साग-सब्जियों की सफल खेती मुख्य रूप से बीज एवं उससे तैयार पौध (रोप) पर निर्भर करती है। स्वस्थ एवं अच्छे गुणवत्ता के बीजों का उपयोग कर किसान रोगरहित व अपेक्षित मात्रा में पौध प्राप्त कर सकते हैं। व्यावसायिक रूप से सब्जी उत्पादन के लिए बीज स्वस्थ, शुद्ध तथा उन्नत किस्म का ही होना चाहिए। इसे कृषि/उद्यानिकी विभाग, राष्ट्रीय बीज निगम, राष्ट्रीय बीज विकास निगम, कृषि विश्वविद्यालय या भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से ही खरीदें। पौधशाला ऐसा स्थान है जहां पर बीज 1के द्वारा पौध (रोप) तैयार करने के लिए आधारभूत आवश्यकताओं का उचित प्रबंध किया जाता है। यहां पर स्थान बदलकर रोपी जा सकने वाली सब्जियों जैसे-टमाटर, बैंगन, मिर्च, प्याज, गोभीवर्गीय सब्जियों के बीजों को कम स्थान में सघनता के साथ कम समय के लिए बोया जाता है। आजकल कद्वर्गीय सब्जियों की भी पौध तैयार कर रोपित की जाती है। ऐसे स्थान को पौधशाला कहते हैं। नर्सरी का क्षेत्र सीमित होने के कारण देखभाल करना आसान एवं सस्ता होता है, परिणामतः विपरीत परिस्थितियों में भी स्वस्थ एवं अपेक्षित मात्रा में पौधे प्राप्त किये जा सकते हैं। पौधशाला के लिए स्थान का चयन पौधशाला के लिए चयनित स्थान की मृदा हल्की, पर्याप्त कार्बनिक पदार्थयुक्त, उपजाऊ एवं भुरभुरीहो। अम्लीय या क्षारीय मृदा का चयन न करें। स्थान अपेक्षाकृत ऊंचा हो, जहां पर जल निकास का उचित प्रबंध हो। सिंचाई की सुविधा आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए। खुला स्थान हो, जहां सूर्य का प्रकाश पूरे दिन बराबर मिलता रहे। चयनित क्षेत्र जंगली पशुओं, कुत्तों, गिलहरियों आदि से सुरक्षित होना चाहिए। प्रतिवर्ष पौधशाला का स्थान बदलतेरहें। सब्जियों का उनके उगाने के आधार पर वर्गीकरण सीडलिंग ट्रे सब्जियों खासकर मिर्च, टमाटर, बैंगन की संकर किस्मों का बीज काफी महंगा आता है। इसलिए आजकल रोगरहित मजबूत पौध उगाने के लिए संरक्षित वातावरण में सीडलिंग ट्रे का उपयोग किया जाता है। सीडलिंग ट्रे अलग-अलग आकार व खानों की होती है। इनमें बीज बोने के लिए 97-200 तक खाने हो सकते हैं। सीडलिंग ट्रे के प्रत्येक खाने का आकार एक से डेढ़ इंच तक होता है। इसके खानों में कोकोपिट, वर्मीकुलाइट और परलाइट के 3:1:1 के अनुपात में बने मिश्रण को भर देते हैं। सीडलिंग ट्रे में बीजों का अंकुरण अच्छा होता है व पौधे कम मरते हैं। पौधे जब खेतों में लगाने योग्य हो जाते हैं, तब इन ट्रे को खेत में ले जाकर खांचे से माध्यम सहित पौधों को निकालकर क्यारियों में निश्चित स्थान पर लगा देते हैं। इससे पौधों की जड़ों को नुकसान नहीं पहुंचता है और पौधे खेत में सही तरह से जम जाते हैं। सीधे बीज कुछ सब्जियों का उत्पादन लेने के लिए उनके बीज की, तैयार खेत में सीधे एवं उचित अंतराल पर बुआई कर दी जाती है। जैसे-भिण्डी, पालक, गाजर, मली एवं सभी फलीदार सब्जियां आदि। रोपण द्वारा बुआई की जाने वाली कुछ सब्जियों के बीज सीधे मुख्य खेत में बोना ज्यादा जोखिम भरा होता है, अत: ऐसीसब्जियों की अलग से पौधशाला में पौध तैयार की जाती है और लगभग एक से डेढ़ माह बाद तैयार पौध को मुख्य खेत में रोपित कर दिया जाता है। सब्जियों की रोपणी मुख्यतः तीन प्रकार से तैयार की जा सकती है: बीजों को क्यारियों में या प्रो-ट्रे मेंबुआई करः टमाटर, बैंगन, मिर्च, प्याज एवं गोभीवर्गीय सब्जियां आदि। बीजों की थैलियों में बुआईः जैसे कद्वर्गीय सब्जियां वानस्पतिक विधि या कलमद्वाराः जैसे-परवल, कुन्दरू, शकरकंद किस्मों का चयन सब्जियां तथा उनकी किस्मों का चयन मदा के प्रकार एवं उसकी गुणवत्ता तथा जलवायु के आधार पर करना चाहिये। कुछ सब्जियों की उन्नत किस्में सारणी-1 में दी गई हैं। सारणी 1. विभिन्न सब्जियों की उन्नत एवं संकर किस्में क्र.सं. सब्जी उन्नत किस्में संकर किस्में 1 टमाटर पूसा रूबी, पूसा गौरव, हिसार अरुण, हिसारएन.अनमोल, हिसार गौरव, एस.एस.-101 पंजाब छुहारा एन.एस.-815, एन.एस.-2535, एन.एस.-8014, स्वरक्षा, निधि,अविनाश-2, पूसा संकर-2,ए.आर.टी.एच.-3 2 बैंगन पूसा पर्पल लांग, पूसा पर्पल राउण्ड, मुक्ताकाशी, पंत सम्राट, पंत ऋतुराज, अर्का के पूसा हाइब्रिड-6, पूसा हाईब्रिड-9इम्प्रूव्ड निशा, रवैया, वी.एन. क्यारियों का आकार क्यारियों में रोपणी तैयार करने के लिए एक आदर्श रोपणी की क्यारियों का आकार 3 मीटर लंबा एवं 1 मीटर चौड़ा होना चाहिए। वर्षाकालीन नर्सरी के लिए सतह से 15-20 सें.मी. ऊंचाई वाली नर्सरी क्यारी उचित रहती है। उठी हुई क्यारी बनाने के लिए क्यारी के किनारों की मृदा निकाल कर क्यारी के बीच के हिस्से में डालते हैं। इससे क्यारी ऊंची हो जाती है और किनारों की तरफ नाली बन जाती है, जो जल निकास का कार्य करती है। दो क्यारियों के बीच कम से कम 50 सें.मी. का स्थान खाली छोडना चाहिए, ताकि संपूर्ण क्यारियों में अंत:कर्षण क्रियाएं (सिंचाई, निराई, गुड़ाई) आदि आसानी से की जा सकें। गर्मी के मौसम में धंसी हुई तथा सर्दी में सपाट क्यारियां बनानी चाहिए। धंसी हुई क्यारी बनाने के लिए क्यारी के अंदर की मृदा मेड़ पर डाल देते हैं। क्यारियों में बीज की बुआई क्यारी में सर्वप्रथम उसकी चौड़ाई के समानान्तर 5 सें.मी. की दूरी पर 0.5 सें.मी. गहरी पक्तियां बना लेते हैं तथा इन्हीं पंक्तियों में लगभग 1 सें.मी. की दूरी पर बीज डालते हैं।बुआई के बाद बीजों को कम्पोस्ट, मुदा व रेत के (1:1:1) के मिश्रण से ढक देना चाहिए, रोपणी में क्यारियों की संख्या का निर्धारण, फसल एवं खेत के आकार के अनुसार करना चाहिए। रोपणी की तैयारी एवं उपचार पौधशाला की मृदा की एक बार गहरी जुताई या फावड़े की सहायता से अप्रैल-मई में खुदाई करने के पश्चात दो से तीन हल्की जुताई करके मृदा को भुरभुरी बना लेते हैं। खरपतवार, बड़े आकार के फसल अवशेष जैसे-मक्का, ज्वार एवं अरहर के अवशेषों को निकाल लेते हैं। अब रोपणी उगाये जाने वाले स्थान पर प्रति वर्ग मीटर की दर से 2 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी हुई खाद या कम्पोस्ट खाद या 500 ग्राम केंचुए की खाद को ट्राइकोडर्मा से उपचारित करके तैयार खेत में डालकर मदा में अच्छी तरह मिला दें। यदि पौधशाला की मदा सख्त हो जाये. तो उसमें प्रति वर्ग मीटर 2.5 कि.ग्रा. रेत अवश्य मिलायें। मृदा शोधन मृदा में अनेक प्रकार के कीटों एवं हानिकारक फफूंदों का भी वास होता है। मृदाजनित रोगों तथा छिपे कीटों से कोमल पौधों की सुरक्षा के लिए मृदा शोधन अत्यंत आवश्यक है। मृदा शोधन निम्न विधियों से की जा सकती है। मृदा सौरीकरण इस विधि में जिस स्थान पर पौधशाला तैयार करनी हो, उस स्थान की रबी फसल की कटाई के पश्चात मार्च में गहरी जुताई कर अप्रैल में क्यारी बनाकर हल्की सिंचाई करके गीला कर दें, ताकि मृदा में नमी बनी रहे एवं खरपतवारों के बीज अंकुरित हो जाएं। अब इन क्यारियों को पारदर्शी पॉलीथीन से ढककर चारों तरफ के किनारे मृदा से दबा दें, ताकि पॉलीथीन के अंदर की हवा तथा वाष्प बाहर न निकले। बरसात शुरू होने के पूर्व लगभग 15 जून तक क्यारी को इसी तरह ढका रहने दें। आवश्यकतानुसार, 4-5 सप्ताह बाद पॉलीथीन की चादर हटाकर मृदा की अच्छी तरह गुड़ाई करके क्यारी बनाकर बीज की बुआई करते हैं। मदा सौरीकरण से मृदाजनित रोगकारक मर जाते हैं। खरपतवार नियंत्रण होता है व साथ ही साथ मृदा में उपस्थित मूलग्रंथि सूत्रकृमि की संख्या में भी कमी आती है। जैविक विधि क्यारी उपचारित करने के लिए ट्राइकोडर्मा का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए 8-10 ग्राम ट्राइकोडर्मा को 10 कि.ग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर मृदा में मिला दें, इसके बाद हल्की सिंचाई कर दें। उपचार के उपरान्त क्यारियों में नमी बनाये रखें। जब भी ट्राइकोडर्मा या ऐसे ही किसी अन्य जैविक पदार्थ का उपयोग करें, तब अन्य किसी रसायन का प्रयोग न करें। रासायनिक विधि कार्बोफ्यूरान कवकनाशी की 5 ग्राम मात्रा प्रति वर्ग मीटर पौधशाला की क्यारी में डालकर मृदा में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए। बीजोपचार रोपणी या पौधशाला में बुआई से पूर्व 1.5 ग्राम थीरम + 1.5 ग्राम बाविस्टीन व 2.5 ग्राम डायथेन एम.-45 या 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा से प्रति कि.ग्रा. बीज को उपचारित करके ही बोना चाहिए, ताकि बीजजनित फफूंद से फैलने वाले रोगों को नियंत्रित किया जा सके।यदि नर्सरी क्यारी का उपचार ट्राइकोडर्मा विरिडी से किया जाता है, तो बीज उपचार भी ट्राइकोडर्मा विरिडी से करें। क्यारियों में बीज की बुआई क्यारी में सर्वप्रथम उसकी चौड़ाई के समानान्तर 5 सें.मी. की दूरी पर 0.5 सें.मी. गहरी पक्तियां बना लेते हैं तथा इन्हीं पंक्तियों में लगभग 1 सें.मी. की दूरी पर बीज डालते हैं।बुआई के बाद बीजों को कम्पोस्ट, मुदा व रेत के (1:1:1) के मिश्रण से ढक देना चाहिएपरन्तु ध्यान रहे कि इस मिश्रण को 5-6 ग्राम थीरम या कैप्टॉन से प्रति कि.ग्रा. मिश्रण की दर से शोधित अवश्य कर लें। केवल मृदा से इसलिए नहीं ढकना चाहिए, क्योंकि मृदा सिंचाई का पानी पाकर सूखने पर सख्त हो जाती है। इस तरह तैयार पौधे घने न होने के कारण आर्द्रगलन रोग की समस्या से बच जाते हैं। क्यारियों को पलवार से ढकना क्यारियों में बीजों की बआई करने के पश्चात इन्हें स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पुआल, गन्ने के सूखे पत्ते या अन्य घास-फूस कीपतली तह से ढक देना चाहिए। इससे मृदा में नमी बनी रहे और सिंचाई करने के दौरान पानी बीजों पर सीधे न पड़े अन्यथा बीजों पर ढका मिश्रण हट जायेगा और बीज का अंकुरण प्रभावित होगा।क्यारियों में 50 प्रतिशत बीजों के सफेद धागेनुमा अंकुर दिखाई देने पर घास-फूस या पलवार को हटा देना चाहिए।अन्यथा अंखुआ बड़ा होने के बाद पलवार हटाने पर अंकुर टूटने एवं पौधे कमजोर होकर जड़ के पास से ही गलकर गिरने लगते हैं। पौधशाला में यह अवस्था बीज बुआई के बाद मिर्च में 7-8 दिनों बाद, टमाटर में 6-7 दिनों बाद व बैंगन में 5-6 दिनों बाद दिखाई देती है। सिंचाई शुरू के 5-6 दिनों तक हजारे की सहायता से हल्की सिंचाई करें, ताकि बीज ज्यादा नमी पाकर बैठ न जाये।वर्षा ऋतु में क्यारी की नालियों में उपस्थित आवश्यकता से अधिक पानी पौधशाला से बाहर निकालना चाहिए। पौध उखाड़ने के 4-5 दिनों पूर्व सिंचाई बंद कर देनी चाहिए, ताकि पौधों में प्रतिकूल वातावरण सहन करने की क्षमता विकसित हो जाये और पौधे कठोर हो जाएं। पौधे उखाड़ने से पहले हल्की सिंचाई कर दें, जिससे पौधे आसानी से उखड़ जाएं तथा जड़ें न टूटे। खरपतवार नियंत्रण क्यारियों में खरपतवार उग आते हैं, तो उन्हें हाथों से निकालते रहना चाहिए तथा व्यावसायिक स्तर पर खरपतवारनाशी जैसे पेन्डीमिथलीन की 3 मि.ली. मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर बीज की बुआई के 48 घण्टे के अंदर अच्छी तरह से छिड़क देते हैं। इससे खरपतवार की समस्या का निदान हो जाता है। घने पौधों को निकालना यदि क्यारियों में पौधे अधिक घने उग आयें, तो 1-2 सें.मी. की दूरी पर स्वस्थ पौधे को छोड़कर अन्य पौधों को छोटी अवस्था में ही उखाड़ देना चाहिए अन्यथा पौधे का तना पतला व कमजोर बना रहेगा। घने पौधे होने पर पौधगलन रोग लगने की ज्यादा आशंका रहती है। पौध सुरक्षा पौधशाला में रस चूसने वाले कीट जैसे-माहूं, जैसिड, सफेद मक्खी एवं थ्रिप्स काफी नुकसान पहुंचाते हैं। इनकी रोकथाम के लिए नीम तेल (एन.एस.के.ई. 1500 पी. पी.एम.) की 5 मि.ली. मात्रा को प्रति लीटर पानी की दर से या 2 मि.ली. रोगोर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर बीज अंकुरण के 8-10 दिनों एवं 25-30 दिनों की अवस्था में छिड़काव करें। रोपण से पूर्व पौधशाला में पौधों को कठोर बनानायह आवश्यक है कि पौधे चाहे कहीं उगाए गये हों, उनका अनुकूलन करना अत्यंत आवश्यक है। खुले वातावरण में उगाये गये पौधों का अनुकूलन 6-7 दिनों तक पानी रोककर किया जाता है। रोपण से पूर्व पौधों की जड़ों का उपचार पौधशाला से रोप निकालने के पश्चात उसकी जड़ को उपचारित करने के लिए 10 ग्राम बाविस्टीन को 10 लीटर पानी में घोलकर तैयार कर लें। तैयार घोल में रोपा की जड़ को 10 मिनट तक डुबाकर रखें। इसके बाद खेत में लगाने के लिए प्रयोग करें। उपचारित पौध का रोपण पौध उपचार के तरन्त बाद खेत में लगायें। कद्वर्गीय सब्जियों के रोप को, जहां तक संभव हो, मेड़ बनाकर मेड़ के किनारे पर लगायें। गर्मियो में रोपा लगाने के पूर्व एवं रोपाई बाद सिंचाई अवश्य करें। वर्षा ऋतु में रोपण के बाद अवश्यकतानुसार सिंचाई करें। खेत में अनावश्यक पानी का भराव न होने दे पौध तैयार करने के लाभ मुख्य खेत खाली न होने पर एक से डेढ़ माह तक फसल को अन्य स्थान पर उगाया जा सकता है। रखरखाव आसानी से किया जा सकता है। कम अथवा ज्यादा वर्षा, तापमान, ओले, कीट व रोगों से आसानी से सुरक्षा कर सकते हैं। नर्सरी अलग जगह तैयार करने से मुख्य खेत को तैयार करने का समय मिल जाता है।