साधारणतः पेड़-पौधों के प्रसारण के लिए बीजों का प्रयोग किया जाता है। ये बीज लैंगिक विधि द्वारा बनाए जाते हैं, जो प्रकृति में स्वयं ही होता है। इसके अतिरिक्त कुछ पेड़-पौधों में उनके किसी विशेष अंग का विभाजन करके या ऐसे ही बीज के तौर पर प्रयुक्त किया जाता है। इस विधि को वानस्पतिक संवर्धन कहते हैं। गन्ना, आलू, अदरक, ग्लैडियोलस, डहलिया, अनन्नास आदि इसी विधि द्वारा प्रसारित होते हैं। इसी तरह से मशरूम की खेती में प्रयुक्त होने वाले बीज को स्पॉन के नाम से जाना जाता है, जो एक प्रकार से वानस्पतिक बीज ही है। इसको बड़ी सावध नी से वैज्ञानिक विधियों से प्रयोगशाला में तैयार करते हैं। मशरूम की खेती के इतिहास के पृष्ठों को पलटने से पता चलता है कि इसकी खेती में बिजाई करने के लिए मशरूम के बीज की कई किस्मों का उल्लेख किया गया है। बीज का उत्पादन करने के लिए बीज सामग्रियों का प्रयोग किया गया है। प्राकृतिक बीज प्राचीनकाल में जब मशरूम उगाने का व्यवसाय शुरू हुआ तो जहां पर यह उग रहा होता था, उसी स्थान की मृदा को एकत्रित करके उसे मशरूम बीज की तरह प्रयोग करते थे। इस मृदा में पर्याप्त मात्रा में मशरूम की फफूंदी उगी होती थी। इस प्रकार की फफूंदीयुक्त मृदा को खाद में डालने पर फफूंदी फैल जाती थी और मशरूम निकलना प्रारंभ हो जाता था। इस प्रकार के मशरूम बीज का प्रयोग वर्ष 1800 में फ्रांस में किया गया था। उस समय इसका शुद्ध बीज बनाने की विधि के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं था। मशरूम के प्राकृतिक बीज को खाद में बिजाई करने के अतिरिक्त ईंट की शक्ल का मशरूम बीज और फ्लेक नामक बीज भी प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार के इसके बीज का वर्णन एटकिन्सन नामक वैज्ञानिक ने वर्ष 1961 में मशरूम से संबंधित अपनी एक पुस्तक में किया है। शिल्प यंत्रशालाचालित मार्ग पर उपलब्ध मशरूम बीज इस प्रकार के मशरूम के बीज का प्रयोग फ्रांस में करते थे।इस प्रकार के बीज का वर्णन भी भी एटकिन्सन ने किया है। प्राचीनकाल में सामग्री को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने-जाने के लिए घोड़ों तथा खच्चरों को काम में लाया जाता था। उस समय मोटर और गाड़ियों का प्रचलन नहीं था। शिल्प यंत्रशालाओं के समीप फैली हुई पगडंडियों में घोड़ों और खच्चरों की लीद पर्याप्त मात्रा में फैली होती थी। इसमें लकड़ी का बुरादा और मिट्टी मिली होने के कारण मशरूम की फफूंदी को उगने के लिए एक उपयुक्त पदार्थ उपलब्ध हो जाता था। इस प्रकार के मिश्रण में उस स्थान पर पहले से ही विद्यमान मशरूम की फफूंदी फैल जाती थी। कभी-कभी समीप पर उगने वाले मशरूमके सूक्ष्म बीज हवा में उड़कर इस मिश्रण पर एकत्रित हो जाते थे तथा उचित वातावरणपाकर समयनुसार उगकर फलदेह अवस्था में परिवर्तित हो जाते थे। फ्लेक स्पॉन फ्लेक स्पॉन को फ्रेंच स्पॉन के नाम से भी जाना जाता है। इस प्रकार का मशरूम बीज फ्रांस में बनाया जाता था। मशरूम के प्राकृतिक बीज की थोड़ी मात्रा को लेकर तैयार की हुई खाद में बिजाई कर देते थे। जब खाद में मशरूम की फफूंदी भलीभांति फैल जाती थी, तो उसे उस खाद को तोड़कर उसके 6 से 8 इंच अर्द्धव्यास के टुकड़े करलेते थे और उनको सुखाने के बाद बीज के तौर पर प्रयोग करते थे। खाद के ऊपर मशरूम की सफेद रंग की फफूंदी फैली होने के कारण खाद के छोटे-छोटे टुकड़े बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़ों की भांति प्रतीत होते थे, इसलिए इस बीज को फ्लेक स्पॉन के नाम से जाना जाता था। उपरोक्त प्रकार के बीज प्रायः अन्य प्रकार की फफूंदी तथा कीट-पतंगों से ग्रसित तथा प्रभावित होते थे। अतः इनसे मिलने वाली पैदावार अनिश्चित होती थी। इस बात को ध्यान में रखते हुए 19वीं शताब्दी में मशरूम के शुद्ध बीज बनाने के बारे में अनुसंधान शुरू हुआ था। निम्नलिखित बीज बनाने का उल्लेख मशरूम के साहित्य में मिलता है। तंबाकू के डंठलों पर निर्मित बीज रेटयू और अरनोल्ड नामक वैज्ञानिकों ने क्रमशः तंबाकू के डंठलों और खाद, मिट्टी या पीट के मिश्रण को मशरूम बीज बनाने के लिए उपयोग किया। अनाज के दानों पर निर्मित बीज वर्ष 1932 में सिन्डेन नामक वैज्ञानिक ने सबसे पहले अनाज के दानों पर मशरूम बीज बनाना प्रारंभ किया। उन्होंने रबी में उगाई जाने वाली राई के उबले हुए दानों पर चूना मिलाने के बाद इस मिश्रण का बीज बनाने के लिए प्रयोग किया। इसके बाद कई वैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार के खाद्यान्नों पर मशरूम बीज बनाना प्रारंभ किया। टैरियर ने वर्ष 1945, लैम्बरट ने वर्ष 1971 तथा बलान और उनके सहयोगियों ने वर्ष 1960 में क्रमश: गेहूं, मक्का तथा जौ के दानों पर बीज बनाना प्रारंभ किया। स्टोलर ने वर्ष 1962 ने उल्लेख किया कि ज्वार की अपेक्षा राई, मशरूम बीज बनाने के लिए अधिक उपयुक्त हैं। राई के दानों पर फफूंदी की वृद्धि एक जैसी होती है। उन्होंने राई के एक पौंड उबले हुए दानों में 1.5 ग्राम कैल्शियम और 6 ग्राम जिप्सम मिलाने का सुझाव दिया, ताकि दाने आपस में न चिपकें तथा फफूंदी भलीभांति फैल जाए। सेंगबुश ने वर्ष 1968 में प्रति कि.ग्रा. उबले हुए मैनीटोबा प्रजाति के गेहूं के दानों में 3 ग्राम कैल्शियम तथा 13 गाम जिप्पम मिलाने का प्रयाव दिया। स्टोलर ने वर्ष 1968 में छिलकेरहित दानों तथा बिनौले की खली के मिश्रण पर बने मशरूम बीज का निरीक्षण किया तो पता चला कि इस मिश्रण में मशरूम की फफूंदी शीघ्र फैलती है, जबकि गेहूं के चोकर तथा गेहूं के मिश्रण में इसका बीज अच्छा नहीं बनता तथा फफूंदी के फैलने में भी अधिक समय लगता था। सेन आन्टोनियो और हवैंग (वर्ष 1977) का मत है कि खाद्यान्न वाले अनाज मशरूम की फफूंदी फैलने के लिए अधिक उपयोगी और उत्तम हैं। विसरका ने वर्ष 1972 में उल्लेख किया कि राई, गेहूं तथा छोटे दाने वाले खाद्यान्न को मशरूम का व्यावसायिक बीज बनाने के लिए सबसे अधिक प्रयोग करते हैं। सिनडेन (वर्ष 1972) के मतानुसार राई का उपयोग बीज बनाने के लिए सबसे अधिक होता है। कुछ उत्पादक ज्वार और छोटे दाने वाले अनाज का भी प्रयो सफलतापूर्वक कर रहे हैं। भारत मेंभी मशरूम बीज बनाने के लिए मंजल ने वर्ष 1973 में ज्वार का प्रयोग करने का सुझाव दिया। वर्ष 1975 में कुमार और सहयोगियों ने पाया कि यदि ज्वार के उबले हुए दानों में 2 प्रतिशत जिप्सम और 6 प्रतिशत कैल्शियम कार्बोनेट मिलाया जाए तो मशरूम का कवक जाल अच्छी तरह और शीघ्रता से फैलता है। दानेदार बीज वर्ष 1972 में ह्यू और लीन नामक वैज्ञानिकों ने भूसी का पाउडर, मांड, खाद का चूर्ण और दानों के छिलकों के पाउडर को आपस में मिलाकर उसकी छोटी-छोटी गोलियां बनाकर मशरूम बीज बनाया। पाउडर की तरह का बीज स्टोलर ने वर्ष 1971 में 20 पदार्थों के मिश्रण पर पाउडर की तरह का मशरूम का बीज बनाया, लेकिन उन्होंने प्रयोग में लाए जाने वाले पदार्थों के नामों का कोई उल्लेख नहीं किया। ईंटवी बीज ब्रिटेन में बीज के उत्पादकों ने मशरूम के प्राकृतिक बीज का उपयोग ईंट की शक्ल का मशरूम बीज बनाने के लिए व्यवसाय के रूप में प्रारंभ किया और वे लोग इस बीज को अमेरिका, जर्मनी, डेनमार्क और ऑस्ट्रेलिया को निर्यात करते थे। ईंट की शक्ल का मशरूम बीज बनाने के लिए घोड़े की लीद, गाय का गोबर तथा दोमट मृदा के मिश्रण को ईंट की शक्ल में ढाला जाता था, जिसका आकार 8x5X1/5 इंच होता था। ये ईंटें थोड़ी सूख जाती थीं तो मशरूम के प्राकृतिक बीज की थोड़ी-सी मात्रा को इसकी सतह पर लगभग एक इंच अर्द्धव्यास का छेद करके अंदर की तरफ भर देते थे। कुछ समय बाद पूरी ईंट में खंभी का कवकजाल फैल जाता था। फफूंदी उगी हुई इन ईंटों को तोड़कर खाद की बिजाई करने के लिए प्रयोग करते थे। खाद में निर्मित बीज मशरूम का शुद्ध बीज बनाने के लिए यह आवश्यक है कि इसके बीजाणुओं को उगाकर शुद्ध फफूंदी प्राप्त की जाए। इसलिए मशरूम के सूक्ष्म बीजों को उगाने के लिए | अनुसंधान प्रारंभ किए गए। कास्टैन्टिन और मैटरोचोट नामक वैज्ञानिकों ने इसके सूक्ष्म बीजों को उगाने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की। मशरूम के सूक्ष्म बीजों को उगाकर फफूंदी के रूप में परिवर्तित करने की विधि ज्ञात होने के बाद वैज्ञानिकों ने खाद पर मशरूम बीज बनाना प्रारंभ किया। वर्ष 1937 में केले नामक वैज्ञानिक ने गेहूं के सूखे डंठलों और घास | को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर, उनको बरसात के पानी में भिगोकर तथा खाद बनाकर | मशरूम बीज बनाने के लिए प्रयोग किया। पिसी हुई जई, मोटी रेत और खाद के मिश्रण में स्टायर नामक वैज्ञानिक द्वारा बनाए गए घोल को मिलाने के बाद गीले किए हुए मिश्रण | को भी बीज बनाने के लिए प्रयोग किया। वर्ष 1938 में इसी वैज्ञानिक ने कुचली हुई जई को स्टायर के घोल से उपचारित करके बनाए गए पदार्थ को मशरूम बीज बनाने के लिए बहुत उपयोगी पाया। लेस कारबोरा नामक वैज्ञानिक ने वर्ष 1941 में सब्जियों की जड़ों से बनाई गई लुगदी को मशरूम बीज बनाने के लिए उपयोग किया। डाई गिआसेन्टो ने वर्ष 1935 तथा लैंगक्रेमर और रैजनिक ने वर्ष 1954 में घोड़े की लीद से बनी हुई खाद पर मशरूम बीज बनाया। सोवेक्साज नामक फ्रांसीसी संस्था ने बेल्जियम में कम्पोस्ट की बनी हुई छोटी-मोटी गोलियों पर बीज बनाने के काम का आविष्कार किया।