परिचय अश्वगंधा को असगंध के नाम से भी जाना जाता है। इसका वानस्पतिक नाम विथेनिया सोम्नीफेरा (Withania somnifera) है। विथेनिया की 26 प्रजातियां हैं, जिनमें से सॉम्नीफेरा तथा कोएग्मूलेंस भारत में पायी जाती हैं। व्यापारिक तौर पर खरीफ फसल के रूप में इसकी खेती राजस्थान, गुजरात एवं पश्चिमी मध्यप्रदेश में की जाती है। यह पौधा 1-2 मीटर लम्बा तथा शाखायुक्त होता है। इस की जड़ें माँसल तथा शाखायुक्त होती हैं। पत्तियाँ 10-12 से.मी. लम्बी, अण्डाकार, सवन्त तथा एकांतर विन्यास में लगी रहती हैं। पुष्प 1 से.मी. आकार के हरे-पीले रंग के होते हैं, जो पत्तियों के कक्ष में गुच्छे के रूप में लगे रहते हैं। फल 5 से 6 मि.मी. चौड़े, गोलाकार, चिकने, पीले-गुलाबी रंग के होते हैं, जो झिल्लीनुमा बाह्य दलपुंज से ढके रहते हैं। फल मांसल बेरी होता है जिसमें असंख्य मटमैले पीले बीज होते हैं। यह प्रजाति मुख्य रूप से भारत के समस्त शुष्क क्षेत्रों में बंजर भूमियों पर मैदानी भाग तथा हिमालय क्षेत्र में 1800 मीटर की उँचाई तक पाई जाती है। म.प्र. में यह नीमच, मंदसौर, रतलाम, झाबुआ, धार, रीवा तथा दमोह जिलों में पायी जाती है। इसके अतिरिक्त यह राजस्थान के नागौर, पंजाब के तराई क्षेत्रों, उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों, हरयाणा, उ.प्र., गुजरात, महाराष्ट्र तथा दिल्ली के आसपास फसल के तौर पर उगायी जाती है। उपयोगिता अश्वगंधा की जड़ का प्रयोग अनेक प्रकार की बीमारियों में किया जाता है। पत्तियों का उपयोग पेट के कीड़े मारने तथा फोड़ों को ठीक करने में किया जाता है। आंतों की सूजन, अल्सर, गठिया की सूजन, तपेदिक, बच्चों में दुर्बलता, वृद्धावस्था में कमजोरी, तंत्रिका तंत्र की थकान, मस्तिष्क की थकान, स्मरण शक्ति का नाश, मांसपेशियों में थकान, स्वप्नदोष आदि रोगों के उपचार में इसका प्रयोग किया जाता है। अश्वगंधा की जड़ों का चूर्ण बराबर मात्रा में शहद तथा घी के साथ मिलाकर नपुंसकता तथा प्रजनन से संबंधित कमजोरी में उपयोग किया जाता है। जड़ का काढ़ा प्रसूता स्त्रियों तथा वृद्ध लोगों के लिए पौष्टिक तथा स्वास्थ्यप्रद होता है। दूध उत्पन्न करने तथा दूध बढ़ाने वाली दवा के रूप में इसके बिलाइकंद तथा मुलहठी के साथ बनाये काढ़े को गाय के दूध के साथ स्त्रियों को दिया जाता है। दृष्टि दोष में इस की जड़ के चूर्ण को मुलहठी के चूर्ण के साथ मिलाकर आँवले के रस में लुगदी बनाकर प्रयोग किया जाता है। मृदा एवं जलवायु उचित जल निकासी वाली बलुई-दोमट तथा हल्की लाल-पीली मिट्टी में इसे सहज ही उगाया जा सकता है । कम उपजाऊ तथा असिंचित भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है, इसकी खेती के लिए 500 से 700 मि.मी. वर्षा वाले उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र उपयुक्त हैं। मिट्टी का pH 7.5 से 8 उपयुक्त होता है। फसल चक्र साल में दो बार रबी एवं खरीफ की फसल के रूप में इसे लगाया जाता है । प्रायः देखा गया है कि रबी की फसल के समय बोये गए पौधे उच्च गुणवत्ता युक्त होते हैं जिसमें जड़ों की मात्रा एवं एल्केलाइड की मात्रा उचित होती है। कृषि तकनीक यह मुख्य रूप से खरीफ फसल है। इसकी फसल मध्य वर्षा (650-700 मि.मी.) मे अच्छी होती है। अश्वगंधा की जवाहर– वैशाखी किस्म उत्पादन में अच्छी होती है। अश्वगंधा की खेती के लिये भूमि की अच्छी प्रकार से जुताई कर समतल कर लिया जाता है। एक हेक्टेयर हेतु 10-12 कि. ग्रा. बीज छिड़काव विधि से बुवाई करके हल्का मिला दिया जाता है। आवश्यकतानुसार पानी दिया जाता है। यह कार्य सितम्बर-अक्टूबर माह में कर लेना चाहिए। बीज की घनी बुवाई से बचने हेतु उस में रेत मिलाकर बुवाई करना चाहिए ताकि पौधों से पौधों के मध्य उचित दूरी बनी रहे। अश्वगंधा कम पानी की फसल है । अतः इसे सिचाई की ज्यादा आवश्यकता नहीं होती है। रोपण विधि रोपण तैयार करने हेतु इसे ट्रे में या 10x1x0.30 मीटर आकार की क्यारी में बोया जाता है। क्यारी में 0.5 से.मी. गहरी नालियाँ बना कर बीज बोकर उसे मिटटी से ढक दें । मल्चिंग हेतु काली पालीथीन से ढकने पर 3-4 दिन मे अंकुरण अच्छा तथा एक साथ आता है। एक दो माह में पौधे 10-12 सें.मी. की ऊँचाई के होने पर उन्हें खेत मे रोपा जाता है। पौधे से पौधे की दूरी 20-25 से.मी. तथा पंक्तियों के बीच की दूरी 30 से.मी. होना चाहिए ताकि इस में निदाई गुडाई का कार्य सुगमता से किया जा सके। 4-5 माह में फसल तैयार होती है। बीजों का संग्रहण समय-समय पर कर लिया जाता है। फसल तैयार होने पर इसकी पत्तियाँ सूखने लगती हैं तथा फल लाल होकर पक जाते हैं। जड़ों के विदोहन हेतु तने को कॉलर से काट कर अलग कर लिया जाता है तथा जड़ों को सावधानी पूर्वक खोद कर 7-10 से.मी. लम्बाई की जड़ों को काट कर या तोड़ कर साफ कर लिया जाता है, जड़ों की मोटाई , लम्बाई तथा दिखावट के आधार पर भाव का निर्धारण होता है। ऋतुजैविकी (फीनोलॉजी) पौधों में पुष्पधारण अक्टूबर-नवम्बर में होता है। फरवरी से मार्च के बीच फल पक कर तैयार हो जाते हैं। बीजों की जीवनक्षमता अवधि 12 से 18 माह तक होती है। बीजों में 3 से 6 माह की सुसुप्तावस्था होती जो समय रहते समाप्त हो जाती है । बीजों की अंकुरण क्षमता 30 से 40 प्रतिशत पायी जाती है तथा पौध प्रतिशतता 20-25 होती है। बीजों का भण्डारण वायुरोधक प्लास्टिक जार या पॉलीथीन में करने पर अधिक समय तक इनकी जीवन क्षमता (viability) बनी रहती है। बीजों का उपयोग 8-12 माह तक कर लेना चाहिए। उपचार बीजों को 100 पी.पी.एम. जी.ए.3 के घोल में 12-24 घंटे उपचारित कर रेत में बोने से उचित अंकुरण प्राप्त होता है। खेत की तैयारी खेत में गोबर की अच्छी प्रकार से सड़ी हुई खाद 2-3 टन/एकड़ बिखराकर हल द्वारा या ट्रैक्टर कल्टीवेटर द्वारा गहरी जुताई की जाती है। पाटा से मृदा भुरभुरी कर लेनी चाहिए। प्रति हेक्टेयर 5 किलो बीज को उतनी ही रेत मिलाकर छिड़काव पद्धति से बो देना चाहिए। बीजों की बुवाई के उपरान्त छिड़काव पद्धति से पानी देना चाहिए। बीजों को बोते समय यह सावधानी रखी जाए कि उन्हें 0.5 से.मी. से अधिक गहराई पर न बोया जाये । इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है कि यदि पौधों की नर्सरी तैयार की गयी हो तो खेत मे 15 से 20 से.मी. लम्बाई के पौधों को 25 से 30 सेमी दूरी पर लगाया जाए। पौधे लगाने के उपरांत मवेशियों तथा वन्य प्राणियों से विशेष रूप से सुरक्षा करना आवश्यक है। फफूंद एवं कीटों का प्रबंध भी आवश्यकतानुसार जरूरी है। पौधों की निंदाई-गुड़ाई करने से पौधों की फलधारण क्षमता बढ़ती है तथा मोटी जड़ों की संख्या में वृद्धि होती है। पौधों का घनत्व 30-60 पौधे प्रति वर्गमीटर से अधिक न हो। श्रेणीकरण (ग्रेडिंग) व्यापारिक तौर पर अश्वगंधा की जड़ों की मोटाई तथा लंबाई के आधार पर निम्नानुसार चार श्रेणियों में बांटा गया है। AGrade – 07 सेमी लंबी 1.5 सेमी व्यास की मुलायम, पूरी चमकदार, सफेद B Grade - 07 सेमी लंबी 1.5 सेमी व्यास की ठोस, चमकदार सफेद C Grade - 07 सेमी लंबी 1.5 सेमी व्यास की ठोस, कम चमकदार, कम सफेद D Grade - पतली कटी-फटी पीले रंग की चमक रहित अश्वगंधा की खेती का आर्थिक विश्लेषण (एक हेक्टेयर हेतु) 1. खेती हेतु आवश्यक बीज - लगभग 5 कि. ग्रा. 2. खेती में कुल व्यय (खेत तैयारी, बीज का मूल्य, निदाई-गुडाई, कटाई एवं प्राथमिक प्रसंस्करण आदि) – लगभग रु. 33 से 35 हजार प्रति हैक्टेयर उत्पादन प्रति हैक्टेयर अ. जड. – 500 कि. ग्रा. 3. उत्पादन प्रति हेक्टेयर अ. जड़ – 500 कि.ग्रा. ब. बीज – 30 कि.ग्रा. 4. प्रचलित बाजार दर (रु.प्रति.कि.ग्रा) बाजार जड़ बीज राष्ट्रीय बाजार रु. 170/- रु. 400/- नागपुर बाजार रु. 180/- रु. 400/ - नीमच बाजार रु. 229/- रु. 400/- उत्पाद का बाजार मूल्य एवं शुद्ध लाभ बाजार जड़ बीज योग शुद्ध लाभ राष्ट्रीय बाजार रु.85,000/- रु.12000/- रु.97,000/- रु. 64,000/- नागपुर बाजार रु.90,000/- रु. 12000/- रु. 1,02,000/- रु. 69,000/- नीमच बाजार रु.1,14,500/- रु. 12000/- रु.1,26,500/- रु. 93,500/ - ई-चरक एप्प जड़ी बूटियों, सुगधित औषधियाँ, कच्चे माल एवं इनसे संबंधित जानकारी के लिये ई-चरक (ई-मंच) का उपयोग करे। यह ऐप एंड्रोइड मोबाइल प्ले स्टोर एवं गूगल पर भी उपलब्ध है। ई-चरक एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें। औषधीय पौधों की कृषि तकनीक, प्राथमिक प्रसंस्करण एवं विपणन संबंधी अधिक जानकारी के लिये संपर्क करें । क्षेत्रीय संचालक क्षेत्रीय सह-सुविधा केन्द्र (मध्यक्षेत्र) राज्य वन अनुसंधान संस्थान, 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