर देती है। पूर्ण विकसित निम्फ अति सूक्ष्म 0.33 मि.मी. लंबा होता है। नुकसान की प्रकृति इसके शिशु एवं वयस्क दोनों ही पौधों के विभिन्न भागों से रस चूसते हैं। इससे पौधे का हरा भाग नष्ट हो जाता है। पत्तों पर पहले सुई की नोक जैसे छोटे हल्के सफेद पीले रंग के धब्बे पड जाते हैं। प्रकोप अधिक होने पर माइट पौधों पर रेशमी जाल बनाती है। प्रभावित पत्तियां सूख जाती हैं। प्रबंधन कीट प्रतिरोधी किस्मों की बुआई करें। खेतों में नीम के बीज के पाउडर का छिड़काव करते रहना चाहिए। कीट का प्रकोप पानी के तेज छिड़काव से कम किया जा सकता है। केराथेन 30 ई.सी. 1 मि.ली. या इथियोन 50 ई.सी. 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। फल मक्खी इस कीट का वैज्ञानिक नाम बैक्टरोसेरा क्यूकूरबिटी है। यह डिप्टेरा गण के टेपरीटिडी कुल का कीट है। पहचान इसका वयस्क लाल भूरे रंग का व वक्ष पर पीले रंग की मार्किंग होती है। फल मक्खी की मादा 6-7 मि.मी. आकार की होती है। नर अपेक्षाकृत छोटा होता है। मादा सफेद सिगार आकार के अंडे, कोमल, नरम फलों में 2 से 4 मि.मी. अंदर घुसकर देती है। लटावस्था मैगट मटमैले सफेद रंग की होती है। इसका अग्र भाग चौड़ा तथा पश्च भाग पतला होता है। लटे टांगरहित होती हैं। पूर्ण विकसित मैगट 9-10 मि.मी. लंबी व बीच से 2 मि.मी. चौड़ी होती है। प्यूपीकरण मृदा में सतह से 0.5 सें.मी. नीचे होता है। नुकसान की प्रकृति इस कीट की मैगट अवस्था मुख्य हानि पहुंचाती है। यह फल में छेद करके अंडे देती है, जिससे प्रभावित हिस्सा मुड़कर टेढ़ा हो जाता है। छेद, रोगजनक जैसे कि जीवाणुऔर कवक के लिए प्रवेश बिन्दु का काम करता है। अंडे से मैगट निकलकर फल का गूदा खाती हैं। छोटे फलों की वृद्धि रुक जाती है। फल सड़कर डंठल से अलग होकर गिर जाते हैं। प्रबंधन गर्मी में खेत की गहरी जुताई करें। ग्रसित फलों को एकत्रित करके नष्ट करें। फल मक्खी की निगरानी के लिए फलों के बागों में मिथाइल यूजिनोल ट्रैप और क्यू-ल्युर ट्रैप लगाएं। फल मक्खी प्रतिरोधी किस्मों की बुआई करें जैसे-ककड़ी में इम्प्रूव्ड लाँग ग्रीन, तोरई में पीलीभीत पद्मनी आदि। फसल पर मैलाथियान 50 ई.सी. का 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें। सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ (उत्तर प्रदेश) चन्द्र शेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर (उत्तर प्रदेश)