आज के दौर में हर तरह के आहार में जैविक सब्जियों का चलन काफी तेजी पर है। ऐसे में माइक्रोग्रीन्स का महत्व किसी से अछूता नहीं है। विशेषज्ञ भी बताते हैं कि यह एक स्वास्थ्यवर्द्धक सुपर फूड है। माइक्रोग्रीन्स का आमतौर पर सलाद और माइक्रोन्यूट्रिएंट से भरपूर आहार के रूप में सेवन किया जाता है। एक बार तैयार हो चुकी माइक्रोग्रीन्स 6 से 7 दिनों तक उपयोग के लायक बनी रहती है। नियमित रूप से यदि इसका सेवन किया जाये तो इससे हमारा स्वास्थ्य एवं आंतरिक प्रणाली दोनों ही मजबूत होते हैं, क्योंकि इसमें शरीर के लिए सभी जरूरी पोषक तत्व होते हैं। भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा द्वारा एनएमएचएस परियोजना के अंतर्गत महिलाओं की पोषण स्थिति को मजबूत बनाने के लिए उच्च हिमालयी क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के प्रयास किए जा रहे हैं। महिलाओं को माइक्रोग्रीन्स एवं गेहूं के ज्वारे को आहार में सम्मिलित करने के लिए प्रोत्साहित कर आहार विविधता एवं पोषक तत्वों को सुनिश्चित किया जा रहा है। माइक्रोग्रीन्स पूर्ण रूप से विकसित हो चुकी सब्जियों का लघु संस्करण है और पौष्टिकता के मामले में उनसे कहीं आगे है। यह छोटे-छोटे नवांकुरों से विकसित हुआ सिर्फ 2 पत्रक और एक कोमल तनायुक्त लगभग एक से तीन इंच लंबाई का कोमल साग है। इसके छोटे से पौधों में पूरे पौधे के मुकाबले 40 प्रतिशत अधिक पौष्टिकता होती है इसलिए इनमें एंटीऑक्सीडेंट की मात्र भी कहीं अधिक होती है। पोषक तत्वों से भरपूर होने के साथ-साथ यह विशेष सुगंध से भी भरपूर है। माइक्रोग्रीन्स उगाने के लिए वनस्पतियां ब्रैसीकेसीकुल-फूलगोभी, ब्रोकली,बंदगोभी, मूली एस्टीरेसीकुल-लैट्यूस, चिकोरी एपिएसीकुल-सोयाबीज, गाजर, सौंफ, अजमोद एमारायलीडेसीकुल-लहसुन, प्याज, लीक एमारैन्थेसीकुल-चौलाई, पालक, चुकन्दर, स्विसचार्ड कुकुरबिटेसीकुल-खीरा, मेलन्स (तरबूज, खरबूज आदि) धान्य फसलें जैसे-धान, जौ, गेहूं, मक्का तथा दलहनी फसलों में मसूर, चना, बीन आदि भी माइक्रोग्रीन्स की तरह प्रयोग किए जाते हैं। सोलेनेसीकुल की सब्जियों का प्रयोग, माइक्रोग्रीन्स उगाने के लिए कभी नहीं करना चाहिए जैसे-आलू, टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च आदि। इन फसलों में पौध अवस्था में एल्केलॉइड जैसे-सोलेनिन, ट्रोपफेन्स आदि की मात्रा काफी अधिक होती है, जिससे शरीर पर कई नुकसानदायक प्रभाव हो सकते हैं। इससे विशेषकर, पाचन तंत्र एवं तंत्रिका तंत्र पर असर पड़ता है। माइक्रोग्रीन्स के अलावा अंकुरित बीजों को भी खाने का चलन काफी बढ़ चुका है, किन्तु यह अंकुरित बीजों से कई मायनों में अलग है। अंकुरित बीज केवल बीज में अंकुर निकल जाने पर भोजन के रूप में प्रयोग कर लिए जाते हैं। इसमें बीज व जड़ दोनों भाग सम्मिलित होते हैं। माइक्रोग्रीन्स में जड़ शामिल नहीं की जाती। सारणी 1. माइक्रोग्रीन्स के रूप में सब्जी फसलों के तैयार होने का समय तीव्र वृद्धि वाली फसलें (7-14 दिन) धीमी वृद्धि वाली फसलें (15-25 दिन) अधिक धीमी वृद्धि वाली फसलें (15-30 दिन) बंदगोभी चौलाई मोटी सौंफ केला चुकंदर तुलसी मक्का गाजर सोया गांठगोभी स्विसचार्ड सौंफ सरसों हरा प्याज पार्सले मूली इनकी कटाई अंकुर निकलने के कुछ दिनों बाद की जाती है। अंकुरों का वृद्धि चक्र केवल 2-7 दिनों का होता है, जबकि माइक्रोग्रीन्स को विकसित होने में 7-30 दिनों का समय लगता है, जब तक कि पत्तियों का पहला जोड़ा पौधे में विकसित न हो जाए। कटाई माइक्रोग्रीन्स जब लगभग दो इंच के हो जाते हैं, तब इनकी कटाई करनी चाहिए। एक साफ रसोई कैंची की सहायता से इनकी कटाई की जाती है। कुछ समय तक प्रयोग के लिये इन्हें फ्रिज में रखा जा सकता है। माइक्रोग्रीन्स की पोषक उपयोगिता माइक्रोग्रीन्स की पोषक उपयोगिता के कारण ही वैश्विक स्तर में इनका महत्व काफी तेजी से बढ़ता जा रहा है। अध्ययनों के अनुसार इसमें काफी अधिक मात्रा में विटामिन्स व कैरोटिनॉइड्स मौजूद होते हैं। पूर्ण रूप से विकसित हो चुके पौधे की तुलना में इनमें पांच गुना अधिक पोषक तत्व होते हैं। खनिज तत्वों में यह कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन, मैगनीज, जिंक, सेलेनियम, मॉलिब्डेनम आदि के अच्छे स्रोत हैं। इसके अतिरिक्त इनमें एंटीऑक्सीडेन्ट्स और पॉलीफिनॉल्स की भी अच्छी मात्रा पाई जाती है। ब्रैसीकेसी माइक्रोग्रीन्स भी पोटेशियम, कैल्शियम, आयरन व जिंक के अच्छे स्रोत माने गये हैं। इसके अतिरिक्त माइक्रोग्रीन्स में मौजूद अन्य फायटोकैमिकल्स हैं-फीनॉलिक एंटीऑक्सीडेन्ट, एंथोसायनिन, ग्लूकोसिनोलेट्स और कैरोटिनॉइड। माइक्रोग्रीन्स का आहार में प्रयोग माइक्रोग्रीन्स को पकाने पर इनमें पाये जाने वाले पोषक तत्व व पानी में घुलनशील विटामिन नष्ट हो जाते हैं। इन्हें विभिन्न प्रकार से आहार में शामिल कर सकते हैं। सलाद में मिलाकर माइक्रोग्रीन्स में कुछ बूंदें नीबू की छिड़ककर सैंडविच में डालकर सूप व पास्ता बनाने में इस्तेमाल फलों के जूस में भी प्रयोग कर सकते हैं। पारंपरिक सब्जियों व अन्य फसलों के माइक्रोग्रीन्स, पोषण प्राप्त करने का एक बहुत सरल साधन हैं, जिन्हें घर के आसपास कहीं भी उगाकर पोषण प्राप्त किया जा सकता है। अतः पोषण सुरक्षा के लिए लोगों का रुझान इसकी तरफ बढ़ाकर इनके पोषण महत्व के प्रति जागरूक करना आवश्यक है, जिससे वे घर में ही उगाकर पोषण प्राप्त कर सकें। गेहूं के ज्वारे (व्हीटग्रास) के फायदे गेहूं के सूक्ष्म पौधे, जिन्हें गेहूं के ज्वारे या व्हीटग्रास भी कहते हैं, स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत लाभकारी होते हैं। इनमें अनेक पोषक तत्व, रोग निरोधक व रोग निवारक शक्ति पाई जाती है। गेहूं के ज्वारा जूस को भी सुपरफूड के रूप में जाना जाता है। इसका उपयोग करने से शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूती मिलती है। इसके साथ ही यह डायबिटीज, ब्लडप्रेशर, गठिया, कैंसर जैसे रोगों को रोकने में लाभकारी होता है। माइक्रोग्रीन्स उत्पादन के प्रमुख चरण किसी भी साधारण ट्रे या फिर किसी पात्र में मृदा लेने के बाद इसको समतल कर लें एवं ध्यान रखें कि यह अधिक दबने न पाए। बीजों को बोने से पूर्व भिगो लेना चाहिए, इससे अंकुरण शीघ्रता से होता है। बीजों के ऊपर मृदा की एक बारीक परत चढ़ा दें। बीज बोने के बाद टे्र को ढकना सुनिश्चित करें। अतिरिक्त आवरण के तौर पर किसी प्लास्टिक का उपयोग किया जा सकता है। बीजों के अंकुरित होते ही प्लास्टिक आवरण को हटा लेना चाहिए। एक बार जब बीज अंकुरित हो जायें, तब उन्हें सूरज की रोशनी के संपर्क में रखें। आवश्यकतानुसार इन्हें हर रोज पानी दें, किन्तु ध्यान रहे कि मृदा में अधिक नमी न होने पाए। माइक्रोग्रीन्स को अपने उचित विकास के लिए लगभग 8 घंटे छायांकित धूप की आवश्यकता होती है। सारणी 2. माइक्रोग्रीन्स के रूप में कुछ सब्जी फसलों का पोषण स्तर फसल परिपक्व पौधे की तुलना में उपस्थित पोषक गुण धनिया केरोटिनाइड का उच्च स्रोत ल्यूटिन व बायोलाजैन्थिन की उपस्थिति 3 गुना ज्यादा β-कैरोटीन चौलाई अत्यधिक मात्रा में विटामिन 'के' मूली विटामिन 'ई' लैट्यूस सबसे अधिक एंटीऑक्सीडेन्ट' लाभकारी फीनॉलिक यौगिक लाल बंदगोभी