पॉपलर एक तेजी से बढ़ने वाला बारहमासी पेड़ है, जिसमें उच्च कार्बनडाइऑक्साइड विनिमय दर और पानी की कम खपत होती है। पॉपलर को हवा की गति को कम करने के लिए उत्तम माना गया है। भारत के उत्तरी भाग में कृषि वानिकी प्रणाली के तहत इसे लगाए जाने पर किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार हो सकता है। इसके द्वारा वातावरण में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिलती है। कृषि वानिकी प्रणाली द्वारा एक हैक्टर क्षेत्रफल में पॉपलर के 425 पौधे लगाए जाते हैं, जिनकी कीमत 5 से 6 वर्षों के बाद लगभग 5 लाख रुपये हो जाती है। पॉपलर की मुख्य विशेषताएं तेज विकास दर और कृषि फसलोंके साथ अनुकूलनशीलता। पल्प, पैकिंग, बक्से, डंडे, बोर्ड, प्लाइवुड और अन्य उद्योगों में इसकी अधिक मांग। कार्बन अनुक्रम के लिए उपयोग में लाया जाता है। फोटोरेमेडियेशन अर्थात दूषित मृदा, हवा और पानी को साफ करता खतो से नाइट्रेट प्रदूषकों का अवशोषण। खेत से लवणता को कम करता इसके पूर्ण विकास में बहुत ही कम अवधि (6-8 वर्ष) लगती है। भारत में वन क्षेत्र लगभग 7.12.249 मावर्ग कि.मी. में फैला हुआ है, जो कि कुल भौगोलिक क्षेत्र का 21.67 प्रतिशत है। देश में कृषि वानिकी प्रणाली आमतौर पर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में की जाती है। इस प्रणाली में कृषिऔर वानिकी का संयोजन किया जाता है। इसमें वर्षभर कुछ न कुछ उपज ली जा सकती है जैसे कि सब्जी, हरी खाद, चारा आदि जिसे सालाना फसलचक्र को ध्यान में रखकर लगाया जाता है। इस प्रणाली में घटकों का चयन एक-दूसरे के पूरक के रूप में किया जाना महत्वपूर्ण है, ताकि विभिन्न फसलों और पेड़ों के बीच प्रतिस्पर्धा से बचा जा सके। एक ही इकाई में लकड़ी के साथ-साथ विभिन्न फसलों एवं पशुपालन को एकीकृत ढंग से उपजाने से किसान को सामाजिक एवं आर्थिक फायदा हो सकता है। वर्तमान में पृथ्वी पर केवल 22 प्रतिशत जमीन को कषि उद्देश्यों के लिए उपयोग में लाया जा रहा है, जिसमें 13 प्रतिशत जमीन की उत्पादक क्षमता बहुत ही कम है, 6 प्रतिशत मध्यम उत्पादकता की श्रेणी में हैं और केवल 3 प्रतिशत जमीन ही उच्च उत्पादक क्षमता की श्रेणी में आती है। अपने देश की बढ़ती आबादी की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए आने वाले वर्षों में कृषि भूमि की उत्पादकता बढ़ाने का भार बढ़ेगा। इसलिए देश के उत्तरी राज्यों में इस प्रणाली को अपनाकर पर्यावरण एवं कृषकों दोनों के हितों की सुरक्षा की जा सकती है। कृषि वानिकी सह बागवानी प्रणाली पॉपलर पर्यावरण के अनुकूल होता है और कृषि वानिकी प्रणाली में उपजाने के लिए बहुत उत्तम है। शिमला मिर्च कम अवधि की बहुत ही लाभदायक सब्जी है, जिसकी खेती रबी और खरीफ दोनों मौसमों में की जा सकती है। सैम हिगिनबॉटम कृषि प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान विश्वविद्यालय, प्रयागराज के वानिकी विभाग के फार्म में वर्ष 2017-2018 में पॉपलर आधारित कृषि वानिकी प्रणाली में शिमला मिर्च लगायी गई, जिसके परिणाम अच्छे थे। पॉपलर रोपण की विधि पॉपलर प्रतिवर्ष 20-25 मीटर प्रति हैक्टर की दर से तेजी से बढ़ता है। आमतौर पर इसके बीज को 22 सें.मी. लंबे और 1-3 सें.मी. व्यास के गड्ढे में लगाया जाता है। पॉपलर लगाने के लिए कुछ मुख्य बातों का ध्यान रखना पड़ता है, जो सारणी-1 में उल्लेखित हैं। शिमला मिर्च की खेती शिमला मिर्च की नर्सरी तैयार की जाती है और जब पौधे 8 से 10 सें.मी. के हो जाते हैं, फिर इसे तैयार खेत में लगाया जाता है। यह तीन रंगों-लाल, हरे और पीले रंग की होती है। भारत में अधिकतर हरे रंग की शिमला मिर्च की खेती की जाती है। खुले खेत में इसकी पैदावार 20 से 40 टन प्रति हैक्टर एवं पॉलीहाउस और ग्रीनहाउस में इसकी उपज 80 से 100 टन प्रति हैक्टर तक होती है। इसकी खेती मुख्यतः उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में की जाती है। इसका उपयोग विभिन्न व्यंजन और छोटे उद्योग में अचार बनाने में किया जाता है। हाल के दिनों में पीली और लाल रंग की शिमला मिर्च की मांग शहरी रेस्तराओं में बढ़ी है, जिसकी अच्छी कीमत किसानों को मिल रही है। पॉपलर की खेती लकडी. ईंधन और चारे की मांग को पूरा करने के लिए की जाती है। इसने प्लाईवुड उद्योग के विकास में मदद की है। अध्ययनों में पता चला है कि पॉपलर के साथ कृषि फसलें अधिक संगत हैं। पॉपलर आधारित कृषि वानिकी प्रणाली में शिमला मिर्च की खेती से सालाना लगभग 5.50 लाख रुपये तक आमदनी और पॉपलर की कीमत लगभग 75,000-80,000 रुपये प्रतिवर्ष प्रति हैक्टर की दर से बढ़ती है। इसके उत्पादन से कृषकों की आर्थिक स्थिति में सुधार हो सकता है। सारणी 1 उत्तर भारत में पॉपलर खेती के लिए मुख्य बिन्दु जीवन काल 5 से 7 वर्ष प्रजाति जी-48 पंक्ति से पंक्ति की दूरी 9 मीटर पौधे से पौधे की दूरी 3 मीटर प्रति हैक्टर पौधों की संख्या मृदा मृदा कार्बनिक पदार्थों से मृदा समृद्ध दोमट बुआई का समय जनवरी और फरवरी वर्षा 750-800 मि. मी. बुआई के समय तापमान 18-20 डिग्री सेल्सियस कटाई के समय तापमान 0-45 डिग्री सेल्सियस सारणी 2 शिमला मिर्च की खेती के दौरान कुछमुख्य बातों का ध्यान मौसम रबी और खरीफ रबी और खरीफ मृदा कार्बनिक पदार्थों से भरपूरदोमट मृदा बुआई का समय सितंबर-फरवरी जैविक उर्वरक 20 से 25 टन प्रति हैक्टर वर्मीकम्पोस्ट 40 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर पोल्ट्री खाद 2.5 टन प्रति हैक्टर बीज की किस्म नेपच्यून एफ 1 हाइब्रिड बीज की कीमत 900 से 1450 रुपये प्रति10 ग्राम सिंचाई साप्ताहिक या 10 दिनों के अंतराल पर दूरी 40 सें.मी. (पौधे से पौधे) 30सें.मी. (पंक्ति से पंक्ति) पौधे का जीवन काल 5 से 6 महीने निराई 30 और 60 दिनों के बाद फफूंदी से बचाव गीले सल्फर का छिड़काव 2 ग्राम प्रति लीटर डाइबैक और फ्रूट मैन्कोजेब का छिड़काव 2 रॉट से बचाव ग्राम प्रति लीटर सारणी 3 पॉपलर आधारित कृषि वानिकी प्रणाली में शिमला मिर्च में लागत एवं आय शिमला मिर्च प्रति सीजन (प्रति हैक्टर) वार्षिक(प्रति हैक्टर) खेत तैयार करने में लागत 7000 रुपये 14000 रुपये नर्सरी की तैयारी और रोपाई खर्च 4000 रुपये 8000 रुपये बीज की लागत (एक हैक्टर के लिए 200 ग्राम) (900प्रति 10 ग्राम) 18000 रुपये 36000 रुपये छिड़काव, निराई और गुड़ाई की लागत 6000 रुपये 12000 रुपये सिंचाई का खर्च 10000 रुपये 20000 रुपये कुल लागत 45,000 रुपये 90,000 रुपये पॉपलर आधारित कृषि वानिकी प्रणाली में शिमला मिर्च की उत्पादकता 20.5 टन 41 टन कुल विक्रय मूल्य (15 रुपये प्रति कि.ग्रा.) 307500 रुपये 6,15,000 रुपये लाभ 262500 रुपये 25,000 रुपये पॉपलर पॉपलर (5 से 6 वर्षों के लिए) लाभ (प्रति वर्ष) - 75,000-80,000 रुपये पीएचडी (शोध छात्र)सहायक प्राध्यापक, सैम हिगिनबॉटम कृषि प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान विश्वविद्यालय, प्रयागराज-211007 (उत्तर प्रदेश)एसआरएफ, भूमि एवं जल प्रबंधन प्रभाग, भाकृअनुप का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना-800014 (बिहार)