कॉस्टस (कॉस्टस स्पेशिओसस) जिंजेबरेसी कुल का बारहमासी पौधा है। इसका उत्पत्ति स्थल इंडोमालयन क्षेत्र है। यह पौधा डायोसजेनिन नामक तत्व का स्रोत है, जिसका उपयोग व्यापक रूप से स्टेरॉयड हार्मोन के व्यावसायिक उत्पादन में किया जाता है। कॉस्टस को बौना शंकु अदरक, भारतीय सिर अदरक, लाल बेंत, लाल बटन अदरक आदि नामों से भी जाना जाता है। आमतौर पर ये पौधे गरम जलवायु में जीवित रहने वाले होते हैं। ये अधिक ठंड सहन नहीं कर पाते हैं। कॉस्टस के पौधे सर्पिल तनों वाले और 1-1.8 मीटर ऊंचे होते हैं। इनकी पत्तियां वैकल्पिक और सर्पिल रूप से व्यवस्थित होती हैं। अंडाकार, नुकीले शीर्ष सहित 8-25 सें.मी. लंबी व 4-10 सें.मी. चौडी पत्तियां चमकदार हरे रंग की होती हैं। कॉस्टस के फल लाल रंग की पंखडियों के साथ खिले होते हैं। पुष्पक्रम अंडाकार 5-15 सें.मी. लंबे व 2-3 सें.मी. व्यास के होते हैं, जिनमें चमकदार लाल धारियां बनी हो। कॉस्टस का पौधा सामान्यतः तटीय काजलोढ़ से लेकर भारी वनीय मृदा में उगाया जाता है। इसके लिए बलुई तथा चिकनी दोमट मृदा सबसे उपयुक्त है, जिसका पी-एच मान 5.7-7.5 होता है। जलवायु कॉस्टस सामान्यत: उष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु का पौधा है। यह समद्र तल से लगभग 1500 मीटर की ऊंचाई तक उगाया जाता है, लेकिन 400 से 600 मीटर की ऊंचाई, जहां की औसत वार्षिक वर्षा 1000 से 1500 मि.मी. के बीच हो, सबसे उपयुक्त मानी जाती है। खेती प्रवर्द्धन कॉस्टस के पौधे को बीज, स्टेम कटिंग और राइजोम से प्रवर्धित किया जाता है, लेकिन व्यावसायिक रूप से इसे प्रकंद (राइजोम) कटिंग के माध्यम से उगाया जाता है। भूमि की तैयारी खेत की 2-3 बार जुताई कर मृदा को अच्छी तरह भुरभुरी बना लिया जाता है। 15 टन प्रति हैक्टर की दर से गोबर खाद को खेत में डालकर अच्छी तरह मिलाया जाता है। 50 सें.मी. की दूरी पर कूड बनाए जाते हैं। रोपण प्रकंद के टुकड़ों को 8-10 सें.मी. की गहराई पर रखा जाता है। ध्यान रखना चाहिए कि प्रकंद की कलियां ऊपर की ओर हों। क्षैतिज रूप से इन्हें 50 सें.मी. की दूरी पर कूड़ों में रखकर मृदा से ढक दिया जाता है। रोपण के तुरंत बाद फसल की सिंचाई की जाती है। मोटे आकार के टुकड़ों में अंकुरण धीमी गति से, 40-45 दिनों में होता है। यह अक्सर इन टुकड़ों पर कलियों के सुषुप्तावस्था के कारण होता है, जो विकसित होने में समय लेती हैं। यह अधिकतर अप्रैल में रोपित फसलों में देखा जाता है। खाद एवं उर्वरक कॉस्टस एक प्रकंद फसल है और इसके बायोमास उत्पादन की भरपाई के लिए भारी खाद की आवश्यकता होती है। वल्लिककारा में किए गए एक परीक्षण के दौरान, डायोसजेनिन नामक तत्व की इस पौधे से अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए 15 टन प्रति हैक्टर गोबर खाद के साथ 45 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 30 कि.ग्रा. फॉस्फोरस एवं 30 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर को इष्टतम माना गया है। सिंचाई पौधों को विकास के लिए कुछ मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। अप्रैल में लगाए गए पौधों को मानसून के आगमन तक प्रत्येक महीने कम से कम 2-3 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। निराई एक निराई फसल की अंकुरण अवधि के दौरान तथा बाद में दो और निराइयां फसल को खरपतवारों से मुक्त रखती हैं। कटाई एवं उपज यह देखा गया है, कि जब पौधा वानस्पतिक वृद्धि की अंतिम अवस्था में होता है, तब उसमें डायोसजेनिन की मात्रा अधिकतम प्राप्त होती है। पहले वानस्पतिक भाग की कटाई की जाती है और फिर प्रकंदों की खुदाई करते हैं। ट्रैक्टरचालित कल्टीवेटर को खेत में 2 से 3 बार आड़े-तिरछे चलाएं और साथ ही उखडे हए प्रकंदों को स्वयं एकत्रित करें। ताजे प्रकंदों की उपज 28-30 टन प्रति हैक्टर होती है। औषधीय महत्व कॉस्टस एक जड़ीबूटी है, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद होती है। इसकी जड़ के तेल का इस्तेमाल दवा बनाने के लिए किया जाता है। इसके पौधे में बहुत सारे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते हैं जैसे-कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, एमाइलोज, लिपिड, विटामिन 'ए' आदि। इसमें एंटीऑक्सीडेंट घटक पाए जाते हैं, जैसे-बीटा कैरोटिन, एस्कॉर्बिक अम्ल (विटामिन 'सी'), टोकोफेरॉल आदि। इसकी जड़ का उपयोग कृमि संक्रमण के इलाज के लिए किया जाता है। पेट के रोगों व पेट के कीट के लिए कॉस्टस बहुत ही लाभकारी है। इसके लिए इसकी जड़ का पाउडर बनाकर उसे कुछ दिनों तक बच्चों को चटाएं। पाउडर की मात्रा बच्चे की उम्र के अनुरूप होनी चाहिए। इसके आवश्यक तेल में कई औषधीय गुण होते हैं। इससे हमारे शरीर के कई रोगों को खत्म किया जा सकता है। जिन लोगों में तनाव ज्यादा रहता है, उनके लिए यह बहुत असरकारक औषधि है। इसके तेल का उपयोग अस्थमा, खांसी, गैस और आंतों के गंभीर रोगों जैसे पेचिश और हैजा के लिए किया जाता है। इसका प्रयोग टॉनिक के रूप में और पाचन को उत्तेजित करने के लिए किया जाता है। सर्दी व बुखार के लिए 1/2 ग्राम कॉस्टस जड़ पाउडर को शहद के साथ देना चाहिए। यह कैंसर के इलाज में भी फायदेमंद होता है। पत्तियों के रस का उपयोग खुजली और त्वचा के रोगों के लिए किया जाता है। इसकी जड़ के पाउडर का आधे से एक ग्राम दिन में दो बार इस्तेमाल पैरालिसिस या पक्षाघात के उपचार के लिए किया जाता है। स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका(आईसीएआर), अंजली पटेल, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़।